
रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध ने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले परिवारों की जिंदगी को भी प्रभावित किया है। युद्ध में अपनों को खोने वाले परिवारों के लिए सबसे मुश्किल समय वह होता है, जब वे अपने प्रियजन के अंतिम संस्कार या धार्मिक संस्कार में भी शामिल नहीं हो पाते। ऐसी ही एक भावुक कहानी रूस से सामने आई है, जहां एक बेटी ने अपने पिता की मृत्यु के बाद हजारों किलोमीटर दूर भारत की धार्मिक नगरी काशी से जुड़कर उनके लिए धार्मिक अनुष्ठान कराया।
रूस की रहने वाली नीना ने अपने पिता एंड्रे की आत्मिक शांति के लिए काशी में त्रिपिंडी श्राद्ध और संबंधित धार्मिक कर्मकांड कराया। खास बात यह रही कि नीना खुद वाराणसी नहीं पहुंच सकीं। उन्होंने रूस से वीडियो कॉल के जरिए पूरे अनुष्ठान में भाग लिया और पुरोहितों के मार्गदर्शन में अपने पिता के लिए धार्मिक प्रक्रिया पूरी कराई।
बताया जा रहा है कि एंड्रे की मौत रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान हुई थी। युद्ध में अपने पिता को खोने के बाद नीना चाहती थीं कि उनकी धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप पिता के लिए ऐसा कर्मकांड कराया जाए, जिसे वह स्वयं भी देख और उसमें शामिल हो सकें। इसी उद्देश्य से उन्होंने काशी में पुरोहितों से संपर्क किया और ऑनलाइन माध्यम से अनुष्ठान कराया।
रूस में बैठी बेटी और काशी में पिता का श्राद्ध
वाराणसी यानी काशी को हिंदू धार्मिक परंपरा में पितरों से जुड़े कर्मकांडों और अंतिम संस्कार से संबंधित धार्मिक अनुष्ठानों के लिए विशेष महत्व प्राप्त है। यहां अलग-अलग तीर्थस्थलों पर पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध जैसे कर्म किए जाते हैं।
नीना के मामले में भी काशी में उनके पिता एंड्रे के लिए धार्मिक अनुष्ठान कराया गया। रूस में होने के कारण वह खुद काशी नहीं आ सकीं, लेकिन तकनीक ने उनके लिए यह दूरी काफी हद तक कम कर दी।
वीडियो कॉल के जरिए वह काशी में चल रहे अनुष्ठान को देखती रहीं। पुरोहितों ने धार्मिक प्रक्रिया के दौरान उन्हें आवश्यक निर्देश दिए और उन्होंने दूर रहकर अपनी ओर से संकल्प तथा अन्य प्रक्रियाओं में भाग लिया।
यह घटना इस बात का भी उदाहरण है कि आधुनिक तकनीक ने धार्मिक और पारिवारिक रस्मों में दूर बैठे लोगों की भागीदारी के नए रास्ते खोले हैं।
युद्ध में पिता को खोने का दर्द
रूस-यूक्रेन युद्ध ने दोनों देशों के लोगों के जीवन को गहराई से प्रभावित किया है। युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में सैनिकों और आम लोगों की मौत हुई है। कई परिवारों के सदस्य अपने प्रियजनों से हमेशा के लिए बिछड़ गए।
नीना के लिए भी अपने पिता एंड्रे को खोना बेहद कठिन अनुभव रहा। युद्ध जैसी परिस्थिति में किसी परिजन की मौत का दुख और भी गहरा हो जाता है, क्योंकि कई बार परिवार के सदस्य अंतिम समय में उनके पास मौजूद नहीं रह पाते।
ऐसे में धार्मिक संस्कार परिवार के लिए भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण हो सकते हैं। नीना ने भी अपने पिता के लिए धार्मिक कर्मकांड कराने का फैसला किया और इसके लिए काशी को चुना।
काशी में त्रिपिंडी श्राद्ध का महत्व
त्रिपिंडी श्राद्ध हिंदू धार्मिक परंपरा से जुड़ा एक विशेष श्राद्ध कर्म है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अनुष्ठान का संबंध पितरों की शांति और उनके लिए किए जाने वाले तर्पण से है। विभिन्न परंपराओं में इसकी प्रक्रिया और उद्देश्य की व्याख्या अलग-अलग तरीके से की जाती है।
काशी को पितृ कर्म और श्राद्ध से जुड़े महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में गिना जाता है। वाराणसी में पिशाच मोचन जैसे स्थानों पर भी पितरों के लिए विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। धार्मिक मान्यता में ऐसे कर्मों को विशेष महत्व दिया जाता है।
नीना के पिता के लिए किए गए कर्मकांड का उद्देश्य भी धार्मिक आस्था के अनुसार उनकी आत्मिक शांति के लिए प्रार्थना और पितृ कर्म पूरा करना था।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि आत्मा की मुक्ति या किसी धार्मिक अनुष्ठान के परिणाम से जुड़ी बातें आस्था और परंपरा का विषय हैं। इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
ऑनलाइन शामिल हुईं नीना
इस पूरे मामले की सबसे खास बात ऑनलाइन भागीदारी रही। नीना रूस में थीं, जबकि धार्मिक कर्मकांड काशी में किया जा रहा था। दोनों स्थानों के बीच हजारों किलोमीटर की दूरी होने के बावजूद वीडियो कॉल के माध्यम से वह अनुष्ठान से जुड़ी रहीं।
पुरोहितों ने मोबाइल या वीडियो कॉल के जरिए उन्हें प्रक्रिया दिखाई और आवश्यक जानकारी दी। इस दौरान नीना अपने पिता को याद करती रहीं और धार्मिक विधि में अपनी ओर से सहभागिता करती रहीं।
आज इंटरनेट और वीडियो कॉल की वजह से विदेश में रहने वाले लोग भी भारत में होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ सकते हैं। हालांकि, इस तरह की ऑनलाइन धार्मिक सेवाओं की स्वीकार्यता और विधि अलग-अलग परंपराओं तथा पुरोहितों के अनुसार अलग हो सकती है।
विदेशों में रहने वाले लोगों का काशी से जुड़ाव
काशी सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले भारतीय और अन्य श्रद्धालुओं के बीच भी धार्मिक महत्व रखती है। खासकर पितृ कर्म और श्राद्ध से जुड़े अनुष्ठानों के लिए विदेशों में रहने वाले लोग भी यहां पुरोहितों से संपर्क करते हैं।
10 सितंबर 2026 की एक स्थानीय रिपोर्ट में भी बताया गया कि आगामी पितृपक्ष के दौरान देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के काशी आने की उम्मीद है। रिपोर्ट के अनुसार, विदेशों में रहने वाले लोग भी पितृ कर्म से जुड़े अनुष्ठानों के लिए पहले से पुरोहितों से संपर्क कर रहे हैं।
ऐसे मामलों में कई बार श्रद्धालु खुद भारत नहीं आ पाते। इसके पीछे दूरी, उम्र, स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति, यात्रा संबंधी परेशानियां या पारिवारिक परिस्थितियां हो सकती हैं। ऐसे में कुछ लोग ऑनलाइन माध्यम से धार्मिक प्रक्रिया में शामिल होने का विकल्प चुनते हैं।
युद्ध की त्रासदी से जुड़ी एक निजी कहानी
रूस-यूक्रेन युद्ध को आम तौर पर अंतरराष्ट्रीय राजनीति, सैन्य कार्रवाई और कूटनीति के नजरिए से देखा जाता है। लेकिन युद्ध का एक मानवीय पहलू भी है, जिसमें परिवार अपने प्रियजनों को खोते हैं और उनके पीछे रह जाने वाले लोग जिंदगी भर उस दर्द के साथ जीते हैं।
नीना की कहानी इसी मानवीय पहलू को सामने लाती है। उनके पिता एंड्रे की मौत युद्ध से जुड़ी परिस्थितियों में हुई और इसके बाद बेटी ने उनके लिए धार्मिक संस्कार कराने का निर्णय लिया।
युद्ध के बीच किसी परिवार के सदस्य की मौत सिर्फ एक व्यक्तिगत नुकसान नहीं होती। परिवार को अंतिम संस्कार, दस्तावेजी प्रक्रिया और कई दूसरी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ सकता है। कई बार दूरी और परिस्थितियां पारंपरिक तरीके से अंतिम संस्कार या धार्मिक कर्म में शामिल होने की संभावना भी खत्म कर देती हैं।
ऐसे में नीना द्वारा काशी से ऑनलाइन जुड़ना उनके लिए अपने पिता के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का एक माध्यम बना।
धार्मिक परंपरा और आधुनिक तकनीक का मेल
इस घटना में एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि पारंपरिक धार्मिक कर्मकांड और आधुनिक तकनीक एक साथ दिखाई देते हैं।
एक तरफ काशी में पुरोहित पारंपरिक विधि-विधान के अनुसार अनुष्ठान कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर रूस में बैठी बेटी वीडियो कॉल के माध्यम से इस प्रक्रिया से जुड़ी थी।
कुछ वर्ष पहले ऐसी स्थिति में परिवार के सदस्य को भारत आकर ही अनुष्ठान में शामिल होना पड़ सकता था। लेकिन अब वीडियो कॉल और डिजिटल संचार के जरिए दूर रहने वाले लोग कम से कम दृश्य और संवाद के स्तर पर धार्मिक प्रक्रिया से जुड़ सकते हैं।
हालांकि, धार्मिक दृष्टि से ऑनलाइन भागीदारी की वैधता या पर्याप्तता को लेकर अलग-अलग मत हो सकते हैं। किसी भी अनुष्ठान की वास्तविक धार्मिक प्रक्रिया संबंधित परंपरा और पुरोहित के मार्गदर्शन पर निर्भर करती है।
पितृ कर्म को लेकर काशी की विशेष पहचान
काशी सदियों से धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रही है। यहां गंगा घाटों, मंदिरों और विभिन्न तीर्थ स्थलों पर अनेक प्रकार के धार्मिक कर्मकांड किए जाते हैं।
पितरों के लिए तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान जैसी परंपराओं का उल्लेख हिंदू धार्मिक संस्कृति में मिलता है। काशी के अलावा गया, प्रयागराज और देश के कई अन्य तीर्थस्थल भी पितृ कर्म के लिए प्रसिद्ध हैं।
त्रिपिंडी श्राद्ध को लेकर विभिन्न धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं। कुछ धार्मिक स्रोत इसे ऐसे पितरों के लिए किए जाने वाले कर्म के रूप में बताते हैं जिनसे संबंधित श्राद्ध या उत्तरक्रिया में किसी प्रकार की बाधा रही हो।
इसलिए किसी व्यक्ति के लिए यह अनुष्ठान केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि अपने दिवंगत परिजन के प्रति श्रद्धा और स्मरण व्यक्त करने का माध्यम भी हो सकता है।
पिता की याद में भावुक हुआ परिवार
किसी प्रियजन की मौत के बाद अंतिम धार्मिक संस्कार से जुड़ना परिवार के लिए भावनात्मक प्रक्रिया होती है। नीना के लिए यह अनुभव इसलिए और भी कठिन रहा होगा क्योंकि वह अपने पिता के पास मौजूद नहीं थीं।
रूस से काशी की दूरी हजारों किलोमीटर है, लेकिन वीडियो कॉल ने उन्हें कम से कम उस धार्मिक प्रक्रिया को अपनी आंखों से देखने और उसमें संवाद के माध्यम से शामिल होने का अवसर दिया।
काशी में पिता के लिए अनुष्ठान होते देखना उनके लिए अपने पिता को अंतिम श्रद्धांजलि देने जैसा अनुभव रहा होगा। हालांकि उनके निजी भावों और अनुभवों के बारे में वही बातें कही जानी चाहिए जिनकी पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों से होती है।
विदेश से ऑनलाइन धार्मिक अनुष्ठान का बढ़ता चलन
डिजिटल तकनीक ने धार्मिक सेवाओं के स्वरूप में भी बदलाव किया है। विदेशों में रहने वाले लोग अब भारत में अपने परिवार या पूर्वजों से जुड़े धार्मिक कर्मों के लिए स्थानीय पुरोहितों से ऑनलाइन संपर्क कर सकते हैं।
कुछ धार्मिक सेवा प्रदाता वीडियो कॉल के माध्यम से पूजा और श्राद्ध कर्म में दूर बैठे लोगों की भागीदारी की सुविधा देते हैं। हालांकि, इन सेवाओं की प्रक्रिया, धार्मिक मान्यता और गुणवत्ता अलग-अलग हो सकती है, इसलिए परिवारों को संबंधित पुरोहित या विश्वसनीय धार्मिक संस्था से पूरी जानकारी लेकर ही निर्णय लेना चाहिए।
नीना के मामले में भी तकनीक ने उनके लिए एक ऐसा रास्ता उपलब्ध कराया, जिससे वह रूस में रहते हुए काशी में हो रहे धार्मिक अनुष्ठान से जुड़ सकीं।
एक बेटी की श्रद्धा ने जोड़ दिए दो देश
रूस और भारत के बीच हजारों किलोमीटर की दूरी है। दोनों देशों की भाषा, संस्कृति और धार्मिक परंपराएं भी अलग हैं। लेकिन किसी अपने को खोने का दर्द किसी सीमा में बंधा नहीं होता।
नीना ने अपने पिता एंड्रे की याद में काशी में धार्मिक कर्मकांड कराया। वह खुद भारत नहीं आ सकीं, लेकिन वीडियो कॉल के जरिए इस प्रक्रिया का हिस्सा बनीं।
यह घटना जहां एक तरफ रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़े एक परिवार के निजी दुख को सामने लाती है, वहीं दूसरी तरफ यह भी दिखाती है कि आधुनिक तकनीक ने दूर बैठे लोगों को धार्मिक और पारिवारिक परंपराओं से जुड़ने का नया माध्यम दिया है।
काशी में पिता के लिए कराया गया यह अनुष्ठान नीना के लिए अपने दिवंगत पिता को श्रद्धांजलि देने का एक तरीका बना। युद्ध ने उनके परिवार से एक सदस्य छीन लिया, लेकिन हजारों किलोमीटर दूर बैठी बेटी ने तकनीक के सहारे अपने पिता की स्मृति और धार्मिक परंपरा से खुद को जोड़ने की कोशिश की।