
PAK से नाउम्मीद सलमान ने ट्रंप को मिलाया फोन, हूतियों पर हमले की मांगी मदद लेकिन US ने किया इनकार
यमन में हूती विद्रोहियों के बढ़ते सैन्य दबाव ने सऊदी अरब की सुरक्षा चिंताओं को एक बार फिर बेहद गंभीर बना दिया है। हालात ऐसे बने कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से सीधे फोन पर संपर्क किया और हूती ठिकानों के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की मांग की। रिपोर्टों के मुताबिक, दोनों नेताओं के बीच गुरुवार को कम से कम दो बार फोन पर बातचीत हुई।
लेकिन रियाद की इस अपील पर वॉशिंगटन ने फिलहाल सीधा सैन्य हमला करने से इनकार कर दिया। अमेरिका ने सीधे अपने सैनिकों या विमानों को हूतियों के खिलाफ युद्ध में उतारने के बजाय सऊदी अरब को खुफिया जानकारी और टारगेटिंग से जुड़ी सहायता देने की बात कही है।
यह घटनाक्रम सऊदी अरब के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि पिछले कुछ समय से वह पाकिस्तान समेत अपने क्षेत्रीय साझेदारों पर सुरक्षा के लिए भरोसा करता रहा है। लेकिन यमन में हालात तेजी से बदल रहे हैं और हूती लड़ाकों की बढ़त ने लाल सागर के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक बाब अल-मंदेब को भी खतरे में डाल दिया है।
क्यों ट्रंप के पास पहुंचे मोहम्मद बिन सलमान?
सऊदी अरब और हूतियों के बीच लंबे समय से तनाव रहा है। हालांकि 2022 के बाद संघर्ष में अपेक्षाकृत शांति देखने को मिली थी, लेकिन हाल के महीनों में स्थिति दोबारा बिगड़ गई।
अब हूती लड़ाकों ने यमन के पश्चिमी हिस्से में अपनी स्थिति मजबूत करते हुए लाल सागर के किनारे महत्वपूर्ण इलाकों की ओर बढ़ना शुरू कर दिया है। हालिया घटनाक्रम में हूतियों के पेरिम द्वीप और धुबाब क्षेत्र तक पहुंचने की खबर सामने आई है। पेरिम द्वीप बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के बेहद करीब स्थित है और यहां नियंत्रण का असर अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार पर पड़ सकता है।
सऊदी अरब के लिए यह सिर्फ यमन का सैन्य संघर्ष नहीं है। यह उसके तेल निर्यात, समुद्री व्यापार और राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ मुद्दा बन चुका है।
इसी वजह से मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी राष्ट्रपति से मदद मांगी।
ट्रंप ने क्यों नहीं मानी सलमान की मांग?
रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन फिलहाल यमन में एक और सीधे सैन्य मोर्चे में उतरने से बचना चाहता है।
अमेरिका पहले से ही क्षेत्र में ईरान के साथ गंभीर सैन्य तनाव में उलझा हुआ है। वॉशिंगटन की प्राथमिकता ईरान और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़े रणनीतिक घटनाक्रम पर बनी हुई है।
ऐसे में अमेरिका नहीं चाहता कि हूतियों के खिलाफ सीधे हमले शुरू करके वह मध्य पूर्व में एक और बड़ा सैन्य मोर्चा खोल दे।
अमेरिकी अधिकारियों ने कथित तौर पर अपने सऊदी समकक्षों को बताया है कि अमेरिकी सेना का ध्यान फिलहाल ईरान और होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा पर रखने का निर्देश है।
यही वजह है कि ट्रंप ने सऊदी अरब की अपील के बावजूद हूतियों पर सीधे अमेरिकी हमले को मंजूरी नहीं दी।
अमेरिका पूरी तरह पीछे भी नहीं हटा
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका ने सऊदी अरब को अकेला छोड़ दिया है।
रिपोर्टों के मुताबिक, वॉशिंगटन सऊदी अरब को खुफिया जानकारी और संभावित हूती ठिकानों की पहचान से जुड़ी टारगेटिंग सहायता देने के लिए तैयार है। यानी अमेरिका प्रत्यक्ष हवाई हमलों में शामिल होने के बजाय पर्दे के पीछे से रियाद की सैन्य क्षमता को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर के सऊदी अरब पहुंचने की भी खबर है। उनकी यात्रा को दोनों देशों के बीच सुरक्षा समन्वय के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका सऊदी सुरक्षा को लेकर चिंतित है, लेकिन वह खुद सीधे युद्ध में उतरने से बचना चाहता है।
पाकिस्तान से क्यों बढ़ी सऊदी की उम्मीद?
सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से रक्षा और सुरक्षा संबंध रहे हैं। पाकिस्तान की सेना के साथ सऊदी अरब के पुराने रक्षा सहयोग को देखते हुए रियाद इस साझेदारी को महत्वपूर्ण मानता रहा है।
हाल ही में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच आपसी रक्षा सहयोग से जुड़ा समझौता भी हुआ है। इसके तहत किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में दूसरे देशों के समर्थन का सिद्धांत महत्वपूर्ण माना गया है।
लेकिन यमन का मौजूदा संकट पाकिस्तान के लिए भी बेहद जटिल है।
इस्लामाबाद एक तरफ सऊदी अरब का रक्षा साझेदार है, तो दूसरी ओर वह ईरान के साथ अपने संबंधों को भी खराब नहीं करना चाहता। यही कारण है कि पाकिस्तान सीधे युद्ध में शामिल होने के बजाय कूटनीतिक भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है।
पाकिस्तान ने सऊदी का समर्थन तो किया, लेकिन…
पाकिस्तान ने हूतियों के हमलों की निंदा की है और सऊदी अरब की सुरक्षा के प्रति समर्थन जताया है।
जुलाई में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मोहम्मद बिन सलमान से फोन पर बातचीत के दौरान लाल सागर में सऊदी तेल टैंकरों पर हूती हमलों की कड़ी निंदा की थी। पाकिस्तान ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून, समुद्री आवाजाही और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बताया था।
लेकिन पाकिस्तान के सामने एक बड़ी दुविधा है।
अगर वह सऊदी अरब की मदद के लिए सीधे सैन्य कार्रवाई में उतरता है, तो ईरान के साथ उसके संबंध प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर, अगर वह सऊदी सुरक्षा समझौतों को नजरअंदाज करता है तो रियाद के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी पर सवाल उठ सकते हैं।
इसी कारण पाकिस्तान फिलहाल मध्यस्थ और कूटनीतिक भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है।
सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए क्यों अहम है बाब अल-मंदेब?
बाब अल-मंदेब दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। यह लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और यूरोप, एशिया तथा मध्य पूर्व के बीच समुद्री व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
यदि इस जलडमरूमध्य में किसी एक सैन्य शक्ति का प्रभाव बहुत बढ़ जाता है, तो जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है।
सऊदी अरब के लिए यह और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य में पहले से तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है। ऐसे में अगर लाल सागर और बाब अल-मंदेब भी असुरक्षित हो जाते हैं, तो सऊदी तेल निर्यात के लिए उपलब्ध सुरक्षित रास्तों पर दबाव बढ़ सकता है।
इसी वजह से हूतियों की हालिया बढ़त को रियाद केवल यमन की सीमा तक सीमित खतरे के रूप में नहीं देख रहा है।
हूतियों की बढ़त ने बढ़ाई चिंता
रिपोर्टों के मुताबिक, हूती लड़ाकों ने हाल के सैन्य अभियान में यमन के पश्चिमी तट पर अपनी स्थिति तेजी से मजबूत की है।
पेरिम द्वीप का महत्व इसलिए भी बहुत अधिक है क्योंकि यह बाब अल-मंदेब के प्रवेश क्षेत्र में स्थित है। इसके आसपास की गतिविधियां समुद्री जहाजों के लिए सुरक्षा जोखिम बढ़ा सकती हैं।
हूतियों के इस विस्तार से सऊदी अरब की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है क्योंकि वह लाल सागर के रास्ते अपने तेल और अन्य व्यापारिक गतिविधियों को संचालित करता है।
अगर समुद्री मार्ग लंबे समय तक बाधित होते हैं तो इसका असर केवल सऊदी अरब पर नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।
तेल की कीमतों पर भी असर
मध्य पूर्व में किसी भी बड़े समुद्री मार्ग पर संकट का सीधा असर तेल बाजार पर पड़ सकता है।
बाब अल-मंदेब के आसपास बढ़ते तनाव के बीच वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों को लेकर भी चिंता बढ़ी है। यदि जहाजों को लंबा वैकल्पिक रास्ता अपनाना पड़ता है, तो परिवहन लागत बढ़ती है और ऊर्जा आपूर्ति पर अनिश्चितता पैदा होती है।
सऊदी अरब दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में से एक है। इसलिए उसके तेल निर्यात मार्ग पर खतरा बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अस्थिरता बढ़ सकती है।
यही वजह है कि अमेरिका सहित पश्चिमी देश भी बाब अल-मंदेब की सुरक्षा को केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं मानते।
ईरान की भूमिका पर भी नजर
हूती आंदोलन को ईरान से समर्थन प्राप्त होने की बात लंबे समय से सामने आती रही है। हालांकि ईरान हूतियों पर सीधे सैन्य नियंत्रण होने से इनकार करता है।
मौजूदा संघर्ष में ईरान का नाम इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच भी पहले से गंभीर सैन्य तनाव चल रहा है।
यदि हूतियों और सऊदी अरब के बीच संघर्ष और बढ़ता है, तो इसके पीछे क्षेत्रीय शक्तियों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भागीदारी का सवाल भी उठ सकता है।
यही वह स्थिति है जिससे अमेरिका बचना चाहता है। वॉशिंगटन के लिए हूतियों पर सीधे हमला करना केवल यमन में सैन्य कार्रवाई नहीं होगी, बल्कि इससे ईरान के साथ व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष और बढ़ सकता है।
जुलाई में तस्वीर अलग थी
इस घटनाक्रम को समझने के लिए कुछ महीने पीछे जाना जरूरी है।
जुलाई में अमेरिका ने सऊदी अरब की ओर से हूतियों के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई को समर्थन दिया था। उस समय सऊदी अरब ने अपनी सैन्य क्षमता पर भरोसा जताया था और स्थिति को खुद संभालने की कोशिश की थी।
लेकिन अब हालात तेजी से बदल गए हैं।
हूतियों की बढ़त और बाब अल-मंदेब के करीब उनकी मौजूदगी ने सऊदी अरब की रणनीतिक गणना बदल दी है। अब रियाद अमेरिका से अधिक प्रत्यक्ष सैन्य समर्थन चाहता दिखाई दे रहा है।
इस बदलाव को सऊदी नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन के रूप में देखा जा रहा है।
क्या सऊदी अरब अकेले हूतियों से लड़ सकता है?
सऊदी अरब के पास अत्याधुनिक हथियार, बड़ी सैन्य क्षमता और मजबूत आर्थिक संसाधन हैं। लेकिन यमन में लंबे समय तक चला संघर्ष यह दिखा चुका है कि हूती लड़ाकों के खिलाफ युद्ध आसान नहीं है।
हूती संगठन पहाड़ी और कठिन भौगोलिक क्षेत्रों का इस्तेमाल करने के साथ-साथ ड्रोन और मिसाइल जैसी तकनीकों का उपयोग करता रहा है।
सऊदी अरब के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि संघर्ष को सीमित रखते हुए अपने शहरों, तेल प्रतिष्ठानों और समुद्री मार्गों की सुरक्षा कैसे की जाए।
यदि युद्ध व्यापक होता है, तो उसका आर्थिक बोझ भी बढ़ सकता है।
अमेरिका का संतुलित रुख
ट्रंप प्रशासन की मौजूदा रणनीति को एक संतुलन के तौर पर देखा जा सकता है।
एक ओर अमेरिका सऊदी अरब को खुफिया जानकारी और टारगेटिंग में मदद कर रहा है, वहीं दूसरी ओर अमेरिकी सैनिकों को सीधे हमले में शामिल करने से बच रहा है।
इसका उद्देश्य संभवतः सऊदी सुरक्षा को समर्थन देना है, लेकिन अमेरिकी सेना को यमन के एक नए युद्ध में फंसने से रोकना भी है।
रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिकी अधिकारियों ने सऊदी पक्ष को यह संदेश दिया है कि फिलहाल वॉशिंगटन का ध्यान ईरान और होर्मुज की सुरक्षा पर है।
पाकिस्तान के सामने बड़ी कूटनीतिक परीक्षा
मौजूदा संकट पाकिस्तान के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण परीक्षा बन गया है।
इस्लामाबाद को सऊदी अरब के साथ अपनी रक्षा साझेदारी निभानी है, लेकिन उसे ईरान के साथ संबंधों को भी संभालना है। साथ ही पाकिस्तान की अपनी आर्थिक स्थिति भी ऐसी है कि वह खाड़ी देशों के साथ रिश्तों को किसी बड़े संकट में नहीं डालना चाहता।
इसीलिए पाकिस्तान फिलहाल कूटनीतिक संदेश पहुंचाने और तनाव कम कराने की कोशिश कर रहा है।
लेकिन जैसे-जैसे हूतियों का हमला सऊदी क्षेत्र और समुद्री मार्गों के करीब पहुंच रहा है, इस्लामाबाद पर फैसला लेने का दबाव बढ़ सकता है।
आगे क्या हो सकता है?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि हूती-सऊदी संघर्ष आगे कितना बढ़ता है।
यदि हूती बाब अल-मंदेब पर अपना नियंत्रण मजबूत करते हैं और सऊदी तेल तथा समुद्री बुनियादी ढांचे पर हमले बढ़ते हैं, तो रियाद फिर से अमेरिका और दूसरे सहयोगियों से अधिक सैन्य सहायता मांग सकता है।
दूसरी ओर, अगर अमेरिका सीधे युद्ध में उतरता है तो संघर्ष का दायरा काफी बढ़ सकता है और ईरान के साथ टकराव और गंभीर हो सकता है।
फिलहाल अमेरिका का रुख यही संकेत देता है कि वह सऊदी अरब को अकेला नहीं छोड़ना चाहता, लेकिन सीधे युद्ध में उतरने से भी बचना चाहता है।
निष्कर्ष
सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का डोनाल्ड ट्रंप को फोन करना और हूतियों के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की मांग करना इस बात का संकेत है कि यमन में हालात रियाद की चिंता के स्तर तक पहुंच चुके हैं।
ट्रंप ने फिलहाल सीधे हमले से इनकार किया है, लेकिन अमेरिका खुफिया जानकारी और टारगेटिंग सहायता के जरिए सऊदी अरब का समर्थन कर रहा है।
पाकिस्तान भी सऊदी अरब का महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार है, लेकिन ईरान के साथ अपने संबंधों के कारण वह सीधे सैन्य संघर्ष में उतरने से बचना चाहता है। इस पूरे घटनाक्रम ने पाकिस्तान के लिए भी एक कठिन रणनीतिक संतुलन पैदा कर दिया है।
सबसे बड़ी चिंता बाब अल-मंदेब की सुरक्षा को लेकर है। अगर हूती इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर अपनी पकड़ मजबूत करते हैं, तो इसका असर केवल सऊदी अरब या यमन तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक व्यापार, तेल की कीमतों और पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
फिलहाल अमेरिका का सीधा सैन्य हस्तक्षेप न करने का फैसला इस संकट को और दिलचस्प बना रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सऊदी अरब अकेले जवाबी कार्रवाई करता है, पाकिस्तान की कूटनीतिक भूमिका कितनी प्रभावी रहती है और अमेरिका किस सीमा तक रियाद को सैन्य सहायता देता है।