
दिल्ली के लाल किले के पास हुए सनसनीखेज कार ब्लास्ट मामले में जांच एजेंसियों ने बड़ी कार्रवाई करते हुए फरार आरोपी मुजफ्फर अहमद को भगोड़ा अपराधी घोषित कर दिया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की मांग पर अदालत ने यह सख्त फैसला सुनाया, जिससे साफ हो गया है कि अब जांच एजेंसियां इस मामले में किसी भी तरह की ढील बरतने के मूड में नहीं हैं। इस फैसले को आतंक और साजिश से जुड़े मामलों में एक अहम कानूनी कदम माना जा रहा है।
यह मामला उस समय सामने आया था जब दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले के नजदीक एक कार में धमाका हुआ था। हालांकि इस ब्लास्ट में किसी की जान नहीं गई, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह घटना बेहद गंभीर मानी गई। लाल किला देश की सुरक्षा और संप्रभुता का प्रतीक है, ऐसे में इसके आसपास किसी भी तरह की विस्फोटक गतिविधि को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे के रूप में देखा जाता है। शुरुआती जांच में ही यह साफ हो गया था कि मामला केवल स्थानीय अपराध तक सीमित नहीं है।
जांच आगे बढ़ने पर NIA ने इस केस की जिम्मेदारी संभाली। एजेंसी को जांच के दौरान कई ऐसे सुराग मिले, जिनसे मुजफ्फर अहमद की भूमिका संदिग्ध पाई गई। बताया गया कि आरोपी ने ब्लास्ट की साजिश रचने, विस्फोटक सामग्री की व्यवस्था करने और वारदात से पहले रेकी जैसे अहम कामों में भूमिका निभाई थी। जैसे ही जांच एजेंसियों ने शिकंजा कसना शुरू किया, मुजफ्फर अहमद फरार हो गया।
NIA ने आरोपी को पकड़ने के लिए कई राज्यों में छापेमारी की, उसके संभावित ठिकानों पर नजर रखी गई और उसके नेटवर्क की गहन जांच की गई। इसके बावजूद जब आरोपी लगातार जांच से बचता रहा और अदालत में पेश नहीं हुआ, तब एजेंसी ने उसे भगोड़ा घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की। कानून के तहत, जब कोई आरोपी जानबूझकर जांच और अदालत से बचता है, तो उसे भगोड़ा अपराधी घोषित किया जा सकता है।
अदालत ने NIA की दलीलों और प्रस्तुत सबूतों को सुनने के बाद यह माना कि मुजफ्फर अहमद जानबूझकर कानून से भाग रहा है। इसके बाद कोर्ट ने उसे आधिकारिक रूप से भगोड़ा अपराधी घोषित कर दिया। इस फैसले के साथ ही अब आरोपी की संपत्ति जब्त करने और उसके खिलाफ और कड़ी कानूनी कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया है।
इस मामले में सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि मुजफ्फर अहमद अकेला नहीं था। जांच में यह भी संकेत मिले हैं कि उसके तार अन्य संदिग्धों और संभावित आतंकी नेटवर्क से जुड़े हो सकते हैं। इसी वजह से NIA इस केस को बेहद संवेदनशील मानकर आगे बढ़ा रही है। एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या इस ब्लास्ट के पीछे किसी बड़े साजिश का हिस्सा था और इसका मकसद क्या था।
दिल्ली ब्लास्ट केस ने एक बार फिर राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि एजेंसियों का दावा है कि समय रहते मामले को नियंत्रित कर लिया गया और किसी बड़े नुकसान से बचाव हो सका। लेकिन यह भी सच है कि इस तरह की घटनाएं यह दिखाती हैं कि आतंकी और असामाजिक तत्व लगातार नए तरीके अपनाने की कोशिश में रहते हैं।
कोर्ट के इस फैसले के बाद अब जांच एजेंसियों को उम्मीद है कि आरोपी पर दबाव और बढ़ेगा। भगोड़ा घोषित होने के बाद आरोपी के लिए देश में छिपना मुश्किल हो जाता है। उसकी हर गतिविधि पर नजर रखी जाती है और जैसे ही कोई सुराग मिलता है, गिरफ्तारी की प्रक्रिया तेज कर दी जाती है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उसकी जानकारी साझा की जा सकती है, यदि उसके विदेश भागने की आशंका हो।
राजनीतिक और सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में त्वरित और सख्त कार्रवाई बेहद जरूरी होती है। इससे न केवल आरोपी पर कानूनी दबाव बनता है, बल्कि यह भी संदेश जाता है कि देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। दिल्ली जैसे संवेदनशील शहर में इस तरह की घटनाओं पर जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाना अनिवार्य है।
फिलहाल NIA इस केस से जुड़े सभी पहलुओं की बारीकी से जांच कर रही है। एजेंसी यह भी सुनिश्चित करना चाहती है कि भविष्य में इस तरह की किसी भी साजिश को शुरुआती स्तर पर ही नाकाम किया जा सके। मुजफ्फर अहमद को भगोड़ा घोषित किया जाना इसी दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
कुल मिलाकर, दिल्ली ब्लास्ट मामले में अदालत और NIA की यह कार्रवाई साफ संकेत देती है कि जांच एजेंसियां अब निर्णायक मोड में हैं। फरार आरोपी पर शिकंजा कसता जा रहा है और आने वाले समय में इस केस से जुड़े और भी बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।