
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के सिकंदराबाद क्षेत्र से एक ऐसा पारिवारिक मामला सामने आया है, जिसने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल और परिवार की जिम्मेदारी को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां चार बेटों वाले एक बुजुर्ग दंपति की स्थिति ऐसी बन गई कि दोनों पति-पत्नी अलग-अलग रहने लगे। दो बेटे अपनी मां के साथ रहने लगे, जबकि दो बेटे पिता के साथ रहने लगे। समय के साथ पति-पत्नी के बीच दूरी और विवाद इतना बढ़ गया कि मामला पुलिस की महिला सेल तक पहुंच गया। वहां हुई काउंसलिंग के बाद दोनों को दोबारा साथ लाने की कोशिश की गई, लेकिन सहमति नहीं बन सकी। आखिरकार बुजुर्ग पति अपनी पत्नी को हर महीने ₹5,000 गुजारा भत्ता देने पर राजी हो गए।
यह मामला सिकंदराबाद कोतवाली क्षेत्र के एक गांव का बताया जा रहा है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, बुजुर्ग दंपति की उम्र क्रमशः 75 और 70 वर्ष है और उनके चार बेटे हैं। उम्र के इस पड़ाव पर दोनों के लिए एक-दूसरे का सहारा होना स्वाभाविक था, लेकिन बच्चों से जुड़े मतभेदों के कारण परिवार की व्यवस्था कुछ ऐसी बनी कि पति और पत्नी अलग-अलग बेटों के साथ रहने लगे।
चार बेटों के बीच अलग हो गए मां-बाप
बताया गया है कि बुजुर्ग पति जिन बेटों के साथ रहना चाहते थे, उनकी मां के साथ नहीं बनती थी। दूसरी तरफ, पत्नी जिन बेटों के साथ रहना चाहती थीं, उनके साथ पति रहने के लिए तैयार नहीं थे। इसी वजह से परिवार में ऐसी स्थिति पैदा हुई कि चारों बेटों ने माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी अलग-अलग बांट ली।
पिता सबसे बड़े और सबसे छोटे बेटे के साथ रहने लगे, जबकि दोनों बीच के बेटे अपनी मां सत्यवती के साथ रहने लगे। इस तरह एक ही परिवार के भीतर पति-पत्नी की जिंदगी अलग-अलग हो गई।
शुरुआत में यह व्यवस्था शायद परिवार को व्यावहारिक समाधान लगती रही हो, लेकिन समय बीतने के साथ पति-पत्नी के बीच दूरी बढ़ती चली गई। अलग-अलग घरों में रहने के कारण मुलाकात और बातचीत कम हुई और पुराने विवाद भी खत्म नहीं हो सके। इसके उलट गलतफहमियां और तनाव बढ़ता गया।
विवाद बढ़ा तो मामला थाने तक पहुंचा
रिपोर्ट के अनुसार, बुजुर्ग पति-पत्नी के बीच विवाद कई बार इतना बढ़ गया कि मामला पुलिस तक पहुंच गया। एक समय स्थिति मारपीट तक पहुंचने की भी बात सामने आई है। इसके बाद पति अपनी पत्नी और उसके साथ रहने वाले दोनों बेटों से और नाराज हो गए।
उन्होंने पत्नी से दूरी बना ली और अपने साथ रहने वाले बेटों के पास ही रहने लगे। इस अलगाव का असर दोनों बुजुर्गों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ा।
उम्र बढ़ने के साथ स्वास्थ्य संबंधी जरूरतें भी बढ़ती हैं। ऐसे में अकेले या अलग-अलग रहना दोनों के लिए मुश्किल साबित हुआ। खासकर पत्नी सत्यवती के सामने इलाज और दैनिक खर्च की समस्या अधिक गंभीर हो गई।
पत्नी की तबीयत बिगड़ी तो आर्थिक मदद की जरूरत पड़ी
अलग रहने के दौरान 70 वर्षीय सत्यवती की स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बढ़ीं। उनके साथ रहने वाले दोनों बेटों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे अपनी मां के इलाज और रोजमर्रा के खर्च का पूरा भार आसानी से उठा सकें।
इसके बाद सत्यवती को अपने पति से आर्थिक मदद की जरूरत महसूस हुई। उन्होंने पति से इलाज और जीवनयापन के लिए सहायता मांगी।
यहीं से मामला पुलिस की महिला सेल तक पहुंचा। शिकायत सामने आने के बाद पुलिस ने इसे केवल पति-पत्नी के आपसी विवाद के रूप में नहीं देखा, बल्कि दोनों की स्थिति को समझने के लिए काउंसलिंग का रास्ता अपनाया।
महिला सेल के काउंसलर्स ने दोनों बुजुर्गों से बातचीत की और पुराने विवाद को खत्म करने की कोशिश की। पुलिस की कोशिश थी कि उम्र के इस पड़ाव पर पति-पत्नी फिर से साथ रह सकें और परिवार का विवाद सुलझ जाए।
पुलिस ने साथ रहने की भी कोशिश की
महिला सेल की काउंसलिंग के दौरान सिर्फ पति-पत्नी को समझाने की कोशिश नहीं की गई, बल्कि यह भी प्रयास किया गया कि चारों बेटे और उनके माता-पिता एक साथ रहें।
पुलिस का उद्देश्य था कि परिवार के भीतर पैदा हुई दूरी कम हो और बुजुर्ग दंपति को अपने बच्चों के साथ एक सुरक्षित पारिवारिक वातावरण मिल सके। लेकिन लंबे समय से चले आ रहे मतभेद और पति-पत्नी के बीच बढ़ चुकी दूरी के कारण यह कोशिश सफल नहीं हो सकी।
दोनों बुजुर्ग एक साथ रहने के लिए तैयार नहीं हुए। उनके बीच विवाद इतना पुराना और गहरा हो चुका था कि काउंसलिंग के बावजूद तत्काल स्थिति बदलना संभव नहीं हुआ।
इसके बाद महिला सेल ने एक वैकल्पिक रास्ता निकालने की कोशिश की, ताकि कम से कम पत्नी के इलाज और जीवनयापन की आर्थिक समस्या का समाधान हो सके।
₹5,000 महीने देने पर तैयार हुए पति
काउंसलिंग के बाद बुजुर्ग पति अपनी पत्नी को हर महीने ₹5,000 देने पर सहमत हो गए। यह राशि पत्नी के गुजारे और जरूरी खर्चों में मदद के लिए दी जानी है।
महिला सेल की प्रभारी अलका चौधरी के मुताबिक, पति को काफी समझाया गया और अंततः वह पत्नी को हर महीने ₹5,000 देने के लिए तैयार हो गए।
रिपोर्ट के मुताबिक, जिस समय समझौता हुआ उस समय महीने के करीब 15 दिन बीत चुके थे। इसलिए तत्काल अवधि के लिए ₹2,700 दिए गए। इसके बाद अगले महीने से पत्नी को ₹5,000 प्रति माह देने पर सहमति बनी।
इस तरह पुलिस की मध्यस्थता से पति-पत्नी के बीच साथ रहने का समाधान तो नहीं निकल सका, लेकिन पत्नी के नियमित खर्च के लिए आर्थिक सहायता का रास्ता जरूर निकला।
एक साथ लाने की कोशिश क्यों नहीं हुई सफल?
परिवार के इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दोनों बुजुर्गों के बीच विवाद अचानक पैदा नहीं हुआ था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अलग-अलग बेटों के साथ रहने की व्यवस्था के बाद पति-पत्नी के बीच कई तरह की गलतफहमियां और मतभेद बढ़ते गए।
जब परिवार में माता-पिता अलग-अलग रहने लगते हैं तो रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातें भी कई बार बड़े विवाद का रूप ले सकती हैं। कौन किससे मिलने गया, किस बेटे के घर ज्यादा समय बिताया, खर्च कौन उठाएगा और इलाज की जिम्मेदारी किसकी होगी, जैसे सवाल परिवार में तनाव पैदा कर सकते हैं।
इस मामले में भी अलग-अलग रहने के बाद पति और पत्नी के बीच दूरी बढ़ती गई। पुलिस ने दोनों को समझाने की कोशिश की, लेकिन जब दोनों साथ रहने के लिए तैयार नहीं हुए तो आर्थिक सहायता का समझौता कराया गया।
बुजुर्गों की देखभाल का सवाल
यह मामला केवल एक परिवार के पति-पत्नी के विवाद तक सीमित नहीं है। इसके पीछे बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल का बड़ा सवाल भी सामने आता है।
बढ़ती उम्र में व्यक्ति को सिर्फ आर्थिक सहायता की जरूरत नहीं होती। बीमारी के समय साथ, नियमित दवा, डॉक्टर के पास ले जाना, भावनात्मक सहारा और रोजमर्रा के छोटे कामों में मदद भी जरूरी होती है।
इस मामले में चार बेटों के बीच माता-पिता की जिम्मेदारी बंटने के बाद पति-पत्नी खुद ही अलग हो गए। इससे उनकी व्यक्तिगत और भावनात्मक जरूरतें भी प्रभावित हुईं।
पुलिस की काउंसलिंग से कम से कम यह सुनिश्चित करने की कोशिश हुई कि पत्नी को पूरी तरह आर्थिक परेशानी का सामना न करना पड़े।
बच्चों के बीच जिम्मेदारी बांटने से बदली पूरी तस्वीर
चार बेटों का होना आम तौर पर बुजुर्ग माता-पिता के लिए एक मजबूत पारिवारिक सहारा माना जा सकता है। लेकिन इस मामले में यही संख्या अलगाव की वजह बन गई।
दो बेटे मां के साथ और दो पिता के साथ रहने लगे। इससे परिवार के भीतर माता-पिता का साथ टूट गया।
यह व्यवस्था उस समय और मुश्किल हो गई जब दोनों के बीच पहले से मतभेद थे। एक ही घर में रहते हुए जिन समस्याओं का समाधान बातचीत से संभव हो सकता था, अलग-अलग रहने के बाद वे और जटिल हो गईं।
माता-पिता की जिम्मेदारी को बेटों के बीच बांटना अपने आप में गलत या सही होने का सवाल नहीं है। कई परिवारों में परिस्थितियों के कारण ऐसी व्यवस्था जरूरी भी हो सकती है। लेकिन इस मामले में पति-पत्नी का अलग होना और उसके बाद उनके बीच विवाद बढ़ना बताता है कि केवल रहने की व्यवस्था बदलने से पारिवारिक समस्या हमेशा खत्म नहीं होती।
इलाज के खर्च ने बढ़ाई परेशानी
सत्यवती की तबीयत खराब होने के बाद उन्हें इलाज और रोजमर्रा के खर्च के लिए पैसे की जरूरत पड़ी। उनके साथ रहने वाले दोनों बेटों की आर्थिक स्थिति सीमित होने के कारण पति से सहायता मांगनी पड़ी।
यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बुजुर्गों के मामले में स्वास्थ्य खर्च अक्सर सबसे बड़ी जरूरत बन जाता है। नियमित दवाइयों से लेकर डॉक्टर की फीस और जांच तक, उम्र बढ़ने के साथ खर्च बढ़ सकता है।
ऐसी स्थिति में यदि पति-पत्नी अलग रहते हों और बच्चों की आर्थिक क्षमता सीमित हो, तो विवाद और आर्थिक परेशानी दोनों बढ़ सकते हैं।
पुलिस की महिला सेल ने इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए काउंसलिंग के जरिए एक व्यावहारिक समझौता कराया।
महिला सेल ने निभाई मध्यस्थ की भूमिका
मामले में पुलिस की भूमिका सीधे कानूनी कार्रवाई करने के बजाय मध्यस्थता और काउंसलिंग की रही। दोनों पक्षों को बुलाकर उनकी बात सुनी गई और परिवार को दोबारा साथ लाने की कोशिश की गई।
जब यह संभव नहीं हुआ तो पत्नी के आर्थिक अधिकार और जरूरत को ध्यान में रखते हुए पति से मासिक खर्च देने पर सहमति बनाई गई।
महिला सेल की प्रभारी अलका चौधरी के अनुसार, दोनों को काफी समझाने के बाद यह रास्ता निकला। पति ₹5,000 प्रति माह देने के लिए तैयार हुए।
इस तरह मामला तत्काल स्तर पर एक समझौते के रूप में सुलझाने की कोशिश की गई।
‘बागबान’ फिल्म की याद क्यों आई?
बुलंदशहर की इस घटना की तुलना कई रिपोर्टों में 2003 में आई फिल्म ‘बागबान’ की कहानी से की गई है। उस फिल्म में भी बुजुर्ग माता-पिता और उनके चार बेटों के बीच रिश्तों तथा माता-पिता की देखभाल को लेकर कहानी दिखाई गई थी।
हालांकि, वास्तविक घटना फिल्म से पूरी तरह अलग है। यहां माता-पिता को दो-दो बेटों के बीच अलग-अलग रहने की स्थिति बनी और पति-पत्नी भी एक-दूसरे से अलग हो गए।
फिल्म और वास्तविक घटना को जोड़ने की वजह मुख्य रूप से चार बेटों और बुजुर्ग माता-पिता के रिश्तों का संदर्भ है। वास्तविक मामले में पुलिस की काउंसलिंग के बाद पत्नी के लिए मासिक गुजारा भत्ता तय होना इसका अलग पहलू है।
क्या पति-पत्नी फिर साथ रहेंगे?
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, काउंसलिंग के दौरान दोनों बुजुर्गों को फिर से साथ लाने की कोशिश की गई, लेकिन दोनों इसके लिए तैयार नहीं हुए।
इसलिए अभी समाधान के तौर पर आर्थिक सहायता पर सहमति बनी है। पति पत्नी को ₹5,000 हर महीने देंगे, जबकि दोनों अलग-अलग रहेंगे।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि पुलिस की काउंसलिंग अदालत द्वारा दिए गए तलाक के आदेश के समान नहीं है। यहां महिला सेल ने पारिवारिक विवाद को बातचीत और मध्यस्थता के जरिए सुलझाने की कोशिश की है।
आगे अगर दोनों में से कोई पक्ष कानूनी कार्रवाई करना चाहता है तो उसके लिए अलग कानूनी प्रक्रिया लागू होगी।
बुजुर्ग दंपति के लिए यह समझौता कितना महत्वपूर्ण?
इस समझौते से कम से कम पत्नी की तत्काल आर्थिक जरूरत पूरी करने का रास्ता बना है। इलाज और रोजमर्रा के खर्च के लिए नियमित ₹5,000 मिलने से उन्हें कुछ आर्थिक सहायता मिल सकती है।
हालांकि, आर्थिक मदद के बावजूद पति-पत्नी के बीच जो दूरी पैदा हुई है, वह बनी हुई है। पुलिस की कोशिश थी कि दोनों साथ रहें, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
इस घटना से यह भी सामने आता है कि परिवार में बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल केवल आर्थिक जिम्मेदारी नहीं है। उनकी इच्छा, आपसी संबंध, स्वास्थ्य और भावनात्मक जरूरतों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
चार बेटों वाला परिवार, फिर भी अकेलेपन की स्थिति
इस कहानी का सबसे मार्मिक पहलू यही है कि चार बेटों के बावजूद बुजुर्ग दंपति को अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में एक-दूसरे से अलग रहना पड़ा।
दो बेटे मां के साथ हैं और दो पिता के साथ। लेकिन माता-पिता के लिए सबसे जरूरी चीज सिर्फ यह नहीं कि उनके पास कोई बेटा मौजूद हो। पति-पत्नी का साथ और परिवार के भीतर सम्मान भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
अलग रहने के कारण दोनों के बीच विवाद बढ़ा और अंततः पत्नी को अपने पति से आर्थिक मदद के लिए पुलिस की महिला सेल तक जाना पड़ा।
पुलिस काउंसलिंग से निकला फिलहाल का रास्ता
सिकंदराबाद के इस मामले में पुलिस ने विवाद को बातचीत के जरिए हल करने की कोशिश की। महिला सेल ने पति-पत्नी को समझाया और परिवार को साथ रखने का प्रयास किया।
जब यह संभव नहीं हुआ तो पति से पत्नी को मासिक गुजारा देने पर सहमति कराई गई। फिलहाल ₹5,000 प्रति माह देने का समझौता हुआ है। शुरुआत में शेष 15 दिनों के लिए ₹2,700 दिए गए और अगले महीने से ₹5,000 मासिक देने की बात तय हुई।
इस समझौते से पत्नी के इलाज और दैनिक खर्च की तत्काल चिंता कुछ हद तक कम हो सकती है।
रिश्तों से जुड़ा बड़ा सवाल
बुलंदशहर की यह घटना सिर्फ एक स्थानीय पारिवारिक विवाद की खबर नहीं है। यह सवाल भी उठाती है कि बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारी परिवार किस तरह निभाता है।
चार बेटों वाले परिवार में यदि माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी अलग-अलग बांटी जाए तो व्यवस्था चल सकती है, लेकिन इसके साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि पति-पत्नी की अपनी जरूरतें और इच्छा प्रभावित न हों।
बढ़ती उम्र में माता-पिता को केवल रहने की जगह या खर्च नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और भावनात्मक साथ की भी जरूरत होती है।
इस मामले में पुलिस की काउंसलिंग ने कम से कम आर्थिक सहायता का एक रास्ता निकाला है। हालांकि पति-पत्नी का दोबारा साथ आना संभव नहीं हो सका।
फिलहाल बुलंदशहर के सिकंदराबाद क्षेत्र का यह मामला इसी वजह से चर्चा में है कि चार बेटों के बीच माता-पिता की जिम्मेदारी बांटने की कोशिश आखिरकार पति-पत्नी के अलगाव तक पहुंच गई और 70 वर्षीय पत्नी को अपने इलाज तथा गुजारे के लिए पति से आर्थिक सहायता मांगनी पड़ी। महिला सेल की काउंसलिंग के बाद पति ₹5,000 मासिक देने पर सहमत हुए हैं। मामले में आगे की स्थिति दोनों पक्षों के बीच बनी सहमति और परिवार के अगले कदम पर निर्भर करेगी।