सत्ता का तमाचा: हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाता रहा युवक, फिर भी SDM ने जड़ दिया थप्पड़, वीडियो से मचा बवाल

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सरकारी पद जिम्मेदारी और संयम की मांग करता है, लेकिन जब वही पद अहंकार और गुस्से का औजार बन जाए, तो लोकतंत्र की आत्मा पर चोट पड़ती है। उत्तर प्रदेश के चित्रकूट से सामने आया यह मामला इसी सच्चाई को उजागर करता है। यहां एक सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वह एक बाइक सवार युवक को सरेआम थप्पड़ मारते नजर आ रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि युवक हाथ जोड़कर माफी मांग रहा था, फिर भी अफसर का गुस्सा नहीं थमा।

यह घटना चित्रकूट जिले के एक व्यस्त इलाके की बताई जा रही है, जहां प्रशासनिक टीम सड़क पर चेकिंग और निरीक्षण अभियान चला रही थी। इसी दौरान एक बाइक सवार युवक को रोका गया। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, युवक से किसी नियम उल्लंघन को लेकर सवाल किया गया था—संभव है कि वह हेलमेट न पहने हो या कागजात पूरे न हों। लेकिन जो कुछ इसके बाद हुआ, उसने पूरे प्रशासनिक तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया।

वायरल वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि युवक दोनों हाथ जोड़कर सामने खड़े अधिकारी से माफी मांग रहा है। उसका चेहरा घबराया हुआ है, आवाज कांप रही है और वह बार-बार कह रहा है कि उससे गलती हो गई है। आसपास कई पुलिसकर्मी और अन्य अधिकारी भी मौजूद हैं। माहौल पूरी तरह अधिकारी के नियंत्रण में है, युवक कहीं से भी आक्रामक या बदतमीज़ नजर नहीं आता।

लेकिन इसी बीच अचानक SDM युवक के चेहरे पर जोरदार थप्पड़ जड़ देते हैं। थप्पड़ लगते ही युवक हड़बड़ा जाता है और पीछे हट जाता है। कुछ पल के लिए वहां मौजूद लोग भी सन्न रह जाते हैं। यह दृश्य कैमरे में कैद हो चुका था और थोड़ी ही देर में सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया।

वीडियो वायरल होते ही लोगों में गुस्सा फूट पड़ा। सवाल उठने लगे कि क्या एक प्रशासनिक अधिकारी को किसी नागरिक को इस तरह सरेआम थप्पड़ मारने का अधिकार है? क्या कानून का पालन कराने का तरीका हिंसा हो सकता है? और अगर यही व्यवहार एक आम पुलिसकर्मी करता, तो क्या उस पर तत्काल कार्रवाई नहीं होती?

सोशल मीडिया पर हजारों लोगों ने इस वीडियो को शेयर करते हुए प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए। कई यूजर्स ने लिखा कि यह सिर्फ एक युवक के अपमान का मामला नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता का उदाहरण है, जहां सत्ता खुद को कानून से ऊपर समझने लगती है।

घटना के बाद जिला प्रशासन हरकत में आया। अधिकारियों ने कहा कि वे वीडियो की जांच कर रहे हैं और पूरे मामले की रिपोर्ट मंगाई गई है। संबंधित SDM से भी स्पष्टीकरण तलब किया गया है। हालांकि, शुरुआती बयानों में यह भी कहा गया कि युवक नियमों का उल्लंघन कर रहा था और अधिकारी ड्यूटी के दौरान कानून व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश कर रहे थे।

लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी स्थिति में थप्पड़ मारना न तो कानूनी है और न ही नैतिक। एक मजिस्ट्रेट के पास जुर्माना लगाने, चालान करने या कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार होता है, लेकिन शारीरिक सजा देने का नहीं।

यह मामला उस बड़ी समस्या की ओर भी इशारा करता है, जिसे अक्सर “सत्ता का दुरुपयोग” कहा जाता है। भारत में कई बार छोटे-छोटे मामलों में अफसरों द्वारा आम नागरिकों के साथ दुर्व्यवहार के वीडियो सामने आते रहे हैं। कभी थप्पड़, कभी डंडा, तो कभी अपमानजनक भाषा—ये सब प्रशासनिक संस्कृति के एक अंधेरे पक्ष को दिखाते हैं।

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि वर्दी और पद कई बार व्यक्ति के भीतर श्रेष्ठता का भ्रम पैदा कर देते हैं। जब अधिकारी खुद को कानून का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि मालिक समझने लगते हैं, तब ऐसे व्यवहार जन्म लेते हैं। यही वजह है कि सिविल सर्विस में ट्रेनिंग के दौरान संयम, संवेदनशीलता और नागरिक अधिकारों पर विशेष जोर दिया जाता है।

इस मामले में भी सबसे ज्यादा दुखद पहलू यह है कि युवक पूरी तरह असहाय स्थिति में था। वह न तो भाग रहा था, न बहस कर रहा था, बल्कि हाथ जोड़कर माफी मांग रहा था। ऐसे में थप्पड़ सिर्फ शारीरिक चोट नहीं, बल्कि आत्मसम्मान पर सीधा हमला है।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस घटना को गंभीर बताते हुए स्वतंत्र जांच की मांग की है। उनका कहना है कि अगर ऐसे मामलों में सिर्फ औपचारिक जांच कर मामला ठंडा कर दिया गया, तो भविष्य में ऐसे व्यवहार और बढ़ेंगे। उन्होंने मांग की है कि दोषी अधिकारी के खिलाफ स्पष्ट अनुशासनात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।

कुछ वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने भी निजी तौर पर माना है कि यह व्यवहार गलत है और इससे पूरे प्रशासन की छवि धूमिल होती है। उनका कहना है कि जनता और प्रशासन के बीच भरोसा तभी कायम रह सकता है, जब अधिकारी कानून के दायरे में रहकर काम करें।

इस घटना ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि फील्ड में तैनात अधिकारियों की मॉनिटरिंग और जवाबदेही कितनी प्रभावी है। जब कैमरे सामने हों, तब भी अगर कोई अफसर थप्पड़ मार सकता है, तो कैमरे के बाहर क्या होता होगा?

पीड़ित युवक के परिवार का कहना है कि उनका बेटा किसी अपराधी की तरह नहीं, बल्कि एक आम नागरिक की तरह वहां मौजूद था। वे चाहते हैं कि सिर्फ माफी नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई हो, ताकि भविष्य में किसी और युवक को इस तरह अपमानित न होना पड़े।

कानून के जानकारों का कहना है कि यह मामला भारतीय दंड संहिता की मारपीट और पद के दुरुपयोग से जुड़ी धाराओं में आ सकता है। अगर सरकार चाहे, तो इसमें आपराधिक कार्रवाई भी संभव है। हालांकि, अक्सर ऐसे मामलों में विभागीय जांच तक ही बात सीमित रह जाती है।

यह घटना लोकतंत्र के एक बुनियादी सिद्धांत की याद दिलाती है—कि कानून सबके लिए समान है। पद चाहे कितना ही ऊंचा क्यों न हो, कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं हो सकता। अगर कानून लागू कराने वाला ही कानून तोड़ने लगे, तो व्यवस्था की नींव कमजोर हो जाती है।

कुल मिलाकर, चित्रकूट का यह थप्पड़ सिर्फ एक व्यक्ति पर पड़ा तमाचा नहीं है। यह तमाचा है उस व्यवस्था पर, जो जनता की सेवा के लिए बनी है, न कि जनता को डराने के लिए। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले में सिर्फ खानापूरी करता है या सच में ऐसा उदाहरण पेश करता है, जिससे भविष्य में कोई अधिकारी सत्ता के नशे में किसी नागरिक पर हाथ उठाने से पहले सौ बार सोचे।

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