
G-20 बैठक में रूस को लेकर पश्चिमी देशों में मतभेद, सर्गेई लावरोव के साथ फोटो सेशन से पीछे हटे मार्को रुबियो; अटलांटा में बढ़ा कूटनीतिक तनाव
अमेरिका के अटलांटा में आयोजित G-20 विदेश मंत्रियों की बैठक में रूस की भागीदारी को लेकर पश्चिमी देशों के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की मौजूदगी पर कई यूरोपीय देशों ने आपत्ति जताई। स्थिति ऐसी बन गई कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो को बैठक के पारंपरिक सामूहिक फोटो सेशन को ही रद्द करना पड़ा। यूरोपीय प्रतिनिधियों ने स्पष्ट संकेत दिया था कि वे रूसी विदेश मंत्री के साथ एक ही तस्वीर में शामिल नहीं होना चाहते। कुछ प्रतिनिधियों ने तो इस फोटो सेशन का बहिष्कार करने या कार्यक्रम से बाहर निकलने तक की चेतावनी दी थी।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध जारी है और पश्चिमी देशों के साथ मॉस्को के संबंधों में तनाव बना हुआ है। रूस की G-20 बैठक में भागीदारी को लेकर पहले से ही कई देशों में असहमति थी। यूरोपीय देशों का मानना है कि यूक्रेन युद्ध के मौजूदा हालात में रूस के साथ सामान्य कूटनीतिक व्यवहार का संदेश देना उचित नहीं होगा। दूसरी तरफ अमेरिका ने रूस को बैठक में शामिल होने का अवसर दिया था, जिससे पश्चिमी सहयोगियों के बीच असहज स्थिति पैदा हो गई।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने विवाद को बढ़ने से रोकने के लिए पारंपरिक ग्रुप फोटो को कार्यक्रम से हटाने का फैसला किया। हालांकि, फोटो सेशन रद्द होने के बावजूद बैठक अपने निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार आगे बढ़ी। रुबियो ने अपने उद्घाटन संबोधन में दुनिया के सामने मौजूद आर्थिक और भू-राजनीतिक चुनौतियों का उल्लेख करते हुए देशों से आपसी सहयोग बढ़ाने की अपील की।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रूस को लेकर पश्चिमी देशों के अलग-अलग रुख को उजागर कर दिया है। साथ ही यह सवाल भी खड़ा हुआ है कि क्या G-20 जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच पर सदस्य देशों के बीच बढ़ते मतभेदों के बावजूद साझा सहमति बनाना संभव होगा।
अटलांटा में क्यों रद्द करना पड़ा G-20 का पारंपरिक फोटो सेशन?
अमेरिका के जॉर्जिया राज्य के अटलांटा शहर में 30 और 31 अक्टूबर 2026 को G-20 देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक आयोजित की जा रही है। इस बैठक में दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के प्रतिनिधि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करने के लिए एकत्र हुए हैं।
आमतौर पर इस तरह की महत्वपूर्ण कूटनीतिक बैठकों की शुरुआत में सभी देशों के प्रतिनिधि एक साथ सामूहिक तस्वीर खिंचवाते हैं। इस तस्वीर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता, संवाद और सहयोग के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। लेकिन इस बार रूस की मौजूदगी ने इस परंपरा के सामने मुश्किल खड़ी कर दी।
रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव भी इस बैठक में शामिल होने के लिए अटलांटा पहुंचे थे। उनकी मौजूदगी पर कई यूरोपीय प्रतिनिधियों ने आपत्ति जताई। उनका कहना था कि रूस के साथ मौजूदा परिस्थितियों में एक ही तस्वीर में शामिल होना गलत राजनीतिक संदेश दे सकता है।
यूरोपीय प्रतिनिधियों ने अमेरिका को संकेत दिया कि यदि लावरोव को सामूहिक फोटो में शामिल किया गया, तो वे इस कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लेंगे या बीच में ही बाहर निकल सकते हैं। इससे फोटो सेशन के दौरान सार्वजनिक विवाद होने की आशंका पैदा हो गई।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने स्थिति का आकलन करने के बाद सामूहिक फोटो सेशन को रद्द करने का फैसला किया। अमेरिकी प्रशासन नहीं चाहता था कि बैठक की शुरुआत ही रूस को लेकर विवाद और कूटनीतिक खींचतान के साथ हो।
इस निर्णय के बाद विदेश मंत्रियों की पारंपरिक सामूहिक तस्वीर नहीं ली गई। हालांकि, सभी प्रतिनिधियों ने निर्धारित बैठक में भाग लिया और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा जारी रखी।
मार्को रुबियो ने विवाद को बढ़ने से रोकने के लिए लिया फैसला
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो इस बैठक की अध्यक्षता कर रहे हैं। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि G-20 के सदस्य देशों को एक मंच पर लाकर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ाई जाए।
रूस की भागीदारी को लेकर यूरोपीय देशों की नाराजगी ने इस काम को मुश्किल बना दिया था। यदि फोटो सेशन के दौरान कुछ प्रतिनिधि बाहर चले जाते, तो इसका असर पूरी बैठक की छवि पर पड़ सकता था।
ऐसी स्थिति में रुबियो ने सामूहिक फोटो सेशन को ही रद्द करना बेहतर समझा। अमेरिकी अधिकारियों का कहना था कि इस कार्यक्रम को लेकर पैदा हुआ विवाद बैठक के वास्तविक एजेंडे से ध्यान भटका सकता था।
यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि अमेरिका इस बैठक के जरिए व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर सहयोग बढ़ाना चाहता है।
रुबियो ने अपने शुरुआती संबोधन में कहा कि दुनिया इस समय एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। उनके मुताबिक, मौजूदा चुनौतियां केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ रहा है।
उन्होंने आर्थिक और भू-राजनीतिक संकटों के आपस में जुड़े होने की बात कही। ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति में बाधा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अनिश्चितता तथा समुद्री मार्गों की सुरक्षा जैसे विषयों को उन्होंने वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बताया।
इस तरह फोटो सेशन रद्द करने के बावजूद अमेरिका ने बैठक को आगे बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर चर्चा करने की कोशिश जारी रखी।
यूरोपीय देशों ने रूस के साथ तस्वीर खिंचाने से क्यों किया इनकार?
यूरोपीय देशों की नाराजगी का प्रमुख कारण रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध है। फरवरी 2022 में रूस की ओर से यूक्रेन पर व्यापक सैन्य हमला शुरू किए जाने के बाद यूरोपीय देशों ने मॉस्को के खिलाफ कई तरह के प्रतिबंध लगाए थे।
यूरोप के कई देश यूक्रेन को राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य सहायता देते रहे हैं। उनका मानना है कि रूस की सैन्य कार्रवाई ने यूरोपीय सुरक्षा व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय नियमों के सामने गंभीर चुनौती पैदा की है।
ऐसे में रूसी विदेश मंत्री के साथ एक ही मंच पर सामूहिक तस्वीर खिंचवाना यूरोपीय देशों के लिए राजनीतिक रूप से असहज हो सकता था।
जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल ने इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि रूस के साथ सामान्य संबंधों जैसी स्थिति नहीं है। उनके मुताबिक, रूस के साथ विवादों पर बातचीत होनी चाहिए, लेकिन ऐसा कोई संकेत नहीं जाना चाहिए जिससे यह लगे कि सब कुछ सामान्य हो चुका है।
यूरोपीय प्रतिनिधियों का मानना था कि रूस के साथ एक सामान्य सामूहिक तस्वीर से यह संदेश जा सकता है कि पश्चिमी देशों ने मॉस्को के साथ अपने मतभेदों को पीछे छोड़ दिया है।
पोलैंड के विदेश मंत्री रादोस्लाव सिकोरस्की ने भी इस मामले में अपनी असहमति जाहिर की। उन्होंने सामूहिक तस्वीर रद्द किए जाने के अमेरिकी फैसले को उचित बताया। उनका कहना था कि वह अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं हैं, जो लावरोव के साथ तस्वीर खिंचवाना नहीं चाहते।
इस तरह यूरोपीय देशों ने यह स्पष्ट कर दिया कि रूस के साथ बातचीत और कूटनीतिक संपर्क जारी रहने के बावजूद वे मौजूदा परिस्थितियों को सामान्य नहीं मानते।
एक तिहाई प्रतिनिधियों को थी सामूहिक फोटो पर आपत्ति
इस विवाद का दायरा केवल यूरोपीय देशों तक सीमित नहीं था। सामने आई जानकारी के अनुसार, पश्चिमी देशों के एक राजनयिक ने बताया कि बैठक में शामिल लगभग एक तिहाई प्रतिभागियों ने रूसी विदेश मंत्री के साथ सामूहिक तस्वीर खिंचवाने पर आपत्ति जताई थी।
इनमें ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देश भी शामिल बताए गए। इन देशों का रुख इस बात का संकेत था कि रूस की भागीदारी को लेकर पश्चिमी सहयोगियों के बीच असहजता व्यापक है।
कुछ यूरोपीय अधिकारियों ने एक वैकल्पिक व्यवस्था का सुझाव भी दिया था। इसके तहत दो अलग-अलग तस्वीरें लेने की संभावना पर विचार किया जा सकता था। पहली तस्वीर में लावरोव को शामिल किया जाता और दूसरी तस्वीर में उनके बिना बाकी प्रतिनिधियों की फोटो ली जाती।
इस विकल्प से उन देशों को अलग रहने का अवसर मिल सकता था, जो रूसी विदेश मंत्री के साथ तस्वीर में शामिल नहीं होना चाहते थे।
हालांकि, अंततः अमेरिकी प्रशासन ने किसी वैकल्पिक फोटो व्यवस्था को अपनाने के बजाय पूरे सामूहिक फोटो कार्यक्रम को ही रद्द कर दिया।
इस फैसले से एक संभावित सार्वजनिक टकराव टल गया, लेकिन रूस को लेकर देशों के बीच मौजूद मतभेद भी स्पष्ट हो गए।
रूस की मौजूदगी पर पहले से उठ रहे थे सवाल
G-20 बैठक में रूस की भागीदारी को लेकर विवाद अचानक नहीं पैदा हुआ। बैठक से पहले ही कुछ सदस्य देशों ने मॉस्को को आमंत्रित किए जाने पर सवाल उठाए थे।
रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध जारी रहने के कारण यूरोपीय देशों के लिए इस बैठक में लावरोव की मौजूदगी एक संवेदनशील मुद्दा बन गई थी।
यूक्रेन के समर्थन में खड़े पश्चिमी देशों का मानना है कि रूस पर दबाव बनाए रखना जरूरी है। उनका तर्क है कि जब तक युद्ध समाप्त करने और यूक्रेन की संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर ठोस प्रगति नहीं होती, तब तक मॉस्को के साथ सामान्य संबंधों का संदेश नहीं दिया जाना चाहिए।
दूसरी तरफ रूस G-20 जैसे मंचों पर अपनी भागीदारी को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अपनी भूमिका बनाए रखने के अवसर के रूप में देखता है।
रूस की विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जखारोवा ने भी बैठक से पहले अमेरिकी प्रशासन की ओर से वीजा व्यवस्था में हुई देरी पर शिकायत की थी। उनके अनुसार, रूसी प्रतिनिधिमंडल के वीजा संबंधी मुद्दे अंतिम समय में सुलझाए गए।
उन्होंने कहा था कि इन परिस्थितियों से ऐसा आभास हुआ कि वाशिंगटन में हर कोई लावरोव की मौजूदगी का स्वागत नहीं कर रहा है।
रूसी विदेश मंत्रालय ने यह भी संकेत दिया कि लावरोव बैठक में वैश्विक आर्थिक संस्थानों में सुधार और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता से जुड़े मुद्दे उठाएंगे।
इससे स्पष्ट है कि बैठक में रूस की भागीदारी केवल औपचारिक उपस्थिति तक सीमित नहीं थी, बल्कि मॉस्को अपने अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण को भी सामने रखना चाहता था।
जोहान वाडेफुल का बयान बना चर्चा का केंद्र
जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल ने रूस के साथ सामूहिक तस्वीर को लेकर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि रूस के साथ संबंधों में सामान्य स्थिति नहीं है।
उनका बयान यूरोपीय देशों की व्यापक सोच को सामने लाता है। यूरोप के कई देशों का मानना है कि रूस के साथ बातचीत जरूरी हो सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यूक्रेन युद्ध से जुड़े मतभेदों को नजरअंदाज कर दिया जाए।
वाडेफुल ने यह भी कहा कि विवादों पर बातचीत बैठक की मेज पर होनी चाहिए। उनका तर्क था कि संवाद के रास्ते बंद नहीं किए जाने चाहिए, लेकिन ऐसा कोई राजनीतिक संकेत भी नहीं दिया जाना चाहिए जिससे रूस के साथ संबंध सामान्य होने का भ्रम पैदा हो।
इस बयान में कूटनीति के दो अलग-अलग पहलू दिखाई देते हैं। एक तरफ बातचीत और संवाद जारी रखने की जरूरत है, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक और नैतिक असहमति को भी स्पष्ट बनाए रखना है।
यही कारण है कि यूरोपीय प्रतिनिधियों ने सामूहिक तस्वीर से दूरी बनाने का फैसला किया।
रूस-यूक्रेन युद्ध ने G-20 की एकजुटता के सामने खड़ी की चुनौती
G-20 दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं का एक महत्वपूर्ण मंच है। इसका उद्देश्य वैश्विक आर्थिक सहयोग, वित्तीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय विकास से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करना है।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भू-राजनीतिक तनावों ने इस मंच की कार्यप्रणाली को प्रभावित किया है। रूस-यूक्रेन युद्ध इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
रूस G-20 का सदस्य है, जबकि यूक्रेन इस समूह का सदस्य नहीं है। इसके बावजूद यूक्रेन युद्ध के प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार, खाद्य आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़े हैं।
यूरोपीय देशों ने रूस की सैन्य कार्रवाई के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। दूसरी तरफ कुछ देश रूस के साथ बातचीत और आर्थिक संबंधों के विभिन्न रास्ते बनाए रखने के पक्ष में हैं।
इन अलग-अलग विचारों के कारण G-20 में साझा रुख तैयार करना मुश्किल हो सकता है।
अटलांटा की बैठक में भी रूस-यूक्रेन संघर्ष प्रमुख विषयों में शामिल रहा। इसके अलावा अमेरिका की व्यापार नीतियों, मध्य पूर्व के तनाव और दक्षिण चीन सागर में चीन की गतिविधियों पर भी चर्चा की जा रही है।
सामूहिक फोटो रद्द होने की घटना इस बात का प्रतीक बन गई कि आर्थिक सहयोग के लिए बनाए गए मंच पर भी भू-राजनीतिक मतभेद किस तरह प्रभाव डाल रहे हैं।
ट्रंप प्रशासन की रूस नीति पर भी उठ रहे सवाल
रूस की G-20 बैठक में मौजूदगी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन की रूस नीति को लेकर भी बहस तेज कर दी है।
अमेरिका और रूस के संबंध पिछले कई वर्षों से तनावपूर्ण रहे हैं। रूस पर यूक्रेन युद्ध के बाद कई पश्चिमी प्रतिबंध लगाए गए थे। लेकिन ट्रंप प्रशासन की कुछ हालिया नीतियों ने यूरोपीय सहयोगियों के बीच चिंता पैदा की है।
रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका ने मॉस्को पर कुछ नए प्रतिबंधों को लागू करने में छूट दी और यूक्रेन को मिलने वाली कुछ लॉजिस्टिक तथा खुफिया सहायता पर अस्थायी प्रतिबंध लगाए।
इसके अलावा रूस से संबंधित डीजल खरीद समझौते को लेकर भी चर्चा हुई है।
यूरोपीय देशों के लिए यह स्थिति असहज है, क्योंकि वे रूस के खिलाफ प्रतिबंधों और यूक्रेन के समर्थन को अपनी सुरक्षा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।
अमेरिकी प्रशासन का रुख यूरोपीय देशों की अपेक्षाओं से अलग दिखाई देने पर पश्चिमी गठबंधन के भीतर मतभेदों की चर्चा बढ़ी है।
इस पृष्ठभूमि में लावरोव की G-20 बैठक में मौजूदगी और सामूहिक तस्वीर का रद्द होना केवल एक कार्यक्रम से जुड़ा मामला नहीं रह गया, बल्कि अमेरिका और यूरोप के बीच रूस नीति को लेकर व्यापक मतभेदों का संकेत भी बन गया है।
बैठक में किन अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर होगी चर्चा?
G-20 विदेश मंत्रियों की बैठक का एजेंडा केवल रूस और यूक्रेन तक सीमित नहीं है। इसमें कई ऐसे मुद्दे शामिल हैं, जिनका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अपने संबोधन में ऊर्जा आपूर्ति, खाद्य सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता को प्रमुख चुनौतियों के रूप में प्रस्तुत किया।
दुनिया के कई महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों से ऊर्जा और व्यापारिक वस्तुओं की आपूर्ति होती है। इनमें होर्मुज जलडमरूमध्य, लाल सागर, काला सागर और दक्षिण चीन सागर विशेष महत्व रखते हैं।
इन क्षेत्रों में तनाव या सैन्य गतिविधियों से जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है। इसका असर तेल और गैस की कीमतों, माल ढुलाई और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण काला सागर क्षेत्र की सुरक्षा पहले से ही एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है। वहीं मध्य पूर्व में अमेरिका और इजरायल से जुड़े ईरान संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य और आसपास के समुद्री क्षेत्रों की सुरक्षा पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
दक्षिण चीन सागर में चीन और अन्य देशों के बीच क्षेत्रीय विवादों का असर भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ सकता है।
इसके अलावा अमेरिका के आयात शुल्क और व्यापार नीतियों को लेकर भी सदस्य देशों के बीच मतभेद मौजूद हैं।
इन सभी मुद्दों पर सहमति बनाना आसान नहीं होगा, क्योंकि प्रत्येक देश की आर्थिक और रणनीतिक प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।
ईरान से जुड़े तनाव ने भी बढ़ाई चिंता
G-20 बैठक के दौरान मध्य पूर्व की स्थिति भी एक महत्वपूर्ण विषय बनी हुई है। अमेरिका और इजरायल से जुड़े ईरान संघर्ष ने क्षेत्रीय सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं।
मध्य पूर्व दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है। यहां किसी भी बड़े सैन्य संघर्ष का असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर पड़ सकता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से विशेष महत्व रखता है। इस समुद्री मार्ग से बड़ी मात्रा में तेल और अन्य ऊर्जा संसाधनों का परिवहन होता है।
यदि यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो कई देशों को ऊर्जा आपूर्ति में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
मार्को रुबियो ने भी समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को अपने संबोधन में महत्व दिया।
इससे संकेत मिलता है कि अमेरिका इस बैठक के माध्यम से केवल राजनीतिक मतभेदों पर चर्चा नहीं करना चाहता, बल्कि आर्थिक और सुरक्षा संबंधी साझा हितों को भी आगे बढ़ाना चाहता है।
हालांकि, रूस, ईरान और यूक्रेन जैसे मुद्दों पर देशों के अलग-अलग रुख के कारण किसी एक साझा रणनीति पर पहुंचना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
दिसंबर में मियामी में होगी G-20 नेताओं की अगली बड़ी बैठक
अटलांटा में विदेश मंत्रियों की यह बैठक दिसंबर में प्रस्तावित G-20 नेताओं के शिखर सम्मेलन की तैयारी का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दिसंबर में फ्लोरिडा के मियामी स्थित अपने गोल्फ क्लब में G-20 नेताओं के शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने वाले हैं।
अटलांटा की बैठक में होने वाली चर्चाओं से दिसंबर के शिखर सम्मेलन के एजेंडे और संभावित सहयोग के क्षेत्रों को तैयार करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, रूस की मौजूदगी को लेकर सामने आए मतभेद यह संकेत देते हैं कि दिसंबर में होने वाली बैठक भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो सकती है।
एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दिसंबर में होने वाले सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। उनकी संभावित भागीदारी को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
यदि पुतिन सम्मेलन में शामिल होते हैं, तो यूरोपीय देशों और अमेरिका के बीच रूस को लेकर मौजूद मतभेद फिर से चर्चा में आ सकते हैं।
इसलिए अटलांटा की बैठक को दिसंबर के शिखर सम्मेलन से पहले सदस्य देशों के बीच संवाद और रणनीतिक प्राथमिकताओं को समझने के एक महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जा रहा है।
यूक्रेन को निमंत्रण नहीं, दक्षिण अफ्रीका की अनुपस्थिति पर भी विवाद
अटलांटा में आयोजित G-20 बैठक को लेकर केवल रूस की भागीदारी ही विवाद का विषय नहीं रही। यूक्रेन और दक्षिण अफ्रीका की अनुपस्थिति पर भी सवाल उठे हैं।
यूक्रेन G-20 का औपचारिक सदस्य नहीं है। हालांकि, पहले कुछ बैठकों में उसे विशेष आमंत्रित देश के रूप में भाग लेने का अवसर दिया गया था। इस बार अमेरिकी अधिकारियों ने केवल औपचारिक सदस्य देशों को शामिल करने का निर्णय लिया, जिसके कारण यूक्रेन को आमंत्रित नहीं किया गया।
इस निर्णय से रूस-यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में बैठक की राजनीतिक संवेदनशीलता और बढ़ गई है।
दूसरी तरफ दक्षिण अफ्रीका G-20 का संस्थापक सदस्य है और समूह में शामिल एकमात्र अफ्रीकी देश है। इसके बावजूद अटलांटा की बैठक में उसे आमंत्रित नहीं किया गया।
दक्षिण अफ्रीका ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा कि उसकी अनुपस्थिति स्वैच्छिक नहीं थी। दक्षिण अफ्रीकी विदेश मंत्री के प्रवक्ता फिंडिले कुनेने ने कहा कि उनका देश लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि बैठक में शामिल नहीं होना उसका अपना फैसला नहीं था।
दक्षिण अफ्रीका ने अन्य G-20 सदस्य देशों की ओर से उठाई गई चिंताओं का स्वागत किया और कहा कि वह अगले साल ब्रिटेन की अध्यक्षता में समान आधार पर भाग लेने के लिए तैयार है।
इस घटनाक्रम ने G-20 की सदस्यता, समान प्रतिनिधित्व और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सभी देशों की भागीदारी को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं।
रूस का कहना है कि वह वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में सुधार की बात उठाएगा
रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की अटलांटा यात्रा को मॉस्को ने अपने अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण को प्रस्तुत करने के अवसर के रूप में देखा है।
रूस के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जखारोवा ने बताया कि लावरोव बैठक में वैश्विक आर्थिक संस्थानों में तेजी से सुधार की आवश्यकता का मुद्दा उठाएंगे।
रूस लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और राजनीतिक संस्थाओं में विकासशील देशों तथा उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका बढ़ाने की बात करता रहा है।
मॉस्को का तर्क है कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में कुछ पश्चिमी देशों का प्रभाव अधिक है और इसे अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाया जाना चाहिए।
रूस की ओर से बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की अवधारणा को भी लगातार आगे बढ़ाया जाता रहा है। इस विचार के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और अर्थव्यवस्था में किसी एक देश या समूह का प्रभुत्व नहीं होना चाहिए।
लावरोव के लिए G-20 बैठक इस दृष्टिकोण को सदस्य देशों के सामने रखने का एक अवसर हो सकती है।
हालांकि, रूस के साथ पश्चिमी देशों के मौजूदा मतभेदों के कारण इन प्रस्तावों पर कितनी सहमति बन पाएगी, यह स्पष्ट नहीं है।
क्या G-20 में बन पाएगी साझा सहमति?
अटलांटा में सामूहिक फोटो सेशन रद्द होने की घटना ने G-20 के सामने मौजूद सबसे बड़ी चुनौती को उजागर किया है। यह मंच दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ लाने और साझा आर्थिक नीतियों पर चर्चा करने के लिए बनाया गया था।
लेकिन मौजूदा समय में रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व के संघर्ष, व्यापारिक प्रतिबंध, आयात शुल्क और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच मतभेद गहरे हैं।
इन परिस्थितियों में सभी देशों के लिए एक समान रुख अपनाना मुश्किल हो सकता है।
मार्को रुबियो ने बैठक में सहयोग और संवाद की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया कई आपस में जुड़े आर्थिक और भू-राजनीतिक संकटों का सामना कर रही है।
अमेरिका की प्राथमिकता है कि सदस्य देश ऊर्जा, व्यापार, समुद्री सुरक्षा और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति जैसे विषयों पर व्यावहारिक सहयोग के रास्ते तलाशें।
लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध और अन्य क्षेत्रीय विवादों के कारण बैठक में व्यापक सहमति बनना आसान नहीं होगा।
अटलांटा की बैठक इस लिहाज से एक महत्वपूर्ण परीक्षा है कि क्या सदस्य देश राजनीतिक मतभेदों के बावजूद साझा आर्थिक हितों पर मिलकर काम कर सकते हैं।
पश्चिमी देशों की एकजुटता पर भी उठे सवाल
रूस के साथ तस्वीर खिंचवाने से इनकार करने वाले यूरोपीय देशों की स्थिति से यह स्पष्ट होता है कि पश्चिमी गठबंधन के भीतर रूस को लेकर एक कठोर रुख मौजूद है।
हालांकि, अमेरिका की ओर से रूस को बैठक में शामिल होने का अवसर दिए जाने और हालिया नीतिगत फैसलों ने यूरोपीय देशों के बीच असहजता पैदा की है।
अमेरिका और यूरोप दोनों यूक्रेन युद्ध को लेकर कई साझा चिंताएं रखते हैं, लेकिन रूस के साथ बातचीत और प्रतिबंधों को लेकर उनकी रणनीतियों में अंतर दिखाई दे सकता है।
यूरोपीय देशों के लिए रूस का सैन्य अभियान उनकी क्षेत्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ है। वहीं अमेरिका वैश्विक स्तर पर आर्थिक और रणनीतिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए रूस के साथ संवाद के कुछ रास्ते खुले रखना चाहता है।
इस अंतर का असर G-20 जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भी दिखाई दे रहा है।
फोटो सेशन रद्द होना इस बात का उदाहरण है कि किसी अंतरराष्ट्रीय बैठक में प्रतीकात्मक कार्यक्रम भी बड़े कूटनीतिक विवाद का कारण बन सकते हैं।
आगे क्या होगा?
अटलांटा में G-20 विदेश मंत्रियों की बैठक 31 अक्टूबर तक जारी रहेगी। इस दौरान सदस्य देशों के प्रतिनिधि वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श करेंगे।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बैठक के अंत में सदस्य देश किन मुद्दों पर साझा सहमति बना पाते हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व की स्थिति और समुद्री मार्गों की सुरक्षा जैसे विषयों पर अलग-अलग देशों के विचार सामने आ सकते हैं।
दिसंबर में मियामी में प्रस्तावित G-20 नेताओं के शिखर सम्मेलन को लेकर भी इस बैठक के परिणाम महत्वपूर्ण होंगे।
रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की मौजूदगी और सामूहिक फोटो सेशन रद्द होने की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रतीकात्मक फैसलों का भी बड़ा महत्व होता है।
मार्को रुबियो ने विवाद को बढ़ने से रोकने के लिए फोटो कार्यक्रम रद्द कर दिया, लेकिन इससे रूस को लेकर पश्चिमी देशों के मतभेद समाप्त नहीं हुए।
कुल मिलाकर, अटलांटा की G-20 बैठक वैश्विक कूटनीति के बदलते समीकरणों का महत्वपूर्ण उदाहरण बन गई है। एक तरफ सदस्य देश आर्थिक और सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ रूस की भागीदारी जैसे मुद्दे उनकी एकजुटता की परीक्षा ले रहे हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या G-20 सदस्य देश अपने मतभेदों के बावजूद साझा वैश्विक चुनौतियों पर कोई ठोस रास्ता निकाल पाते हैं या राजनीतिक तनाव इस मंच की कार्यक्षमता को प्रभावित करता रहेगा।