
मुंबई बीएमसी चुनाव नतीजों के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। चुनाव परिणाम सामने आते ही शिवसेना के शिंदे गुट के पार्षदों का एक होटल में एकत्र होना सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बन गया। सवाल उठने लगे कि क्या यह कदम संभावित हॉर्स ट्रेडिंग के डर से उठाया गया है या फिर इसके पीछे मुंबई महानगरपालिका में मेयर पद को लेकर कोई बड़ी रणनीति छिपी है। इस पूरे घटनाक्रम पर अब शिंदे गुट से जुड़े एक शिवसेना कॉरपोरेटर ने खुलकर जवाब दिया है।
बीएमसी चुनाव हमेशा से सिर्फ नगर निगम का चुनाव नहीं रहा, बल्कि इसे महाराष्ट्र की राजनीति का सेमीफाइनल कहा जाता है। देश की सबसे अमीर नगर निगम होने के साथ-साथ बीएमसी का नियंत्रण राजनीतिक दलों के लिए ताकत का प्रतीक माना जाता है। इस बार चुनाव नतीजे ऐसे रहे कि किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। ऐसे हालात में जोड़-तोड़, समर्थन और रणनीतिक बैठकों की अटकलें लगना स्वाभाविक माना जा रहा है।
इसी पृष्ठभूमि में शिंदे गुट के पार्षदों का मुंबई के एक बड़े होटल में ठहरना सुर्खियों में आ गया। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि यह सब संभावित टूट-फूट को रोकने और पार्षदों को “सुरक्षित” रखने के लिए किया गया है। सोशल मीडिया पर भी सवाल उठे कि क्या शिंदे गुट को अपने ही पार्षदों पर भरोसा नहीं है।
इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए शिंदे गुट से जुड़े एक शिवसेना कॉरपोरेटर ने साफ कहा कि होटल में रुकने का फैसला किसी डर या हॉर्स ट्रेडिंग की आशंका के कारण नहीं लिया गया है। उनके मुताबिक, यह पूरी तरह एक संगठनात्मक और रणनीतिक बैठक थी, जहां भविष्य की राजनीतिक दिशा पर चर्चा की जानी थी। उन्होंने कहा कि चुनाव नतीजों के बाद सभी पार्षदों का एक जगह इकट्ठा होना सामान्य प्रक्रिया है।
कॉरपोरेटर का कहना है कि बीएमसी जैसे बड़े संस्थान में अगला कदम क्या होगा, यह तय करने के लिए आपसी संवाद बेहद जरूरी होता है। मेयर पद, स्थायी समिति और अन्य अहम पदों को लेकर रणनीति बनाना किसी भी राजनीतिक दल की जिम्मेदारी होती है। इसे हॉर्स ट्रेडिंग से जोड़ना विपक्ष की राजनीति है।
उन्होंने यह भी कहा कि शिंदे गुट के सभी पार्षद पूरी तरह एकजुट हैं और किसी तरह की टूट की आशंका नहीं है। “हमारे पार्षद किसी दबाव में नहीं हैं। होटल में बैठक इसलिए हुई, ताकि हम शांति से बैठकर आगे की रणनीति पर चर्चा कर सकें,”—ऐसा उनका कहना था।
मेयर पद को लेकर भी सियासी चर्चाएं तेज हैं। बीएमसी में मेयर का पद बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि यह न सिर्फ प्रशासनिक नियंत्रण देता है, बल्कि राजनीतिक रूप से भी बड़ी जीत मानी जाती है। ऐसे में शिंदे गुट का फोकस इस बात पर है कि वह अपने सहयोगियों के साथ मिलकर मजबूत दावा पेश कर सके। यही वजह है कि बैठक को मेयर पद की तैयारी से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि होटल में पार्षदों का ठहरना भारतीय राजनीति में नया नहीं है। इससे पहले भी कई राज्यों और नगर निगमों में इस तरह की रणनीतियां अपनाई जा चुकी हैं। हालांकि, हर बार इसे हॉर्स ट्रेडिंग से जोड़कर देखा जाता है, क्योंकि जनता के बीच इस शब्द की नकारात्मक छवि बन चुकी है।
शिंदे गुट के समर्थकों का कहना है कि विपक्ष जानबूझकर इस मुद्दे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है, ताकि उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया जा सके। उनका तर्क है कि अगर विपक्ष को अपने पार्षदों पर भरोसा है, तो वे भी खुलकर बैठक कर सकते हैं। सिर्फ होटल में रुकने से किसी पर आरोप लगाना सही नहीं है।
वहीं, विपक्षी दलों का दावा है कि अगर सब कुछ सामान्य है, तो फिर पार्षदों को होटल में क्यों ठहराया गया? उनके अनुसार, यह कदम राजनीतिक अस्थिरता और अविश्वास को दर्शाता है। विपक्ष का यह भी कहना है कि आने वाले दिनों में बीएमसी की राजनीति और ज्यादा दिलचस्प होने वाली है।
बीएमसी चुनाव के बाद का यह दौर सभी दलों के लिए परीक्षा की घड़ी है। एक तरफ सत्ता पाने की कोशिशें हैं, तो दूसरी तरफ अपने-अपने गुट को एकजुट रखने की चुनौती। शिंदे गुट के लिए यह और भी अहम है, क्योंकि वे खुद को शिवसेना की असली धारा के रूप में स्थापित करने की कोशिश में लगे हुए हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी दिखाया है कि नगर निगम की राजनीति अब सिर्फ स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रही। इसमें राज्य और राष्ट्रीय राजनीति की छाया भी साफ नजर आने लगी है। मेयर पद की लड़ाई को आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
कॉरपोरेटर के बयान के बाद भले ही शिंदे गुट ने सफाई दे दी हो, लेकिन सियासी अटकलें फिलहाल थमने के आसार कम ही नजर आते हैं। बीएमसी में अगली सत्ता संरचना क्या होगी, यह तो आने वाले दिनों में साफ होगा, लेकिन इतना तय है कि होटल में हुई यह बैठक मुंबई की राजनीति में लंबे समय तक चर्चा में बनी रहेगी।
कुल मिलाकर, शिंदे गुट के पार्षदों का होटल में इकट्ठा होना सिर्फ एक बैठक थी या इसके पीछे कोई बड़ी सियासी रणनीति—यह सवाल अभी खुला है। हालांकि, गुट की ओर से यह स्पष्ट कर दिया गया है कि हॉर्स ट्रेडिंग का डर नहीं, बल्कि संगठनात्मक मजबूती और मेयर पद की रणनीति ही इसका मुख्य कारण थी। अब सबकी नजरें इस पर टिकी हैं कि बीएमसी की सत्ता की चाबी आखिर किसके हाथ लगती है।