
कहीं खराब मशीनें, कहीं कर्मचारियों की कमी, सरकारी अस्पतालों में बेकार पड़े वेंटिलेटर
देश के सरकारी अस्पतालों में गंभीर मरीजों की जान बचाने के लिए उपलब्ध कराए गए वेंटिलेटरों की स्थिति चिंता बढ़ाने वाली है। कोरोना महामारी के दौरान जब अस्पतालों में सांस लेने में परेशानी झेल रहे मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही थी, तब बड़ी मात्रा में वेंटिलेटर और अन्य चिकित्सा उपकरण उपलब्ध कराए गए थे। इन मशीनों से उम्मीद थी कि भविष्य में भी गंभीर मरीजों को समय पर इलाज मिल सकेगा। लेकिन कई साल गुजरने के बाद देश के अलग-अलग राज्यों से ऐसी तस्वीरें सामने आ रही हैं, जहां ये मशीनें या तो खराब पड़ी हैं, या स्टोर रूम में बंद हैं, या फिर उन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी है।
राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और पंजाब के सरकारी अस्पतालों में सामने आई परिस्थितियां स्वास्थ्य व्यवस्था की तैयारियों पर सवाल खड़े करती हैं। कहीं वेंटिलेटरों को चादर और पॉलिथीन से ढककर रखा गया है, तो कहीं तकनीकी खराबियों के कारण वे इस्तेमाल के लायक नहीं हैं। कुछ अस्पतालों में मशीनें काम करने की स्थिति में होने का दावा किया गया है, लेकिन प्रशिक्षित डॉक्टरों, नर्सों और तकनीकी कर्मचारियों की कमी के कारण उनका उपयोग नहीं हो पा रहा।
यह मामला केवल महंगे उपकरणों के रखरखाव तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि जब किसी मरीज की हालत अचानक गंभीर हो जाए और उसे सांस लेने में सहायता की जरूरत पड़े, तब क्या अस्पताल में मौजूद मशीन तत्काल उसके काम आ पाएगी? वेंटिलेटर का अस्पताल में मौजूद होना और जरूरत के समय मरीज को उसका लाभ मिलना दो अलग-अलग बातें हैं।
राजस्थान के पाली में चादर और पॉलिथीन से ढके मिले वेंटिलेटर
राजस्थान के पाली जिले स्थित बांगड़ अस्पताल में कोरोना काल के दौरान उपलब्ध कराए गए वेंटिलेटर चादर और पीली पॉलिथीन से ढके मिले। इन मशीनों को महामारी के दौरान गंभीर मरीजों के उपचार में सहायता देने के उद्देश्य से अस्पताल पहुंचाया गया था। लेकिन हालिया पड़ताल के दौरान उनकी ऐसी स्थिति सामने आने के बाद सवाल उठने लगे कि आखिर इन उपकरणों का नियमित इस्तेमाल क्यों नहीं हो रहा है।
अस्पताल के अधीक्षक डॉ. कैलाश परिहार के मुताबिक, अस्पताल में गंभीर मरीजों की संख्या कम होने के कारण इन वेंटिलेटरों की जरूरत नहीं पड़ती। अस्पताल प्रशासन का यह भी दावा है कि मशीनें चालू हालत में हैं और उनकी साफ-सफाई की जाती है।
प्रशासन का पक्ष यह है कि मशीनों का उपयोग कम होने का अर्थ यह नहीं है कि वे खराब हो चुकी हैं। यदि अस्पताल में वेंटिलेटर की जरूरत वाले मरीज कम आते हैं, तो उनका इस्तेमाल सीमित रह सकता है। लेकिन इस स्थिति में यह देखना भी आवश्यक है कि मशीनें नियमित रूप से जांची जा रही हैं या नहीं और आपात स्थिति आने पर उन्हें तत्काल इस्तेमाल में लाया जा सकता है या नहीं।
इस मामले में राजस्थान सरकार के कैबिनेट मंत्री जोराराम कुमावत ने जांच कराने की बात कही है। इसके साथ ही यह सवाल भी सामने आया कि यदि किसी अस्पताल में उपलब्ध मशीनों की तत्काल आवश्यकता नहीं है, तो क्या उन्हें ऐसे दूसरे सरकारी अस्पतालों तक पहुंचाने की व्यवस्था हो सकती है जहां गंभीर मरीजों के उपचार के लिए संसाधनों की कमी है।
स्वास्थ्य व्यवस्था में संसाधनों का उचित वितरण भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना नए उपकरण खरीदना। एक अस्पताल में अनुपयोगी पड़ी मशीन दूसरे अस्पताल में किसी मरीज के उपचार में उपयोगी साबित हो सकती है, बशर्ते वहां जरूरी बुनियादी ढांचा, प्रशिक्षित कर्मचारी और तकनीकी सहायता उपलब्ध हो।
शिमला में 20 वेंटिलेटर मिले, केवल आठ का हो रहा इस्तेमाल
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला स्थित दीनदयाल उपाध्याय क्षेत्रीय अस्पताल में भी वेंटिलेटरों के उपयोग को लेकर सवाल उठे हैं। अस्पताल को पीएम केयर्स फंड के माध्यम से कुल 20 वेंटिलेटर मिले थे। लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इनमें से केवल आठ मशीनें इस्तेमाल में हैं, जबकि लगभग 12 वेंटिलेटर स्टोर रूम में रखे हुए हैं।
अस्पताल प्रशासन ने मशीनों के इस्तेमाल में तकनीकी समस्याओं को एक कारण बताया है। कुछ वेंटिलेटरों में स्क्रीन और सॉफ्टवेयर से जुड़ी दिक्कतें होने की बात सामने आई है। चिकित्सा अधीक्षक डॉ. लोकेंद्र शर्मा ने भी उपकरणों की स्थिति के संबंध में जानकारी दी।
वेंटिलेटर आधुनिक चिकित्सा उपकरण हैं, जिनमें केवल बिजली का कनेक्शन देना पर्याप्त नहीं होता। उनके विभिन्न हिस्सों, मॉनिटर, सॉफ्टवेयर और अन्य प्रणालियों का सही तरीके से काम करना जरूरी है। मशीन में कोई तकनीकी खराबी आने पर उसे मरीज के उपचार में इस्तेमाल करने से पहले ठीक कराना और उसकी कार्यक्षमता की जांच करना आवश्यक होता है।
यदि मशीन की स्क्रीन या सॉफ्टवेयर में समस्या हो, तो चिकित्सा कर्मचारी मरीज की स्थिति की निगरानी और आवश्यक सेटिंग करने में कठिनाई का सामना कर सकते हैं। इसलिए ऐसी मशीनों के लिए समय पर तकनीकी सहायता और मरम्मत की व्यवस्था महत्वपूर्ण है।
हिमाचल प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री धनीराम शांडिल ने इस स्थिति के लिए पिछली बीजेपी सरकार के कार्यकाल में रखरखाव की कथित लापरवाही पर सवाल उठाए। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र से जरूरत से अधिक वेंटिलेटर भेजे गए थे। यह उनका राजनीतिक और प्रशासनिक आरोप है। मशीनों की खरीद, वितरण और रखरखाव से संबंधित जिम्मेदारी का आकलन करने के लिए संबंधित रिकॉर्ड तथा जांच के निष्कर्षों को देखना जरूरी होगा।
यहां प्रमुख सवाल यह है कि यदि 20 मशीनें अस्पताल को उपलब्ध कराई गई थीं, तो सभी मशीनों को उपयोग योग्य बनाए रखने के लिए आवश्यक मरम्मत और तकनीकी सहायता की व्यवस्था कितनी प्रभावी रही। साथ ही, यह भी जरूरी है कि अस्पताल की वास्तविक जरूरत के अनुरूप उपकरणों का इस्तेमाल हो और जो मशीनें वहां उपयोग में नहीं आ सकतीं, उनके बारे में समय रहते उचित निर्णय लिया जाए।
मध्य प्रदेश के शहडोल में कमरे में बंद मिले वेंटिलेटर
मध्य प्रदेश के शहडोल जिला अस्पताल में पीएम केयर्स फंड से मिले वेंटिलेटर एक कमरे में बंद मिले। अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि मशीनें काम करने की स्थिति में हैं, लेकिन प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मचारियों की कमी के कारण उनका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।
यह स्थिति स्वास्थ्य व्यवस्था की एक ऐसी समस्या की ओर इशारा करती है, जिसमें उपकरण उपलब्ध होने के बावजूद मानव संसाधन की कमी उपचार में बाधा बन जाती है। किसी अस्पताल को वेंटिलेटर उपलब्ध करा देना तभी उपयोगी है, जब वहां उसे संचालित करने और मरीज की लगातार निगरानी करने के लिए प्रशिक्षित टीम भी मौजूद हो।
वेंटिलेटर पर रखे गए मरीज की स्थिति पर लगातार नजर रखनी पड़ती है। मरीज की सांस, ऑक्सीजन स्तर, अन्य चिकित्सकीय संकेतों और मशीन की सेटिंग पर ध्यान देना पड़ता है। जरूरत पड़ने पर उपचार में बदलाव भी करना होता है। इस कारण वेंटिलेटर का सुरक्षित इस्तेमाल प्रशिक्षित डॉक्टरों, नर्सों और संबंधित तकनीकी कर्मचारियों की उपलब्धता पर निर्भर करता है।
यदि अस्पताल में मशीन तो मौजूद है, लेकिन प्रशिक्षित कर्मचारी उपलब्ध नहीं हैं, तो उसे केवल चालू कर देना मरीज के लिए सुरक्षित समाधान नहीं हो सकता। इसके लिए कर्मचारियों की भर्ती, प्रशिक्षण और ड्यूटी की ऐसी व्यवस्था जरूरी है जिससे गंभीर मरीजों को चौबीसों घंटे देखभाल मिल सके।
शहडोल के मामले में अस्पताल प्रबंधन ने मशीनों के काम करने की स्थिति का दावा किया है। इसलिए यहां सामने आई समस्या को सीधे मशीनों की खराबी के रूप में नहीं देखा जा सकता। प्रमुख चुनौती प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी और उपलब्ध उपकरणों को मरीजों की सेवा में लगाने की है।
सतना के जिला अस्पताल में सात वेंटिलेटर, एक मरम्मत के लिए भेजा गया
मध्य प्रदेश के सतना स्थित 500 बिस्तरों वाले सरदार वल्लभभाई पटेल जिला अस्पताल में भी वेंटिलेटर सपोर्ट वाले कार्डियक बेड और ट्रॉमा यूनिट की व्यवस्था को लेकर सवाल सामने आए। यहां मशीनों की उपलब्धता के साथ पर्याप्त नर्सिंग स्टाफ की कमी एक प्रमुख समस्या बताई गई।
अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. अमर सिंह के मुताबिक, अस्पताल को कुल सात वेंटिलेटर मिले थे। इनमें से छह चालू हालत में हैं, जबकि एक मशीन मरम्मत के लिए भोपाल भेजी गई है।
यह उदाहरण बताता है कि हर अस्पताल में स्थिति एक जैसी नहीं है। कुछ जगह उपकरण तकनीकी रूप से खराब हैं, कुछ स्थानों पर मरम्मत की जरूरत है और कहीं मशीनें उपलब्ध होने के बावजूद कर्मचारियों की कमी है। इसलिए समस्या का समाधान केवल नई मशीनें खरीदने से नहीं हो सकता। अस्पताल के अनुसार जरूरी कर्मचारियों, मरम्मत सेवाओं और बुनियादी सुविधाओं का आकलन भी उतना ही जरूरी है।
नर्सिंग स्टाफ की कमी का असर गंभीर मरीजों की देखभाल पर पड़ सकता है। वेंटिलेटर पर मौजूद मरीज को लगातार निगरानी और निर्धारित चिकित्सा प्रक्रिया की जरूरत होती है। यदि अस्पताल में पर्याप्त प्रशिक्षित नर्सें नहीं हैं, तो उपलब्ध मशीनों का पूरा लाभ लेना मुश्किल हो सकता है।
इसलिए अस्पतालों की व्यवस्था का मूल्यांकन करते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि कितने वेंटिलेटर खरीदे गए या कितने अस्पताल में मौजूद हैं। यह भी देखना होगा कि कितने उपकरण कार्यशील हैं, कितने इस्तेमाल में हैं, कितने प्रशिक्षित कर्मचारी उपलब्ध हैं और आपात स्थिति में कितनी तेजी से उपचार शुरू किया जा सकता है।
उत्तर प्रदेश के महाराजगंज में वर्षों से इस्तेमाल का इंतजार
उत्तर प्रदेश के महाराजगंज स्थित जिला महिला अस्पताल में कोरोना काल के दौरान भेजे गए वेंटिलेटर और दूसरे चिकित्सा उपकरण लंबे समय से इस्तेमाल में नहीं आ सके हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अस्पताल की पांचवीं मंजिल पर रखे गए उपकरणों में से कई धूल खाते मिले। कुछ सामान कमरों में बंद था और मशीनों को मरीजों के उपचार में लगाने की व्यवस्था पूरी नहीं हो सकी थी।
महाराजगंज को कोरोना महामारी के दौरान 18 वेंटिलेटर मिले थे। लेकिन इन्हें संचालित करने के लिए आवश्यक बुनियादी सुविधाएं समय पर तैयार नहीं हो पाईं। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. सुरेंद्र कुमार चौधरी ने बताया कि मशीनों को इस्तेमाल में लाने के लिए मेडिकल गैस पाइपलाइन और अन्य संसाधनों की आवश्यकता थी। प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी भी एक बाधा रही।
अस्पताल प्रशासन के अनुसार, क्रिटिकल केयर यूनिट तैयार कर ली गई है और मशीनों को वहां स्थानांतरित करने की प्रक्रिया शुरू की गई है। अधिकारियों का कहना है कि जरूरी पाइपलाइन, कर्मचारियों और अन्य उपकरणों की व्यवस्था पूरी होने के बाद वेंटिलेटरों को इस्तेमाल में लाया जा सकेगा।
इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वेंटिलेटर की कार्यक्षमता केवल मशीन पर निर्भर नहीं करती। गंभीर मरीजों के उपचार के लिए अस्पताल में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जहां ऑक्सीजन और अन्य आवश्यक मेडिकल गैसों की आपूर्ति, बिजली, मॉनिटरिंग उपकरण, प्रशिक्षित कर्मचारी और जरूरी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हों।
यदि मशीनें अस्पताल में पहुंच जाएं, लेकिन उन्हें चलाने के लिए जरूरी ढांचा तैयार न हो, तो सार्वजनिक धन से खरीदे गए उपकरण लंबे समय तक अनुपयोगी रह सकते हैं। इस दौरान मशीनों की वारंटी, रखरखाव और तकनीकी सहायता से जुड़ी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं।
महाराजगंज में अब क्रिटिकल केयर यूनिट के तैयार होने और उपकरणों को वहां स्थानांतरित करने की बात सामने आई है। लेकिन वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब मशीनें सभी आवश्यक सुरक्षा जांचों के बाद नियमित रूप से मरीजों के उपचार में उपलब्ध होंगी।
पश्चिम बंगाल के दिनहाटा में भी मशीनों में खराबी
पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले के दिनहाटा अस्पताल में भी वेंटिलेटरों की खराब स्थिति सामने आई है। अस्पताल प्रशासन ने मशीनों में तकनीकी दिक्कत होने की बात स्वीकार की और जल्द मरम्मत कराने का आश्वासन दिया।
वेंटिलेटर जैसे महत्वपूर्ण उपकरणों में खराबी आने के बाद उनकी मरम्मत को लंबे समय तक टालना गंभीर समस्या बन सकता है। ऐसे उपकरणों की नियमित जांच, समय पर सर्विसिंग और खराब हिस्सों को बदलने की व्यवस्था होनी चाहिए। यदि किसी मशीन को मरम्मत की आवश्यकता है, तो उसकी स्थिति स्पष्ट रूप से दर्ज होनी चाहिए और उसे दोबारा इस्तेमाल में लाने से पहले तकनीकी रूप से सुरक्षित घोषित किया जाना चाहिए।
अस्पतालों में उपकरणों का रखरखाव केवल किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं होना चाहिए। चिकित्सा प्रशासन, बायोमेडिकल इंजीनियरिंग टीम और संबंधित सेवा प्रदाताओं के बीच समन्वय जरूरी है। किसी मशीन में खराबी आने पर उसकी शिकायत दर्ज करने से लेकर मरम्मत और दोबारा जांच तक की प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए।
दिनहाटा के मामले में अस्पताल प्रशासन ने मरम्मत का भरोसा दिया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मशीनें कितनी जल्दी ठीक होती हैं और उनके काम करने की पुष्टि के बाद उन्हें मरीजों के उपचार में किस तरह उपलब्ध कराया जाता है।
पंजाब के फिरोजपुर में चार वेंटिलेटर लंबे समय तक इस्तेमाल नहीं हुए
पंजाब के फिरोजपुर सिविल अस्पताल को कोरोना काल के दौरान चार वेंटिलेटर उपलब्ध कराए गए थे। रिपोर्ट के अनुसार, इनका लंबे समय तक इस्तेमाल नहीं हो पाया। अस्पताल प्रशासन ने इसकी वजह कर्मचारियों और आवश्यक बुनियादी सुविधाओं की कमी बताई।
हालांकि, वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी डॉ. निखिल गुप्ता के अनुसार, पिछले सप्ताह से आईसीयू की व्यवस्था शुरू की गई है और चारों वेंटिलेटर स्थापित कर दिए गए हैं।
यह मामला उन उदाहरणों में शामिल है जहां लंबे समय तक अनुपयोगी रहने के बाद उपकरणों को इस्तेमाल में लाने की दिशा में कदम उठाए जाने की जानकारी सामने आई है। लेकिन आईसीयू शुरू करने और मशीनें स्थापित करने के बाद भी यह जरूरी है कि पूरी व्यवस्था लगातार काम करती रहे।
आईसीयू केवल बेड और मशीनों का नाम नहीं है। इसमें गंभीर मरीजों की निगरानी, आवश्यक दवाओं की उपलब्धता, प्रशिक्षित डॉक्टरों और नर्सों की ड्यूटी, ऑक्सीजन तथा अन्य जरूरी सुविधाओं की निरंतर आपूर्ति शामिल होती है। वेंटिलेटर लगाने के बाद इन सभी व्यवस्थाओं का संचालन जरूरी है।
फिरोजपुर में आईसीयू की शुरुआत को लेकर सामने आई जानकारी यह संकेत देती है कि कुछ अस्पतालों में संसाधनों को उपयोग में लाने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। हालांकि, लंबे समय तक मशीनों का इस्तेमाल न हो पाने की वजहों और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बनने देने के लिए उठाए गए उपायों की जानकारी भी महत्वपूर्ण होगी।
वेंटिलेटर खरीदना ही पर्याप्त क्यों नहीं?
वेंटिलेटर एक ऐसा चिकित्सा उपकरण है जो सांस लेने में गंभीर परेशानी झेल रहे मरीजों को श्वसन सहायता देने में मदद करता है। इसका इस्तेमाल विशेष चिकित्सकीय निगरानी में किया जाता है। गंभीर रूप से बीमार मरीजों के उपचार में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन इसका लाभ तभी मिलता है जब मशीन ठीक हो, अस्पताल में जरूरी बुनियादी ढांचा मौजूद हो और प्रशिक्षित चिकित्सा टीम उपलब्ध हो।
कोरोना महामारी के दौरान अस्पतालों पर अचानक मरीजों का दबाव बढ़ गया था। ऐसे समय में वेंटिलेटर और ऑक्सीजन संबंधी संसाधनों की जरूरत तेजी से बढ़ी। महामारी से निपटने के लिए उपकरणों की उपलब्धता बढ़ाना जरूरी था। लेकिन महामारी के बाद इन उपकरणों के दीर्घकालिक इस्तेमाल और रखरखाव की योजना भी उतनी ही जरूरी हो गई।
उपकरणों को खरीदने के बाद उनकी स्थापना, कर्मचारियों का प्रशिक्षण, नियमित तकनीकी जांच, खराबी की स्थिति में मरम्मत और आवश्यक पुर्जों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होती है। यदि इनमें से किसी एक व्यवस्था में कमी रह जाए, तो महंगे उपकरण भी मरीजों के लिए उपलब्ध नहीं हो पाते।
इसके अलावा, हर अस्पताल की जरूरत एक जैसी नहीं होती। किसी बड़े अस्पताल में गंभीर मरीजों की संख्या अधिक हो सकती है, जबकि किसी दूसरे अस्पताल में वेंटिलेटर की जरूरत अपेक्षाकृत कम हो। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग को अस्पतालों की वास्तविक जरूरत, मरीजों की संख्या और उपलब्ध सुविधाओं के आधार पर उपकरणों का वितरण तथा पुनर्वितरण करने की व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए।
यदि किसी अस्पताल में मशीनों की संख्या जरूरत से अधिक है और दूसरे अस्पताल में गंभीर मरीजों को पर्याप्त सुविधा नहीं मिल रही, तो उपलब्ध उपकरणों के बेहतर उपयोग की संभावनाओं का आकलन किया जाना चाहिए। इसके लिए प्रशासनिक अनुमति, तकनीकी उपयुक्तता और सुरक्षित परिवहन सहित सभी आवश्यक पहलुओं पर ध्यान देना होगा।
प्रशिक्षित डॉक्टर, नर्स और तकनीकी कर्मचारी भी जरूरी
वेंटिलेटर की उपयोगिता केवल उसकी तकनीकी स्थिति पर निर्भर नहीं करती। मशीन को संचालित करने वाले प्रशिक्षित डॉक्टरों और नर्सों की भूमिका भी अहम है। मरीज की स्थिति के अनुसार मशीन की सेटिंग तय करना, उसकी निगरानी करना और किसी भी समस्या पर तुरंत कार्रवाई करना विशेषज्ञता की मांग करता है।
इसके साथ ही बायोमेडिकल तकनीकी कर्मचारियों की उपलब्धता भी जरूरी है। मशीन में खराबी आने पर उसे समय पर ठीक करने, सुरक्षा जांच करने और उसके सभी हिस्सों की कार्यक्षमता सुनिश्चित करने के लिए तकनीकी सहयोग चाहिए। यदि अस्पताल में ऐसे कर्मचारियों की कमी हो, तो छोटी तकनीकी समस्या भी लंबे समय तक मशीन को अनुपयोगी बना सकती है।
मध्य प्रदेश के शहडोल में प्रशिक्षित स्टाफ की कमी और उत्तर प्रदेश के महाराजगंज में बुनियादी सुविधाओं के साथ कर्मचारियों की कमी का उल्लेख इस समस्या के अलग-अलग पहलुओं को सामने लाता है। इसी तरह, सतना के अस्पताल में नर्सिंग स्टाफ की कमी का मुद्दा भी उपकरणों के प्रभावी इस्तेमाल से जुड़ा है।
इसलिए अस्पतालों की जरूरतों का आकलन करते समय केवल मशीनों की संख्या नहीं, बल्कि उन्हें संचालित करने वाली टीम की उपलब्धता को भी प्राथमिकता देनी चाहिए। कर्मचारियों की नियुक्ति, नियमित प्रशिक्षण और पर्याप्त संख्या में ड्यूटी स्टाफ की व्यवस्था के बिना गंभीर मरीजों के उपचार की क्षमता सीमित रह सकती है।
उपकरणों के रखरखाव और जवाबदेही की जरूरत
सरकारी अस्पतालों में महंगे चिकित्सा उपकरणों का उपयोग सुनिश्चित करने के लिए नियमित रखरखाव और स्पष्ट जवाबदेही की व्यवस्था आवश्यक है। किसी मशीन को अस्पताल में पहुंचाने के बाद यह दर्ज किया जाना चाहिए कि उसे कब स्थापित किया गया, उसकी जांच कब हुई, वह कितने समय तक इस्तेमाल में रही और यदि वह खराब है तो मरम्मत की प्रक्रिया किस चरण में है।
इस तरह का रिकॉर्ड अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को यह पहचानने में मदद कर सकता है कि कौन-से उपकरण काम कर रहे हैं और किन्हें तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। यदि किसी मशीन का लंबे समय से इस्तेमाल नहीं हो रहा, तो उसके कारण की समीक्षा होनी चाहिए। वजह तकनीकी खराबी है, स्टाफ की कमी है, जरूरी पाइपलाइन नहीं है या अस्पताल में उस उपकरण की वास्तविक जरूरत नहीं है, यह स्पष्ट होना चाहिए।
जवाबदेही का अर्थ केवल किसी अधिकारी या कर्मचारी को दोष देना नहीं है। इसका उद्देश्य समस्या की पहचान कर उसे समय पर दूर करना और सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग सुनिश्चित करना होना चाहिए। जहां मशीनों की मरम्मत जरूरी है, वहां तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जाए। जहां कर्मचारियों की कमी है, वहां भर्ती या प्रशिक्षण की योजना बनाई जाए। जहां बुनियादी ढांचा अधूरा है, वहां उसे पूरा करने के लिए समयसीमा तय की जाए।
यदि उपकरणों की स्थिति और उनके इस्तेमाल की नियमित समीक्षा हो, तो लंबे समय तक मशीनों के बंद कमरों में पड़े रहने की आशंका कम की जा सकती है। साथ ही, जरूरत पड़ने पर अस्पतालों के बीच उपकरणों के पुनर्वितरण पर भी विचार किया जा सकता है।
मरीजों के लिए सबसे बड़ा सवाल: जरूरत पड़ने पर इलाज मिलेगा या नहीं?
सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटरों की उपलब्धता का उद्देश्य गंभीर मरीजों को समय पर चिकित्सा सहायता देना है। इसलिए इन मशीनों के उपयोग से जुड़ी समस्याओं का सबसे बड़ा असर मरीजों की उपचार व्यवस्था पर पड़ सकता है।
जब किसी मरीज की हालत बिगड़ती है, तो डॉक्टरों को उपलब्ध संसाधनों के आधार पर तत्काल निर्णय लेना पड़ता है। यदि अस्पताल में वेंटिलेटर मौजूद है लेकिन वह खराब है, या उसे चलाने के लिए प्रशिक्षित टीम उपलब्ध नहीं है, तो अस्पताल की उपचार क्षमता प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में मरीज को दूसरे अस्पताल में भेजने की जरूरत पड़ सकती है, हालांकि प्रत्येक मामले में रेफरल की वजह और निर्णय अलग हो सकते हैं।
इसलिए यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि अस्पताल में मौजूद उपकरण केवल कागजों पर उपलब्ध न रहें, बल्कि उनकी कार्यक्षमता की पुष्टि हो और वे जरूरत के समय मरीजों के उपचार में लगाए जा सकें। इसके लिए नियमित निरीक्षण, मरम्मत, प्रशिक्षित कर्मचारियों की उपलब्धता और अस्पताल प्रशासन की निगरानी जरूरी है।
निष्कर्ष: महामारी के बाद भी स्वास्थ्य व्यवस्था की तैयारी जरूरी
राजस्थान के पाली, हिमाचल प्रदेश के शिमला, मध्य प्रदेश के शहडोल और सतना, उत्तर प्रदेश के महाराजगंज, पश्चिम बंगाल के दिनहाटा तथा पंजाब के फिरोजपुर से सामने आई स्थितियां बताती हैं कि वेंटिलेटरों के प्रभावी इस्तेमाल में अलग-अलग प्रकार की बाधाएं मौजूद हैं। कहीं मशीनों की तकनीकी खराबी है, कहीं प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी, तो कहीं आवश्यक बुनियादी ढांचे का अभाव रहा है।
इन सभी मामलों में एक साझा प्रश्न यह है कि कोरोना काल में उपलब्ध कराए गए उपकरणों को लंबे समय तक उपयोगी बनाए रखने की व्यवस्था कितनी प्रभावी रही। महामारी के दौरान आपात जरूरतों को पूरा करने के लिए उपकरण खरीदना आवश्यक था, लेकिन उसके बाद उनकी नियमित देखभाल, तकनीकी सहायता और कर्मचारियों की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
सरकारी अस्पतालों की वास्तविक क्षमता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि वहां कितने वेंटिलेटर मौजूद हैं। यह देखना भी जरूरी है कि कितनी मशीनें कार्यशील हैं, कितनी नियमित रूप से मरीजों के उपचार में इस्तेमाल होती हैं और जरूरत पड़ने पर कितनी जल्दी उपलब्ध कराई जा सकती हैं।
अस्पतालों में उपकरणों का रखरखाव, कर्मचारियों की नियुक्ति, जरूरी सुविधाओं का विकास और नियमित समीक्षा स्वास्थ्य प्रशासन की प्राथमिकताओं में शामिल होने चाहिए। इससे सार्वजनिक धन से खरीदी गई मशीनों का बेहतर उपयोग हो सकेगा और गंभीर मरीजों को समय पर उपचार मिलने की संभावना बढ़ेगी।
आखिरकार, वेंटिलेटर की सफलता उसके अस्पताल में पहुंचने से नहीं, बल्कि जरूरतमंद मरीज को सही समय पर उससे मिलने वाली चिकित्सा सहायता से तय होती है।