‘मां की सेवा’ या कांग्रेस से नाराज़गी? शशि थरूर का लगातार दूसरी रणनीतिक बैठक से नदारद रहना बढ़ा सवाल

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कांग्रेस पार्टी इन दिनों अपनी आंतरिक राजनीति, रणनीति और संगठनात्मक ढांचे को लेकर कई महत्वपूर्ण बैठकों का आयोजन कर रही है। इन बैठकों में पार्टी के प्रमुख नेता और रणनीतिकार शामिल होकर आगामी चुनावों और राजनीतिक चुनौतियों पर चर्चा करते हैं। लेकिन लगातार दूसरी बार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तिरुवनंतपुरम के सांसद शशि थरूर का इन बैठकों में शामिल न होना कई तरह के कयासों को जन्म दे रहा है। क्या यह सिर्फ उनकी मां की तबीयत का मामला है, या फिर उनके मन में पार्टी नेतृत्व को लेकर कोई असंतोष पनप रहा है? ये सवाल राजनीतिक हलकों में जोर पकड़ने लगे हैं।

लगातार दूसरी बार गैरहाज़िर—क्या है वजह?

कांग्रेस की हालिया रणनीतिक बैठक में शशि थरूर का नाम फिर से अनुपस्थित नेताओं की सूची में शामिल था। इससे पहले हुई बैठक में भी वे नहीं पहुंचे थे। आधिकारिक रूप से थरूर ने अपनी मां की खराब तबीयत और उनकी देखभाल की ज़रूरत को गैरहाज़िरी की वजह बताया है। यह बात उन्होंने सार्वजनिक रूप से भी स्वीकार की कि मां की सेवा उनके लिए सर्वोपरि है, और ऐसे में उनका राजनीतिक कार्यक्रम पीछे हो सकता है।

हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो वजह सिर्फ इतनी भर नहीं हो सकती। पार्टी में वरिष्ठ नेताओं का दृष्टिकोण है कि इतनी महत्वपूर्ण बैठकों से एक सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री का बार-बार अनुपस्थित रहना कहीं न कहीं असहजता पैदा करता है।

मोदी के कार्यक्रम में दिखी मौजूदगी—शुरू हुई चर्चा

चर्चा तब और तेज हो गई जब इसी अवधि के दौरान शशि थरूर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक कार्यक्रम में नजर आए। विपक्षी दल का एक नेता, जो पार्टी की रणनीति बैठक में शामिल नहीं होता लेकिन प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में शिरकत करता है—यह बात कांग्रेस खेमे में कई सवाल खड़े कर रही है।

कांग्रेस कार्यकर्ताओं और कुछ नेताओं का मानना है कि यदि थरूर सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल हो सकते हैं, तो फिर पार्टी की बैठकों में क्यों नहीं आते? वहीं दूसरी तरफ, थरूर समर्थक कहते हैं कि मां की सेवा की जिम्मेदारी के बावजूद वे उन आयोजनों में शामिल हुए जिनमें उनकी उपस्थिति अनिवार्य थी।

कांग्रेस नेतृत्व से थरूर की ‘दूरी’?

यह बात नई नहीं है कि शशि थरूर का कांग्रेस नेतृत्व से मतभेद कई बार सुर्खियों में रहा है। वे पार्टी लाइन से अलग विचार रखने के लिए जाने जाते हैं। कई मुद्दों पर उनका रुख कांग्रेस के आधिकारिक स्टैंड से मिला-जुला रहता है, लेकिन वे स्पष्टवादिता और खुले विचारों के लिए भी मशहूर हैं।

पिछले एक वर्ष में थरूर कई मौकों पर अपनी असहमति खुलकर व्यक्त कर चुके हैं। चाहे वह पार्टी की चयन प्रक्रिया हो, प्रदेश नेतृत्व से जुड़ा मसला हो या संगठनात्मक सुधारों पर उनके सुझाव—हर बार उनकी राय ने आंतरिक राजनीति में हलचल मचाई है।

केरल कांग्रेस में शक्ति संतुलन की जंग

केरल में कांग्रेस की राजनीति में थरूर एक महत्वपूर्ण लेकिन विवादित चेहरा बनकर उभरे हैं। केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) का एक वर्ग उन्हें मुख्यमंत्री पद का संभावित चेहरा मानता है, जबकि दूसरा समूह उनका कट्टर विरोध करता है। यही वजह है कि कई बार थरूर और राज्य नेतृत्व के बीच अप्रत्यक्ष खींचतान देखी गई है।

हाल ही में जब कांग्रेस ने केरल में संगठन और चुनावी तैयारियों के लिए बैठक बुलाई, उस समय भी थरूर की गैरहाज़िरी ने इस विवाद को फिर से हवा दे दी। कई नेताओं ने यह मुद्दा उठाया कि थरूर को पार्टी की सामूहिक रणनीति में हिस्सा लेना चाहिए।

क्या कांग्रेस हाईकमान नाराज़ है?

सूत्रों का मानना है कि पार्टी हाईकमान इस बात को लेकर चिंतित है कि थरूर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने की ओर बढ़ रहे हैं। राहुल गांधी और केरल कांग्रेस नेतृत्व के साथ उनके संबंध पहले भी सुर्खियों में रहे हैं, और अब बारी-बारी से रणनीतिक बैठकों में अनुपस्थित रहना सवालों को और गहरा कर देता है।

हालांकि पार्टी की आधिकारिक प्रतिक्रिया काफी सावधान रही है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि थरूर एक वरिष्ठ सांसद हैं और यदि वे किसी पारिवारिक कारण से बैठक में नहीं आ सके तो इसमें कोई असमान्यता नहीं है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में ऐसी बातें अक्सर सतह के नीचे अधिक कुछ कहती-सूझती हैं।

थरूर का तर्क: मां पहले, राजनीति बाद में

खुद शशि थरूर बार-बार दोहराते रहे हैं कि उनकी मां उम्रदराज हैं और स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही हैं। ऐसे में उनका प्राथमिक कर्तव्य परिवार के साथ रहना है। उन्होंने कहा कि जो लोग किसी राजनीतिक उद्देश्य से उनकी अनुपस्थिति को मुद्दा बना रहे हैं, उन्हें संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।

लेकिन आलोचकों का कहना है कि यदि यह मामला सिर्फ पारिवारिक होता, तो वे नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम में शामिल होने से भी बच सकते थे।

कांग्रेस के लिए यह संकेत क्या देता है?

पार्टी अनुशासन के लिहाज से देखें तो एक वरिष्ठ सांसद का लगातार रणनीतिक बैठकों से दूर रहना अच्छा संदेश नहीं देता। कांग्रेस वर्तमान समय में पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रही है—आंतरिक मतभेद, चुनावी रणनीति की दिक्कतें, और बीजेपी द्वारा देश में लगातार बढ़ती राजनीतिक पकड़।

ऐसे समय में पार्टी को अपने हर नेता के योगदान की आवश्यकता है। थरूर जैसे प्रभावशाली नेता का पार्टी बैठकों में शामिल न होना संभवतः कांग्रेस की एकता और दिशा पर भी असर डालता है।

आगे क्या?

कांग्रेस नेतृत्व को अब यह फैसला करना होगा कि शशि थरूर की अनुपस्थिति को वे कैसे देखते हैं—एक व्यक्तिगत मजबूरी या एक बड़ा राजनीतिक संकेत। वहीं दूसरी ओर, थरूर को भी स्पष्ट करना होगा कि वे कांग्रेस के साथ कितनी मजबूती से खड़े हैं।

भविष्य में यदि यह दूरी बढ़ती है, तो यह केवल कांग्रेस के लिए ही नहीं बल्कि भारतीय राजनीति के व्यापक परिदृश्य में भी महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है, क्योंकि थरूर आज भी देश के जाने-माने बौद्धिक और प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं।

समग्र रूप से देखा जाए तो शशि थरूर की अनुपस्थिति, उनके कार्यक्रमों का चयन और पार्टी में बन रहे समीकरण—ये तीनों मिलकर कांग्रेस के भीतर एक बड़े विमर्श को जन्म दे चुके हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में यह ‘दूरी’ कम होगी या और बढ़ेगी।

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