
चीन के ‘वाटर बम’ के जवाब में भारत का 11,200 मेगावाट सियांग बांध, फिर भी क्यों विरोध कर रहे अरुणाचल के Gen-Z?
अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना (Siang Upper Multipurpose Project) को लेकर विवाद लगातार बढ़ रहा है। केंद्र सरकार इस परियोजना को भारत की ऊर्जा और जल सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण मान रही है। इसके पीछे चीन की ओर से तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर बनाई जा रही विशाल जलविद्युत परियोजना भी एक बड़ी वजह है। भारत को आशंका है कि भविष्य में चीन की ओर से नदी के पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने या उसमें अचानक बदलाव होने से निचले इलाकों पर असर पड़ सकता है।
लेकिन अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी के आसपास रहने वाले आदिवासी समुदायों, खासकर आदि समुदाय के लोगों और युवाओं का नजरिया अलग है। उनका कहना है कि जिस नदी को सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा और ऊर्जा उत्पादन के नजरिये से देख रही है, वही उनके लिए जीवन, आजीविका, संस्कृति और पूर्वजों की जमीन का आधार है। स्थानीय लोगों को डर है कि इतना बड़ा बांध और उससे बनने वाला जलाशय गांवों, खेतों, जंगलों तथा पारंपरिक जीवनशैली को प्रभावित कर सकता है।
इसी विरोध के बीच अक्टूबर 2026 में प्रदर्शन तेज हुए। 23 अक्टूबर को पूर्वी सियांग जिले के पासीघाट में विरोध के दौरान हिंसा, आगजनी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं सामने आईं। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल किया। अधिकारियों के मुताबिक, कई पुलिसकर्मी घायल हुए, जबकि स्थानीय संगठनों ने परियोजना से जुड़ी सर्वे गतिविधियां रोकने और गिरफ्तार किए गए कार्यकर्ताओं को रिहा करने की मांग उठाई।
इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चीन की विशाल जलविद्युत परियोजना के संभावित प्रभावों से निपटने के लिए भारत को भी सियांग नदी पर इतना बड़ा बांध बनाना चाहिए, या इससे स्थानीय लोगों के लिए नए पर्यावरणीय, सामाजिक और भौगोलिक जोखिम पैदा हो सकते हैं? यही सवाल अरुणाचल प्रदेश के युवाओं के आंदोलन के केंद्र में है।
चीन का विशाल बांध और भारत की जल सुरक्षा की चिंता
सियांग नदी का उद्गम तिब्बत में होता है, जहां इसे यारलुंग त्सांगपो के नाम से जाना जाता है। यह नदी अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करने के बाद सियांग कहलाती है। आगे चलकर यह दूसरी नदियों से मिलती है और असम में ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली का हिस्सा बन जाती है। अंततः ब्रह्मपुत्र बांग्लादेश की ओर बहती है।
इस नदी का प्रवाह भारत के पूर्वोत्तर के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसका पानी स्थानीय समुदायों की खेती, मछली पालन, घरेलू जरूरतों और पारिस्थितिकी से जुड़ा हुआ है। इसलिए नदी के ऊपरी हिस्से में होने वाली बड़ी परियोजनाओं को लेकर भारत में जल प्रबंधन और सुरक्षा से संबंधित चिंताएं उठती रही हैं।
चीन तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर लगभग 60,000 मेगावाट क्षमता वाली विशाल जलविद्युत परियोजना विकसित कर रहा है। इस परियोजना को लेकर भारत में चिंता है कि भविष्य में नदी के पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने की चीन की क्षमता बढ़ सकती है। हालांकि, चीन की परियोजना से भारत में पानी की उपलब्धता पर वास्तविक असर कितना होगा, यह उसके डिजाइन, संचालन, जलाशय व्यवस्था और नदी के प्राकृतिक प्रवाह सहित कई कारकों पर निर्भर करेगा।
भारत की चिंता केवल सामान्य जलविद्युत उत्पादन तक सीमित नहीं है। नदी के ऊपरी हिस्से में बड़े बांध का संचालन सूखे मौसम में पानी की उपलब्धता, अचानक पानी छोड़े जाने की स्थिति और बाढ़ प्रबंधन जैसे मुद्दों को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, किसी संभावित खतरे और किसी वास्तविक घटना के बीच अंतर करना जरूरी है। चीन की परियोजना से भारत में पानी की आपूर्ति बाधित होने या अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़े जाने की आशंका को अभी किसी निश्चित भविष्य की घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता।
इसी रणनीतिक पृष्ठभूमि में भारत ने सियांग नदी पर अपनी बड़ी बहुउद्देशीय परियोजना की योजना को आगे बढ़ाने पर जोर दिया है। सरकार की दलील है कि पर्याप्त जल भंडारण क्षमता से नदी के प्रवाह को बेहतर तरीके से प्रबंधित करने और संभावित परिस्थितियों से निपटने में मदद मिल सकती है।
क्या है 11,200 मेगावाट का सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट?
सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट, जिसे संक्षेप में SUMP कहा जाता है, अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित एक विशाल जलविद्युत और जल भंडारण परियोजना है। इसे सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (NHPC) विकसित करने की योजना बना रही है।
इस परियोजना की प्रस्तावित बिजली उत्पादन क्षमता 11,200 मेगावाट है। यदि यह योजना इसी क्षमता के साथ बनती है और संचालन शुरू करती है, तो यह भारत की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक होगी। इसमें बिजली उत्पादन के साथ बड़े पैमाने पर पानी का भंडारण और नदी के प्रवाह को प्रबंधित करने की संभावनाएं भी शामिल हैं।
सरकार का कहना है कि परियोजना से बिजली उत्पादन बढ़ सकता है, क्षेत्रीय बुनियादी ढांचे को प्रोत्साहन मिल सकता है और रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। इसके अलावा, प्रस्तावित जलाशय के जरिए बाढ़ के प्रभाव को कम करने और नदी के पानी के प्रबंधन में मदद मिलने की संभावना पर भी विचार किया जा रहा है।
हालांकि, 11,200 मेगावाट की क्षमता बिजली उत्पादन से संबंधित आंकड़ा है। इससे अपने आप यह तय नहीं होता कि परियोजना कितनी मात्रा में पानी जमा कर सकेगी या चीन की परियोजना से उत्पन्न संभावित बदलावों को किस हद तक नियंत्रित कर पाएगी। इन सवालों के जवाब के लिए जल विज्ञान, भूगर्भीय परिस्थितियों, जलाशय की क्षमता और संचालन योजना का विस्तृत अध्ययन जरूरी होगा।
परियोजना का अंतिम डिजाइन, जलाशय का वास्तविक आकार, संभावित निर्माण स्थल और पर्यावरणीय प्रभाव अभी विस्तृत अध्ययन से जुड़े विषय हैं। इसलिए इसकी प्रस्तावित क्षमता को अंतिम निर्माण योजना और सभी मंजूरियों की पुष्टि के समान नहीं माना जाना चाहिए।
सरकार इसे चीन के संभावित ‘वाटर बम’ का जवाब क्यों मानती है?
‘वाटर बम’ शब्द का इस्तेमाल इस बहस में उस आशंका को व्यक्त करने के लिए किया जा रहा है, जिसमें चीन के ऊपरी हिस्से में बने विशाल बांध से नदी के पानी के प्रवाह में अचानक बदलाव होने की संभावना जताई जाती है। यह एक राजनीतिक और रणनीतिक रूपक है, न कि किसी ऐसी घटना का प्रमाण जो निश्चित रूप से होने वाली हो।
भारत सरकार के दृष्टिकोण से सियांग परियोजना का रणनीतिक महत्व इसलिए बढ़ जाता है, क्योंकि यह चीन की ओर से प्रस्तावित विशाल जलविद्युत परियोजना के नीचे की ओर स्थित होगी। सरकार का मानना है कि बड़े जलाशय की मदद से भारत को पानी के प्रवाह को प्रबंधित करने में अतिरिक्त क्षमता मिल सकती है।
परियोजना के समर्थकों का तर्क है कि यदि भविष्य में नदी के प्रवाह में अचानक बदलाव आता है, तो भारत के पास पानी को जमा करने और आवश्यकता के अनुसार छोड़ने का एक साधन हो सकता है। इससे जल प्रबंधन, बिजली उत्पादन और कुछ परिस्थितियों में बाढ़ के प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
लेकिन इस दलील की भी सीमाएं हैं। किसी जलाशय की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें पहले से कितना पानी उपलब्ध है, नदी में उस समय कितना पानी आ रहा है, जलाशय को किस तरह संचालित किया जा रहा है और संभावित बदलाव कितनी तेजी से होते हैं। इसलिए केवल एक बड़े बांध का निर्माण कर लेने से हर तरह के जल संकट या बाढ़ को रोकने की गारंटी नहीं मिलती।
इसके अतिरिक्त, बांध के संचालन के दौरान स्थानीय पर्यावरण और नदी पर पड़ने वाले प्रभावों को भी ध्यान में रखना होगा। राष्ट्रीय सुरक्षा के उद्देश्य और स्थानीय समुदायों की सुरक्षा को एक-दूसरे के विरोध में रखने के बजाय दोनों के लिए उपलब्ध विकल्पों का वैज्ञानिक आकलन करना आवश्यक है।
फिर अरुणाचल प्रदेश के Gen-Z को क्यों है आपत्ति?
अरुणाचल प्रदेश में विरोध कर रहे युवा और स्थानीय संगठन इस परियोजना को केवल बिजली उत्पादन की योजना के रूप में नहीं देखते। उनके लिए यह उस नदी और घाटी के भविष्य का सवाल है, जहां उनके परिवार पीढ़ियों से रहते आए हैं।
स्थानीय लोगों की पहली बड़ी चिंता अपनी पैतृक जमीन और गांवों को लेकर है। प्रस्तावित विशाल जलाशय के कारण कुछ गांवों, कृषि भूमि और बस्तियों के प्रभावित होने की आशंका जताई गई है। विरोध करने वाले संगठनों का कहना है कि यदि परियोजना आगे बढ़ती है, तो लोगों को अपनी जमीन और पारंपरिक निवास छोड़ने की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।
दूसरी चिंता आजीविका से जुड़ी है। सियांग नदी के आसपास रहने वाले कई परिवार खेती, मछली पालन, स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक गतिविधियों पर निर्भर हैं। यदि नदी का प्राकृतिक प्रवाह बदलता है या जमीन और जंगल प्रभावित होते हैं, तो उनके जीवनयापन के तरीके पर असर पड़ सकता है।
तीसरी चिंता सांस्कृतिक पहचान की है। आदि समुदाय के लिए नदी और उसके आसपास का भूभाग केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि पारंपरिक ज्ञान, सामाजिक संबंधों और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। स्थानीय लोगों को डर है कि बड़े बांध से उनकी सांस्कृतिक और सामुदायिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
चौथी चिंता पर्यावरण और भूकंपीय जोखिम से जुड़ी है। अरुणाचल प्रदेश हिमालयी क्षेत्र में स्थित है, जहां भूकंप का खतरा महत्वपूर्ण है। इतने बड़े बांध के निर्माण से पहले भूगर्भीय स्थिरता, भूस्खलन, जलाशय के प्रभाव और संभावित आपदाओं का विस्तृत अध्ययन आवश्यक होगा।
इन आशंकाओं के कारण कई युवा और स्थानीय संगठन चाहते हैं कि परियोजना से संबंधित सर्वेक्षण और अन्य प्रारंभिक गतिविधियों को रोका जाए, जब तक उनकी चिंताओं पर स्पष्ट जवाब न दिया जाए।
आदि समुदाय की जमीन और सांस्कृतिक विरासत का सवाल
सियांग घाटी में आदि समुदाय की महत्वपूर्ण आबादी रहती है। इस समुदाय की सामाजिक व्यवस्था, पारंपरिक संस्थाएं और आजीविका स्थानीय भूभाग तथा नदी से गहराई से जुड़ी हुई हैं। इसलिए प्रस्तावित परियोजना को लेकर उनकी चिंता केवल संभावित मुआवजे तक सीमित नहीं है।
स्थानीय समुदायों का कहना है कि यदि गांवों का स्थानांतरण होता है, तो इसके साथ सामाजिक नेटवर्क, खेती की जमीन, पारंपरिक संसाधनों और सांस्कृतिक स्थलों पर भी असर पड़ सकता है। किसी समुदाय को दूसरी जगह बसाने से केवल मकान बदलते हैं, ऐसा नहीं है। उनके साथ जुड़े रोजगार, रिश्ते, स्थानीय ज्ञान और जीवनशैली को भी बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
विरोध का नेतृत्व करने वाले संगठनों में आदि बाने केबांग और सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम जैसे समूह शामिल हैं। इन संगठनों ने परियोजना से जुड़े शुरुआती सर्वेक्षण को लेकर भी आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि यदि सर्वेक्षण शुरू हो जाता है, तो परियोजना धीरे-धीरे आगे बढ़ सकती है और बाद में उसे रोकना अधिक कठिन हो सकता है।
कुछ संगठनों ने प्रस्तावित प्रारंभिक व्यवहार्यता रिपोर्ट को अस्वीकार करने और परियोजना को रद्द करने की मांग की है। वे चाहते हैं कि सरकार स्थानीय समुदायों के साथ पारंपरिक संस्थाओं के माध्यम से चर्चा करे और प्रभावित लोगों की सामूहिक सहमति तथा चिंताओं को गंभीरता से ले।
इस बहस में एक अहम प्रश्न यह भी है कि स्थानीय लोगों की सहमति किस तरह दर्ज की जाए। विरोध करने वाले संगठनों का कहना है कि केवल कुछ परिवारों या व्यक्तियों के हस्ताक्षर पूरे समुदाय की सहमति का विकल्प नहीं हो सकते। उनके अनुसार, गांवों की पारंपरिक परिषदों और सामुदायिक संस्थाओं के साथ सार्थक बातचीत जरूरी है।
सर्वेक्षण को लेकर ही क्यों बढ़ा विवाद?
सरकार के मुताबिक, फिलहाल प्रस्तावित परियोजना की प्रारंभिक व्यवहार्यता रिपोर्ट (Pre-Feasibility Report या PFR) से जुड़ी गतिविधियों पर विचार किया जा रहा है। इस चरण का उद्देश्य यह समझना है कि परियोजना तकनीकी और भूगर्भीय दृष्टि से संभव है या नहीं, संभावित स्थान कौन-से हो सकते हैं और क्षेत्र में निर्माण से जुड़े जोखिम क्या हैं।
प्रस्तावित सर्वेक्षण नवंबर 2026 से जनवरी 2027 तक लगभग तीन महीने चलने की योजना से जुड़ा बताया गया है। इसमें भूगर्भीय परिस्थितियों, नदी के प्रवाह, संभावित जलाशय और अन्य तकनीकी पहलुओं का आकलन किया जा सकता है।
सरकार का कहना है कि प्रारंभिक व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार करना बांध निर्माण की अंतिम मंजूरी के समान नहीं है। परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए विस्तृत अध्ययन, पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव का आकलन, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट और लागू नियमों के तहत आवश्यक मंजूरियां हासिल करना जरूरी होगा।
लेकिन स्थानीय विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि सर्वेक्षण को एक साधारण तकनीकी कदम समझकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्हें डर है कि प्रारंभिक अध्ययन पूरा होने के बाद परियोजना के पक्ष में प्रशासनिक और वित्तीय प्रतिबद्धताएं बढ़ सकती हैं, जिससे भविष्य में उसे रोकना कठिन हो जाएगा।
यही वजह है कि आंदोलन का एक प्रमुख लक्ष्य सर्वेक्षण गतिविधियों को रोकना बन गया है। स्थानीय संगठनों के अनुसार, जब तक परियोजना के संभावित प्रभावों और समुदायों की चिंताओं पर स्पष्ट संवाद नहीं होता, तब तक आगे बढ़ना उचित नहीं है।
क्या बांध बनने का अंतिम फैसला हो चुका है?
अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने कहा है कि परियोजना के निर्माण पर अंतिम निर्णय अभी नहीं लिया गया है। उनके अनुसार, सरकार पहले यह जानना चाहती है कि परियोजना तकनीकी और भूगर्भीय दृष्टि से व्यवहार्य है या नहीं।
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा है कि यदि विशेषज्ञों के अध्ययन में परियोजना उपयुक्त नहीं पाई जाती, तो सरकार व्यवहार्यता के चरण से आगे नहीं बढ़ेगी। यदि परियोजना तकनीकी रूप से संभव पाई जाती है, तो भी पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, सामाजिक प्रभाव आकलन, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट और आवश्यक वैधानिक मंजूरियों की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि प्रभावित समुदायों के साथ बातचीत की जाएगी। मुख्यमंत्री ने स्थानीय संगठनों और युवाओं से संवाद की पेशकश की है और कहा है कि परियोजना को लेकर गलतफहमियों तथा आशंकाओं को दूर करने के लिए सही जानकारी उपलब्ध कराना जरूरी है।
हालांकि, स्थानीय प्रदर्शनकारियों का भरोसा अभी पूरी तरह बहाल नहीं हुआ है। उनके लिए केवल यह आश्वासन पर्याप्त नहीं है कि अभी निर्माण की अंतिम मंजूरी नहीं दी गई है। वे चाहते हैं कि सर्वेक्षण और परियोजना से जुड़ी गतिविधियों पर उनकी आपत्तियों को स्पष्ट रूप से संबोधित किया जाए।
इसलिए मौजूदा स्थिति को प्रस्तावित परियोजना के निर्माण की अंतिम मंजूरी के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। अभी मामला व्यवहार्यता अध्ययन, विरोध, सरकारी संवाद और स्थानीय समुदायों की मांगों के बीच आगे बढ़ रहा है।
पर्यावरणीय और भूकंपीय जोखिम कितने महत्वपूर्ण हैं?
अरुणाचल प्रदेश का भूगोल पहाड़ी है और कई इलाके भूकंपीय गतिविधियों के लिहाज से संवेदनशील माने जाते हैं। बड़े बांधों के निर्माण में ऐसी परिस्थितियों का विशेष महत्व होता है, क्योंकि जलाशय, ढलानों की स्थिरता, भूस्खलन और भूकंप से जुड़े जोखिमों का आकलन करना जरूरी होता है।
स्थानीय लोगों को आशंका है कि सियांग पर इतना बड़ा बांध बनने से नदी की प्राकृतिक पारिस्थितिकी प्रभावित हो सकती है। नदी में पानी का प्रवाह बदलने, तलछट के जमाव, जलीय जीवों के आवास और आसपास के जंगलों पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन जरूरी होगा।
जलाशय बनने से कुछ क्षेत्र जलमग्न हो सकते हैं। इससे वनस्पति, कृषि भूमि और स्थानीय बस्तियों पर असर पड़ने की संभावना का आकलन करना होगा। निर्माण के दौरान सड़क, सुरंग, मशीनरी और अन्य बुनियादी ढांचे की जरूरत भी पर्यावरण पर प्रभाव डाल सकती है।
इन आशंकाओं का वास्तविक पैमाना परियोजना के अंतिम डिजाइन और वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट होगा। इसलिए बिना विस्तृत रिपोर्ट के यह कहना उचित नहीं होगा कि बांध निश्चित रूप से किसी विशेष स्तर का नुकसान करेगा। लेकिन इसी तरह, यह भी उचित नहीं होगा कि केवल बिजली उत्पादन और राष्ट्रीय सुरक्षा के संभावित लाभों के आधार पर पर्यावरणीय जोखिमों को नजरअंदाज कर दिया जाए।
एक पारदर्शी प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों को अध्ययन के निष्कर्ष समझाए जाने चाहिए और उनके सवालों के जवाब दिए जाने चाहिए। यही बात परियोजना की सामाजिक स्वीकार्यता और दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
विरोध शांतिपूर्ण आंदोलन से हिंसक घटनाओं तक कैसे पहुंचा?
सियांग परियोजना के खिलाफ विरोध एक दिन में शुरू नहीं हुआ। स्थानीय स्तर पर नदी पर बड़े बांध की योजनाओं का विरोध कई दशकों से होता रहा है। हाल के वर्षों में प्रस्तावित 11,200 मेगावाट परियोजना और उससे जुड़े सर्वेक्षणों के कारण आंदोलन तेज हुआ है।
सितंबर और अक्टूबर 2026 में प्रदर्शनकारियों और प्रशासन के बीच तनाव बढ़ा। मुख्यमंत्री की क्षेत्रीय यात्रा के दौरान भी विरोध हुआ और कुछ स्थानों पर वाहनों को नुकसान पहुंचाए जाने की खबरें आईं। प्रदर्शनकारियों ने सर्वेक्षण रोकने, सुरक्षा बलों को हटाने और गिरफ्तार कार्यकर्ताओं की रिहाई की मांग उठाई।
अक्टूबर की शुरुआत में कुछ स्थानों पर पुलिस कार्रवाई और आंसू गैस के इस्तेमाल को लेकर भी शिकायतें सामने आईं। स्थानीय पत्रकारों और कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि महिलाओं सहित प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग ने युवाओं के गुस्से को और बढ़ाया। इन आरोपों के संबंध में प्रशासन और पुलिस की ओर से सामने आने वाली जानकारी को भी जांच में ध्यान में रखना होगा।
23 अक्टूबर को विरोध के दौरान स्थिति और बिगड़ गई। रिपोर्टों के अनुसार, पासीघाट में पुलिस स्टेशन, NHPC के कार्यालय और कुछ जनप्रतिनिधियों के आवासों को नुकसान पहुंचाया गया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर पथराव के आरोप लगाए और कई पुलिसकर्मियों के घायल होने की जानकारी दी।
हिंसा और आगजनी की घटनाएं आंदोलन के मूल मुद्दों से अलग गंभीर विषय हैं। किसी परियोजना के खिलाफ विरोध करना और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना अलग-अलग बातें हैं। स्थानीय आंदोलन से जुड़े कुछ लोगों ने भी कहा है कि हिंसा उनके आंदोलन के उद्देश्य का हिस्सा नहीं थी।
इसलिए पूरे युवा आंदोलन को हिंसक घटनाओं के आधार पर परिभाषित करना भी सही नहीं होगा। साथ ही, संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और लोगों को घायल करने की घटनाओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
Gen-Z आंदोलन में क्यों आगे नजर आ रहा है?
अरुणाचल प्रदेश में युवाओं की भागीदारी इस आंदोलन की खास बात बन गई है। युवा प्रदर्शनकारी परियोजना को केवल वर्तमान जमीन या मुआवजे का मुद्दा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा सवाल मानते हैं।
उनकी चिंता है कि यदि नदी घाटी में बड़े पैमाने पर बदलाव होता है, तो इसका असर आने वाले दशकों तक रह सकता है। जमीन, रोजगार, स्थानीय संस्कृति, प्राकृतिक संसाधन और पारंपरिक संस्थाओं पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर युवाओं में असंतोष है।
कई युवा यह भी सवाल उठा रहे हैं कि जब परियोजना का अंतिम डिजाइन और पर्यावरणीय प्रभाव अभी तय नहीं हैं, तो स्थानीय समुदायों को शुरुआती चरण से ही निर्णय प्रक्रिया में कैसे शामिल किया जा सकता है। उनके अनुसार, केवल तकनीकी सर्वेक्षण शुरू कर देना पर्याप्त नहीं है; लोगों को यह समझने का अधिकार होना चाहिए कि उनके क्षेत्र में क्या प्रस्तावित है और उसके संभावित परिणाम क्या हो सकते हैं।
पारंपरिक सामुदायिक संस्थाओं के जरिए चर्चा की मांग भी इसी संदर्भ में सामने आई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि गांवों के बुजुर्गों, किसानों, युवाओं और अन्य प्रभावित समूहों की राय को व्यवस्थित रूप से सुना जाना चाहिए।
इस आंदोलन में राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय अधिकारों के बीच संतुलन का प्रश्न उभरकर सामने आया है। युवाओं की मांग का केंद्र यह है कि भारत की जल सुरक्षा के नाम पर स्थानीय समुदायों के भविष्य से जुड़े सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
भारत के सामने क्या विकल्प हैं?
सियांग परियोजना पर बहस केवल बांध बनाने या न बनाने तक सीमित नहीं है। इसके साथ कई विकल्पों और नीतिगत सवालों पर विचार किया जा सकता है। इनमें नदी के प्रवाह की निगरानी, चीन के साथ जल संबंधी जानकारी साझा करने की व्यवस्था, कूटनीतिक संवाद, बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली और स्थानीय समुदायों के साथ पारदर्शी चर्चा शामिल हैं।
भारत और चीन के बीच सीमा पार नदियों से जुड़े जल प्रबंधन का प्रश्न लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। यदि ऊपरी हिस्से में पानी के प्रवाह में बदलाव की आशंका है, तो नदी के जल स्तर, प्रवाह और अन्य संकेतकों की निगरानी से जोखिमों का बेहतर आकलन किया जा सकता है। समय पर जानकारी मिलने से निचले क्षेत्रों में तैयारी करने में भी मदद मिल सकती है।
इसके अलावा, बड़े जलाशय की उपयोगिता और जोखिमों की तुलना अन्य विकल्पों से की जानी चाहिए। किसी परियोजना का निर्णय केवल उसके बिजली उत्पादन की क्षमता या रणनीतिक महत्व के आधार पर नहीं होना चाहिए। उसमें आर्थिक लागत, स्थानीय विस्थापन, पर्यावरणीय प्रभाव और दीर्घकालिक सुरक्षा का आकलन भी शामिल होना चाहिए।
यदि सियांग परियोजना आगे बढ़ती है, तो स्थानीय समुदायों के लिए पुनर्वास, मुआवजा, आजीविका और सांस्कृतिक संरक्षण की ठोस व्यवस्था महत्वपूर्ण होगी। यदि अध्ययन में परियोजना के जोखिम बहुत अधिक पाए जाते हैं, तो सरकार को वैकल्पिक समाधान पर भी विचार करना पड़ सकता है।
सियांग बांध विवाद का भविष्य क्या होगा?
फिलहाल सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट को लेकर बहस के दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क दे रहे हैं। सरकार इसे भारत की जल और ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानती है, खासकर चीन की विशाल जलविद्युत परियोजना के संदर्भ में। दूसरी ओर, स्थानीय समुदायों को आशंका है कि परियोजना उनके गांवों, जमीन, आजीविका और सांस्कृतिक विरासत पर गंभीर असर डाल सकती है।
सरकार का कहना है कि प्रारंभिक व्यवहार्यता रिपोर्ट का उद्देश्य परियोजना की तकनीकी और भूगर्भीय संभावना की जांच करना है, न कि निर्माण की अंतिम मंजूरी देना। लेकिन स्थानीय संगठनों का मानना है कि इस चरण में भी उनकी आपत्तियों को गंभीरता से सुनना जरूरी है, क्योंकि सर्वेक्षण आगे की परियोजना प्रक्रिया का आधार बन सकता है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रारंभिक अध्ययन कैसे आगे बढ़ता है, सरकार प्रभावित समुदायों के साथ किस तरह संवाद करती है और पर्यावरणीय तथा सामाजिक जोखिमों का आकलन किस स्तर पर किया जाता है। इसके साथ ही, चीन की परियोजना के वास्तविक जल प्रबंधन प्रभावों को लेकर वैज्ञानिक जानकारी भी इस बहस में अहम भूमिका निभाएगी।
कुल मिलाकर, अरुणाचल प्रदेश में सियांग बांध को लेकर विरोध केवल विकास के खिलाफ आंदोलन नहीं है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा, बिजली उत्पादन, पानी के नियंत्रण, स्थानीय अधिकारों और पर्यावरणीय संरक्षण के बीच संतुलन का जटिल सवाल है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह चीन की ओर से पैदा हो सकने वाली रणनीतिक चिंताओं का जवाब खोजते हुए उन समुदायों की आशंकाओं को भी गंभीरता से ले, जिनकी जमीन और जीवन इस परियोजना से सीधे प्रभावित हो सकते हैं।