
30 सितंबर तक पूरा होगा अमेरिकी सैनिकों का इराक से निकलना
इराक में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी अब अपने अंतिम चरण में पहुंच गई है। अमेरिका और इराक के बीच 2024 में हुए समझौते के तहत अमेरिकी नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के इराक में सैन्य मिशन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का फैसला हुआ था। अब 30 सितंबर 2026 तक बचे अमेरिकी सैनिकों की वापसी पूरी करने की योजना है।
इस वापसी के साथ इराक में 2003 से शुरू हुई अमेरिकी सैन्य मौजूदगी का मौजूदा चरण समाप्त हो जाएगा। अमेरिकी सेना ने पिछले साल इराक के ज्यादातर हिस्सों में स्थित ठिकानों से अपनी मौजूदगी कम कर ली थी। इसके बाद उत्तरी इराक के कुर्द क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों की सीमित मौजूदगी बची थी। अब वहां से भी सैनिक और सैन्य उपकरण हटाए जा रहे हैं।
अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, इराक में अब अमेरिकी सैनिकों का मिशन पहले जैसा नहीं रहा है। इराकी सुरक्षा बलों को प्रशिक्षण और आतंकवाद विरोधी अभियानों में सहयोग देने की जिम्मेदारी धीरे-धीरे इराकी बलों को हस्तांतरित की गई है।
2003 में शुरू हुआ था पूरा अभियान
अमेरिका ने मार्च 2003 में इराक पर सैन्य हमला किया था। उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के प्रशासन ने इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की सरकार के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी।
अमेरिका और उसके सहयोगियों ने उस समय इराक के पास बड़े पैमाने पर विनाशकारी हथियार यानी Weapons of Mass Destruction होने का दावा किया था। बाद में ऐसे हथियार नहीं मिले। यही वजह रही कि इराक युद्ध की शुरुआती वजहों और अमेरिकी फैसले को लेकर वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस होती रही।
अमेरिकी सैन्य अभियान के दौरान इराक में बड़ी संख्या में सैनिक तैनात किए गए। 2007 में अमेरिकी मौजूदगी अपने चरम पर पहुंची और उस समय इराक में 1.70 लाख से अधिक अमेरिकी सैनिक थे।
लेकिन समय के साथ अमेरिकी सैन्य मौजूदगी घटती गई और दिसंबर 2011 में अमेरिका ने अपने अंतिम लड़ाकू सैनिकों को इराक से वापस बुला लिया था। उस समय ऐसा लगा कि इराक में अमेरिकी युद्ध अभियान समाप्त हो चुका है।
2014 में फिर लौटे अमेरिकी सैनिक
अमेरिका की इराक से दूरी ज्यादा लंबी नहीं रही। 2014 में इस्लामिक स्टेट यानी ISIS के तेजी से उभरने के बाद हालात पूरी तरह बदल गए।
ISIS ने इराक और सीरिया के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था। संगठन ने इराक में कई शहरों और रणनीतिक इलाकों पर नियंत्रण स्थापित किया। इसके बाद इराकी सरकार ने अमेरिका और उसके सहयोगियों से मदद मांगी।
अमेरिका के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय गठबंधन ने ISIS के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया। इस दौरान अमेरिकी सेना ने इराकी सुरक्षा बलों को प्रशिक्षण, खुफिया जानकारी, हवाई सहायता और सैन्य सहयोग उपलब्ध कराया।
अमेरिकी सेना 2014 में इराकी सरकार के निमंत्रण पर वापस आई थी। इसलिए 2003 के आक्रमण के बाद की सैन्य मौजूदगी और 2014 के बाद ISIS विरोधी मिशन की परिस्थितियां अलग थीं।
ISIS के खिलाफ अभियान में क्या हुआ?
ISIS ने 2014 में इराक के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था। संगठन ने एक समय इराक के लगभग एक-तिहाई हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लिया था।
अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन और इराकी सुरक्षा बलों के सैन्य अभियानों के बाद ISIS का क्षेत्रीय नियंत्रण धीरे-धीरे खत्म हुआ। 2017 में इराकी सरकार ने देश में ISIS के क्षेत्रीय कब्जे के खिलाफ जीत की घोषणा की।
इसके बाद भी ISIS पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। संगठन के पास इराक में सक्रिय क्षेत्रीय नियंत्रण तो नहीं रहा, लेकिन उसके स्लीपर सेल यानी छिपे हुए छोटे नेटवर्क मौजूद रहे। ऐसे समूह समय-समय पर हमले करने और सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती देने की क्षमता रखते हैं।
यही कारण है कि अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बावजूद ISIS का मुद्दा पूरी तरह खत्म नहीं माना जा रहा है।
अमेरिकी सेना अब क्यों जा रही है?
अमेरिका और इराक के बीच 2024 में हुए समझौते के तहत अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के इराक में सैन्य मिशन को खत्म करने की योजना बनाई गई थी।
पहले चरण में इराक के संघीय हिस्सों में गठबंधन का सैन्य मिशन सितंबर 2025 तक समाप्त करने की योजना थी। दूसरे चरण में सीमित सहयोग और क्षेत्रीय आतंकवाद विरोधी अभियानों से जुड़े बदलावों के लिए सितंबर 2026 तक का समय रखा गया।
इस प्रक्रिया के तहत अमेरिकी सैनिकों ने कई ठिकानों से अपनी मौजूदगी कम की और सैनिकों को दूसरे स्थानों पर स्थानांतरित किया। अब इराक में बचे अंतिम सैनिकों की भी वापसी की जा रही है।
अमेरिका की ओर से यह भी कहा गया है कि इराकी सुरक्षा बल अब देश में आतंकवाद विरोधी अभियान का नेतृत्व करने की स्थिति में हैं। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ISIS के खिलाफ अभियान में इराकी सुरक्षा बलों और कुर्द पेशमर्गा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
4500 अमेरिकी सैनिकों की मौत का आंकड़ा क्यों चर्चा में है?
इराक युद्ध और उसके बाद की सैन्य मौजूदगी अमेरिका के लिए भारी मानवीय कीमत लेकर आई। उपलब्ध रिपोर्टों में इराक में दो दशकों से अधिक समय के दौरान लगभग 4,500 अमेरिकी सैनिकों की मौत का आंकड़ा सामने आता है।
हालांकि, अलग-अलग स्रोतों में मौतों की गणना का तरीका अलग हो सकता है। कुछ आंकड़े केवल इराक युद्ध क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौतों को गिनते हैं, जबकि कुछ व्यापक सैन्य अभियानों या संबंधित अवधियों को शामिल करते हैं।
2026 में भी इराक में मौजूद अमेरिकी सैनिकों को सुरक्षा जोखिमों का सामना करना पड़ा। इस साल ईरान के साथ व्यापक संघर्ष के दौरान इराक में अमेरिकी सैन्यकर्मियों की मौत की घटनाएं भी हुईं। रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई में एरबिल के पास एक ड्रोन को नियंत्रित तरीके से निष्क्रिय करने की कार्रवाई के दौरान एक अमेरिकी सेना सार्जेंट की मौत हुई थी।
अरबों डॉलर का खर्च
इराक युद्ध केवल अमेरिकी सैनिकों की जान की कीमत तक सीमित नहीं रहा। अमेरिका ने इस पूरे सैन्य अभियान और उससे जुड़ी गतिविधियों पर भारी आर्थिक खर्च किया।
इराक में सैन्य अभियान के अलावा सैनिकों की तैनाती, हथियार, सैन्य उपकरण, लॉजिस्टिक्स, पुनर्निर्माण, घायल सैनिकों की चिकित्सा और पूर्व सैनिकों से जुड़ी दीर्घकालिक सुविधाओं पर भी अमेरिका को खर्च करना पड़ा।
अमेरिकी इराक युद्ध की कुल लागत का अनुमान लगाने के तरीके अलग-अलग हैं। इसलिए केवल एक आंकड़े को पूरे युद्ध की अंतिम लागत मानना सही नहीं होगा। लेकिन यह स्पष्ट है कि यह अभियान अमेरिकी इतिहास के सबसे महंगे विदेशी सैन्य अभियानों में शामिल रहा।
इसके अलावा युद्ध के बाद अमेरिकी सरकार पर पूर्व सैनिकों की स्वास्थ्य देखभाल और अन्य लाभों से जुड़े दीर्घकालिक खर्च का प्रभाव भी पड़ा।
क्या अमेरिका ने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया?
अमेरिकी सेना की वापसी के साथ यह सवाल भी उठ रहा है कि इराक में 2003 से शुरू हुए अमेरिकी अभियान का अंतिम परिणाम क्या रहा।
अमेरिका ने 2003 में सद्दाम हुसैन की सरकार को सत्ता से हटाया। इसके बाद इराक में राजनीतिक व्यवस्था बदली और वर्षों तक हिंसा तथा विद्रोह का दौर चला। 2011 में अमेरिकी लड़ाकू सैनिकों की वापसी हुई, लेकिन 2014 में ISIS के उभार के कारण अमेरिका को फिर सैन्य भूमिका निभानी पड़ी।
अंततः ISIS का इराक में क्षेत्रीय नियंत्रण समाप्त हुआ, लेकिन संगठन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। दूसरी तरफ इराक की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था में ईरान समर्थक सशस्त्र समूहों का प्रभाव भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है।
इसलिए अमेरिकी वापसी को केवल सैन्य अभियान की समाप्ति के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ इराक की भविष्य की सुरक्षा व्यवस्था, राजनीतिक संतुलन और बाहरी शक्तियों के प्रभाव से जुड़े सवाल भी जुड़े हैं।
ईरान को क्यों मिल सकता है फायदा?
अमेरिकी सेना की वापसी का एक महत्वपूर्ण पहलू ईरान का प्रभाव है। इराक की सीमा ईरान से लगती है और दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक संबंध हैं।
इराक में कई शक्तिशाली शिया राजनीतिक और सशस्त्र समूह हैं जिनके ईरान से करीबी संबंध बताए जाते हैं। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा रही है और इराक इस प्रतिस्पर्धा का एक प्रमुख क्षेत्र रहा है।
ईरान और उसके समर्थक समूहों ने अमेरिकी सैनिकों की वापसी का स्वागत किया है और इसे अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत होने के अवसर के रूप में देखा है। ईरान समर्थक समूहों के कुछ नेताओं ने अमेरिकी वापसी को अपनी जीत बताया है। यह उनका राजनीतिक दावा है, जिसे स्वतंत्र तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
कुछ इराकी सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी सैन्य मौजूदगी खत्म होने से ईरान समर्थित समूहों का प्रभाव बढ़ सकता है। हालांकि, इराक की सरकार अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और सभी हथियारबंद समूहों को राज्य के नियंत्रण में लाने की कोशिश कर रही है।
ISIS की वापसी का खतरा कितना है?
अमेरिकी सैनिकों की वापसी के साथ दूसरा बड़ा सवाल ISIS से जुड़ा है।
इराक में ISIS का क्षेत्रीय कब्जा खत्म हो चुका है, लेकिन संगठन के स्लीपर सेल अब भी मौजूद हैं। ये समूह छोटे हमले, घात लगाकर हमला करने और आत्मघाती हमलों जैसी गतिविधियों के जरिए अपनी मौजूदगी बनाए रखने की कोशिश कर सकते हैं।
कुछ इराकी सुरक्षा अधिकारियों और कुर्द अधिकारियों ने अमेरिकी वापसी से पहले ISIS से जुड़े संदिग्ध नेटवर्क की गतिविधियों में बढ़ोतरी की बात कही है। एक कुर्द कमांडर ने Reuters को बताया कि अमेरिकी वापसी की खबर के बाद स्लीपर सेल की गतिविधियों में हलचल देखी गई। इराकी अधिकारियों ने एक संदिग्ध ISIS सेल द्वारा वापसी के आसपास आत्मघाती हमले की तैयारी का दावा भी किया। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग स्तर पर उपलब्ध नहीं है।
अमेरिकी सैन्य अधिकारियों का कहना है कि इराकी सुरक्षा बलों ने ISIS से मुकाबले में काफी क्षमता विकसित कर ली है। यही बदलाव अमेरिकी सैन्य भूमिका कम करने के फैसले का एक प्रमुख आधार है।
इराक के सामने अब दो बड़ी चुनौतियां
अमेरिकी सेना के निकलने के बाद इराक के सामने कम से कम दो प्रमुख सुरक्षा चुनौतियां रहेंगी।
पहली चुनौती ISIS जैसे आतंकवादी संगठनों के बचे हुए नेटवर्क से निपटना है। इसके लिए इराकी सुरक्षा बलों को खुफिया जानकारी, निगरानी, सैन्य लॉजिस्टिक्स और आतंकवाद विरोधी क्षमता बनाए रखनी होगी।
दूसरी चुनौती देश के अंदर मौजूद गैर-राज्य सशस्त्र समूहों को लेकर है। इराकी प्रधानमंत्री ने 30 सितंबर की समयसीमा को विदेशी सैनिकों की वापसी से जोड़ते हुए हथियारों पर राज्य का एकाधिकार स्थापित करने की बात कही है। लेकिन कुछ शक्तिशाली ईरान समर्थित मिलिशिया समूहों ने हथियार छोड़ने की समयसीमा को स्वीकार नहीं किया है।
इससे अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद इराक में सुरक्षा और राजनीतिक संतुलन का सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है।
क्या अमेरिका और इराक के संबंध खत्म हो जाएंगे?
ऐसा नहीं है। अमेरिकी सैन्य मिशन के खत्म होने का अर्थ अमेरिका और इराक के संबंधों का अंत नहीं है।
अमेरिकी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि दोनों देशों के बीच भविष्य में सामान्य द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग का ढांचा बनाया जा सकता है। इसका मतलब सैन्य गठबंधन के बजाय प्रशिक्षण, सुरक्षा सहयोग, खुफिया साझेदारी और अन्य द्विपक्षीय व्यवस्थाओं पर जोर हो सकता है।
इसके साथ आर्थिक संबंध भी महत्वपूर्ण रहेंगे। अमेरिका और इराक के बीच तेल, निवेश, ऊर्जा और अन्य आर्थिक क्षेत्रों में संबंध मौजूद हैं।
इराक भी एक ऐसी विदेश नीति की कोशिश कर रहा है जिसमें वह अमेरिका और ईरान दोनों के साथ अपने संबंध बनाए रख सके।
21 साल बाद बदल रहा है इराक का सुरक्षा ढांचा
2003 में अमेरिकी सेना जिस इराक में दाखिल हुई थी और 2026 में जिस इराक से निकल रही है, दोनों की परिस्थितियां काफी अलग हैं।
2003 में अमेरिका ने सद्दाम हुसैन की सरकार को हटाने के लिए सैन्य अभियान शुरू किया था। 2011 में अमेरिकी लड़ाकू सैनिक वापस गए। 2014 में ISIS के विस्तार के बाद अमेरिकी सेना फिर लौटी। इसके बाद लगभग एक दशक तक मुख्य भूमिका ISIS विरोधी अभियान और इराकी सुरक्षा बलों के प्रशिक्षण की रही।
अब 30 सितंबर 2026 तक अमेरिकी सैनिकों की अंतिम वापसी पूरी होने की उम्मीद है। इसके बाद इराक की सुरक्षा की मुख्य जिम्मेदारी इराकी सेना, पुलिस और कुर्द सुरक्षा बलों पर होगी।
यह बदलाव इराक की संप्रभुता के नजरिए से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन इसके साथ ISIS के बचे हुए नेटवर्क, ईरान समर्थित सशस्त्र समूहों और क्षेत्रीय तनाव से जुड़े सवाल भी बने रहेंगे।
अमेरिकी सेना की वापसी इसलिए केवल एक सैन्य अभियान का अंत नहीं है। यह 2003 के बाद से इराक और मध्य पूर्व की राजनीति में अमेरिका की भूमिका के एक महत्वपूर्ण चरण के समापन का संकेत है। आगे इराक अपनी सुरक्षा व्यवस्था को किस तरह संभालता है और अमेरिका के साथ उसके संबंध किस रूप में आगे बढ़ते हैं, यह आने वाले समय में क्षेत्रीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण होगा।
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