राजस्थान निकाय चुनाव में BJP का दबदबा, छोटे कस्बों और आदिवासी इलाकों में मजबूत पकड़, किसान बेल्ट में निर्दलीयों ने बिगाड़ा गणित

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राजस्थान के 2026 नगर निकाय चुनाव के नतीजों ने प्रदेश की सियासत में एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच मुकाबले की तस्वीर साफ कर दी है। 309 शहरी निकायों में हुए चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन नतीजों को केवल बीजेपी बनाम कांग्रेस की सीधी लड़ाई के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी। कई इलाकों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने बेहद मजबूत प्रदर्शन किया है और कुछ बड़े नगर निकायों में उन्होंने बोर्ड गठन का पूरा गणित ही बदल दिया है।

राज्य के 10 नगर निगमों में बीजेपी ने पांच जगह जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस एक निगम में स्पष्ट रूप से आगे रही। चार नगर निगमों में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और वहां निर्दलीय पार्षदों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई। वहीं छोटे कस्बों और कई आदिवासी इलाकों में बीजेपी की पकड़ मजबूत दिखाई दी। इसके उलट किसान बहुल क्षेत्रों और कुछ बड़े शहरों में निर्दलीय तथा स्थानीय चेहरों ने राष्ट्रीय दलों को कड़ी चुनौती दी।

इन चुनावों में कुल 10,245 पार्षद पदों के लिए मतदान हुआ था। चुनाव दो चरणों में 9 और 11 सितंबर को कराए गए थे और मतगणना 14 सितंबर को हुई। राज्य में 1.44 करोड़ से अधिक मतदाता इस चुनाव में वोट डालने के पात्र थे। यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी की भजनलाल शर्मा सरकार और विपक्षी कांग्रेस के लिए एक अहम राजनीतिक परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है।

बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी, कांग्रेस दूसरे नंबर पर

उपलब्ध परिणामों के मुताबिक लगभग 10,200 से अधिक वार्डों के नतीजे सामने आने तक बीजेपी ने 4,171 वार्डों में जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस 3,597 वार्ड जीतने में सफल रही। निर्दलीयों ने भी 2,272 वार्डों में जीत दर्ज कर अपनी ताकत दिखाई। इसके अलावा आम आदमी पार्टी, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी, CPI(M), BSP और भारत आदिवासी पार्टी जैसे दलों ने भी अलग-अलग इलाकों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।

309 शहरी निकायों में से बीजेपी 148 निकायों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई, जबकि कांग्रेस 104 निकायों में सबसे आगे रही। 10 निकायों में दोनों दल बराबरी पर रहे। इसका मतलब यह है कि बीजेपी ने राज्य के शहरी स्थानीय निकायों में व्यापक बढ़त बनाई है, लेकिन कांग्रेस पूरी तरह मुकाबले से बाहर नहीं हुई है। कई शहरों में कांग्रेस ने बीजेपी को कड़ी टक्कर दी और कुछ महत्वपूर्ण नगर निगमों में उसे बढ़त भी मिली।

यह आंकड़ा बीजेपी के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले स्थानीय निकाय चुनावों की तुलना में इस बार राज्य में शहरी निकायों की संख्या और वार्डों का दायरा काफी बढ़ा है। 2019-21 के चुनाव चक्र में 196 शहरी निकाय और करीब 7,500 वार्ड थे। इस बार 309 निकायों में 10,245 पार्षद पदों के लिए चुनाव हुआ।

छोटे कस्बों में बीजेपी की मजबूत पकड़

इन चुनावों की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर छोटे कस्बों और नगर पालिकाओं से निकलकर सामने आई है। बीजेपी ने बड़ी संख्या में नगर पालिकाओं में बढ़त बनाई और कई जगहों पर बोर्ड बनाने की स्थिति में पहुंच गई।

आंकड़ों के अनुसार बीजेपी ने 252 नगर पालिकाओं में से 144 में जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस 92 नगर पालिकाओं में सबसे बड़ी पार्टी रही। नगर परिषदों में भी बीजेपी ने 21 जगहों पर बढ़त बनाई, जबकि कांग्रेस 17 परिषदों में आगे रही। निर्दलीयों ने नगर पालिका और परिषद दोनों स्तरों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

छोटे कस्बों की राजनीति में स्थानीय संगठन, उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ और जातीय-सामाजिक समीकरण अक्सर बड़ी भूमिका निभाते हैं। ऐसे क्षेत्रों में विधानसभा या लोकसभा चुनाव की तुलना में मतदाता स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि को अधिक महत्व दे सकते हैं। बीजेपी ने इन चुनावों में संगठनात्मक स्तर पर इसका लाभ उठाया दिखाई देता है।

आदिवासी बेल्ट में भी बीजेपी का प्रदर्शन

राजस्थान के आदिवासी इलाकों में भी बीजेपी का प्रदर्शन कई जगह मजबूत रहा। दक्षिणी राजस्थान के इलाकों में स्थानीय राजनीतिक समीकरण हमेशा से अलग रहे हैं। यहां बीजेपी और कांग्रेस के अलावा भारत आदिवासी पार्टी जैसे दल भी अपनी मौजूदगी रखते हैं।

सलूम्बर नगर परिषद इसका एक उदाहरण है। यहां 25 वार्डों में बीजेपी ने 12 और कांग्रेस ने 11 सीटें जीतीं। एक सीट भारत आदिवासी पार्टी और एक निर्दलीय के खाते में गई। ऐसे में बोर्ड गठन के लिए निर्दलीय पार्षद की भूमिका निर्णायक हो सकती है।

मतदान के दौरान भी आदिवासी इलाकों में लोगों की बड़ी भागीदारी देखने को मिली थी। प्रतापगढ़ जिले के आदिवासी बहुल अरनोद नगर पालिका क्षेत्र में 91.98 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ था, जो राज्य में सबसे अधिक मतदान वाले क्षेत्रों में रहा। यहां 41,085 मतदाताओं में से 33,064 ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया।

इससे यह संकेत मिलता है कि आदिवासी क्षेत्रों में स्थानीय चुनावों को लेकर मतदाताओं की दिलचस्पी काफी अधिक रही। हालांकि, इन इलाकों के पूरे राजनीतिक रुझान को केवल एक चुनाव के आधार पर तय करना उचित नहीं होगा।

किसान बहुल इलाकों में निर्दलीयों का दम

जहां बीजेपी ने व्यापक स्तर पर अच्छा प्रदर्शन किया, वहीं निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी कई इलाकों में दोनों प्रमुख दलों की चुनौती बढ़ा दी। खास तौर पर किसान बहुल और स्थानीय मुद्दों से प्रभावित क्षेत्रों में निर्दलीय उम्मीदवारों को मतदाताओं का समर्थन मिला।

निर्दलीयों ने पूरे राज्य में 2,272 वार्डों में जीत दर्ज की। यह संख्या इतनी बड़ी है कि उन्हें केवल तीसरी ताकत कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कई नगर निकायों में बोर्ड बनाने के लिए बीजेपी या कांग्रेस को निर्दलीयों का समर्थन लेना पड़ सकता है।

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह जिले भरतपुर में इसका सबसे बड़ा उदाहरण सामने आया। 65 सदस्यीय नगर निगम में निर्दलीय उम्मीदवार 36 वार्डों में जीत या बढ़त के साथ सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरे। बीजेपी 20 और कांग्रेस केवल सात वार्डों तक सीमित रही। BSP और RLP को भी एक-एक सीट मिली।

भरतपुर का नतीजा इसलिए भी खास है क्योंकि यह मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का गृह क्षेत्र है। ऐसे में यहां निर्दलीयों का मजबूत प्रदर्शन बीजेपी के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश माना जा सकता है।

जयपुर में बीजेपी ने बहुमत हासिल किया

राजधानी जयपुर में बीजेपी ने स्पष्ट बढ़त बनाते हुए 150 वार्डों में से 78 पर जीत दर्ज की। कांग्रेस 53 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही, जबकि 15 वार्ड निर्दलीयों के खाते में गए। 76 सीटों का बहुमत का आंकड़ा पार करते ही जयपुर नगर निगम में बीजेपी का बोर्ड बनना लगभग तय हो गया।

जयपुर का चुनाव इस बार खास था क्योंकि पुराने जयपुर ग्रेटर और जयपुर हेरिटेज नगर निगमों को मिलाकर 150 वार्ड वाला एकीकृत नगर निगम बनाया गया था। राजधानी के नतीजे बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यहां जीत पार्टी को राज्य के सबसे बड़े शहरी निकाय में स्पष्ट नियंत्रण देती है।

कांग्रेस ने जयपुर में 53 सीटों के साथ मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई, लेकिन वह बहुमत से काफी दूर रह गई। इस परिणाम ने राजधानी में बीजेपी की संगठनात्मक ताकत को भी रेखांकित किया।

उदयपुर और कोटा में भी बीजेपी का बहुमत

उदयपुर में बीजेपी ने 80 में से 53 वार्ड जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। कांग्रेस को 23 सीटें मिलीं, जबकि निर्दलीयों को तीन सीटों पर जीत मिली। एक सीट CPI(M) के खाते में गई। 41 सीटों के बहुमत के आंकड़े से बीजेपी काफी आगे रही।

कोटा में भी बीजेपी ने 100 में से 53 वार्ड जीतकर बहुमत हासिल किया। वहीं भीलवाड़ा में पार्टी ने 70 में से 45 सीटें जीतकर मजबूत स्थिति बनाई। इन नतीजों ने दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के प्रमुख शहरी केंद्रों में बीजेपी की स्थिति को मजबूत किया है।

बीकानेर में कांग्रेस ने किया पलटवार

पूरे राज्य की तस्वीर बीजेपी के पक्ष में रही, लेकिन कुछ बड़े शहरों ने कांग्रेस को राहत दी। बीकानेर नगर निगम में कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया। पार्टी ने 35 वार्डों में जीत दर्ज की, जबकि बीजेपी 21 पर रही और आठ सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार जीते।

बीकानेर का नतीजा बताता है कि बीजेपी की statewide बढ़त के बावजूद कांग्रेस कुछ स्थानीय गढ़ों में अपनी स्थिति बनाए रखने में सफल रही है। स्थानीय नेतृत्व और उम्मीदवारों की व्यक्तिगत पकड़ ने यहां महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो सकती है।

अजमेर और पाली में भी कांग्रेस आगे

अजमेर में कांग्रेस ने बीजेपी को पीछे छोड़ा। 80 वार्डों में कांग्रेस ने 37 सीटें जीतीं, जबकि बीजेपी के खाते में 32 सीटें आईं। 11 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार विजयी रहे। ऐसे में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी तो बनी, लेकिन बोर्ड गठन के लिए उसे अन्य पार्षदों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है।

पाली में भी कांग्रेस 65 में से 29 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। बीजेपी को 21 और निर्दलीयों को 15 सीटें मिलीं। यहां भी निर्दलीयों की संख्या इतनी अधिक है कि सत्ता का अंतिम समीकरण समर्थन पर निर्भर कर सकता है।

पाली बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ का गृह क्षेत्र है। ऐसे में वहां कांग्रेस का सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरना बीजेपी के लिए राजनीतिक रूप से उल्लेखनीय परिणाम माना जा सकता है।

जोधपुर में बराबरी का मुकाबला

जोधपुर नगर निगम में बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने 44-44 वार्डों में जीत दर्ज की। बाकी 10 वार्ड निर्दलीयों के खाते में गए। इस स्थिति में किसी भी पार्टी को अपने दम पर बोर्ड बनाने के लिए पर्याप्त संख्या नहीं मिली।

जोधपुर का नतीजा बताता है कि राजस्थान के कुछ बड़े शहरों में मुकाबला बेहद करीबी रहा। यहां निर्दलीय पार्षदों की भूमिका सीधे तौर पर सत्ता गठन में महत्वपूर्ण हो सकती है।

बड़े शहरों और छोटे कस्बों का अलग संदेश

इन चुनावों से राजस्थान की राजनीति में एक दिलचस्प पैटर्न सामने आया है। बीजेपी ने छोटे कस्बों और कई नगर पालिकाओं में व्यापक जीत दर्ज की, जबकि बड़े शहरों में तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं रही।

जयपुर, उदयपुर और कोटा जैसे शहरों में बीजेपी को बहुमत मिला, लेकिन बीकानेर में कांग्रेस ने पलटवार किया और अजमेर, पाली जैसे शहरों में भी कांग्रेस मजबूत रही। भरतपुर और जोधपुर जैसे शहरों में निर्दलीयों ने राजनीतिक समीकरण जटिल बना दिए।

इसका अर्थ यह है कि मतदाताओं ने सभी शहरों और कस्बों में एक जैसा फैसला नहीं दिया। स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवारों, क्षेत्रीय समीकरणों और संगठन की ताकत ने अलग-अलग निकायों में अलग परिणाम दिए।

कांग्रेस के लिए 2028 से पहले चुनौती

बीजेपी की बढ़त कांग्रेस के लिए निश्चित रूप से चिंता का विषय है। 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले यह पहला बड़ा स्थानीय चुनावी संकेत है कि सत्तारूढ़ बीजेपी राज्य के शहरी इलाकों में अपनी स्थिति बनाए रखने में सफल रही है।

कांग्रेस ने 3,597 से ज्यादा वार्डों में जीत दर्ज कर यह जरूर दिखाया है कि पार्टी पूरी तरह कमजोर नहीं हुई है। लेकिन बीजेपी से लगभग 574 वार्ड पीछे रहना बताता है कि पार्टी को स्थानीय संगठन और उम्मीदवार चयन के स्तर पर काम करने की जरूरत हो सकती है।

दूसरी ओर, कांग्रेस के लिए यह भी महत्वपूर्ण होगा कि वह अजमेर, बीकानेर, पाली और अन्य मजबूत प्रदर्शन वाले क्षेत्रों में अपनी स्थिति को विधानसभा चुनाव तक कैसे बनाए रखती है।

निर्दलीय बने तीसरी ताकत

इस चुनाव का एक बड़ा संदेश निर्दलीयों की मजबूत मौजूदगी है। 2,272 निर्दलीय पार्षदों की जीत बताती है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं ने बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधे चुनाव के बजाय स्थानीय उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी।

कई निकायों में निर्दलीय अब केवल संख्या भर नहीं हैं, बल्कि बोर्ड गठन में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। भरतपुर, पाली, जोधपुर और सलूम्बर जैसे परिणाम इसके उदाहरण हैं।

यह राजस्थान की स्थानीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। विधानसभा या लोकसभा चुनावों में जहां राष्ट्रीय और राज्य स्तर के मुद्दे अधिक प्रभावी होते हैं, वहीं नगर निकाय चुनाव में सड़क, पानी, सफाई, नाली, स्थानीय बाजार, अतिक्रमण, रोजगार और व्यक्तिगत उम्मीदवार की छवि जैसे मुद्दे ज्यादा असर डाल सकते हैं।

AAP, CPI(M) और दूसरे दलों की भी मौजूदगी

इस बार चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के अलावा कुछ छोटे दलों ने भी उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। बारां नगर परिषद में आम आदमी पार्टी ने 60 में से 31 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया। वहीं बीकानेर जिले की नोखा नगरपालिका में CPI(M) ने 45 में से 29 वार्ड जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया।

CPI(M) ने पूरे राज्य में 192 उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें 40 जीतने में सफल रहे। यह आंकड़ा पार्टी के लिए स्थानीय स्तर पर महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

इसी तरह RLP, BSP और भारत आदिवासी पार्टी ने भी कुछ इलाकों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। इससे यह संकेत मिलता है कि राजस्थान की स्थानीय राजनीति केवल दो दलों तक सीमित नहीं है।

21 सितंबर को मेयर और सभापति चुनाव

पार्षदों के चुनाव के बाद अब अगली चुनौती नगर निकायों में बोर्ड गठन की है। मेयर और सभापति के चुनाव 21 सितंबर को होंगे, जबकि डिप्टी मेयर, डिप्टी चेयरपर्सन और नगर पालिका के उपाध्यक्ष पदों के चुनाव 22 सितंबर को होने हैं।

यहीं पर निर्दलीयों और छोटे दलों की वास्तविक राजनीतिक ताकत सामने आएगी। जिन निकायों में बीजेपी या कांग्रेस बहुमत से दूर हैं, वहां समर्थन जुटाने के लिए दोनों प्रमुख दलों को स्थानीय समीकरणों के अनुसार रणनीति बनानी होगी।

बीजेपी के लिए जीत, लेकिन पूरी तरह एकतरफा नहीं

राजस्थान निकाय चुनाव का समग्र परिणाम बीजेपी के पक्ष में जरूर गया है। पार्टी ने सबसे ज्यादा वार्ड जीते, सबसे ज्यादा शहरी निकायों में सबसे बड़ी पार्टी बनी और कई महत्वपूर्ण नगर निगमों में बहुमत हासिल किया।

लेकिन तस्वीर को एकतरफा कहना भी सही नहीं होगा। कांग्रेस ने बीकानेर में स्पष्ट जीत हासिल की, अजमेर और पाली में बढ़त बनाई और कई अन्य क्षेत्रों में बीजेपी को कड़ी टक्कर दी। वहीं निर्दलीयों ने भरतपुर, पाली और जोधपुर सहित कई जगहों पर निर्णायक स्थिति हासिल की।

इसलिए इन चुनावों का सबसे बड़ा संदेश यह है कि राजस्थान में बीजेपी फिलहाल शहरी स्थानीय राजनीति में मजबूत स्थिति में है, लेकिन कांग्रेस के पास अभी भी कई मजबूत स्थानीय क्षेत्र मौजूद हैं। साथ ही, निर्दलीय और छोटे दल तेजी से ऐसी तीसरी ताकत के रूप में उभरे हैं जिन्हें नजरअंदाज करना दोनों बड़े दलों के लिए मुश्किल होगा।

2028 के विधानसभा चुनाव तक अभी समय है। ऐसे में नगर निकाय के ये नतीजे अंतिम राजनीतिक फैसला नहीं हैं, बल्कि राजस्थान के मौजूदा राजनीतिक मूड का एक महत्वपूर्ण संकेत जरूर हैं। बीजेपी इस जनादेश को संगठन और सरकार के पक्ष में समर्थन के रूप में देख रही है, जबकि कांग्रेस के सामने अब स्थानीय स्तर पर संगठन मजबूत करने और अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों को बचाने की चुनौती है। आने वाले दिनों में मेयर और सभापति के चुनाव बताएंगे कि पार्षदों के इन नतीजों से वास्तविक सत्ता किसके हाथ में जाती है।

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