OTT पर भी नहीं बदली तस्वीर! ‘नई कहानियों’ के दावे के बावजूद पुरुष किरदारों का दबदबा, डेटा ने खोली सच्चाई

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भारतीय मनोरंजन जगत में एक समय ऐसा माना जाने लगा था कि ओटीटी प्लेटफॉर्म महिलाओं के लिए नए अवसरों का दरवाजा खोलेंगे। यह उम्मीद की जा रही थी कि यहां पर महिला किरदारों को न सिर्फ ज्यादा स्पेस मिलेगा, बल्कि वे कहानी के केंद्र में भी होंगी। लेकिन हालिया डेटा और रिसर्च से सामने आई तस्वीर चौंकाने वाली है। जिस ओटीटी को ‘नई सोच’ और ‘नई कहानियों’ का मंच कहा जा रहा था, वहां भी पुरुष प्रधानता (‘मेल डॉमिनेंस’) का दबदबा साफ दिखाई देता है

डेटा बताता है कि वेब सीरीज और ओटीटी फिल्मों में लीड रोल आज भी ज्यादातर पुरुषों के हिस्से में ही जा रहे हैं। महिला किरदार बड़ी संख्या में अब भी सहायक या सीमित दायरे में सिमटे नजर आते हैं।


🔹 OTT से थी बराबरी की उम्मीद, टूटी महिलाओं की आस

जब ओटीटी प्लेटफॉर्म ने भारत में जोर पकड़ा, तो माना गया कि यह बॉलीवुड की परंपरागत सोच से अलग होगा। यहां पर वहीरोनुमा छवि, पुरानी रूढ़ियां और पुरुष-प्रधान स्क्रिप्ट से हटकर महिलाओं को सशक्त किरदार मिलेंगे। शुरुआती दौर में कुछ वेब सीरीज ने इस उम्मीद को जिंदा भी रखा, जहां महिलाओं को मजबूत और स्वतंत्र रूप में दिखाया गया।

लेकिन जैसे-जैसे ओटीटी का बाज़ार बढ़ता गया, कंटेंट का दबाव, व्यूअरशिप की दौड़ और कमाई की होड़ में वही पुराना फॉर्मूला लौटता नजर आया। एक बार फिर से कहानियों के केंद्र में पुरुष आ गए।


🔹 डेटा क्या कहता है?

ताजा आंकड़ों के अनुसार—

  • ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने वाली ज्यादातर वेब सीरीज में पुरुष ही मुख्य किरदार होते हैं।

  • महिला लीड आधारित सीरीज की संख्या बेहद सीमित है।

  • ज्यादातर शोज में महिला पात्रों को या तो हीरो की प्रेमिका, पत्नी, मां या सहायक भूमिका में दिखाया गया है।

  • एक्शन, क्राइम और थ्रिलर जैसी लोकप्रिय कैटेगरी में महिला लीड लगभग न के बराबर है।

यानि जिस मंच को महिलाओं के लिए ‘गेम चेंजर’ माना गया था, वहां भी वे अब भी पीछे रह गई हैं।


🔹 बॉलीवुड जैसी कहानी, OTT पर भी वही हाल

बॉलीवुड में वर्षों से यह आरोप लगता रहा है कि यहां फिल्में हीरो के इर्द-गिर्द घूमती हैं और हीरोइन केवल शो-पीस बनकर रह जाती हैं। ओटीटी आने के बाद यह उम्मीद जगी थी कि यहां यह ढांचा टूटेगा, लेकिन हकीकत में ओटीटी भी बॉलीवुड की ही राह पर चलता हुआ दिख रहा है

हालांकि फर्क इतना है कि यहां कहानियां ज्यादा बोल्ड हैं, विषय ज्यादा खुले हैं, लेकिन सत्ता अब भी पुरुष किरदारों के हाथ में ही है।


🔹 महिलाओं को क्यों नहीं मिल रहे लीड रोल?

इस सवाल के कई कारण सामने आते हैं—

  1. मार्केट का दबाव:
    मेकर्स का मानना है कि पुरुष लीड वाली सीरीज ज्यादा दर्शक खींचती हैं और ज्यादा कमाई करती हैं।

  2. स्क्रिप्ट की सोच:
    अभी भी ज्यादातर लेखक पुरुष दृष्टिकोण से कहानियां गढ़ते हैं।

  3. निर्माण से जुड़े लोगों की संरचना:
    प्रोड्यूसर, डायरेक्टर और बड़े फैसले लेने वाले पदों पर पुरुषों का वर्चस्व ज्यादा है, जिससे महिला केंद्रित कहानियों को उतना महत्व नहीं मिल पाता।

  4. जोखिम से बचने की प्रवृत्ति:
    मेकर्स सुरक्षित रास्ता अपनाना चाहते हैं, जिसके लिए वे स्थापित पुरुष सुपरस्टार्स या लोकप्रिय मेल कैरेक्टर्स पर भरोसा करते हैं।


🔹 जहां महिला लीड दिखीं, वहां भी संघर्ष

कुछ ओटीटी शोज ऐसे जरूर रहे हैं जिनमें महिला पात्र केंद्र में दिखीं, लेकिन उनकी संख्या बेहद कम है। इन शोज को आलोचकों ने सराहा, लेकिन व्यावसायिक सफलता के मामले में कई बार इन्हें उतना समर्थन नहीं मिला, जितना पुरुष-प्रधान शोज को मिला। इससे भी निर्माताओं का भरोसा महिला लीड से और कमजोर हुआ।


🔹 समाज की सोच भी है एक बड़ी वजह

केवल फिल्म इंडस्ट्री ही नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता भी इसकी बड़ी वजह बनती है। आज भी बड़े पैमाने पर दर्शक पुरुष किरदार को ही ‘हीरो’ के रूप में देखना पसंद करते हैं।
महिला अगर मजबूत दिखाई जाती है, तो अक्सर उसे ‘अपवाद’ के तौर पर पेश किया जाता है, न कि सामान्य स्थिति के रूप में।


🔹 OTT पर बढ़ता कंटेंट, लेकिन घटती बराबरी

ओटीटी पर हर महीने सैकड़ों घंटे का नया कंटेंट रिलीज हो रहा है, लेकिन महिला प्रतिनिधित्व की रफ्तार उस अनुपात में नहीं बढ़ रही है। क्राइम, राजनीति, गैंगस्टर और थ्रिलर जैसे जॉनर में तो महिला पात्र लगभग हाशिए पर चली जाती हैं।

यह ट्रेंड इस बात का संकेत है कि चाहे प्लेटफॉर्म नया हो, लेकिन सोच अब भी काफी हद तक पुरानी ही बनी हुई है।


🔹 महिला कलाकारों की चिंता और सवाल

कई महिला कलाकार समय-समय पर यह सवाल उठाती रही हैं कि—

  • उन्हें मजबूत लीड रोल क्यों नहीं दिए जाते?

  • क्यों हर कहानी का भार अब भी पुरुष कंधों पर ही डाला जाता है?

  • क्या दर्शक महिला-प्रधान कहानियां स्वीकार नहीं करेंगे, या यह सिर्फ एक धारणा है?

ये सवाल आज भी पूरी तरह अनुत्तरित हैं।


🔹 क्या दर्शक भी जिम्मेदार हैं?

इस असमानता में दर्शकों की भूमिका भी अहम मानी जाती है। जब महिला-प्रधान शोज को अपेक्षित व्यूअरशिप नहीं मिलती और पुरुष-प्रधान सीरीज रिकॉर्ड तोड़ देती हैं, तो मेकर्स को साफ संकेत मिलता है कि बाजार क्या चाहता है।

यानी बदलाव सिर्फ इंडस्ट्री से नहीं, बल्कि दर्शक वर्ग से भी आना जरूरी है।


🔹 बदलाव की उम्मीद अभी भी जिंदा

हालांकि स्थिति पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है। कुछ नए निर्माता, लेखक और प्लेटफॉर्म अब महिला-केंद्रित कहानियों पर गंभीरता से काम कर रहे हैं। सामाजिक मुद्दों, मानसिक स्वास्थ्य, करियर संघर्ष और पारिवारिक दबाव जैसे विषयों पर महिलाओं को केंद्र में रखकर कुछ अलग तरह की सीरीज भी बन रही हैं।

लेकिन यह बदलाव अभी सीमित है और इसे मुख्यधारा बनने में वक्त लगेगा।


निष्कर्ष

ओटीटी मंच को भले ही ‘नई सोच’ और ‘नई आज़ादी’ का प्रतीक माना जाता हो, लेकिन हकीकत में यहां भी महिला प्रतिनिधित्व अब भी बराबरी तक नहीं पहुंच पाया है। डेटा साफ बताता है कि कहानी का केंद्र आज भी पुरुष ही बने हुए हैं।

अगर ओटीटी को सच में बदलाव का मंच बनना है, तो उसे न सिर्फ नई कहानियां दिखानी होंगी, बल्कि नई सोच को भी ईमानदारी से अपनाना होगा, जहां महिला सिर्फ सहायक पात्र नहीं, बल्कि कहानी की नायिका भी बन सके।

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