
उत्तर प्रदेश के बांदा में बहुचर्चित पोर्नोग्राफी मामले में विशेष अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए एक जूनियर इंजीनियर (JE) और उसकी पत्नी को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई है। अदालत ने इस मामले को “दुर्लभतम से दुर्लभ” श्रेणी का अपराध बताते हुए कठोरतम दंड उचित ठहराया।
क्या था मामला?
जांच एजेंसियों के अनुसार, आरोपी दंपति पर नाबालिग से जुड़ी अश्लील सामग्री तैयार करने और उसे प्रसारित करने का आरोप था। मामले के खुलासे के बाद पुलिस ने विस्तृत जांच की, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जुटाए और कई डिजिटल उपकरण जब्त किए।
फॉरेंसिक जांच और गवाहों के बयान के आधार पर अदालत ने दोनों को दोषी पाया।
अदालत की टिप्पणी
निर्णय सुनाते हुए अदालत ने कहा कि बच्चों से जुड़े यौन अपराध समाज के लिए बेहद गंभीर खतरा हैं। ऐसे मामलों में कड़ी सजा आवश्यक है, ताकि समाज में सख्त संदेश जाए और भविष्य में इस तरह के अपराधों पर अंकुश लगे।
जांच और सबूत
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डिजिटल डिवाइस और हार्ड डिस्क जब्त
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फॉरेंसिक रिपोर्ट अदालत में पेश
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पीड़ित पक्ष के बयान दर्ज
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आईटी एक्ट और पॉक्सो कानून के तहत कार्रवाई
अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष ने पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं।
कानूनी पहलू
इस मामले में आईटी अधिनियम और पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत आरोप तय किए गए थे। बाल यौन शोषण और अश्लील सामग्री से जुड़े मामलों में कानून बेहद सख्त है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि फांसी की सजा दुर्लभ मामलों में ही दी जाती है, जब अपराध की प्रकृति अत्यंत गंभीर हो।
आगे की प्रक्रिया
दोषी पक्ष को उच्च न्यायालय में अपील का अधिकार है। भारतीय न्याय प्रणाली में फांसी की सजा पर अंतिम मुहर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की प्रक्रिया के बाद ही लगती है।
निष्कर्ष
बांदा की अदालत का यह फैसला बाल सुरक्षा से जुड़े अपराधों पर सख्त रुख का संकेत देता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों के शोषण और अश्लील सामग्री जैसे अपराधों को किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
अब मामला आगे की न्यायिक प्रक्रिया की ओर बढ़ेगा।