उत्तराखंड में गुलदार का आतंक: दो दिनों में दो बच्चों की मौत, पहाड़ी इलाकों में दहशत

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गुलदार के जबड़े में समाई मासूमों की जिंदगी! उत्तराखंड में दो दिनों में दो बच्चों की मौत, पहाड़ों में फैला आतंक

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में गुलदार के हमलों ने एक बार फिर लोगों को दहशत में डाल दिया है। दो दिनों के भीतर पौड़ी गढ़वाल और चंपावत जिले में दो बच्चों की जान जाने की घटनाओं ने ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है। घर के आंगन और गांव के रास्तों के आसपास हुए इन हमलों ने लोगों के मन में यह डर पैदा कर दिया है कि अब अपने घरों के नजदीक भी बच्चे सुरक्षित नहीं हैं।

पहली घटना पौड़ी जिले के वजली गांव में हुई, जहां पांच वर्षीय बच्ची आरुषि को गुलदार घर के आंगन से उठा ले गया। दूसरी घटना चंपावत जिले के लोहाघाट क्षेत्र के सुंई डुंगरी गांव में हुई, जहां 13 वर्षीय छात्र हर्षित पुजारी मेले से लौटते समय गुलदार के हमले का शिकार हो गया।

दोनों घटनाओं के बाद प्रभावित गांवों में शोक और गुस्से का माहौल है। ग्रामीण वन विभाग और प्रशासन से गुलदार की गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण, नियमित गश्त और बच्चों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की मांग कर रहे हैं।

पौड़ी में घर के आंगन से बच्ची को उठा ले गया गुलदार

पौड़ी जिले के वजली गांव में मंगलवार शाम एक दर्दनाक घटना हुई। पांच वर्षीय आरुषि अपनी मां और परिवार के साथ ननिहाल आई हुई थी। वह घर के आंगन में खेल रही थी, तभी गुलदार अचानक वहां पहुंचा और बच्ची को उठा ले गया।

परिजनों ने शोर मचाया और ग्रामीणों ने बच्ची की तलाश शुरू की। गुलदार बच्ची को घर से कुछ दूरी पर झाड़ियों की ओर ले गया था। काफी खोजबीन के बाद उसका शव बरामद हुआ। इस घटना ने परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया।

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, घटना की जानकारी मिलते ही टीम मौके पर पहुंची। गुलदार को पकड़ने और उसकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए कार्रवाई शुरू की गई। उसे आदमखोर घोषित किए जाने के संबंध में भी संबंधित अधिकारियों को पत्र भेजा गया।

घटना के बाद ग्रामीणों का गुस्सा सड़कों पर फूटा

बच्ची की मौत के बाद पौड़ी जिले के आसपास के गांवों में आक्रोश फैल गया। ग्रामीणों ने पौड़ी-देवप्रयाग मोटर मार्ग पर खांड्यूसैंण के पास प्रदर्शन किया और सड़क जाम कर दी। लोगों का आरोप था कि क्षेत्र में गुलदार की आवाजाही और हमलों की आशंका पहले से बनी हुई थी, लेकिन सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए गए।

प्रदर्शन के दौरान ग्रामीणों ने वन विभाग और प्रशासन से जवाब मांगा। उनकी मांग थी कि प्रभावित क्षेत्र में तत्काल सुरक्षा व्यवस्था की जाए और हमले के लिए जिम्मेदार गुलदार को पकड़ा जाए।

कुछ ग्रामीणों ने अधिकारियों के मौके पर नहीं पहुंचने पर नाराजगी जताई। प्रदर्शन के दौरान वन विभाग के अधिकारियों और स्थानीय प्रशासन को भी विरोध का सामना करना पड़ा। स्थिति को संभालने के लिए पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा।

चंपावत में मेले से लौट रहा 13 वर्षीय छात्र बना शिकार

दूसरी घटना चंपावत जिले के लोहाघाट क्षेत्र के सुंई डुंगरी गांव में हुई। यहां 13 वर्षीय छात्र हर्षित पुजारी रायकोट में आयोजित मेले से घर लौट रहा था। देर शाम वह अपने घर के पास पहुंचा, तभी गुलदार ने उस पर हमला कर दिया।

स्थानीय लोगों के अनुसार, गुलदार ने किशोर को घर से कुछ दूरी पर घात लगाकर पकड़ा और खेतों की ओर खींच ले गया। जब हर्षित देर तक घर नहीं पहुंचा तो परिजनों और ग्रामीणों ने उसकी तलाश शुरू की।

कुछ समय बाद उसका शव घर से करीब 200 मीटर दूर मिला। परिजन उसे अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। हर्षित परिवार का इकलौता बेटा बताया गया है। उसकी मौत से माता-पिता और परिजन गहरे सदमे में हैं।

गांवों में बच्चों को अकेले बाहर भेजने से डर रहे लोग

लगातार हो रहे हमलों के बाद ग्रामीणों की दिनचर्या प्रभावित हो रही है। लोगों का कहना है कि शाम ढलते ही गांवों के रास्ते सुनसान हो जाते हैं। माता-पिता बच्चों को घर के बाहर खेलने या अकेले कहीं जाने देने से डरने लगे हैं।

पहाड़ी गांवों में लोगों को रोजमर्रा के कामों के लिए घर से बाहर निकलना पड़ता है। महिलाएं जंगल या खेतों में काम करती हैं, बच्चे स्कूल आते-जाते हैं और बुजुर्ग भी आसपास के रास्तों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में गुलदार की मौजूदगी लोगों के लिए लगातार खतरा बन गई है।

ग्रामीणों का कहना है कि केवल लोगों को सावधान रहने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है। वन विभाग को संवेदनशील इलाकों में नियमित गश्त, निगरानी और जरूरत के अनुसार पिंजरे लगाने जैसे कदम उठाने चाहिए।

वन विभाग की कार्रवाई और ग्रामीणों की मांग

दोनों घटनाओं के बाद वन विभाग की टीमों ने प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी और गश्त शुरू की। चंपावत के सुंई डुंगरी गांव में प्रशासन ने वन विभाग को पिंजरा लगाने के निर्देश दिए। पौड़ी में भी गुलदार की गतिविधियों पर नजर रखने और उसे पकड़ने की प्रक्रिया शुरू की गई।

ग्रामीणों की प्रमुख मांगें हैं कि प्रभावित इलाकों में वन विभाग की स्थायी टीम तैनात की जाए, नियमित गश्त बढ़ाई जाए, बच्चों के स्कूल आने-जाने वाले रास्तों पर सुरक्षा व्यवस्था हो और हमलावर गुलदार को जल्द पकड़ा जाए।

कुछ ग्रामीणों ने मुआवजे और गांवों में रोशनी तथा अन्य सुरक्षा सुविधाएं बढ़ाने की मांग भी उठाई है। उनका कहना है कि हर घटना के बाद आश्वासन मिलता है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं हो पाता।

उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष की बढ़ती चुनौती

उत्तराखंड के कई पहाड़ी जिलों में मानव-वन्यजीव संघर्ष एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है। गुलदारों की आबादी, जंगलों में बदलाव, गांवों से पलायन और आबादी के आसपास झाड़ियों तथा खाली मकानों की मौजूदगी जैसे कई कारण इस संघर्ष को बढ़ा सकते हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, गुलदार अक्सर जंगलों के अलावा आबादी के आसपास भी रहने लगते हैं। ऐसे क्षेत्रों में उन्हें छिपने की जगह और छोटे पशु मिल सकते हैं। जब मनुष्य और वन्यजीवों का संपर्क बढ़ता है, तो हमलों का खतरा भी बढ़ सकता है।

हालांकि, किसी एक घटना के पीछे का कारण अलग हो सकता है। इसलिए हर हमले की जांच और संबंधित वन्यजीव की पहचान जरूरी होती है। केवल सामान्य अनुमान के आधार पर किसी जानवर को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है।

ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए क्या जरूरी है?

विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों की मांगों के आधार पर प्रभावित गांवों में कई तरह के उपाय जरूरी माने जा रहे हैं:

  • संवेदनशील इलाकों में नियमित वन विभाग गश्त
  • गुलदार की गतिविधियों पर निगरानी और कैमरा ट्रैप
  • स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए सुरक्षित मार्ग और समूह में आवाजाही
  • शाम के समय गांवों के रास्तों पर पर्याप्त रोशनी
  • घरों के आसपास झाड़ियों और छिपने की जगहों की सफाई
  • वन विभाग की त्वरित प्रतिक्रिया टीम
  • ग्रामीणों को हमले की स्थिति में सुरक्षित व्यवहार की जानकारी
  • प्रभावित परिवारों को समय पर सहायता और मुआवजा

इन उपायों का उद्देश्य केवल किसी एक गुलदार को पकड़ना नहीं, बल्कि गांवों में मानव-वन्यजीव संघर्ष के जोखिम को कम करना होना चाहिए।

दो परिवारों पर टूटा दुखों का पहाड़

पौड़ी में आरुषि की मौत ने उसके परिवार को गहरे दुख में डाल दिया है। वह अपनी मां के साथ ननिहाल आई हुई थी और परिवार के लिए खुशी का समय अचानक मातम में बदल गया।

चंपावत में हर्षित पुजारी की मौत से उसके माता-पिता ने अपना इकलौता बेटा खो दिया। मेले से घर लौटते समय हुई इस घटना ने पूरे गांव को स्तब्ध कर दिया।

दोनों घटनाएं यह याद दिलाती हैं कि वन्यजीवों के हमले केवल समाचार की सुर्खियां नहीं होते, बल्कि इनके पीछे ऐसे परिवार होते हैं जिनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल जाती है।

निष्कर्ष

उत्तराखंड के पौड़ी और चंपावत जिलों में दो दिनों के भीतर दो बच्चों की मौत ने गुलदार के हमलों और मानव-वन्यजीव संघर्ष की गंभीरता को फिर सामने ला दिया है। पौड़ी में पांच वर्षीय आरुषि को घर के आंगन से उठा ले जाने और चंपावत में 13 वर्षीय हर्षित पर हमले की घटनाओं के बाद ग्रामीणों में भय और आक्रोश है।

वन विभाग और प्रशासन ने कार्रवाई शुरू की है, लेकिन प्रभावित लोगों की मांग है कि सुरक्षा के इंतजाम तत्काल और स्थायी हों। अब जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें ग्रामीण अपने घरों, रास्तों और बच्चों की सुरक्षा को लेकर लगातार भय में न रहें।

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