
डिजिटल ठगी के बढ़ते मामलों के बीच मध्य प्रदेश से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने यह दिखा दिया कि साइबर अपराधी किस तरह डर और भ्रम का इस्तेमाल कर बुजुर्गों को निशाना बना रहे हैं। खरगोन जिले के सनावद थाना क्षेत्र में रहने वाले 80 वर्षीय सेवानिवृत्त प्रोफेसर से ‘डिजिटल अरेस्ट’ का डर दिखाकर करीब 10 लाख रुपये की ठगी कर ली गई। आरोपियों ने फोन पर खुद को जांच एजेंसियों से जुड़ा अधिकारी बताया और प्रोफेसर को आतंकवादी फंडिंग के झूठे आरोपों में फंसाने की धमकी दी।
पीड़ित प्रोफेसर के अनुसार, उन्हें एक दिन अचानक फोन आया। कॉल करने वाले ने बेहद गंभीर और डराने वाले लहजे में कहा कि उनके बैंक खाते में एक आतंकवादी संगठन की ओर से 7 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए हैं। इतना ही नहीं, कॉलर ने यह भी दावा किया कि यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है और यदि तुरंत सहयोग नहीं किया गया तो गिरफ्तारी हो सकती है। उम्र और स्वास्थ्य के कारण प्रोफेसर पहले ही अकेलेपन और चिंता से जूझ रहे थे, ऐसे में यह कॉल उनके लिए बेहद डरावनी साबित हुई।
ठगों ने बातचीत के दौरान प्रोफेसर को पूरी तरह मानसिक दबाव में ले लिया। उन्हें बताया गया कि मामला बेहद संवेदनशील है, इसलिए वे किसी से भी इस बारे में बात नहीं कर सकते। यही नहीं, आरोपियों ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहा कि प्रोफेसर को फिलहाल घर से बाहर निकलने की अनुमति नहीं है और हर निर्देश का पालन करना अनिवार्य होगा। यह सब सुनकर प्रोफेसर पूरी तरह घबरा गए और ठगों की बातों पर भरोसा कर बैठे।
इसके बाद ठगों ने प्रोफेसर से उनके बैंक खातों, एफडी और बचत से जुड़ी जानकारी हासिल की। उन्हें यह कहकर अलग-अलग खातों में पैसे ट्रांसफर करवाए गए कि यह रकम जांच के लिए अस्थायी तौर पर सुरक्षित रखी जा रही है। प्रोफेसर को यह भी भरोसा दिलाया गया कि जांच पूरी होने के बाद पूरी राशि वापस कर दी जाएगी। डर और भ्रम की स्थिति में प्रोफेसर ने अपनी जीवनभर की बचत से करीब 10 लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए।
कुछ समय बाद जब ठगों के फोन बंद हो गए और कोई संपर्क नहीं हुआ, तब प्रोफेसर को ठगी का अहसास हुआ। उन्होंने अपने परिजनों को पूरी घटना बताई, जिसके बाद मामले की सूचना पुलिस को दी गई। शिकायत मिलते ही पुलिस ने केस दर्ज कर जांच शुरू की। शुरुआती जांच में यह साफ हो गया कि यह एक संगठित साइबर फ्रॉड है, जिसमें अपराधी खुद को जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को फंसाते हैं।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह ‘डिजिटल अरेस्ट स्कैम’ हाल के दिनों में तेजी से फैल रहा है। अपराधी खासतौर पर बुजुर्गों और पढ़े-लिखे लेकिन तकनीकी रूप से कम सक्रिय लोगों को निशाना बना रहे हैं। फोन कॉल, फर्जी आईडी, और कानूनी शब्दों का इस्तेमाल कर वे पीड़ित को इतना डरा देते हैं कि वह बिना सोचे-समझे पैसे ट्रांसफर कर देता है।
इस मामले में पुलिस ने लोगों से अपील की है कि किसी भी अनजान कॉल पर बैंकिंग जानकारी साझा न करें। कोई भी सरकारी एजेंसी या पुलिस फोन पर इस तरह की जानकारी नहीं मांगती और न ही ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसा कोई कानूनी प्रावधान है। अगर किसी को इस तरह की धमकी भरी कॉल आती है, तो तुरंत स्थानीय पुलिस या साइबर सेल से संपर्क करना चाहिए।
साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि ठग मनोवैज्ञानिक तरीके से हमला करते हैं। वे पहले डर पैदा करते हैं, फिर गोपनीयता की शर्त रखते हैं और अंत में जल्दबाजी में फैसला करवाते हैं। बुजुर्ग लोग, जो कानून और प्रशासन का सम्मान करते हैं, अक्सर ऐसे मामलों में जल्दी घबरा जाते हैं और ठगों की बातों पर भरोसा कर लेते हैं।
पीड़ित प्रोफेसर के परिवार ने इस घटना को बेहद दुखद बताया है। उनका कहना है कि जीवनभर ईमानदारी से पढ़ाने और समाज की सेवा करने वाले व्यक्ति के साथ इस तरह की ठगी होना बेहद पीड़ादायक है। परिवार ने प्रशासन से मांग की है कि ऐसे अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो और बुजुर्गों को जागरूक करने के लिए विशेष अभियान चलाए जाएं।
पुलिस अब बैंक ट्रांजैक्शनों और कॉल डिटेल्स के आधार पर आरोपियों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। साइबर सेल की टीम यह पता लगाने में जुटी है कि पैसा किन खातों में गया और क्या यह किसी बड़े गिरोह का हिस्सा है। हालांकि, ऐसे मामलों में पैसा वापस मिल पाना हमेशा आसान नहीं होता, क्योंकि ठग कई स्तरों पर रकम को ट्रांसफर कर देते हैं।
यह घटना समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। डिजिटल युग में जहां सुविधाएं बढ़ी हैं, वहीं अपराध के तरीके भी बदल गए हैं। खासकर बुजुर्गों को यह समझने की जरूरत है कि डर के आधार पर लिया गया कोई भी फैसला नुकसानदायक हो सकता है। परिवार के सदस्यों को भी चाहिए कि वे अपने बुजुर्गों को इस तरह के साइबर फ्रॉड के बारे में जागरूक करें।
कुल मिलाकर, खरगोन जिले का यह मामला यह साबित करता है कि साइबर ठगी अब सिर्फ तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक चुनौती बन चुकी है। ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे झूठे शब्दों के जरिए लोगों को डराकर ठगना एक खतरनाक चलन है। अगर समय रहते जागरूकता और सख्ती नहीं बढ़ाई गई, तो ऐसे मामले और भी बढ़ सकते हैं।