
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार, 22 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने संबोधन के दौरान ईरान को लेकर बेहद कड़ा बयान दिया। ट्रंप ने कहा कि उनके सामने एक बड़ा फैसला है कि ईरान के साथ ऐसा समझौता किया जाए, जिससे वह आगे बढ़ सके और दोबारा निर्माण कर सके, या फिर ईरानी शासन के खिलाफ बेहद कठोर सैन्य कार्रवाई की जाए। उन्होंने अपने संबोधन में ईरान को लेकर ‘डील’ और ‘सर्वनाश’ के बीच का विकल्प पेश किया और कहा कि उन्हें इस मुद्दे पर जल्द निर्णय लेना है।
ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी सैन्य संघर्ष को खत्म करने के लिए बातचीत की संभावनाओं पर भी चर्चा चल रही है। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का बचाव कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ वह यह भी कह रहे हैं कि अंततः दोनों देशों के बीच समझौता हो सकता है। ट्रंप ने दावा किया कि उन्हें उम्मीद है कि अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के बाद ईरान के साथ कोई डील हो सकती है।
UN में ट्रंप ने ईरान को क्या कहा?
संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में अपने भाषण के दौरान ट्रंप ने ईरान को लेकर अपनी रणनीति स्पष्ट करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि उनके सामने एक बड़ा निर्णय है। उनके अनुसार, एक रास्ता ईरान के साथ समझौता करने का है, जिसके तहत ईरान को दोबारा अपने देश का पुनर्निर्माण करने का मौका मिल सकता है। दूसरा विकल्प ईरानी शासन को पूरी तरह सैन्य तरीके से खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ना है।
ट्रंप ने अपने संबोधन में कहा कि वह ऐसा विकल्प चुन सकते हैं जिसमें ईरान को भविष्य में अमेरिकी या अन्य देशों के खिलाफ हमला करने का अवसर न मिले। उन्होंने ईरान पर लोगों और देशों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करने का आरोप भी लगाया। ये आरोप ट्रंप की ओर से लगाए गए हैं और इन्हें उनके राजनीतिक तथा सैन्य रुख के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
उनके इस बयान को ईरान के खिलाफ अब तक दिए गए सबसे कड़े सार्वजनिक संदेशों में से एक माना जा रहा है। हालांकि, उसी भाषण में ट्रंप ने समझौते की संभावना भी खुली रखी और कहा कि उन्हें विश्वास है कि अंततः डील हो सकती है।
ईरान के साथ बातचीत की संभावना भी कायम
ट्रंप के भाषण का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि उन्होंने सैन्य कार्रवाई की धमकी के साथ बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया। उन्होंने कहा कि उन्हें लगता है कि चुनाव के बाद अमेरिका और ईरान के बीच समझौता हो सकता है।
रॉयटर्स के मुताबिक, ट्रंप ने 3 नवंबर को होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बाद ईरान के साथ डील होने की उम्मीद जताई। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ईरान को लेकर उनके फैसले चुनाव से प्रभावित नहीं हैं। यानी एक तरफ उन्होंने चुनाव के बाद समझौते की संभावना जताई, दूसरी तरफ कहा कि चुनाव उनकी ईरान नीति का आधार नहीं है।
यह विरोधाभास इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ट्रंप के बयान में एक साथ दो संदेश दिखाई देते हैं। पहला, अमेरिका ईरान पर दबाव बनाए रखना चाहता है। दूसरा, अगर बातचीत के जरिए कोई समझौता संभव होता है तो उसका रास्ता अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है।
अमेरिका-ईरान संघर्ष करीब सात महीने से जारी
अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा संघर्ष कई महीनों से जारी है। ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र में अपने संबोधन का एक बड़ा हिस्सा इस सैन्य कार्रवाई को सही ठहराने में लगाया। उन्होंने कहा कि अमेरिकी और इजरायली सैन्य कार्रवाई का उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना था।
ईरान लंबे समय से परमाणु हथियार बनाने की कोशिश करने के अमेरिकी और इजरायली आरोपों से इनकार करता रहा है। इसलिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर दोनों पक्षों के दावों में बड़ा अंतर बना हुआ है। ट्रंप ने अपने भाषण में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को सुरक्षा के लिहाज से जरूरी बताया, जबकि ईरान का रुख अलग रहा है।
ट्रंप के अनुसार, ईरान की गतिविधियों को रोकने के लिए अमेरिका ने सैन्य कदम उठाया। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान का शासन कमजोरी और दबाव की स्थिति में है। ये ट्रंप द्वारा दिए गए आकलन हैं और ईरान इन आरोपों को स्वीकार नहीं करता।
‘ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करें’
ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र में सिर्फ सैन्य दबाव की बात नहीं की। उन्होंने दूसरे देशों से ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने का भी आह्वान किया। उनका कहना था कि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक दबाव से ईरान को बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
रॉयटर्स के अनुसार, ट्रंप ने दूसरे देशों से ईरान के साथ आर्थिक संबंधों को सीमित करने और उस पर दबाव बढ़ाने की अपील की। यह संदेश ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत दोबारा शुरू होने की संभावना पर चर्चा हो रही है।
अमेरिका की रणनीति में आर्थिक प्रतिबंध और सैन्य दबाव पहले से ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। ईरान के तेल निर्यात, बैंकिंग और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर लगाए गए प्रतिबंधों का उद्देश्य उसकी आर्थिक क्षमता को प्रभावित करना रहा है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज भी बड़ा मुद्दा
अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का मुद्दा भी बेहद महत्वपूर्ण है। फारस की खाड़ी और अरब सागर के बीच स्थित यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है।
रॉयटर्स के अनुसार, ईरान ने संकेत दिया है कि यदि अमेरिका अपनी नाकेबंदी हटाता है तो वह एक सप्ताह के भीतर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोल सकता है। दूसरी ओर, अमेरिका इस क्षेत्र में ईरान पर दबाव बनाए हुए है।
इस समुद्री मार्ग में किसी भी तरह का लंबा व्यवधान वैश्विक तेल आपूर्ति और ऊर्जा बाजारों पर असर डाल सकता है। यही वजह है कि अमेरिका-ईरान संघर्ष पर केवल दोनों देशों की सरकारों की नजर नहीं है, बल्कि दुनिया के ऊर्जा बाजार और दूसरे देश भी घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।
क्या ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति की मुलाकात होगी?
संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन दोनों न्यूयॉर्क में मौजूद हैं। ऐसे में दोनों नेताओं के बीच संभावित मुलाकात को लेकर भी चर्चा रही है।
हालांकि, ट्रंप के संयुक्त राष्ट्र भाषण में पेजेशकियन के साथ किसी संभावित आमने-सामने बैठक की घोषणा नहीं हुई। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार दोनों देशों के बीच जुलाई में अंतरिम समझौते को लेकर हुई प्रक्रिया टूटने के बाद से दोनों राष्ट्रपतियों की कोई ज्ञात आमने-सामने बैठक नहीं हुई है।
इसलिए UN महासभा के दौरान किसी बैठक की संभावना को फिलहाल निश्चित घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता। दोनों देशों के बीच बातचीत को फिर से शुरू करने के संकेत जरूर मिल रहे हैं, लेकिन ठोस समझौता अभी सामने नहीं आया है।
ईरान की तरफ से भी सख्त संदेश
ट्रंप के भाषण के बीच ईरान की ओर से भी यह संदेश दिया गया है कि वह अमेरिकी दबाव के आगे आत्मसमर्पण नहीं करेगा। रॉयटर्स के अनुसार ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर कालीबाफ ने कहा कि ट्रंप को समझना चाहिए कि वह ईरानी जनता और उसके सशस्त्र बलों पर अपनी शक्ति थोप नहीं सकते।
इससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों देशों के बीच बातचीत की संभावना के बावजूद सार्वजनिक बयानबाजी में कड़ापन बरकरार है। अमेरिका समझौते के लिए दबाव की नीति की बात कर रहा है, जबकि ईरान अपनी संप्रभुता और सैन्य प्रतिरोध की बात कर रहा है।
चुनाव के बाद डील की बात क्यों?
ट्रंप ने अपने भाषण में अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के बाद ईरान के साथ समझौता होने की संभावना जताई। अमेरिका में मध्यावधि चुनाव 3 नवंबर 2026 को होने हैं। ट्रंप का कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि उसके बाद बातचीत आगे बढ़ सकती है।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव उनके ईरान संबंधी फैसलों को प्रभावित नहीं करते। इसलिए उनके बयान में चुनाव को लेकर दो अलग-अलग संदर्भ दिखाई देते हैं। एक तरफ वह चुनाव के बाद समझौते की संभावना बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अपनी मौजूदा नीति को चुनाव से अलग बता रहे हैं।
किसी भी समझौते का वास्तविक स्वरूप इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका और ईरान किन शर्तों पर सहमत होते हैं। परमाणु कार्यक्रम, सैन्य गतिविधियां, प्रतिबंध, तेल व्यापार, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे इसमें महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
अमेरिका की सैन्य कार्रवाई का ट्रंप ने किया बचाव
संयुक्त राष्ट्र में ट्रंप ने अपने भाषण के दौरान अमेरिका की ईरान नीति का जोरदार बचाव किया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने ईरान के परमाणु खतरे को रोकने के लिए सैन्य कार्रवाई की।
एसोसिएटेड प्रेस के अनुसार ट्रंप ने ईरानी शासन को कमजोर और हताश बताया तथा दावा किया कि अमेरिकी कार्रवाई का उद्देश्य ईरान से जुड़े खतरे को खत्म करना था। उन्होंने संघर्ष को समाप्त करने के लिए ईरान पर बातचीत का दबाव बनाए रखने की बात भी कही।
यह बयान उस समय आया जब अमेरिका के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान के साथ युद्ध और उसके आर्थिक प्रभावों को लेकर बहस जारी है। युद्ध ने ऊर्जा बाजारों और क्षेत्रीय सुरक्षा पर भी असर डाला है।
संयुक्त राष्ट्र में ईरानी प्रतिनिधिमंडल का विरोध
ट्रंप के भाषण के दौरान ईरानी प्रतिनिधिमंडल के कुछ सदस्यों ने सभा से बाहर जाने का कदम उठाया। रिपोर्टों के अनुसार, जब ट्रंप ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और संघर्ष का उल्लेख किया तो ईरानी प्रतिनिधिमंडल के अधिकांश सदस्य हॉल से बाहर चले गए।
यह घटनाक्रम अमेरिका और ईरान के बीच गहरे राजनीतिक मतभेद को दिखाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा दुनिया के नेताओं के लिए अपनी विदेश नीति का पक्ष रखने का महत्वपूर्ण मंच है, लेकिन इस मंच पर दिए गए भाषणों के बीच भी दोनों देशों के बीच सीधी बातचीत का रास्ता अभी स्पष्ट नहीं हुआ है।
ट्रंप का संदेश सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं
ट्रंप का UN भाषण केवल ईरान को लेकर नहीं था। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और अमेरिका की संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर भी अपना रुख रखा। उनके भाषण में अमेरिकी हितों और राष्ट्रीय संप्रभुता को प्राथमिकता देने की बात प्रमुख थी।
लेकिन ईरान उनके संबोधन का सबसे संवेदनशील हिस्सा रहा, क्योंकि दोनों देशों के बीच वास्तविक सैन्य संघर्ष चल रहा है। ट्रंप का ‘डील या सर्वनाश’ वाला बयान इसी संघर्ष के अगले चरण को लेकर उनके रुख को सामने लाता है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। ट्रंप एक ओर ईरान को कड़ी सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दे रहे हैं, तो दूसरी ओर समझौते की संभावना भी खुली रख रहे हैं। ईरान ने भी अमेरिकी दबाव के सामने झुकने से इनकार किया है, लेकिन बातचीत को लेकर अलग-अलग माध्यमों से संकेत सामने आए हैं।
आने वाले दिनों में सबसे अहम सवाल यह होगा कि क्या दोनों देश दोबारा औपचारिक बातचीत की मेज पर लौटते हैं। यदि बातचीत शुरू होती है तो परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध, सैन्य कार्रवाई, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे उसके केंद्र में रहेंगे।
ट्रंप का संयुक्त राष्ट्र में दिया गया बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें उन्होंने एक साथ दो रास्तों का संकेत दिया है। एक तरफ वह ईरान पर सैन्य और आर्थिक दबाव बढ़ाने की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ यह भी कह रहे हैं कि समझौते के जरिए ईरान को आगे बढ़ने का अवसर दिया जा सकता है। अब यह देखना होगा कि आने वाले हफ्तों में यह बयान वास्तविक कूटनीतिक बातचीत में बदलता है या दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव और बढ़ता है।