
रिटायरमेंट से 5 दिन पहले IAS अधिकारी के खिलाफ FIR, करोड़ों के प्लॉट को लाखों में देने का आरोप
हरियाणा में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी रहे डी. सुरेश से जुड़ा भूखंड आवंटन का मामला एक बार फिर चर्चा में है। राज्य के एंटी करप्शन ब्यूरो यानी ACB ने भूखंडों के कथित गलत आवंटन और पद के दुरुपयोग से जुड़े मामले में पूर्व IAS अधिकारी डी. सुरेश समेत नौ लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है। यह मामला इसलिए भी सुर्खियों में आया क्योंकि FIR उनके निर्धारित रिटायरमेंट से कुछ दिन पहले दर्ज हुई थी।
मामले में आरोप है कि हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण यानी HSVP से संबंधित कुछ भूखंडों को विस्थापित या ओस्टिज कोटा के तहत ऐसे तरीके से आवंटित किया गया, जिसमें निर्धारित नियमों और कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। जांच एजेंसी के मुताबिक, एक भूखंड की वास्तविक बाजार कीमत कई करोड़ रुपये बताई गई, जबकि उसका आवंटन बेहद कम रकम पर किए जाने का आरोप है।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि FIR में लगाए गए आरोप अभी जांच के दायरे में हैं। किसी व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज होना अपने आप में अपराध साबित होने के बराबर नहीं है। मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण के अंतर्गत आने वाले भूखंडों के आवंटन से जुड़ा है। ACB की जांच के अनुसार, दो अलग-अलग भूखंडों के आवंटन में कथित तौर पर नियमों की अनदेखी की गई।
रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से एक मामला गुरुग्राम के सेक्टर-40 से संबंधित है। दूसरा भूखंड सेक्टर-39 में स्थित बताया गया है। जांच एजेंसी का आरोप है कि इन भूखंडों को ओस्टिज कोटा के तहत आवंटित करने की प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुईं।
ओस्टिज यानी विस्थापित व्यक्ति कोटा का उद्देश्य उन लोगों को कुछ परिस्थितियों में राहत या पुनर्वास से जुड़ी सुविधा देना है, जिनकी जमीन या संपत्ति सरकारी परियोजनाओं अथवा अन्य निर्धारित कारणों से प्रभावित हुई हो। इस श्रेणी में भूखंड आवंटन के लिए निर्धारित पात्रता और दस्तावेजी प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक होता है।
ACB को संदेह है कि संबंधित मामलों में इन नियमों का पालन सही तरीके से नहीं किया गया।
करोड़ों की संपत्ति लाखों में देने का आरोप
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भूखंड की कीमत से जुड़ा है। आरोप है कि करीब 3.5 करोड़ रुपये मूल्य के बताए जा रहे एक भूखंड को लगभग 6.71 लाख रुपये में आवंटित कर दिया गया।
यदि जांच में यह आरोप सही साबित होता है, तो सरकारी संपत्ति के मूल्यांकन और उसके आवंटन की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं। हालांकि, किसी भूखंड की वास्तविक बाजार कीमत और आवंटन मूल्य अलग-अलग कानूनी एवं प्रशासनिक मानकों पर आधारित हो सकते हैं। इसलिए केवल बाजार कीमत और आवंटन कीमत के अंतर को अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
ACB की जांच का मुख्य विषय यही है कि क्या भूखंड का आवंटन निर्धारित नियमों के अनुसार हुआ था और क्या संबंधित अधिकारियों ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल नियमों के विपरीत किया।
सेक्टर-40 के भूखंड को लेकर क्या आरोप?
ACB के अनुसार, गुरुग्राम के सेक्टर-40 में एक भूखंड के आवंटन को लेकर भी गंभीर सवाल उठे हैं। जांच एजेंसी का अनुमान है कि यदि यह भूखंड सामान्य प्रक्रिया के तहत ई-नीलामी के जरिए बेचा जाता, तो राज्य सरकार को लगभग चार करोड़ रुपये तक का राजस्व प्राप्त हो सकता था।
आरोप है कि इसके बजाय भूखंड को ओस्टिज कोटा के माध्यम से आवंटित कर दिया गया।
जांच में यह भी सामने आया कि संबंधित आवंटन पत्र जारी होने के बाद भूखंडों को दूसरे लोगों को बेच दिया गया। ACB इसी लेन-देन को भी अपनी जांच का हिस्सा बना रही है।
यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी जमीन या HSVP के भूखंडों के आवंटन में पात्रता, आरक्षण श्रेणी, भुगतान और हस्तांतरण से जुड़े नियमों का पालन आवश्यक होता है।
सेक्टर-39 के भूखंड का मामला
दूसरा मामला गुरुग्राम के सेक्टर-39 में स्थित भूखंड नंबर 257ए से जुड़ा बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार यह चार मरला यानी लगभग 100 वर्ग गज का भूखंड था।
जांच एजेंसी के अनुसार, इस भूखंड का आवंटन 29 मई 2019 को श्याम सिंह नामक व्यक्ति के नाम किया गया था। ACB का आरोप है कि यह आवंटन उस समय हुआ जब संबंधित पात्रता को लेकर कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं थी और हाईकोर्ट के एक फैसले के विपरीत आवंटन किए जाने का सवाल उठा।
यही कारण है कि ACB ने संबंधित अधिकारियों और अन्य व्यक्तियों की भूमिका की जांच शुरू की।
शिकायत के बाद शुरू हुई जांच
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जून 2024 में कन्हई गांव के एक व्यक्ति की ओर से भूखंड आवंटन से संबंधित शिकायत की गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जरूरी राशि जमा किए बिना भी भूखंड के आवंटन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।
इसके बाद मामले की जांच हुई और दस्तावेजों तथा आवंटन प्रक्रिया की समीक्षा की गई।
जांच एजेंसी ने कथित अनियमितताओं के आधार पर पूर्व IAS अधिकारी डी. सुरेश सहित कई लोगों को आरोपी बनाया।
ACB की कार्रवाई से यह संकेत मिलता है कि एजेंसी केवल भूखंड के बाजार मूल्य और आवंटन मूल्य के अंतर की जांच नहीं कर रही, बल्कि यह भी देख रही है कि आवेदन से लेकर आवंटन और बाद में भूखंड के हस्तांतरण तक पूरी प्रक्रिया में किस-किस व्यक्ति की भूमिका रही।
FIR में कुल नौ आरोपी
रिपोर्टों के मुताबिक इस मामले में कुल नौ लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। इनमें पूर्व IAS अधिकारी डी. सुरेश के अलावा एक अन्य पूर्व IAS अधिकारी गिरीश कुमार, जिला अटॉर्नी अनिल कुमार और अधीक्षक नितिन हुड्डा समेत अन्य लोग शामिल हैं।
ACB अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि भूखंडों के आवंटन से जुड़े निर्णय किस स्तर पर लिए गए और किन अधिकारियों ने फाइलों पर कार्रवाई की।
किसी भी प्रशासनिक मामले में केवल अंतिम आदेश जारी करने वाले अधिकारी की भूमिका ही नहीं, बल्कि पूरी फाइल प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों और लाभार्थियों की भूमिका भी जांच का विषय बन सकती है।
डी. सुरेश के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
डी. सुरेश हरियाणा कैडर के 1995 बैच के IAS अधिकारी रहे हैं। उन्होंने राज्य प्रशासन में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। 2025 में जारी हरियाणा सरकार के एक प्रशासनिक फेरबदल में उनका नाम भी महत्वपूर्ण पदों के साथ सामने आया था।
हालिया घटनाक्रम में उनके खिलाफ FIR का मामला उस समय सामने आया जब उनकी सेवा समाप्त होने का समय बेहद करीब था। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में भी इस मामले से संबंधित कार्यवाही हुई।
एक रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार ने अदालत के समक्ष कहा था कि यदि जांच के दौरान डी. सुरेश की हिरासत की आवश्यकता पड़ती है तो उन्हें सात दिन का अग्रिम नोटिस दिया जाएगा। अदालत में यह भी बताया गया था कि FIR में कुल नौ आरोपियों को शामिल किया गया है।
पहले भी ACB के निशाने पर रहे हैं डी. सुरेश
मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि डी. सुरेश का नाम HSVP से जुड़े अन्य कथित अनियमितता मामलों में भी सामने आ चुका है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, गुरुग्राम में उनके खिलाफ यह तीसरा ACB मामला बताया गया है। इससे पहले सेक्टर-23 में जब्त किए गए एक भूखंड को गलत तरीके से आवंटित किए जाने से संबंधित मामले में भी उनका नाम आरोपी के तौर पर सामने आया था।
हालांकि अलग-अलग मामलों में लगाए गए आरोपों को स्वतंत्र रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता। प्रत्येक मामले में जांच, सबूत और न्यायिक प्रक्रिया का अपना महत्व है।
सरकारी जमीन और आवंटन प्रक्रिया पर सवाल
इस पूरे मामले ने सरकारी भूखंडों के आवंटन की प्रक्रिया को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
सरकारी प्राधिकरणों के पास बड़ी मात्रा में जमीन होती है। इन जमीनों का आवंटन अलग-अलग श्रेणियों, योजनाओं और नीतियों के तहत किया जाता है। यदि किसी विशेष कोटे का इस्तेमाल पात्र व्यक्ति के बजाय किसी अन्य व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के लिए किया जाता है, तो इससे सरकारी राजस्व और नीति की विश्वसनीयता दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
इसी वजह से भूखंड आवंटन के मामलों में दस्तावेजों की जांच, पात्रता का सत्यापन, भुगतान की पुष्टि और आवंटन के बाद होने वाले हस्तांतरण पर निगरानी महत्वपूर्ण होती है।
क्या सिर्फ कम कीमत पर आवंटन अपराध है?
यह सवाल इस मामले में खास तौर पर महत्वपूर्ण है।
किसी सरकारी योजना के तहत भूखंड का आवंटन बाजार मूल्य से कम कीमत पर होना अपने आप में अवैध नहीं माना जा सकता। सरकार कई योजनाओं में निर्धारित वर्गों को रियायती दर पर जमीन या संपत्ति उपलब्ध कराती है।
लेकिन यदि आरोप यह हो कि किसी ऐसे व्यक्ति को लाभ दिया गया जो पात्र नहीं था, या नियमों को बदलकर अथवा नजरअंदाज करके आवंटन किया गया, तो मामला अलग हो जाता है।
इसलिए ACB की जांच में केवल यह नहीं देखा जाएगा कि भूखंड कितने में आवंटित हुआ, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि आवंटन किस नियम के तहत किया गया, लाभार्थी पात्र था या नहीं और निर्णय लेने वाले अधिकारियों ने अपनी शक्तियों का सही इस्तेमाल किया या नहीं।
हाईकोर्ट में भी उठा मामला
डी. सुरेश से जुड़ा यह विवाद अदालत तक भी पहुंचा। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में उनकी ओर से मामले से संबंधित याचिका दायर की गई थी। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को FIR दर्ज होने और जांच की स्थिति के बारे में जानकारी दी गई।
राज्य ने अदालत में यह भी आश्वासन दिया कि यदि जांच के दौरान अधिकारी की हिरासत की जरूरत पड़ी तो उन्हें पहले से सूचना दी जाएगी।
इससे साफ है कि मामला केवल प्रशासनिक जांच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके कानूनी पहलुओं पर भी अदालत की निगरानी बनी हुई है।
ACB की जांच में अब क्या होगा?
FIR दर्ज होने के बाद जांच एजेंसी आम तौर पर संबंधित दस्तावेजों, सरकारी फाइलों, नोटिंग, आदेशों और भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड की जांच करती है। इस मामले में भी भूखंड आवंटन से जुड़ी फाइलें और संबंधित अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकती है।
जांच के दौरान यह पता लगाने की कोशिश होगी कि:
- भूखंड के आवंटन के लिए आवेदन किसने किया था।
- आवेदक संबंधित कोटे के लिए पात्र था या नहीं।
- जरूरी राशि और दस्तावेज जमा किए गए थे या नहीं।
- फाइल पर किन अधिकारियों ने निर्णय लिया।
- क्या किसी कानूनी आदेश या अदालत के फैसले की अनदेखी हुई।
- आवंटन के बाद भूखंड किसके नाम रहा।
- क्या उसे बाद में किसी अन्य व्यक्ति को बेचा या हस्तांतरित किया गया।
- इससे सरकार को कितना संभावित राजस्व नुकसान हुआ।
इन सवालों के जवाब जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे।
आरोप साबित होना अभी बाकी
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि FIR आरोपों की शुरुआत है, अंतिम फैसला नहीं। ACB ने जिन लोगों को आरोपी बनाया है, उन्हें अदालत में दोषी साबित किए जाने तक कानून की नजर में आरोपी ही माना जाएगा।
जांच एजेंसी के आरोपों और अदालत में साबित होने वाले तथ्यों के बीच अंतर होता है। इसलिए इस मामले में अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही निकाला जा सकेगा।
फिलहाल मामला सरकारी भूखंडों के आवंटन, कथित पद के दुरुपयोग और संभावित राजस्व नुकसान के आरोपों की जांच पर केंद्रित है।
निष्कर्ष
हरियाणा के पूर्व IAS अधिकारी डी. सुरेश के खिलाफ भूखंड आवंटन से जुड़े मामले में दर्ज FIR ने सरकारी जमीन के इस्तेमाल और HSVP की आवंटन व्यवस्था पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि करोड़ों रुपये मूल्य के बताए जा रहे भूखंडों को निर्धारित प्रक्रिया से हटकर बेहद कम रकम पर आवंटित किया गया और बाद में उनमें से कुछ को दूसरे लोगों को बेच दिया गया।
ACB ने इस मामले में नौ लोगों को आरोपी बनाया है और जांच जारी है। डी. सुरेश के खिलाफ इससे पहले भी HSVP से जुड़े मामलों में ACB कार्रवाई का उल्लेख सामने आया है।
अब इस मामले की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि जांच एजेंसी को दस्तावेजों और अन्य सबूतों से क्या जानकारी मिलती है और अदालत में आरोप किस तरह साबित होते हैं। फिलहाल यह मामला हरियाणा में सरकारी संपत्ति के आवंटन और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा एक महत्वपूर्ण भ्रष्टाचार जांच मामला बन गया है।