
आधुनिक जीवनशैली ने इंसान को जितनी सुविधाएँ दी हैं, उतनी ही बीमारियाँ भी उसके पीछे-पीछे चली आई हैं। आज हर दूसरा इंसान तनाव, मोटापा, थकान, अनियमित खान-पान, पाचन समस्याओं और कई तरह की बड़ी स्वास्थ्य परेशानियों से जूझ रहा है। ऐसे माहौल में आचार्य बालकृष्ण ने एक बार फिर चेताते हुए कहा है कि लगातार बढ़ती बीमारियों की सबसे बड़ी वजह दवाइयों की कमी नहीं, बल्कि हमारी खुद की गलत आदतें हैं। उन्होंने दावा किया कि यदि इंसान अपनी जीवनशैली के कुछ मूलभूत सिद्धांतों को समझ ले, तो 90% बीमारियाँ शुरू ही नहीं होंगी, और बाकी भी धीरे-धीरे खत्म हो जाएँगी—वह भी बिना किसी दवाई के।
आचार्य बालकृष्ण ने यह भी बताया कि आज दुनिया भर में सबसे बड़ा खतरा किसी एक बीमारी का नहीं, बल्कि ज्यादा खाना, गलत खाना और लगातार खाते रहना है। उनका कहना है कि शरीर की क्षमता सीमित होती है और जब हम उससे ज्यादा उसे भरते रहते हैं, तो यह बोझ बीमारियों के रूप में बाहर आता है।
बीमारियों की जड़: गलत खान-पान की आदतें
आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि आज इंसान जितनी बार मोबाइल नहीं खोलता, उससे ज्यादा बार खाना या स्नैक्स खोलकर खाता रहता है। लगातार खाने से शरीर को न तो भोजन पचाने का समय मिलता है, और न ही उसे उपयोग करने का। परिणामस्वरूप—
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पाचन तंत्र कमजोर होता है
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आँतों में अपच और गैस की समस्या बनने लगती है
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मोटापा बढ़ता है
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रक्त में शर्करा स्तर बढ़कर डायबिटीज की ओर ले जाता है
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शरीर की कोशिकाएँ सुस्त हो जाती हैं
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इम्यूनिटी कमजोर होती जाती है
उन्होंने कहा कि शरीर एक मशीन की तरह है। यदि लगातार उसे काम में लगाए रखेंगे, तो वह थककर खराब ही होगी। फिर इंसान दवाइयों को दोष देता है, जबकि असल समस्या उसकी अपनी आदतें होती हैं।
आचार्य बालकृष्ण का ‘स्वास्थ्य मंत्र’: भोजन सीमित, समय निश्चित
आचार्य बालकृष्ण ने बताया कि स्वस्थ रहने का पहला मंत्र है—भोजन की मात्रा और समय को नियंत्रित करना।
उन्होंने कहा कि भोजन दो ही कारणों से करना चाहिए:
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शरीर की ऊर्जा जरूरतें पूरी करने के लिए
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पोषक तत्व उपलब्ध कराने के लिए
लेकिन आज लोग भावनाओं, तनाव, बोरियत, मनोरंजन और आदत की वजह से खाते हैं। यह गलत तरीका बीमारी को जन्म देता है।
उन्होंने सुझाव दिया कि—
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भोजन दिन में दो से तीन बार लिया जाए
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बीच-बीच में कुछ भी खाने से बचें
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भोजन हल्का और प्राकृतिक हो
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ज्यादा तला-भुना व पैकेट फूड छोड़कर देशी, मौसमी भोजन अपनाएँ
उपवास: शरीर की प्राकृतिक दवा
आचार्य बालकृष्ण ने उपवास को “शरीर की सफाई” बताया। उनका कहना है कि उपवास कोई धार्मिक कर्म नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। जब शरीर को भोजन नहीं मिलता तो वह खुद अंदर जमा अपशिष्ट, विषाक्त पदार्थ और खराब कोशिकाओं को नष्ट करने लगता है। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में ऑटोफैगी कहा जाता है, जो आज दुनिया भर में स्वास्थ्य जगत में चर्चा का विषय है।
उपवास के प्रमुख लाभ:
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पाचन तंत्र को आराम मिलता है
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शरीर में जमा टॉक्सिन बाहर निकलते हैं
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खून स्वच्छ होता है
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वजन सहज रूप से नियंत्रित होता है
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मानसिक एकाग्रता बढ़ती है
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प्राकृतिक इम्यूनिटी मजबूत होती है
आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि सप्ताह में एक दिन उपवास या फिर 12 से 14 घंटे का रात्रिकालीन उपवास (Intermittent Fasting) हर व्यक्ति को करना चाहिए।
नींद: दवाओं से बड़ी प्राकृतिक दवा
उन्होंने कहा कि शरीर की आधी बीमारियाँ खराब नींद से पैदा होती हैं। आज लोग देर रात तक स्क्रीन पर रहते हैं, जिससे—
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हार्मोनल असंतुलन
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मानसिक तनाव
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चिड़चिड़ापन
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थकान
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पाचन खराब
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त्वचा समस्याएँ
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बाल झड़ना
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मोटापा
जैसी समस्याएँ जन्म लेती हैं।
आचार्य बालकृष्ण का कहना है—
“8 घंटे की गहरी नींद किसी भी महंगी दवा से ज्यादा असरदार इलाज है।”
उन्होंने सलाह दी कि रात में भोजन सोने से कम से कम 2 घंटे पहले करना चाहिए और सोते समय मोबाइल या टेलीविज़न को पूरी तरह छोड़ देना चाहिए।
योग और प्राणायाम: रोग प्रतिरोधक शक्ति का असली स्रोत
आचार्य बालकृष्ण ने स्वास्थ्य का असली आधार बताया—योग और प्राणायाम।
उनका कहना है कि जब तक शरीर में प्राणशक्ति (लाइफ-एनर्जी) का प्रवाह सुचारु नहीं होगा, तब तक कोई भी दवा स्थायी असर नहीं कर सकती।
योग और प्राणायाम से:
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फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है
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खून में ऑक्सीजन का स्तर सुधारता है
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दिल मजबूत होता है
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पाचन बेहतर होता है
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तनाव दूर होता है
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मानसिक शांति मिलती है
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शरीर में लचीलापन आता है
उन्होंने खासतौर पर दैनिक जीवन में शामिल करने के लिए ये अभ्यास सुझाए—
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कपालभाति
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अनुलोम-विलोम
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भ्रामरी
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सूर्य नमस्कार
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वज्रासन
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शवासन
ये सभी शरीर को भीतर से मजबूत बनाते हैं।
भावनात्मक स्वास्थ्य भी उतना ही जरूरी
आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि मन की स्थिति भी शरीर को प्रभावित करती है।
उन्होंने बताया कि:
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क्रोध
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तनाव
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ईर्ष्या
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चिंता
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निराशा
जैसी भावनाएँ शरीर में जहरीले हार्मोन पैदा करती हैं, जो धीरे-धीरे गंभीर बीमारियों का रूप ले लेती हैं।
उन्होंने बताया कि खुश रहने, सकारात्मक सोच रखने और ध्यान करने से न सिर्फ मानसिक शांति मिलती है, बल्कि शरीर तेजी से स्वस्थ भी होता है।
प्राकृतिक जीवनशैली: दवाओं से छुटकारे का रास्ता
आचार्य बालकृष्ण का निष्कर्ष साफ है—
“बीमारियों का इलाज दवाओं में नहीं, बल्कि सही आदतों और प्रकृति से जुड़ी दिनचर्या में है।”
उन्होंने जोर दिया कि—
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सुबह सूर्योदय से पहले उठें
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शुद्ध वायु में प्राणायाम करें
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प्राकृतिक आहार लें
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मौसमी फल-सब्जियाँ चुनें
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ज्यादा पानी पिएँ
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15–30 मिनट का दैनिक व्यायाम करें
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उपवास को जीवन का हिस्सा बनाएं
इन आदतों को अपनाने से शरीर खुद को ठीक करने लगता है।
निष्कर्ष
आचार्य बालकृष्ण का संदेश आज की नई पीढ़ी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। जहाँ लोग दवाइयों पर निर्भर होते जा रहे हैं, वहीं वे हमें याद दिलाते हैं कि शरीर एक आत्म-चिकित्सा प्रणाली है। यदि हम उसे सही ढंग से चलने दें तो बीमारियाँ हमसे दूर रहेंगी।
स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर, भोजन को नियंत्रित कर, उपवास को नियमित बनाकर, योग-प्राणायाम का अभ्यास कर और मानसिक शांति बनाए रखकर इंसान बिना दवाओं के भी फिट और ऊर्जावान रह सकता है।
और यही है—
आचार्य बालकृष्ण का प्राकृतिक स्वास्थ्य मंत्र:
“जीवनशैली बदलो, बीमारी खुद-ब-खुद दूर होगी।”