
संसद का शीतकालीन सत्र अपने पांचवें दिन में प्रवेश कर चुका है और इस बार सदन की कार्यवाही पर दिल्ली-एनसीआर के गंभीर प्रदूषण का साया साफ नजर आ रहा है। जहां शुरुआती दो दिनों में सत्र पूरी तरह हंगामे की भेंट चढ़ गया था, वहीं तीसरा और चौथा दिन अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा। अब पांचवें दिन विपक्ष ने एक बार फिर दिल्ली के बिगड़ते प्रदूषण को बड़ा मुद्दा बनाते हुए सरकार को घेरा है।
नई दिल्ली में शुक्रवार सुबह से ही संसद परिसर में गहमागहमी का माहौल दिखा। विपक्षी दलों के सांसदों ने प्रदूषण के मुद्दे को लेकर सरकार से जवाब की मांग की और इस विषय पर व्यापक चर्चा की जरूरत पर जोर दिया। उनका कहना है कि दिल्ली और आसपास के इलाकों में रहने वाले करोड़ों लोग जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं, लेकिन सरकार का रवैया अब भी उदासीन है।
🔹 शुरुआती दिन रहे थे हंगामेदार
शीतकालीन सत्र के पहले और दूसरे दिन संसद में भारी हंगामा देखने को मिला था।
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अनेक मुद्दों पर विपक्ष का विरोध
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नारेबाजी और वेल में आकर प्रदर्शन
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कार्यवाही का बार-बार स्थगित होना
इन सबके चलते सदन का कामकाज सुचारू रूप से नहीं चल सका। हालांकि, तीसरे और चौथे दिन स्थिति कुछ हद तक सामान्य रही और दोनों सदनों में शांतिपूर्ण तरीके से कार्यवाही संपन्न हुई।
🔹 पांचवें दिन फिर प्रदूषण पर गरमाई सियासत
अब पांचवें दिन एक बार फिर दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण को लेकर सियासी माहौल गर्म हो गया है। विपक्ष का आरोप है कि—
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सरकार केवल कागजी योजनाएं बना रही है
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जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही
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आम जनता, बुजुर्गों और बच्चों का स्वास्थ्य खतरे में है
विपक्षी नेताओं ने कहा कि राजधानी में हालात इतने खराब हो चुके हैं कि लोगों को मास्क पहनकर घर से बाहर निकलना पड़ रहा है, स्कूलों की छुट्टियां करनी पड़ रही हैं और अस्पतालों में सांस से जुड़ी बीमारियों के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
🔹 सरकार से ठोस जवाब की मांग
विपक्ष ने सरकार से सीधे सवाल किए कि—
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प्रदूषण से निपटने के लिए अब तक क्या-क्या कदम उठाए गए?
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ग्रैप (GRAP) जैसे नियमों का कितना असर दिखा?
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पराली जलाने, ट्रैफिक प्रदूषण और निर्माण कार्यों पर नियंत्रण कैसे होगा?
विपक्ष का आरोप है कि प्रदूषण केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे उत्तर भारत में फैल चुका है। इसके बावजूद सरकार इसे प्राथमिकता नहीं दे रही।
🔹 स्वास्थ्य संकट में बदलता प्रदूषण
सदन में यह मुद्दा केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे जन-स्वास्थ्य संकट के रूप में भी पेश किया गया। सांसदों ने बताया कि—
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अस्थमा और फेफड़ों की बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं
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बच्चों और बुजुर्गों पर सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है
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लंबे समय तक जहरीली हवा में रहने से गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है
इस वजह से विपक्ष का कहना है कि प्रदूषण अब केवल पर्यावरण का मसला नहीं रहा, बल्कि यह सीधे तौर पर जीवन और मृत्यु का सवाल बन चुका है।
🔹 सरकार की ओर से क्या कहा गया?
सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि प्रदूषण एक जटिल समस्या है, जिसका समाधान केवल एक राज्य या एक विभाग नहीं कर सकता। केंद्र सरकार ने दावा किया कि—
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राज्यों के साथ समन्वय स्थापित किया जा रहा है
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उद्योगों पर सख्त नियम लगाए गए हैं
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इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दिया जा रहा है
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कूड़े और पराली जलाने के खिलाफ अभियान चलाए जा रहे हैं
सरकार का कहना है कि प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों तरह की रणनीति पर काम किया जा रहा है।
🔹 पहले से तय एजेंडे पर असर
संसद के शीतकालीन सत्र में इससे पहले कई अहम विधेयकों पर चर्चा होनी थी। लेकिन प्रदूषण का मुद्दा छा जाने के चलते यह आशंका बढ़ गई है कि—
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अन्य विधेयकों पर चर्चा प्रभावित हो सकती है
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विपक्ष लगातार कार्यवाही में बाधा डाल सकता है
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सत्र का समय हंगामे में बर्बाद हो सकता है
पहले ही सत्र के शुरुआती दो दिन लगभग बेकार जा चुके हैं, ऐसे में सरकार और विपक्ष—दोनों के सामने यह चुनौती है कि बाकी दिनों का उपयोग किस तरह किया जाए।
🔹 दिल्ली की जनता की उम्मीदें
संसद में भले ही राजनीतिक तकरार चल रही हो, लेकिन दिल्ली और एनसीआर की जनता की नजरें इस पर टिकी हैं कि—
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क्या इस बार वास्तव में प्रदूषण पर ठोस फैसला होगा?
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क्या केवल बयानबाजी के बजाय जमीनी कार्रवाई होगी?
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क्या आने वाले वर्षों में सर्दियों के मौसम में लोगों को साफ हवा नसीब होगी?
लोग चाहते हैं कि संसद का मंच सिर्फ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का अखाड़ा न बने, बल्कि जनहित के मुद्दों का समाधान निकालने की जगह बने।
🔹 सत्र के आगे का रास्ता
आने वाले दिनों में शीतकालीन सत्र और भी अहम होने वाला है।
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कई महत्वपूर्ण विधेयक चर्चा के लिए आएंगे
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विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को भी उठा सकता है
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सरकार अपनी उपलब्धियां गिनाने की कोशिश करेगी
ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या प्रदूषण का मुद्दा पूरे सत्र पर हावी रहेगा या धीरे-धीरे अन्य राष्ट्रीय मुद्दे भी केंद्र में आएंगे।
✅ निष्कर्ष
संसद के शीतकालीन सत्र का पांचवां दिन यह साफ दिखा रहा है कि दिल्ली-एनसीआर का प्रदूषण अब केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक और जन-स्वास्थ्य मुद्दा बन चुका है। विपक्ष इसे लेकर सरकार पर लगातार दबाव बना रहा है, वहीं सरकार अपने कदमों और नीतियों का बचाव कर रही है।
आने वाले दिनों में तय होगा कि यह मुद्दा केवल बहस तक सीमित रहेगा या इससे कोई मजबूत और ठोस समाधान निकलकर सामने आएगा, जिससे देश की राजधानी को इस जहरीली हवा से राहत मिल सके।