पहले चुनाव में मिली हार से लेकर 10वीं बार मुख्यमंत्री बनने तक—कैसे बने नीतीश कुमार बिहार की सियासत के ‘सिकंदर’

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नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर भारतीय लोकतंत्र की उन दुर्लभ कहानियों में से है, जो लगातार उतार–चढ़ाव, असफलताओं, गठजोड़ों, सिद्धांतों और परिस्थितियों के बीच आकार लेती है। आज वह बिहार के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक हैं, लेकिन उनकी यात्रा किसी सीधी रेखा की तरह नहीं रही। पहले ही चुनाव में हार, कई बार सत्ता से बाहर रहना, अलग-अलग राजनीतिक दलों से टकराव और गठबंधन की बदली रणनीतियाँ—इन सभी ने मिलकर एक ऐसा नेता गढ़ा जिसे आज बिहार में “सियासत का सिकंदर” कहा जाता है।

नीतीश कुमार के दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद उनके राजनीतिक करियर को फिर से देखकर यह समझना जरूरी हो जाता है कि आखिर वह कौन से कारक थे जिन्होंने उन्हें बिना किसी बड़े जातीय आधार या विशाल संगठन के बावजूद बिहार के सबसे स्थिर चेहरे के रूप में स्थापित किया।


शुरुआती संघर्ष: पहली बार चुनाव और पहली हार

नीतीश कुमार का राजनीतिक करियर छात्र राजनीति से प्रारंभ हुआ, जहाँ उन्होंने जेपी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। इसी दौरान लालू प्रसाद यादव और कई भविष्य के बड़े नेता उनके साथ थे।
सत्तर के दशक के आंदोलनों ने उन्हें पहचान तो दी, लेकिन उन्होंने चुनावी राजनीति में जब पहली बार कदम रखा, तो सफलता उनके हाथ नहीं लगी।

पहले चुनाव में हार ने नीतीश को दो रास्ते दिए—या तो वह राजनीति में संघर्ष जारी रखें, या फिर किसी दूसरी राह पर चल पड़ें। उन्होंने पहला विकल्प चुना। यह निर्णय उनके करियर का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ, क्योंकि वही दृढ़ता आगे चलकर उन्हें राज्य की सत्ता तक लेकर आई।


लालू प्रसाद यादव के साथ सियासी दोस्ती और अलगाव

नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव एक समय एक ही राजनीतिक धारा के मजबूत साथी थे। जेपी आंदोलन के दिनों में दोनों ने साथ संघर्ष किया और जनता दल की राजनीति में कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। लेकिन समय के साथ राजनीतिक दृष्टिकोण और सत्ता के समीकरण बदलते गए।

लालू यादव के शासनकाल में नीतीश का प्रभाव सीमित होने लगा। सत्ता के केंद्रीकरण, भ्रष्टाचार के बढ़ते आरोपों और सुशासन की कमी को देखते हुए उन्होंने खुद को अलग करने का फैसला लिया।

यही वह दौर था जब नीतीश ने अपने लिए एक अलग सियासी पहचान गढ़नी शुरू की—एक ऐसी पहचान जिसमें विकास, प्रशासनिक दक्षता और कानून-व्यवस्था पर जोर था।


नई राजनीतिक पहचान का निर्माण

लालू प्रसाद यादव से अलग होने के बाद नीतीश कुमार ने अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने के लिए जदयू के फ्रेमवर्क को आसपास के दलों के साथ मिलकर एक मजबूत संगठन के रूप में विकसित किया।
उनका मुख्य संदेश था:

  • बेहतर प्रशासन

  • भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती

  • कानून-व्यवस्था में सुधार

  • आर्थिक विकास पर ध्यान

उनकी यह रणनीति सफल हुई। यही वह समय था जब बिहार में “सुशासन बाबू” की छवि बननी शुरू हुई।


पहली बार मुख्यमंत्री पद की ओर बढ़ता कदम

लंबे संघर्ष और राजनीतिक सफर के बाद जब पहली बार नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने, तो राज्य एक गहरे संकट से गुजर रहा था। सड़कों, कानून-व्यवस्था, बिजली, शिक्षा—हर क्षेत्र में सुधार की भारी आवश्यकता थी।

मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद ही उन्होंने पुलिस प्रशासन, शिक्षा संस्थानों, महिला सशक्तिकरण और स्वास्थ्य सेवाओं में तेज़ी से सुधार शुरू किए।
महिला आरक्षण नीति, पंचायत चुनावों में महिलाओं की भागीदारी, सड़क निर्माण, स्कूलों में साइकिल योजना—इन कदमों ने उनकी लोकप्रियता को राज्य में नई ऊँचाइयों तक पहुंचाया।


गठबंधन राजनीति के मास्टर

नीतीश कुमार का राजनीतिक करियर इस बात का प्रमाण है कि वह गठबंधन राजनीति के सबसे कुशल खिलाड़ी हैं।
उन्होंने कई बार परिस्थितियों के अनुसार गठबंधन बदले, लेकिन उसकी वजह हमेशा प्रशासनिक स्थिरता, राज्य हित और दीर्घकालिक रणनीति बताई।

उनकी गठबंधन यात्रा कुछ इस प्रकार रही—

  1. लंबा NDA गठबंधन

  2. फिर लालू यादव के साथ महागठबंधन में वापसी

  3. फिर महागठबंधन से बाहर आकर वापस NDA में शामिल होना

  4. ताजा राजनीतिक बदलाव में एक बार फिर नई संरचना बनाना

कई राजनीतिक विश्लेषकों ने उनके इन फैसलों की आलोचना की, लेकिन जनता के बीच उनकी “काम करने वाले नेता” की छवि बरकरार रही।


हर बार वापसी क्यों होती है?

यह सवाल हमेशा उठता है कि क्यों नीतीश कुमार बार-बार सत्ता में वापस आ जाते हैं। इसके कई कारण हैं:

1. जातीय समीकरण से परे एक छवि

जहाँ कई नेता अपने जातीय आधार पर राजनीति करते हैं, नीतीश ने अपने शासनकाल में प्रशासनिक सुधार और सर्वसमावेशी नीतियों को प्राथमिकता दी।

2. विकास के प्रतीक के रूप में स्थान

चौड़ी सड़कें, स्कूलों में बेहतर व्यवस्था, स्वास्थ्य उपक्रम—इन सबने बिहार में उनकी छवि को मजबूत बनाया।

3. मजबूत संगठनात्मक कौशल

कम संसाधनों और सीमित संगठन के बावजूद उन्हें शासन में स्थिरता देने के लिए जाना जाता है।

4. राजनीतिक समय का सही आकलन

नीतीश हमेशा परिस्थितियों को समझने और जल्दी निर्णय लेने के लिए जाने जाते हैं।


दसवीं बार मुख्यमंत्री: इतिहास में अनोखा अध्याय

दसवीं बार मुख्यमंत्री बनकर नीतीश कुमार ने एक ऐसी उपलब्धि हासिल कर ली है, जिसकी तुलना देश के बहुत कम नेताओं से की जा सकती है। उनके इस रिकॉर्ड में यह साफ दिखाई देता है कि:

  • जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता बनी हुई है

  • गठबंधन राजनीति में उनकी भूमिका निर्णायक है

  • बिहार की सत्ता संरचना में वह आज भी केंद्र में हैं

उनकी यह उपलब्धि राजनीतिक स्थिरता के संदर्भ में भी उल्लेखनीय है, क्योंकि बिहार के जटिल सामाजिक ढांचे में लंबे समय तक शासन करना आसान नहीं है।


आगे बिहार की राजनीति में नीतीश की भूमिका

अब जब नीतीश कुमार दसवीं बार सत्ता में आए हैं, तो उनसे अपेक्षाएँ भी उसी अनुपात में बढ़ रही हैं। लोगों की नजरें इस पर होंगी कि वह आगे—

  • आर्थिक सुधारों

  • रोजगार सृजन

  • औद्योगिक निवेश

  • शिक्षा प्रणाली

  • स्वास्थ्य ढांचे

पर क्या नए कदम उठाते हैं।

राजनीतिक रूप से भी यह देखने की उत्सुकता होगी कि वह आने वाले वर्षों में किस गठबंधन के साथ आगे बढ़ते हैं और उनका उत्तराधिकारी कौन होगा।


निष्कर्ष

पहली चुनावी हार से लेकर दसवीं बार मुख्यमंत्री बनने तक की यह यात्रा बताती है कि नीतीश कुमार केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की एक विस्तृत और बहुआयामी कहानी हैं।
उनकी रणनीति, समझ, प्रशासनिक सुधारों और लगातार बदलते राजनीतिक समीकरणों को समझने की क्षमता ने उन्हें बिहार के राजनीतिक छत्रपति के रूप में स्थापित कर दिया है।

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