UP एनकाउंटर के डर से गले में तख्ती लटकाकर SSP ऑफिस पहुंचा शूटर, बोला- पैर में गोली मार सकती है पुलिस

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उत्तर प्रदेश के मेरठ में अपराध और पुलिस कार्रवाई से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने एक बार फिर ‘एनकाउंटर के डर’ की चर्चा छेड़ दी है। स्क्रैप कारोबारी पर जानलेवा हमले के मामले में आरोपी बताए जा रहे शूटर रवीश ने पुलिस से बचने के बजाय खुद ही पुलिस कार्यालय पहुंचकर आत्मसमर्पण कर दिया। खास बात यह रही कि वह गले में एक तख्ती लटकाकर SSP ऑफिस पहुंचा और पुलिस के सामने सरेंडर किया।

रवीश ने कैमरे पर दावा किया कि उसे डर था कि पुलिस गिरफ्तारी के दौरान उसके पैर में गोली मार सकती है। इसी डर की वजह से उसने कहीं छिपने या भागने के बजाय सीधे पुलिस के सामने जाने का फैसला किया। घटना का वीडियो और तस्वीरें सामने आने के बाद मामला चर्चा में आ गया।

पुलिस के मुताबिक, रवीश मेरठ के फतेहउल्लापुर का रहने वाला है और उसके खिलाफ लोहियानगर थाने में हत्या के प्रयास से जुड़ा मामला दर्ज था। पुलिस उसकी तलाश कर रही थी और उसकी गिरफ्तारी के लिए लगातार दबिश दी जा रही थी। शनिवार को उसने पुलिस कार्यालय पहुंचकर आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बाद पुलिस ने उसकी निशानदेही पर कथित तौर पर .32 बोर की पिस्तौल और छह जिंदा कारतूस बरामद किए।

गले में तख्ती लेकर SSP ऑफिस पहुंचा आरोपी

इस पूरे मामले की सबसे दिलचस्प तस्वीर वह रही जब रवीश गले में तख्ती लटकाए पुलिस कार्यालय पहुंचा। आम तौर पर आरोपी पुलिस से बचने की कोशिश करते हैं, लेकिन यहां उसने खुद ही पुलिस के सामने पहुंचकर गिरफ्तारी देने का रास्ता चुना।

रवीश ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करते समय अपने डर की वजह बताई। उसका दावा था कि उसे आशंका थी कि अगर पुलिस उसे किसी दूसरे स्थान से गिरफ्तार करती है तो उसके पैर में गोली मारी जा सकती है। इसी वजह से उसने खुद पुलिस कार्यालय पहुंचना ज्यादा सुरक्षित समझा।

हालांकि, आरोपी ने एनकाउंटर को लेकर जो आशंका जताई है, वह उसका अपना दावा है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि पुलिस वास्तव में उसे गिरफ्तार करते समय गोली मारने वाली थी। पुलिस की ओर से ऐसी कोई बात सामने नहीं आई है कि उसके खिलाफ गिरफ्तारी के दौरान बल प्रयोग की कोई योजना थी।

फिर भी आरोपी का इस तरह आत्मसमर्पण करना यह दिखाता है कि उत्तर प्रदेश में पुलिस की सख्त कार्रवाई और एनकाउंटर की चर्चा अपराधियों के बीच किस तरह मनोवैज्ञानिक असर डाल सकती है।

स्क्रैप कारोबारी पर जानलेवा हमले का आरोप

रवीश पर मेरठ के लोहियानगर थाना क्षेत्र में स्क्रैप कारोबारी पर जानलेवा हमला करने के मामले में शामिल होने का आरोप है। इसी मामले में पुलिस उसे तलाश रही थी।

पुलिस के अनुसार, उसके खिलाफ मामला दर्ज होने के बाद गिरफ्तारी के लिए दबिश दी जा रही थी। लगातार बढ़ते पुलिस दबाव के बीच आरोपी ने आखिरकार खुद पुलिस कार्यालय पहुंचकर सरेंडर कर दिया।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी व्यक्ति के आरोपी होने का मतलब यह नहीं है कि अदालत में उसका अपराध साबित हो चुका है। रवीश के खिलाफ दर्ज मामले और पुलिस की जांच के आधार पर उस पर आरोप हैं। मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया में इन आरोपों की जांच होगी।

पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि हमले में उसकी वास्तविक भूमिका क्या थी, हथियार कहां से आया और वारदात के पीछे किसी अन्य व्यक्ति या गिरोह की भूमिका थी या नहीं।

पुलिस को निशानदेही पर मिला हथियार

रवीश के आत्मसमर्पण के बाद पुलिस ने उससे पूछताछ की। पुलिस के मुताबिक, पूछताछ और उसकी निशानदेही के आधार पर कथित तौर पर वारदात में इस्तेमाल .32 बोर की पिस्तौल बरामद की गई। इसके साथ छह जिंदा कारतूस भी मिलने की बात कही गई है।

हथियार की बरामदगी जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अब पुलिस यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि हथियार वैध था या अवैध, इसे आरोपी तक किसने पहुंचाया और क्या इसका इस्तेमाल वास्तव में उसी वारदात में किया गया था।

पुलिस बरामद हथियार को केस की जांच में शामिल कर सकती है और जरूरत पड़ने पर फोरेंसिक जांच भी कराई जा सकती है। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि हथियार से घटना में गोली चली थी या नहीं और क्या उसका संबंध मौके से मिले किसी सबूत से स्थापित होता है।

गिरफ्तारी से पहले ही बढ़ गया था पुलिस का दबाव

पुलिस का कहना है कि रवीश की गिरफ्तारी के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे थे। ऐसे में उसके अचानक SSP ऑफिस पहुंचने को पुलिस दबाव के परिणाम के तौर पर देखा जा रहा है।

पुलिस के अनुसार, गिरफ्तारी से बचने के लिए लगातार जगह बदलना या छिपना उसके लिए मुश्किल होता जा रहा था। इसी दौरान उसने खुद पुलिस के सामने जाने का फैसला किया।

हालांकि, आत्मसमर्पण के पीछे आरोपी की अपनी रणनीति भी हो सकती है। पुलिस कार्यालय में पहुंचकर सरेंडर करने से उसे यह फायदा हो सकता था कि वह किसी मुठभेड़ या पुलिस पीछा किए जाने की स्थिति से बच सके। इसी वजह से उसने सार्वजनिक रूप से यह भी कहा कि उसे पैर में गोली मारे जाने का डर था।

यूपी में ‘एनकाउंटर’ की चर्चा क्यों होती है?

उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में पुलिस मुठभेड़ों को लेकर काफी चर्चा हुई है। सरकार और पुलिस की ओर से अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई को कानून-व्यवस्था सुधारने की रणनीति का हिस्सा बताया जाता रहा है। वहीं मानवाधिकार संगठनों और विपक्षी दलों की ओर से समय-समय पर पुलिस मुठभेड़ों की निष्पक्ष जांच की मांग भी उठती रही है।

ऐसे माहौल में जब कोई आरोपी खुद यह कहकर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करता है कि उसे एनकाउंटर का डर है, तो उसका बयान स्वाभाविक रूप से चर्चा में आ जाता है।

हालांकि हर आत्मसमर्पण को सीधे पुलिस एनकाउंटर की आशंका से जोड़ना भी उचित नहीं होगा। किसी आरोपी का डर वास्तविक अनुभव, पुलिस की सख्त छवि या उसके खिलाफ चल रही कार्रवाई के दबाव से भी पैदा हो सकता है।

रवीश ने खुद अपने डर की बात कही है, लेकिन उसके इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।

पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले

मेरठ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए हैं जब वांछित आरोपियों ने पुलिस के सामने खुद को पेश किया और अपराध छोड़ने या माफी मांगने की बात कही।

फरवरी 2023 में मेरठ के परीक्षितगढ़ थाने में एक आरोपी सौरभ गिरी गले में तख्ती लटकाकर पहुंचा था। उस तख्ती पर उसने पुलिस से डरने की बात लिखी थी और थाने में आत्मसमर्पण किया था। पुलिस के अनुसार, उसके खिलाफ कई मामले दर्ज थे और आत्मसमर्पण के बाद उसकी निशानदेही पर अवैध हथियार बरामद किया गया था।

इसी तरह 2023 में मुजफ्फरनगर में भी एक लूट के आरोपी ने एनकाउंटर के डर का हवाला देते हुए तख्ती लेकर थाने में आत्मसमर्पण किया था। उसके दो कथित साथियों को पुलिस मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया गया था, जिसके बाद वह खुद पुलिस के सामने पहुंच गया था।

इन घटनाओं में एक समान बात दिखाई देती है—पुलिस की सख्त कार्रवाई की छवि आरोपी के फैसले को प्रभावित करती दिखाई देती है। हालांकि हर मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं।

क्या पुलिस के लिए यह बड़ी कामयाबी है?

पुलिस के नजरिए से देखें तो किसी वांछित आरोपी का बिना पीछा या मुठभेड़ के गिरफ्तार हो जाना निश्चित रूप से जांच को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है। आरोपी से पूछताछ, हथियार की बरामदगी और वारदात में शामिल अन्य लोगों के बारे में जानकारी जुटाना आसान हो सकता है।

रवीश के मामले में भी पुलिस के पास अब पूछताछ का अवसर है। यदि वह हमले के पीछे किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका, हथियार की सप्लाई या किसी कथित साजिश के बारे में जानकारी देता है, तो जांच का दायरा आगे बढ़ सकता है।

पुलिस यह भी पता कर सकती है कि स्क्रैप कारोबारी को निशाना बनाने के पीछे क्या वजह थी। क्या मामला व्यक्तिगत विवाद से जुड़ा था, कारोबार से संबंधित था या किसी कथित सुपारी या आपराधिक नेटवर्क से इसका संबंध था—इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट होंगे।

तख्ती पर क्या लिखा था?

पुलिस द्वारा जारी किए गए वीडियो में रवीश हाथ में पोस्टर लिए हुए दिखाई दिया। रिपोर्टों के अनुसार, वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से माफी मांगता नजर आया।

इस तरह की तस्वीरें अक्सर सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो जाती हैं। आरोपी का गले में तख्ती डालकर पुलिस कार्यालय पहुंचना अपने आप में असामान्य दृश्य था। इसलिए घटना का वीडियो सामने आते ही लोगों का ध्यान इसकी तरफ गया।

हालांकि किसी आरोपी द्वारा कैमरे के सामने माफी मांगना अपने आप में उसके खिलाफ लगे आरोपों को साबित नहीं करता। अपराध की पुष्टि अदालत में साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर होती है।

अब आगे क्या होगा?

आत्मसमर्पण के बाद पुलिस की जांच का अगला चरण महत्वपूर्ण होगा। सबसे पहले आरोपी से पूछताछ कर वारदात के बारे में जानकारी जुटाई जाएगी। इसके बाद बरामद हथियार और कारतूस को केस से जोड़कर जांच की जाएगी।

पुलिस यह भी पता लगाएगी कि क्या इस मामले में अन्य आरोपी शामिल हैं। यदि किसी अन्य व्यक्ति ने कथित तौर पर हमले की योजना बनाई या हथियार उपलब्ध कराया था, तो जांच उसी दिशा में आगे बढ़ सकती है।

साथ ही पुलिस को घटनास्थल से मिले सीसीटीवी फुटेज, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, कॉल डिटेल और अन्य तकनीकी साक्ष्यों की भी जांच करनी होगी। इन सबके आधार पर यह तय करने की कोशिश होगी कि हमले के समय कौन-कौन लोग मौजूद थे और घटना कैसे हुई।

पुलिस की सख्ती का मनोवैज्ञानिक असर

रवीश के आत्मसमर्पण की घटना को सिर्फ एक अपराधी की गिरफ्तारी के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। यह मामला पुलिस की सख्त छवि के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को भी सामने लाता है।

जब कोई आरोपी खुद यह कहता है कि उसे पुलिस से डर लग रहा था और इसी वजह से उसने सीधे पुलिस कार्यालय पहुंचकर सरेंडर किया, तो यह संकेत देता है कि पुलिस कार्रवाई का दबाव उस पर था।

लेकिन कानून-व्यवस्था के किसी भी मॉडल में पुलिस की सख्ती के साथ कानूनी प्रक्रिया का पालन भी उतना ही जरूरी है। किसी आरोपी के खिलाफ कार्रवाई कानून के दायरे में होनी चाहिए और दोष साबित करने का अंतिम अधिकार अदालत के पास होता है।

इसलिए रवीश के मामले में भी पुलिस की जांच, बरामदगी और अदालत में आगे होने वाली कानूनी प्रक्रिया ही यह तय करेगी कि उस पर लगाए गए आरोप कितने सही हैं।

मेरठ में पुलिस कार्रवाई पर पहले भी उठे सवाल

मेरठ में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर हाल के दिनों में अलग-अलग मामलों में सवाल भी उठे हैं। सितंबर 2026 में भावनपुर थाने के SHO को जानलेवा हमले के एक आरोपी को कथित तौर पर छोड़ने और विवेचना में लापरवाही के आरोप में लाइन हाजिर किए जाने की खबर सामने आई थी। यह कार्रवाई वरिष्ठ अधिकारियों की समीक्षा के बाद हुई थी।

इस पृष्ठभूमि में रवीश का SSP कार्यालय पहुंचकर सरेंडर करना पुलिस की कार्यशैली पर अलग तरह की चर्चा को जन्म दे सकता है। एक तरफ पुलिस के सख्त रवैये की चर्चा है, तो दूसरी तरफ पुलिस की कार्रवाई में पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया का सवाल भी महत्वपूर्ण है।

आरोपी के सरेंडर से क्या संदेश गया?

रवीश का SSP ऑफिस पहुंचना एक तरह से यह संदेश देता है कि पुलिस के दबाव से बचना उसके लिए मुश्किल हो गया था। उसने खुद को पुलिस के सामने पेश करना उस विकल्प के तौर पर चुना जिसे वह ज्यादा सुरक्षित मान रहा था।

उसके गले में तख्ती और हाथ में पोस्टर होने से घटना का दृश्य और भी नाटकीय बन गया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का वास्तविक महत्व जांच पूरी होने के बाद सामने आएगा।

अगर पुलिस बरामद हथियार को हमले से जोड़ पाती है और अन्य साक्ष्य भी आरोपी की भूमिका की पुष्टि करते हैं, तो जांच को महत्वपूर्ण सफलता मिल सकती है। दूसरी ओर यदि आरोपों और बरामदगी को लेकर कोई विसंगति सामने आती है तो उसका फैसला कानूनी प्रक्रिया के तहत होगा।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि मेरठ का शूटर रवीश पुलिस की गिरफ्त में है। उसने खुद SSP ऑफिस पहुंचकर आत्मसमर्पण किया और पुलिस के मुताबिक उसकी निशानदेही पर एक .32 बोर पिस्तौल तथा छह जिंदा कारतूस बरामद किए गए हैं।

उसका यह दावा कि उसे पैर में गोली मारे जाने का डर था, अब इस पूरे मामले का सबसे चर्चित पहलू बन गया है। हालांकि यह उसका दावा है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। पुलिस अब उसके खिलाफ दर्ज जानलेवा हमले के मामले की जांच आगे बढ़ाएगी और यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि वारदात में उसकी वास्तविक भूमिका क्या थी।

इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल जरूर सामने ला दिया है कि उत्तर प्रदेश में पुलिस की सख्त कार्रवाई की छवि अपराधियों के फैसलों को किस हद तक प्रभावित कर रही है। लेकिन किसी भी आरोपी के खिलाफ अंतिम निष्कर्ष जांच और अदालत की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही निकाला जाना चाहिए।

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