
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच रिश्तों में पिछले कुछ समय में एक दिलचस्प बदलाव दिखाई दे रहा है। जिस ट्रंप ने अपने राजनीतिक करियर में चीन की व्यापार नीति और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर उसके प्रभाव को लेकर लगातार कड़े बयान दिए थे, वही अब शी जिनपिंग के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों को सकारात्मक शब्दों में पेश कर रहे हैं। 24 सितंबर 2026 को शी जिनपिंग की व्हाइट हाउस यात्रा प्रस्तावित है, जहां ट्रंप उनके सम्मान में स्टेट डिनर की मेजबानी करेंगे। इस मुलाकात से पहले दोनों देशों के आर्थिक अधिकारी व्यापार, टैरिफ, महत्वपूर्ण खनिजों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे मुद्दों पर बातचीत कर रहे हैं।
ट्रंप का यह बदला हुआ अंदाज केवल व्यक्तिगत दोस्ती की कहानी नहीं है। इसके पीछे अमेरिका और चीन के बीच चल रही लंबी व्यापारिक खींचतान, टैरिफ, सप्लाई चेन, दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े हित भी हैं। दोनों देशों ने पिछले महीनों में टकराव को नियंत्रित करने के लिए बातचीत के कई दौर किए हैं और अब नेताओं की बैठक से पहले कुछ व्यावहारिक समझौतों की जमीन तैयार करने की कोशिश की जा रही है।
कभी चीन के खिलाफ बेहद सख्त रहे हैं ट्रंप
डोनाल्ड ट्रंप के राजनीतिक करियर में चीन लंबे समय से एक प्रमुख मुद्दा रहा है। अपने पहले राष्ट्रपति कार्यकाल और उससे पहले के चुनाव प्रचार में उन्होंने चीन पर अमेरिकी उद्योगों और नौकरियों को नुकसान पहुंचाने तथा व्यापार में अमेरिका के खिलाफ असंतुलन पैदा करने के आरोप लगाए थे।
उनकी सरकार ने चीन से आयात होने वाले कई उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाए थे। इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिकी सामान पर शुल्क बढ़ाए। इससे दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार युद्ध जैसी स्थिति पैदा हुई थी।
2025 में ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान भी चीन पर नए टैरिफ लगाए गए। शुरुआती दौर में दोनों देशों के बीच शुल्कों में तेजी से बढ़ोतरी हुई और कुछ मामलों में दरें तीन अंकों तक पहुंच गईं। बाद में बातचीत के जरिए स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश हुई और अक्टूबर 2025 में दोनों देशों के नेताओं के बीच एक व्यापार समझौता हुआ, जिसने टैरिफ टकराव को कुछ हद तक कम किया।
यही वह पृष्ठभूमि है, जिसमें ट्रंप और शी के बीच मौजूदा बातचीत को समझना जरूरी है।
अब ट्रंप शी को ‘महान सज्जन’ क्यों बता रहे हैं?
सितंबर में ट्रंप ने शी जिनपिंग के बारे में सार्वजनिक रूप से कहा कि वह एक अच्छे व्यक्ति हैं और दोनों के बीच अच्छे संबंध हैं। उन्होंने यह भी कहा कि चीन अमेरिका का प्रतिस्पर्धी है, लेकिन दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध अच्छे हैं।
ट्रंप ने शी के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों को पहले भी बातचीत में महत्वपूर्ण बताया है। मई 2026 में चीन की अपनी यात्रा के दौरान दोनों नेताओं के बीच आमने-सामने बैठक हुई थी। उसके बाद अमेरिका और चीन ने व्यापारिक संबंधों को अधिक व्यवस्थित तरीके से संभालने के लिए बातचीत जारी रखी। अमेरिकी प्रशासन ने इस प्रक्रिया को ‘managed trade’ यानी प्रबंधित व्यापार की दिशा में आगे बढ़ने के रूप में पेश किया है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका और चीन के बीच सभी विवाद खत्म हो गए हैं। दोनों देशों के बीच टैरिफ, तकनीक, AI, दुर्लभ खनिज, ताइवान और कई अन्य रणनीतिक मुद्दों पर मतभेद अभी भी मौजूद हैं। आगामी बैठक का एक उद्देश्य इन मतभेदों को नियंत्रित करते हुए व्यापारिक संबंधों को अधिक स्थिर बनाना है।
टैरिफ बना हुआ है सबसे बड़ा मुद्दा
ट्रंप और शी की आगामी मुलाकात में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में व्यापार और टैरिफ शामिल हैं। पिछले वर्षों में दोनों देशों ने एक-दूसरे के सामान पर कई तरह के शुल्क लगाए हैं। इससे कंपनियों की लागत, सप्लाई चेन और वैश्विक व्यापार पर असर पड़ा है।
अक्टूबर 2025 में बनी व्यापारिक सहमति के तहत दोनों देशों ने टकराव को कम किया था। लेकिन यह व्यवस्था स्थायी व्यापार समझौते में तब्दील नहीं हुई है। मौजूदा व्यापारिक विराम की अवधि नवंबर 2026 में समाप्त होने वाली है, इसलिए उससे पहले दोनों पक्ष किसी नए समझौते या विस्तार की संभावनाएं तलाश रहे हैं।
अमेरिकी और चीनी अधिकारी 20 सितंबर को न्यूयॉर्क में भी बातचीत कर रहे हैं। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट और चीन के उपप्रधानमंत्री हे लिफेंग के बीच हुई बातचीत में टैरिफ के अलावा AI और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति पर भी चर्चा हो रही है।
चीन से दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति भी अहम
अमेरिका और चीन के रिश्तों में दुर्लभ खनिज यानी rare earth minerals का महत्व पिछले कुछ समय में काफी बढ़ा है। इन खनिजों का इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहनों, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरणों और कई आधुनिक तकनीकों में होता है।
चीन वैश्विक दुर्लभ खनिज आपूर्ति श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। व्यापार विवाद के दौरान इन खनिजों की आपूर्ति को लेकर अमेरिका और उसके सहयोगियों में चिंता बढ़ी है।
अक्टूबर 2025 के व्यापार समझौते के तहत चीन ने महत्वपूर्ण खनिजों और rare-earth magnets की आपूर्ति को सामान्य बनाए रखने की दिशा में कदम उठाने पर सहमति जताई थी। लेकिन अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि हाल की आपूर्ति उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रही है। यही मुद्दा अब ट्रंप-शी वार्ता से पहले होने वाली आर्थिक बातचीत में भी शामिल है।
AI भी बनेगा बातचीत का बड़ा हिस्सा
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी अमेरिका-चीन संबंधों में तेजी से महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। दोनों देश AI को आर्थिक विकास के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा और तकनीकी प्रतिस्पर्धा के नजरिए से देखते हैं।
अमेरिकी और चीनी अधिकारियों के बीच 20 सितंबर की बातचीत में AI सुरक्षा और तकनीकी नियंत्रण से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की जा रही है। रिपोर्टों के अनुसार दोनों पक्ष AI तकनीक के लिए कुछ सुरक्षा मानकों या guardrails पर भी बातचीत कर रहे हैं।
AI के क्षेत्र में अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा केवल कंपनियों तक सीमित नहीं है। इसमें सेमीकंडक्टर, कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा, उन्नत मॉडल और तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला जैसे विषय भी जुड़े हुए हैं। इसलिए आगामी बैठक में AI से जुड़े किसी बड़े समझौते की संभावना पर दुनिया की तकनीकी और कारोबारी कंपनियों की भी नजर है।
अमेरिका को क्या चाहिए?
अमेरिका की ओर से चीन के साथ बातचीत में व्यापार संतुलन और अमेरिकी कंपनियों के लिए बाजार पहुंच महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। अमेरिकी प्रशासन ने चीन से अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद बढ़ाने और बोइंग विमानों की खरीद जैसे विषयों को भी बातचीत के एजेंडे में रखा है।
रॉयटर्स के अनुसार दोनों पक्ष गैर-रणनीतिक वस्तुओं पर कुछ टैरिफ कम करने तथा चीन की ओर से अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद बढ़ाने जैसे विकल्पों पर चर्चा कर रहे हैं। हालांकि बातचीत अभी जारी है और किसी अंतिम समझौते की घोषणा नहीं हुई है।
अमेरिकी व्यापार नीति में चीन के साथ संबंधों को पूरी तरह खत्म करने के बजाय नियंत्रित और संतुलित व्यापार व्यवस्था बनाने की बात भी सामने आई है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय के दस्तावेज में कहा गया है कि अमेरिका चीन के साथ व्यापार जारी रखना चाहता है, लेकिन इसे पारस्परिकता और संतुलन के आधार पर संचालित करने की कोशिश करेगा।
चीन की तरफ से क्या मुद्दे हैं?
चीन के लिए भी अमेरिका के साथ स्थिर व्यापारिक संबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन बीजिंग कई अमेरिकी नीतियों को लेकर अपनी चिंताएं रखता है। टैरिफ, तकनीकी प्रतिबंध और चीनी कंपनियों पर लगाए गए विभिन्न अमेरिकी नियंत्रण दोनों देशों के बीच विवाद के प्रमुख हिस्से हैं।
इसके अलावा ताइवान भी अमेरिका-चीन संबंधों का संवेदनशील विषय है। दोनों देशों के बीच किसी भी उच्चस्तरीय बातचीत में इस मुद्दे को नजरअंदाज करना मुश्किल है। रॉयटर्स के अनुसार आगामी ट्रंप-शी बैठक में व्यापार के अलावा ताइवान, ईरान और AI जैसे मुद्दों पर भी चर्चा की संभावना है।
इसलिए ट्रंप और शी की मुलाकात को केवल व्यापार वार्ता के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह अमेरिका-चीन व्यापक संबंधों की दिशा से भी जुड़ी हुई है।
व्हाइट हाउस में स्टेट डिनर क्यों महत्वपूर्ण है?
शी जिनपिंग की आगामी अमेरिका यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा व्हाइट हाउस में होने वाला स्टेट डिनर है। अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से किसी विदेशी नेता को स्टेट डिनर देना एक औपचारिक राजनयिक सम्मान होता है।
ट्रंप ने सितंबर की शुरुआत में कहा था कि शी 24 सितंबर को अमेरिका आएंगे और उनके सम्मान में स्टेट डिनर आयोजित किया जाएगा। उन्होंने शी के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों को भी सकारात्मक तरीके से पेश किया।
यह राजनयिक गर्मजोशी उस समय खास महत्व रखती है जब दोनों देशों के बीच कई रणनीतिक मतभेद बने हुए हैं। हालांकि औपचारिक स्वागत और व्यक्तिगत सौहार्द का मतलब यह नहीं है कि सभी नीतिगत विवाद समाप्त हो गए हैं।
क्या इसे ‘दोस्ती’ कहना सही होगा?
सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में ट्रंप और शी के रिश्ते को दोस्ती के रूप में पेश किया जा रहा है। ट्रंप खुद भी कई बार शी के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों के लिए दोस्ताना भाषा का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में व्यक्तिगत संबंध और देशों के रणनीतिक हित अलग-अलग स्तर पर काम करते हैं।
अमेरिका और चीन अभी भी दुनिया की दो बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्तियां हैं और उनके बीच तकनीक, व्यापार, सुरक्षा तथा वैश्विक प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा जारी है। इसलिए ट्रंप के नरम सार्वजनिक बयान को अमेरिका की चीन नीति में सभी क्षेत्रों में बदलाव के बराबर नहीं माना जा सकता।
एसोसिएटेड प्रेस की हालिया रिपोर्ट में भी इस बदलाव को ट्रंप की चीन नीति के व्यापक संदर्भ में देखा गया है। रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप अब शी के बारे में पहले की तुलना में अधिक सकारात्मक भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जबकि चीन के साथ कई आर्थिक और रणनीतिक मतभेद अभी भी मौजूद हैं।
भारत समेत दुनिया की नजर इस बैठक पर
अमेरिका और चीन के बीच होने वाली किसी भी बड़ी बैठक का असर केवल इन दोनों देशों तक सीमित नहीं रहता। दुनिया की सप्लाई चेन, कच्चे माल की कीमतें, तकनीकी उद्योग और वैश्विक बाजार दोनों देशों के आर्थिक फैसलों से प्रभावित होते हैं।
अगर टैरिफ में और कटौती या व्यापारिक विराम को आगे बढ़ाने पर सहमति बनती है तो कंपनियों को कुछ स्थिरता मिल सकती है। दूसरी तरफ अगर बातचीत में कोई ठोस प्रगति नहीं होती और नए शुल्क या प्रतिबंधों की स्थिति बनती है, तो वैश्विक कारोबारी माहौल पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। फिलहाल दोनों देशों के अधिकारियों की बातचीत का उद्देश्य तनाव को बढ़ाने के बजाय संभावित समझौतों की जमीन तैयार करना है।
भारत के लिए भी अमेरिका-चीन संबंध महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि दोनों देश भारत के बड़े व्यापारिक और रणनीतिक साझेदारों में शामिल हैं। इसके अलावा वैश्विक सप्लाई चेन, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों से जुड़े बदलाव भारतीय उद्योगों को भी प्रभावित कर सकते हैं।
आगे क्या होगा?
24 सितंबर को प्रस्तावित ट्रंप-शी बैठक से पहले अमेरिका और चीन के आर्थिक अधिकारी बातचीत कर रहे हैं। टैरिफ, दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति, कृषि खरीद, बोइंग विमान, AI और व्यापारिक व्यवस्था जैसे कई विषय मेज पर हैं। लेकिन फिलहाल किसी बड़े अंतिम समझौते की घोषणा नहीं हुई है। रॉयटर्स से बात करने वाले एक विश्लेषक ने भी संभावना जताई कि दोनों पक्ष कुछ सीमित कदमों पर सहमत हो सकते हैं, जबकि किसी व्यापक breakthrough की उम्मीद को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए।
इसलिए ट्रंप के बदले हुए सुर को समझने के लिए सिर्फ उनकी बयानबाजी देखना पर्याप्त नहीं है। पिछले एक साल में अमेरिका और चीन ने टैरिफ टकराव के बाद बातचीत के कई दौर किए हैं और दोनों देश अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित रखते हुए संबंधों को अधिक प्रबंधित तरीके से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
ट्रंप और शी की आगामी बैठक यह तय करने में महत्वपूर्ण होगी कि यह प्रक्रिया कितनी आगे बढ़ती है। क्या दोनों देश मौजूदा व्यापारिक विराम को आगे बढ़ा पाते हैं, क्या rare earth minerals की आपूर्ति को लेकर कोई ठोस व्यवस्था बनती है और क्या AI तथा तकनीकी प्रतिस्पर्धा के लिए कुछ नए नियम तय होते हैं, इन सवालों के जवाब बैठक के बाद ही ज्यादा स्पष्ट होंगे। फिलहाल इतना जरूर है कि अमेरिका-चीन संबंधों में तीखे टकराव के साथ-साथ बातचीत और व्यक्तिगत कूटनीति का एक नया चरण भी दिखाई दे रहा है।