
भारत में संघीय ढांचे को लेकर अक्सर बहस छिड़ती रहती है, और जब भी केंद्र सरकार किसी केंद्रीय शासित प्रदेश (UT) की शक्तियों या प्रशासनिक व्यवस्थाओं में बदलाव करती है, तब कई राज्यों में चिंता और विवाद बढ़ जाते हैं। इस बार मामला चंडीगढ़ का है—एक ऐसा शहर जो पंजाब और हरियाणा दोनों का साझा राजधानी है, लेकिन संवैधानिक रूप से एक केंद्र शासित प्रदेश है। केंद्र सरकार हाल ही में संसद के शीतकालीन सत्र में संविधान संशोधन विधेयक लाने की तैयारी में है, जिसके तहत आर्टिकल 240 में बदलाव करते हुए चंडीगढ़ पर केंद्र का नियंत्रण और मजबूत किया जा सकता है।
जैसे ही यह खबर सामने आई, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल भड़क उठे। सभी का आरोप है कि केंद्र इस प्रस्ताव के जरिये पंजाब के अधिकारों को कम करने की कोशिश कर रहा है।
आर्टिकल 240 आखिर है क्या?
संविधान का अनुच्छेद 240 केंद्रीय शासित प्रदेशों के प्रशासन से जुड़ा है। यह राष्ट्रपति को अधिकार देता है कि वह कुछ विशेष UTs के लिए नियम (Regulations) बना सकें, जो कानून की तरह लागू होते हैं।
वर्तमान में यह प्रावधान अंडमान-निकोबार, दादरा-नगर हवेली, लक्षद्वीप, पुडुचेरी और लद्दाख जैसे UTs पर लागू होता है।
चंडीगढ़ पर अभी यह अनुच्छेद सीधा लागू नहीं है, क्योंकि यहां प्रशासन पंजाब पुनर्गठन अधिनियम 1966 के तहत चलता है।
अगर सरकार प्रस्तावित संशोधन लेकर आती है तो चंडीगढ़ भी इस सूची में शामिल हो सकता है। इसका मतलब होगा—
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केंद्र की सीधी शक्तियों में वृद्धि
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UT प्रशासन के लिए राष्ट्रपति द्वारा नियम बनाने का रास्ता
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पंजाब व हरियाणा की भूमिका और कमजोर
केंद्र क्या बदलाव करना चाहता है?
सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार 131वां संविधान संशोधन विधेयक लाने की तैयारी कर रही है।
इसका उद्देश्य चंडीगढ़ को किसी भी अन्य केंद्र शासित प्रदेश की तरह प्रशासनिक रूप से “केंद्र के अधिक नियंत्रण” के दायरे में लाना बताया जा रहा है।
इसके तहत केंद्र नए ढांचे के अनुसार—
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चंडीगढ़ प्रशासन
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सुरक्षा
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पुलिस व्यवस्था
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सेवा नियम
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भूमि एवं नगर नियोजन
इन सभी क्षेत्रों में अपनी शक्तियों का विस्तार करना चाहता है।
पंजाब क्यों नाराज़ है?
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इसे “संविधान और संघीय ढांचे पर हमला” बताया। उनका कहना है कि—
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चंडीगढ़ ऐतिहासिक रूप से पंजाब का हिस्सा रहा है, जिसे सिर्फ प्रशासनिक सुविधा के लिए UT बनाया गया था।
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केंद्र बार-बार ऐसे कदम उठाता है जो पंजाब के अधिकारों को कमजोर करते हैं।
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राज्य सरकार को बिना चर्चा किए फैसले थोपना लोकतंत्र के खिलाफ है।
मान ने कहा कि केंद्र की यह पहल पंजाब के हिस्से से चंडीगढ़ को और दूर कर देगी।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी इसका विरोध करते हुए कहा—
“केंद्र सरकार राज्यों की शक्तियों को कम करने में लगी है। यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।”
सुखबीर बादल भी आक्रोशित— सभी दल एकजुट
अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने भी केंद्र को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि चंडीगढ़ पंजाब की पहचान से जुड़ा मुद्दा है और इस पर एकतरफा फैसला स्वीकार्य नहीं होगा।
उन्होंने आरोप लगाया कि—
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केंद्र पंजाब के हितों की अनदेखी कर रहा है
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चंडीगढ़ में दखल बढ़ाकर पंजाब की प्रशासनिक भूमिका घटाई जा रही है
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यह फैसले संयुक्त पंजाब आंदोलन की भावनाओं को ठेस पहुंचाते हैं
दिलचस्प यह है कि लंबे समय बाद पंजाब की तीन प्रमुख राजनीतिक ताकतें—AAP, Congress और Akali Dal—इस मुद्दे पर एक स्वर में दिखीं।
पंजाब का ऐतिहासिक तर्क— चंडीगढ़ हमारा है
चंडीगढ़ के मुद्दे पर पंजाब का रुख बिल्कुल स्पष्ट रहा है।
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1966 में हरियाणा बनने के बाद चंडीगढ़ को UT बनाया गया।
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पंजाब ने हमेशा इसे अपनी राजधानी माना है।
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कई आयोगों ने समय-समय पर चंडीगढ़ को पंजाब को सौंपने की सिफारिश भी की है।
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सुप्रीम कोर्ट में भी इस मुद्दे पर कई बार सुनवाई हो चुकी है।
ऐसे में पंजाब को लगता है कि केंद्र का नया कदम इस ऐतिहासिक दावे को कमजोर करने की रणनीति है।
केंद्र का पक्ष— प्रशासनिक दक्षता और भविष्य की योजना
केंद्र सरकार के सूत्रों का कहना है कि—
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चंडीगढ़ एक तेजी से बढ़ता शहरी क्षेत्र है
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इसके प्रशासनिक ढांचे को आधुनिक और अधिक सक्षम बनाने की आवश्यकता है
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एक समान व्यवस्था से UT की गवर्नेंस बेहतर होगी
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कोई भी कदम जनहित और विकास को ध्यान में रखते हुए उठाया जाएगा
हालांकि सरकार ने अभी आधिकारिक रूप से संशोधन विवरण सार्वजनिक नहीं किया है, लेकिन संकेत यही मिल रहे हैं कि चंडीगढ़ को अन्य UTs की तरह विशेष प्रशासनिक व्यवस्था दी जाएगी।
क्या बदलेगा अगर चंडीगढ़ पर Article 240 लागू हुआ?
अगर संशोधन पारित हो गया तो—
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राष्ट्रपति को चंडीगढ़ के लिए कानून जैसी शक्तियों वाले नियम बनाने का अधिकार मिलेगा।
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केंद्र चंडीगढ़ प्रशासन के ढांचे में बड़े बदलाव कर सकेगा।
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पंजाब और हरियाणा की पारंपरिक भूमिका और कम हो जाएगी।
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UT के पुलिस, भूमि और सेवा ढांचे में नया मॉडल लागू किया जा सकता है।
इससे चंडीगढ़ में नियम बनाने और लागू करने की रफ्तार तेज हो सकती है, लेकिन पंजाब को यह केंद्र द्वारा किया गया “एकतरफा कदम” लगता है।
क्या हो सकता है सियासी परिणाम?
यह मुद्दा सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और भावनात्मक भी है।
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पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी इसका जमकर विरोध करेगी।
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अकाली दल और कांग्रेस भी इसे चुनावी मुद्दा बना सकते हैं।
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चंडीगढ़ में चुनावी माहौल और तनाव पैदा हो सकता है।
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केंद्र और राज्य के बीच खींचतान और बढ़ सकती है।
इसलिए आने वाले समय में यह मामला संसद और पंजाब की राजनीति दोनों में गरमाएगा।
निष्कर्ष
आर्टिकल 240 में प्रस्तावित संशोधन केवल संवैधानिक बदलाव नहीं, बल्कि संघीय संबंधों, राज्य अधिकारों और चंडीगढ़ की विशिष्ट राजनीतिक पहचान से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है।
पंजाब इसे “अपने अधिकारक्षेत्र पर हमला” मानता है, जबकि केंद्र इसे “गवर्नेंस सुधार” बताता है।
अब देखने वाली बात होगी कि—
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क्या केंद्र इस बिल को संसद में पेश करता है?
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क्या इसका कानूनी और राजनीतिक विरोध इतना बढ़ेगा कि इसे वापस लेना पड़े?
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या फिर चंडीगढ़ के प्रशासन का नया अध्याय शुरू होगा?
हर हाल में यह मुद्दा आने वाले महीनों में देश की राजनीति का प्रमुख केंद्र रहेगा।