ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तानी गोलाबारी से घायल हुई गाय ‘गौरी’ को मिली नई जिंदगी, कृत्रिम पैर लगने के बाद फिर खड़ी हुई

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भारत-पाकिस्तान बॉर्डर पर हुए ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तानी सेना की गोलाबारी के दौरान घायल हुई गाय ‘गौरी’ को आखिरकार नई जिंदगी मिल गई है। लंबे समय से उपचार के बाद गौरी को कृत्रिम पैर लगाया गया, जिसके बाद वह अब पहले की तरह खड़ी होने और चलने की कोशिश कर रही है। यह सिर्फ एक जानवर के पुनर्वास की कहानी नहीं, बल्कि करुणा, विज्ञान और सेवा की एक मिसाल बन गई है जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा है।


गोलाबारी में उड़ा था गौरी का पिछला पैर

ऑपरेशन सिंदूर उस समय चर्चा में आया था जब पाकिस्तान की ओर से अचानक की गई भारी फायरिंग के कारण पशुधन और ग्रामीणों को गंभीर नुकसान उठाना पड़ा। इनमे सबसे ज्यादा दर्दनाक मामला गौरी का था—एक शांत, स्थानीय गाय, जिसका पिछला पैर सीमा पार से हुई शेलिंग में बुरी तरह कट गया था। धमाके की आवाज़ के साथ उड़े छर्रों ने गौरी को गंभीर रूप से घायल कर दिया। मौके पर मौजूद ग्रामीणों ने तुरंत उसे सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया, लेकिन उसकी हालत बेहद नाजुक थी।

गौरी को सेना और पशु-चिकित्सा विभाग की टीम ने मिलकर नजदीकी सैन्य अस्पताल पहुंचाया, जहां डॉक्टरों ने कई घंटों तक ऑपरेशन किया। उसकी जान तो बच गई, लेकिन पैर को बचाया नहीं जा सका।


भारतीय सेना और वेटरिनरी टीम का अनोखा प्रयास

गौरी को बचाने में कई संस्थाओं और विशेषज्ञों ने मिलकर काम किया। वेटरिनरी सर्जनों ने तय किया कि गौरी के लिए एक विशेष कृत्रिम पैर बनाया जाएगा, ताकि वह सामान्य जीवन जी सके। इसके लिए बायो-मेकेनिकल इंजीनियरों को बुलाया गया जिन्होंने गौरी के वजन, चलने की क्षमता और शारीरिक संरचना के आधार पर एक कस्टमाइज्ड प्रोस्थेटिक लेग तैयार किया।

कृत्रिम पैर बनाने की प्रक्रिया आसान नहीं थी। कई बार माप लिए गए, संरचना बदली गई, और प्रेशर टेस्ट किए गए, ताकि पैर गौरी के शरीर के संतुलन के अनुकूल रह सके। टीम का लक्ष्य था कि पैर न केवल टिकाऊ हो बल्कि दर्द या घाव भी ना पैदा करे।

फाइनल फिटिंग के दिन जवानों और डॉक्टरों की टीम भावुक हो गई जब गौरी ने पहली बार खड़े होने की कोशिश की। कुछ सेकंड तक लड़खड़ाने के बाद वह संतुलन बनाए रखने में सफल रही। यह क्षण मानो सभी की मेहनत का पुरस्कार था।


स्थानीय लोगों में खुशी की लहर

गौरी को नई जिंदगी मिलने की खबर पूरे इलाके में तेजी से फैल गई। ग्रामीण, जो उसे परिवार का हिस्सा मानते थे, अस्पताल में उससे मिलने पहुंचे। कई लोग मिठाइयाँ लेकर आए और गौरी के माथे पर तिलक लगाकर उसे शुभकामनाएं दीं।

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, गौरी सीमा पर कई वर्षों से बच्चों और बुजुर्गों की ‘प्रिय साथी’ रही है। उसका बार-बार लोगों के घर आना, बच्चों के साथ खेलना और गांव के माहौल को खुशनुमा बनाना सभी को याद रहता है। इसलिए उसका घायल होना पूरे गांव के लिए एक सदमे जैसा था।


सीमा पर लगातार गोलाबारी में पशुधन भी बन रहे निशाना

इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सीमा पर बढ़ती गोलाबारी का खामियाजा सिर्फ सैनिक या नागरिक ही नहीं, बल्कि पशुधन भी भुगतते हैं। कई बार जानवरों के घायल या मारे जाने की खबरें आती रहती हैं, लेकिन उन्हें वह महत्व नहीं मिलता जिसके वे हकदार हैं। इसीलिए गौरी के पुनर्वास की कहानी उम्मीद और संवेदना की मिसाल बन गई है।


नई जिंदगी की ओर पहला कदम

कृत्रिम पैर लगने के बाद गौरी में फिर से ऊर्जा दिखाई दे रही है। डॉक्टरों का कहना है कि आने वाले हफ्तों में लगातार फिजियोथेरेपी और देखभाल से वह पहले की तरह चलने लगेगी। सेना ने भी आश्वासन दिया है कि गौरी की देखभाल की जिम्मेदारी वे आगे भी निभाते रहेंगे।

गौरी की कहानी साबित करती है कि जीवन का मूल्य सभी के लिए समान है—चाहे मानव हो या पशु। यह पुनर्वास न केवल मेडिकल विज्ञान की उपलब्धि है, बल्कि भारतीय संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों की एक जीवंत मिसाल भी है।

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