
बिहार विधानसभा चुनाव का माहौल गरमाने लगा है। एनडीए और महागठबंधन के बीच सियासी जंग का नया केंद्र कर्पूरी ठाकुर बन गए हैं — वो नेता, जिनकी पहचान “पिछड़ों के मसीहा” के रूप में होती है।
जहां एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत कर्पूरी ठाकुर की विरासत को सम्मान देने से की है, वहीं महागठबंधन भी उसी प्रतीक के सहारे OBC और अति पिछड़ा वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रहा है।
🗳️ महागठबंधन की बिसात
राजद नेता तेजस्वी यादव ने हाल के भाषणों में बार-बार कर्पूरी ठाकुर का नाम लेकर खुद को उनकी विचारधारा का उत्तराधिकारी बताया है।
तेजस्वी का तर्क है कि “कर्पूरी ठाकुर का सपना सामाजिक न्याय था, जिसे एनडीए खत्म करना चाहता है।”
महागठबंधन के लिए कर्पूरी ठाकुर की छवि को भुनाना OBC मतदाताओं को एकजुट करने का अहम जरिया माना जा रहा है — खासकर यादव, कुशवाहा, मल्लाह और नोनिया समुदायों में।
कांग्रेस और वाम दलों ने भी इसी नैरेटिव पर अपने प्रचार अभियान की रूपरेखा तैयार कर ली है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह रणनीति 1990 के दशक के मंडल राजनीति मॉडल को फिर से जीवित करने की कोशिश है।
🇮🇳 मोदी ने खींची सियासी लकीर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार में अपने पहले चुनावी भाषण में स्पष्ट संदेश दिया —
“कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़ों के हक के लिए लड़ाई लड़ी, और एनडीए सरकार उसी विचार को आगे बढ़ा रही है।”
मोदी ने अपने भाषण में बिहार के सबसे बड़े सामाजिक समूह — अति पिछड़ों (EBC) — को साधने पर जोर दिया।
उन्होंने दावा किया कि केंद्र और राज्य की एनडीए सरकारें “कर्पूरी ठाकुर की सोच को विकास के साथ जोड़ने का काम कर रही हैं।”
मोदी के इस बयान को राजनीतिक जानकार महागठबंधन के नैरेटिव को काउंटर करने की कोशिश मान रहे हैं।
🧩 आखिर कर्पूरी ठाकुर ही क्यों?
कर्पूरी ठाकुर बिहार के पहले ऐसे मुख्यमंत्री थे जिन्होंने पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू किया था।
उनकी नीति ने राज्य की सामाजिक संरचना को बदल दिया और उन्हें ‘जननायक’ की उपाधि दिलाई।
आज, तीन दशक बाद, दोनों प्रमुख गठबंधन उनकी विरासत को अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटे हैं —
-
एनडीए उन्हें “विकास और समावेश की प्रेरणा” के तौर पर पेश कर रहा है।
-
महागठबंधन उन्हें “सामाजिक न्याय की लड़ाई का प्रतीक” बता रहा है।
🔹 OBC और EBC वोट पर फोकस
बिहार की लगभग 60% आबादी पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग की है। यही कारण है कि दोनों गठबंधन इन वोटों को लुभाने के लिए हर संभव रणनीति अपना रहे हैं।
राजनीतिक विशेषज्ञ डॉ. अरुण सिंह कहते हैं —
“कर्पूरी ठाकुर का नाम सिर्फ एक स्मृति नहीं, बल्कि बिहार की चुनावी राजनीति का सबसे मजबूत प्रतीक बन चुका है। जो भी उनके नैरेटिव को अपने पक्ष में करेगा, वही मतदाताओं के दिल में जगह बनाएगा।”
🗣️ जमीनी स्तर पर बदलता माहौल
गांवों और छोटे कस्बों में लोगों के बीच कर्पूरी ठाकुर का नाम अब फिर से चर्चा में है।
समस्तीपुर के रहने वाले एक बुजुर्ग मतदाता ने कहा —
“कर्पूरी जी गरीबों के लिए लड़े थे। आज जो भी उनकी बात करेगा, हम उसी के साथ जाएंगे।”
यह भावना बताती है कि कर्पूरी ठाकुर अब सिर्फ एक ऐतिहासिक नेता नहीं, बल्कि बिहार के चुनावी मानस का जिंदा प्रतीक बन गए हैं।
🔚 निष्कर्ष
बिहार चुनाव 2025 में मुद्दे कई हैं — रोजगार, विकास, कानून-व्यवस्था — लेकिन असली लड़ाई “कर्पूरी ठाकुर की विरासत” को लेकर होती दिख रही है।
महागठबंधन जहां सामाजिक न्याय का झंडा उठाकर मैदान में है, वहीं मोदी के नेतृत्व वाला एनडीए विकास और समावेश के एजेंडे को आगे रखकर उसी प्रतीक को अपनी दिशा में मोड़ने की कोशिश कर रहा है।
अब देखना यह है कि ‘जननायक’ की राजनीति किसके पक्ष में जनता का जनादेश मोड़ती है — न्याय की अपील या विकास का वादा?