नसीमुद्दीन सिद्दीकी: सपा के लिए एसेट या लायबिलिटी? अखिलेश की रणनीति में कहां बैठते हैं फिट

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर नसीमुद्दीन सिद्दीकी का नाम चर्चा में है। कभी बहुजन राजनीति के अहम चेहरे रहे सिद्दीकी अब समाजवादी खेमे में सक्रिय हैं। सवाल यह उठ रहा है कि क्या वे अखिलेश यादव के लिए राजनीतिक एसेट साबित होंगे या रणनीतिक चुनौती?


बसपा से सपा तक का सफर

नसीमुद्दीन सिद्दीकी लंबे समय तक मायावती के करीबी माने जाते थे। बसपा सरकार के दौर में उनकी संगठनात्मक पकड़ मजबूत थी। बाद में पार्टी से अलगाव के बाद उन्होंने सपा का दामन थामा।

यह बदलाव उत्तर प्रदेश की मुस्लिम और दलित राजनीति के समीकरणों में नई संभावनाएं लेकर आया।


सपा के लिए संभावित एसेट

1️⃣ मुस्लिम वोट बैंक पर प्रभाव
सिद्दीकी का पश्चिमी और मध्य यूपी में प्रभाव माना जाता है। सपा के पारंपरिक मुस्लिम-यादव समीकरण को मजबूत करने में वे सहायक हो सकते हैं।

2️⃣ संगठनात्मक अनुभव
लंबे राजनीतिक अनुभव के चलते वे बूथ स्तर पर रणनीति बनाने और स्थानीय नेताओं को साधने में भूमिका निभा सकते हैं।

3️⃣ विपक्षी खेमे की समझ
बसपा में काम करने का अनुभव उन्हें विपक्ष की रणनीति समझने में बढ़त देता है।


क्या बन सकते हैं लायबिलिटी?

1️⃣ छवि का सवाल
राजनीति में विवाद और पुराने आरोप अक्सर चुनावी नैरेटिव को प्रभावित करते हैं। विपक्ष उन्हें मुद्दा बना सकता है।

2️⃣ आंतरिक असंतोष
सपा के भीतर पहले से मौजूद नेताओं के साथ समन्वय चुनौती बन सकता है।

3️⃣ वोट ट्रांसफर की अनिश्चितता
यह तय नहीं कि उनके साथ आने से बसपा समर्थकों का वोट स्वतः सपा को शिफ्ट होगा।


अखिलेश की रणनीति क्या हो सकती है?

अखिलेश यादव संभवतः सिद्दीकी को सीधे चुनावी चेहरा बनाने के बजाय रणनीतिक भूमिका में रख सकते हैं—

  • मुस्लिम बहुल सीटों पर समन्वय

  • संगठनात्मक सलाहकार

  • विपक्षी नैरेटिव का जवाब

इस तरह वे अनुभव का लाभ भी ले सकते हैं और संभावित जोखिम को सीमित भी रख सकते हैं।


निष्कर्ष

नसीमुद्दीन सिद्दीकी सपा के लिए अवसर और चुनौती—दोनों का मिश्रण हैं। यदि उनकी राजनीतिक पकड़ और अनुभव का संतुलित उपयोग किया गया, तो वे एसेट साबित हो सकते हैं। लेकिन रणनीति में चूक उन्हें लायबिलिटी भी बना सकती है।

अब देखना होगा कि अखिलेश यादव उन्हें किस भूमिका में आगे बढ़ाते हैं और आगामी चुनावों में इसका क्या असर पड़ता है।

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