कर्नाटक में सिद्धारमैया बनाम डीके शिवकुमार: ‘जाति राजनीति’ के अपने ही दांव में फंसते राहुल गांधी

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कर्नाटक की राजनीति में इन दिनों सत्ता का घमासान चरम पर है। कांग्रेस पार्टी यहां भारी बहुमत से सरकार में है, लेकिन सबसे बड़ा संकट सरकार के भीतर ही दिख रहा है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार (DKS) के बीच खींचतान अब खुलकर सामने आ चुकी है। और इस पूरे विवाद के केंद्र में खड़े हैं — राहुल गांधी, जिनके ‘जाति आधारित राजनीतिक संतुलन’ के दांव अब उन्हीं पर उल्टा पड़ते नजर आ रहे हैं।

कहां से शुरू हुई लड़ाई?

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच लंबी रस्साकशी चली थी। उस समय समझौता यह हुआ कि—

  • सिद्धारमैया पहले ढाई साल तक मुख्यमंत्री रहेंगे।

  • उसके बाद सत्ता डीके शिवकुमार को सौंप दी जाएगी।

लेकिन अब ढाई साल का समय करीब आते ही सत्ता हस्तांतरण का मुद्दा फिर गरमाने लगा है।

DK शिवकुमार क्यों नाराज हैं?

डीके शिवकुमार का दावा है कि उन्होंने पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई है।

उनका तर्क है—

  • कांग्रेस को बड़ा वोट शेयर वोक्कालिगा समुदाय की वजह से मिला।

  • वह खुद इस समुदाय के सबसे बड़े नेता हैं।

  • इसलिए मुख्यमंत्री पद उनके हिस्से आना चाहिए।

लेकिन इस मांग पर रोक लगा रहे हैं सिद्धारमैया और उनके समर्थक।

सिद्धारमैया का ‘AHINDA कार्ड’

सिद्धारमैया लंबे समय से AHINDA (दलित, अल्पसंख्यक, ओबीसी) को अपना बड़ा वोटबैंक मानते हैं।
उनकी रणनीति हमेशा जाति आधारित कल्याण योजनाओं और सामाजिक समीकरणों पर आधारित रही है।

CM पद पर बने रहना उनके लिए इसलिए जरूरी है क्योंकि:

  • AHINDA समुदाय उन पर भरोसा करता है।

  • कांग्रेस की 2028 की रणनीति भी इसी सामाजिक आधार पर टिकी है।

  • वह खुद को सर्वमान्य नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं।

यही वजह है कि वे सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं हैं।

राहुल गांधी का ‘जाति संतुलन’ उलझा

राहुल गांधी ने कर्नाटक में जाति आधारित सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश की थी।
लेकिन अब वही समीकरण उलझते जा रहे हैं—

  • यदि सिद्धारमैया हटते हैं तो AHINDA समूह नाराज़ होगा।

  • यदि डीके शिवकुमार को नहीं बनाया गया तो वोक्कालिगा समुदाय भड़क सकता है।

  • दोनों ही कांग्रेस के लिए बेहद अहम वोटबैंक हैं।

ऐसे में राहुल गांधी किसी एक पक्ष का साथ नहीं ले पा रहे।

DKS के समर्थकों ने बढ़ाई पार्टी की चिंता

पिछले कुछ महीनों में DKS समर्थकों ने खुलकर बयान दिए:

  • “ढाई साल पूरे होते ही सत्ता बदलनी चाहिए।”

  • “पार्टी ने वादा किया था, उसे निभाना चाहिए।”

कई विधायक डीके शिवकुमार के साथ दिखते हैं, जिससे सिद्धारमैया गुट असहज है।
पार्टी की आंतरिक खींचतान अब सार्वजनिक विवाद का रूप ले चुकी है।

सिद्धारमैया का पलटवार

सिद्धारमैया का कहना है—

  • सरकार स्थिर है, बदलाव की जरूरत नहीं।

  • ढाई साल वाला फॉर्मूला लिखित समझौता नहीं, सिर्फ राजनीतिक बातचीत थी।

  • उनके नेतृत्व में सरकार बेहतर काम कर रही है और कामकाज बाधित नहीं होना चाहिए।

उनका स्पष्ट संकेत है कि वह अभी पद छोड़ने के मूड में नहीं हैं।

कांग्रेस हाईकमान की दुविधा

राहुल गांधी और सोनिया गांधी के सामने तीन बड़ी समस्याएँ खड़ी हैं—

  1. CM बदलने से सरकार में दरार पड़ सकती है।

  2. DKS को नाराज़ करने से दक्षिण भारत में कांग्रेस को बड़ा नुकसान हो सकता है।

  3. सिद्धारमैया को हटाने से केंद्र में राहुल गांधी की छवि कमजोर दिख सकती है।

हाईकमान अभी किसी बड़े निर्णय से बच रहा है, लेकिन समय कम बचा है।

कर्नाटक कांग्रेस में जाति समीकरण क्यों इतने अहम हैं?

कर्नाटक की राजनीति में तीन प्रमुख जातीय समूह प्रभावशाली हैं—

  • वोक्कालिगा — DKS का आधार

  • लिंगायत — भाजपा का आधार

  • AHINDA समूह — सिद्धारमैया का आधार

कांग्रेस ने वोक्कालिगा + AHINDA के संयोजन से भारी जीत हासिल की थी।
अब यही समीकरण टूटने लगा तो 2028 में कांग्रेस मुश्किल में पड़ सकती है।

राहुल गांधी पर दबाव क्यों बढ़ रहा है?

राहुल गांधी पर दो तरफ़ा दबाव है—

  • DKS चाहते हैं कि राहुल जी वादा निभाएं।

  • सिद्धारमैया चाहते हैं कि विकास और सामाजिक आधार के चलते उन्हें पूरा कार्यकाल मिले।

इसके साथ ही विपक्ष लगातार कांग्रेस की आंतरिक कलह को मुद्दा बनाकर हाईकमान को कमजोर बताने में जुटा है।

आगे क्या हो सकता है?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार तीन संभावनाएँ सबसे ज्यादा हैं—

  1. सत्ता का शांतिपूर्वक हस्तांतरण
    — ढाई साल पूरा होते ही DKS को CM बनाया जा सकता है।

  2. सत्ता साझा करने का नया फॉर्मूला
    — सिद्धारमैया को कुछ समय और, फिर DKS को मौका।

  3. स्थिति काबू से बाहर भी जा सकती है
    — दोनों गुट ज्यादा आक्रामक हुए तो कांग्रेस सरकार पर संकट गहरा सकता है।

राजनीतिक रूप से यह संकट जितना कर्नाटक का है, उतना ही राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता का भी परीक्षण है।

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