
देश में राजनीतिक दलों की संख्या हजारों में है, लेकिन इनमें से सभी दल चुनावी राजनीति में उतने सक्रिय नजर नहीं आते, जितनी बड़ी उनकी वित्तीय गतिविधियां दिखाई देती हैं। राजनीतिक फंडिंग को लेकर सामने आई एक पड़ताल ने ऐसे ही कुछ पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों यानी Registered Unrecognised Political Parties (RUPPs) के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
पड़ताल में ऐसे राजनीतिक दलों के बारे में जानकारी सामने आई है, जिन्हें एक ही वित्तीय वर्ष में करोड़ों और कुछ मामलों में सैकड़ों करोड़ रुपये का चंदा मिला, लेकिन चुनावी मैदान में उनकी मौजूदगी बेहद सीमित रही। कुछ मामलों में संबंधित दलों के पंजीकृत कार्यालय भी बंद मिले या वहां राजनीतिक गतिविधि के स्पष्ट संकेत दिखाई नहीं दिए।
सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ पार्टियों को सैकड़ों करोड़ रुपये का चंदा मिलने के बावजूद उन्होंने लोकसभा चुनाव में केवल एक, दो या कुछ ही उम्मीदवार मैदान में उतारे। इससे राजनीतिक फंडिंग की पारदर्शिता, चंदे के इस्तेमाल और टैक्स नियमों के संभावित दुरुपयोग को लेकर सवाल खड़े हुए हैं।
क्या होती हैं RUPPs?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि Registered Unrecognised Political Party यानी RUPP आखिर होती क्या है।
ऐसी राजनीतिक पार्टियां चुनाव आयोग के साथ पंजीकृत होती हैं, लेकिन उन्हें अभी राष्ट्रीय या राज्य स्तर की मान्यता प्राप्त नहीं होती। देश में ऐसी पार्टियों की संख्या काफी ज्यादा है।
चुनाव आयोग ने जून 2025 में बताया था कि देश में 2,800 से अधिक RUPPs पंजीकृत थीं। आयोग ने उन पार्टियों के खिलाफ भी प्रक्रिया शुरू की थी, जिन्होंने छह वर्षों से कोई चुनाव नहीं लड़ा था और जिनके कार्यालय भौतिक रूप से भी खोजे नहीं जा सके थे। शुरुआती चरण में 345 ऐसी पार्टियों को सूची से हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई थी।
यानी हर पंजीकृत राजनीतिक दल का चुनावी राजनीति में सक्रिय होना जरूरी नहीं है। लेकिन जब किसी ऐसी पार्टी के खाते में करोड़ों रुपये का चंदा दिखाई देता है और उसकी जमीनी गतिविधियां बेहद सीमित नजर आती हैं, तो स्वाभाविक रूप से पारदर्शिता और फंड के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठते हैं।
एक पार्टी को मिला 330 करोड़ रुपये का चंदा
पड़ताल में गुजरात की सत्यवादी रक्षक पार्टी का मामला सामने आया। रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी को वित्त वर्ष 2023-24 में करीब 330 करोड़ रुपये का चंदा मिला था।
इतनी बड़ी रकम मिलने के बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने केवल एक उम्मीदवार को मैदान में उतारा।
पार्टी के ऑडिट रिकॉर्ड के अनुसार, चुनाव प्रचार पर करीब 8.48 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जबकि लगभग 316 करोड़ रुपये का खर्च ‘जनकल्याण’ के नाम पर दिखाया गया।
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतनी बड़ी रकम का इस्तेमाल किस तरह और किन गतिविधियों पर किया गया। जब पड़ताल करने वाली टीम ने पार्टी के पंजीकृत कार्यालय का जायजा लेने की कोशिश की, तो वहां कोई सक्रिय राजनीतिक कार्यालय जैसा माहौल दिखाई नहीं दिया।
रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात के आनंद शहर में पार्टी का पंजीकृत कार्यालय एक फ्लैट में बताया गया था, लेकिन दरवाजे पर ताला लगा था और बाहर पार्टी की गतिविधियों से जुड़ा कोई स्पष्ट बोर्ड या पोस्टर भी नजर नहीं आया।
आम जनमत पार्टी को 620 करोड़ रुपये
एक और मामला आम जनमत पार्टी का सामने आया, जिसे वित्त वर्ष 2023-24 में लगभग 620 करोड़ रुपये का चंदा मिलने की जानकारी सामने आई।
यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे एक साल पहले यानी 2022-23 में पार्टी को करीब 216 करोड़ रुपये मिले थे। यानी एक ही साल में चंदे की रकम में बहुत बड़ा उछाल दिखाई दिया।
लेकिन इतनी बड़ी वित्तीय गतिविधि के बावजूद पार्टी की जमीनी राजनीतिक मौजूदगी को लेकर सवाल उठे।
पड़ताल में पार्टी के पूर्व पदाधिकारियों और वर्तमान स्थिति को लेकर भी कई सवाल सामने आए। रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी की संस्थापक अध्यक्ष अनामिका पासवान ने दावा किया कि उन्होंने 2022 में ही पार्टी से इस्तीफा दे दिया था।
उनकी ओर से यह भी बताया गया कि पार्टी ने अपना आधार पटना से अहमदाबाद स्थानांतरित कर लिया था और बाद में गौरव मिश्रा को अध्यक्ष बनाए जाने की बात सामने आई।
जब अहमदाबाद में पार्टी के पंजीकृत कार्यालय की पड़ताल की गई तो वहां भी गतिविधियों को लेकर सवाल उठे।
बंद कार्यालय ने बढ़ाई चिंता
राजनीतिक दल का कार्यालय उसकी संगठनात्मक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र होता है। आम तौर पर किसी सक्रिय राजनीतिक दल के कार्यालय में कार्यकर्ताओं की आवाजाही, बैठकें, सदस्यता अभियान, चुनावी तैयारी या अन्य संगठनात्मक गतिविधियां दिखाई दे सकती हैं।
लेकिन पड़ताल में जिन कुछ RUPPs का जिक्र किया गया, उनमें पंजीकृत कार्यालय बंद मिले।
गरीब कल्याण पार्टी का उदाहरण भी इसी संदर्भ में सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार, इस पार्टी को 2023-24 में करीब 138 करोड़ रुपये का चंदा मिला था और उसने लोकसभा चुनाव में तीन उम्मीदवार उतारे थे।
इसके बावजूद पार्टी का कार्यालय बंद मिला। पार्टी के अध्यक्ष से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन कार्यालय स्तर पर सक्रिय राजनीतिक गतिविधि का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला।
ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि यदि किसी पार्टी के पास करोड़ों रुपये का फंड है, तो उसकी संगठनात्मक गतिविधियां जमीन पर इतनी सीमित क्यों दिखाई देती हैं?
छह पार्टियों को मिला बड़ा चंदा
पड़ताल में छह प्रमुख RUPPs पर विशेष ध्यान दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2023-24 में इन छह पार्टियों को मिलने वाला चंदा इतना अधिक था कि इनकी कुल आय कई स्थापित राजनीतिक दलों से भी ज्यादा बैठती थी।
इसके बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में इन छह पार्टियों ने कुल मिलाकर सिर्फ 15 उम्मीदवार मैदान में उतारे।
तुलना करें तो भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर पांच अन्य राष्ट्रीय पार्टियों ने मिलकर 893 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे थे।
यह तुलना अपने आप में यह साबित नहीं करती कि इन RUPPs ने कोई गैरकानूनी काम किया है। लेकिन इतनी बड़ी वित्तीय गतिविधि और सीमित चुनावी सक्रियता के बीच का अंतर राजनीतिक फंडिंग की व्यवस्था पर सवाल जरूर खड़ा करता है।
आखिर इतना पैसा आ कहां से रहा है?
राजनीतिक दलों को चंदा मिलना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। भारत में राजनीतिक दलों को निर्धारित नियमों के तहत दान प्राप्त करने की व्यवस्था है।
समस्या तब पैदा होती है जब किसी पार्टी को मिलने वाले बड़े चंदे और उसके वास्तविक राजनीतिक कामकाज के बीच बहुत बड़ा अंतर दिखाई दे।
पड़ताल में विशेषज्ञों और टैक्स मामलों से जुड़े लोगों ने इस अंतर की संभावित वजह के रूप में राजनीतिक दलों को मिलने वाली टैक्स छूट का मुद्दा उठाया।
राजनीतिक दलों की आय को कानून में निर्धारित शर्तों के तहत टैक्स में छूट मिल सकती है। वहीं पात्र राजनीतिक चंदे पर दान देने वाले व्यक्ति को भी आयकर कानून के तहत निर्धारित प्रावधानों के अनुसार टैक्स लाभ मिल सकता है।
यही व्यवस्था यदि नियमों के बाहर जाकर इस्तेमाल की जाए तो फर्जी या संदिग्ध चंदे का रास्ता खुल सकता है।
फर्जी चंदे के जरिए टैक्स लाभ का आरोप
पड़ताल में विशेषज्ञों ने एक कथित मॉडल का जिक्र किया जिसमें किसी व्यक्ति द्वारा राजनीतिक दल को चंदा देने के बदले उसे टैक्स लाभ मिलता है और कथित तौर पर बाद में रकम का एक हिस्सा किसी अन्य माध्यम से वापस किया जा सकता है।
इस तरह के आरोपों को सामान्य राजनीतिक चंदे से अलग समझना जरूरी है।
यदि कोई व्यक्ति वास्तव में राजनीतिक दल को चंदा देता है और कानून के तहत मिलने वाली टैक्स छूट का लाभ लेता है, तो वह अपने आप में अपराध नहीं है। लेकिन यदि चंदा केवल कागजों पर दिखाया जाए और रकम को किसी अन्य तरीके से वापस करने या स्थानांतरित करने की व्यवस्था हो, तो मामला संभावित टैक्स चोरी और वित्तीय अनियमितता की जांच के दायरे में आ सकता है।
ऐसे आरोपों की पुष्टि प्रत्येक मामले के दस्तावेजों और जांच के आधार पर ही हो सकती है।
इनकम टैक्स विभाग की कार्रवाई का भी जिक्र
पड़ताल में आयकर विभाग से जुड़ी कार्रवाई का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, विभाग ने संदिग्ध RUPPs से जुड़े कथित फर्जी चंदे और वित्तीय लेनदेन की जांच की है।
एक आंतरिक दस्तावेज के हवाले से दावा किया गया कि वर्ष 2022 से विभाग ने हजारों करोड़ रुपये के कथित फर्जी राजनीतिक चंदे की पहचान की है। दस्तावेज में लगभग 5,591 करोड़ रुपये के संदिग्ध फर्जी दान और इनमें से करीब 2,749 करोड़ रुपये की वसूली का उल्लेख बताया गया है।
इसके अलावा करीब 665 करोड़ रुपये के विदेशी लेनदेन की भी पहचान किए जाने का दावा किया गया है।
हालांकि, ऐसे आंकड़ों को अंतिम और सार्वभौमिक सरकारी आंकड़ा मानने से पहले संबंधित सरकारी विभागों की आधिकारिक पुष्टि जरूरी है। पड़ताल में भी संबंधित अधिकारियों और संस्थाओं से इन दावों पर प्रतिक्रिया मांगे जाने की बात सामने आई है।
हवाला और फर्जी रसीदों से जुड़े आरोप
आयकर विभाग ने दिसंबर 2025 में RUPPs से जुड़े संदिग्ध वित्तीय लेनदेन को लेकर एक प्रेस रिलीज जारी की थी। इसमें विभाग ने कार्रवाई से मिले सबूतों के आधार पर कुछ राजनीतिक दलों के इस्तेमाल को फंड ट्रांसफर, हवाला लेनदेन, सीमा-पार धन हस्तांतरण और कथित फर्जी चंदे की रसीदों से जोड़ने की बात कही थी।
विभाग के अनुसार, कुछ ऐसी पार्टियां भी सामने आई थीं जो अपने पंजीकृत पते पर काम नहीं कर रही थीं और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय नहीं थीं।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी जांच में किसी श्रेणी की पार्टियों के खिलाफ अनियमितताओं के उदाहरण सामने आने का अर्थ यह नहीं है कि हर RUPP संदिग्ध या अवैध है।
हजारों पंजीकृत दलों में से प्रत्येक पार्टी की स्थिति उसके अपने रिकॉर्ड और कानूनी अनुपालन के आधार पर तय होगी।
चार पार्टियों के कार्यालय एक ही इलाके में
पड़ताल का एक और दिलचस्प पहलू यह था कि छह प्रमुख RUPPs में से चार के पंजीकृत कार्यालय गुजरात के एक ही इलाके में बताए गए।
ऐसे में यह सवाल उठा कि क्या इन पार्टियों की प्रशासनिक या वित्तीय व्यवस्था के बीच किसी प्रकार का संबंध है।
सिर्फ एक इलाके में कार्यालय होना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। किसी भी संगठन के लिए एक ही क्षेत्र में कार्यालय होना संभव है। लेकिन यदि अलग-अलग राजनीतिक दलों के वित्तीय रिकॉर्ड, पदाधिकारी, अकाउंटिंग व्यवस्था या संचालन के बीच अन्य समानताएं भी मिलें, तो जांच एजेंसियों के लिए यह महत्वपूर्ण तथ्य बन सकता है।
चार्टर्ड अकाउंटेंट की भूमिका पर सवाल
पड़ताल में कुछ मामलों में चार्टर्ड अकाउंटेंट यानी CA की भूमिका का भी उल्लेख किया गया।
कुछ विशेषज्ञों और अधिकारियों के हवाले से कहा गया कि कुछ संदिग्ध राजनीतिक दलों की वित्तीय गतिविधियों में अकाउंटिंग पेशेवरों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
यहां भी किसी पूरे पेशे या सभी चार्टर्ड अकाउंटेंट पर सवाल नहीं लगाया जा सकता। अधिकांश पेशेवर कानून के दायरे में काम करते हैं।
मामला केवल उन विशिष्ट मामलों से जुड़ा है जहां किसी जांच में वित्तीय लेनदेन, दस्तावेजों या चंदे की व्यवस्था में संभावित अनियमितता के संकेत मिलें।
चुनाव आयोग ने भी की है कार्रवाई
राजनीतिक दलों की सक्रियता को लेकर चुनाव आयोग पहले भी कार्रवाई कर चुका है।
2025 में चुनाव आयोग ने 345 RUPPs को सूची से हटाने की प्रक्रिया शुरू की थी। आयोग ने कहा था कि इन पार्टियों ने 2019 के बाद छह वर्षों तक एक भी चुनाव नहीं लड़ा था और उनके कार्यालयों का भौतिक सत्यापन भी नहीं हो सका था।
आयोग की कार्रवाई का मुख्य आधार चुनावी गतिविधि और कार्यालय से जुड़े नियमों का पालन था। इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल पंजीकरण होना पर्याप्त नहीं है; राजनीतिक दलों को निर्धारित शर्तों का पालन भी करना पड़ता है।
राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता क्यों जरूरी?
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की फंडिंग बेहद महत्वपूर्ण विषय है। चुनाव लड़ने, संगठन चलाने और राजनीतिक गतिविधियां संचालित करने के लिए धन की आवश्यकता होती है।
लेकिन जनता के लिए यह जानना भी जरूरी है कि राजनीतिक दलों को पैसा कहां से मिल रहा है और उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए किया जा रहा है।
पारदर्शिता की कमी से कई तरह के सवाल पैदा हो सकते हैं। बड़े चंदे और सीमित राजनीतिक गतिविधि के बीच अंतर हो तो संदेह बढ़ना स्वाभाविक है।
इसीलिए राजनीतिक चंदे की रिपोर्टिंग, ऑडिट, आयकर नियमों और चुनाव आयोग की निगरानी का महत्व बढ़ जाता है।
क्या हर छोटी राजनीतिक पार्टी संदिग्ध है?
बिल्कुल नहीं।
किसी पार्टी का छोटा संगठन होना, कम चुनाव लड़ना या किसी छोटे कार्यालय से काम करना अपने आप में उसे फर्जी साबित नहीं करता।
भारत में कई राजनीतिक दल सीमित संसाधनों के साथ काम करते हैं और स्थानीय या क्षेत्रीय मुद्दों पर राजनीति करते हैं। कुछ पार्टियां चुनाव में सीमित उम्मीदवार उतार सकती हैं और फिर भी वैध राजनीतिक संगठन हो सकती हैं।
सवाल तब उठता है जब किसी पार्टी की वित्तीय गतिविधियां उसके सार्वजनिक राजनीतिक कामकाज से पूरी तरह असंगत दिखाई दें और साथ ही उसके रिकॉर्ड, कार्यालय, चंदे और खर्च को लेकर पर्याप्त पारदर्शिता न हो।
बड़े राजनीतिक दलों से भी अलग तस्वीर
पड़ताल में यह तुलना भी सामने आई कि कुछ RUPPs की आय इतनी अधिक थी कि वे कई स्थापित राष्ट्रीय दलों की तुलना में भी बड़े वित्तीय आंकड़े दिखा रही थीं।
यह स्थिति अपने आप में भारतीय चुनावी राजनीति के बदलते वित्तीय परिदृश्य को दर्शाती है।
जहां एक ओर बड़े राजनीतिक दलों के पास व्यापक संगठन, लाखों कार्यकर्ता और देशभर में चुनावी गतिविधियां होती हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ अपेक्षाकृत अज्ञात दलों के पास करोड़ों रुपये का फंड दिखाई देना स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा करता है।
आगे क्या होना चाहिए?
ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण है कि आरोपों और तथ्यों के बीच अंतर रखा जाए।
यदि किसी राजनीतिक दल के खिलाफ वित्तीय अनियमितता के पर्याप्त संकेत हैं, तो संबंधित एजेंसियों को रिकॉर्ड की जांच करनी चाहिए। बैंक लेनदेन, चंदा देने वालों की जानकारी, ऑडिट रिपोर्ट, आयकर रिटर्न, चुनावी खर्च और पार्टी की वास्तविक गतिविधियों को एक साथ देखकर तस्वीर स्पष्ट हो सकती है।
इसके साथ ही राजनीतिक दलों को भी अपने वित्तीय रिकॉर्ड सार्वजनिक और पारदर्शी तरीके से प्रस्तुत करने चाहिए।
लोकतंत्र में पैसे की पारदर्शिता सबसे जरूरी
राजनीतिक दल लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसलिए उनके वित्तीय स्रोतों को लेकर जनता का भरोसा कायम रहना बेहद जरूरी है।
कागजों पर करोड़ों रुपये का चंदा, सीमित चुनावी गतिविधियां और बंद कार्यालय जैसे तथ्य अगर एक साथ दिखाई देते हैं तो वे निश्चित रूप से व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हैं। लेकिन किसी पार्टी को दोषी घोषित करने के लिए केवल इन संकेतों से आगे बढ़कर ठोस जांच और कानूनी निष्कर्ष जरूरी हैं।
RUPPs को लेकर सामने आई यह पड़ताल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ कुछ पार्टियों की कहानी नहीं, बल्कि राजनीतिक फंडिंग की पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता पर बहस को आगे बढ़ाती है।
देश में राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे, उनके खर्च और टैक्स लाभ की व्यवस्था जितनी पारदर्शी होगी, लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा उतना ही मजबूत होगा।
फिलहाल इस मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि जिन पार्टियों के पास करोड़ों रुपये का चंदा पहुंच रहा है, उनकी वास्तविक राजनीतिक गतिविधियां कितनी व्यापक हैं और उन पैसों का इस्तेमाल किस तरह किया जा रहा है। इन सवालों के अंतिम जवाब संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड, जांच और नियामक संस्थाओं की कार्रवाई से ही सामने आएंगे।