‘बालासाहेब को समर्पित सत्ता’ का नारा: शिंदे गुट ने BMC मेयर पद पर ठोका दावा, क्या बीजेपी से बनेगा सत्ता का संतुलन?

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मुंबई महानगरपालिका के चुनाव नतीजों के बाद महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। देश की सबसे अमीर नगर निगम मानी जाने वाली बीएमसी में मेयर पद को लेकर सियासी खींचतान तेज हो गई है। इस बार शिवसेना के शिंदे गुट ने खुलकर यह मांग रख दी है कि मेयर का पद उन्हें मिलना चाहिए, और इसके पीछे उन्होंने एक भावनात्मक और राजनीतिक तर्क भी सामने रखा है—“यह पद बालासाहेब ठाकरे को ट्रिब्यूट के तौर पर होना चाहिए।”

शिंदे गुट का कहना है कि बालासाहेब ठाकरे की जन्मशती के वर्ष में बीएमसी का मेयर पद शिवसेना (शिंदे गुट) के पास होना न सिर्फ राजनीतिक रूप से उचित होगा, बल्कि वैचारिक रूप से भी यही उनकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। इस मांग के सामने आते ही महायुति के भीतर समीकरण बदलते नजर आने लगे हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारतीय जनता पार्टी इस मांग पर सहमत होगी या फिर सत्ता संतुलन की लड़ाई और जटिल होने वाली है।

बीएमसी की राजनीति हमेशा से महाराष्ट्र की सत्ता का रुख तय करने में अहम भूमिका निभाती रही है। दशकों तक शिवसेना का यह गढ़ माना जाता रहा है। बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत का सबसे मजबूत प्रतीक भी यही नगर निगम रहा है। ऐसे में शिंदे गुट की यह रणनीति सिर्फ सत्ता हासिल करने की नहीं, बल्कि असली शिवसेना होने के दावे को मजबूत करने की कोशिश भी मानी जा रही है।

शिंदे गुट के नेताओं का कहना है कि उन्होंने बालासाहेब की विचारधारा को आगे बढ़ाया है और आज भी वही धारा उनकी राजनीति का आधार है। उनके मुताबिक, अगर जन्मशती वर्ष में मेयर पद उनके पास आता है, तो यह बालासाहेब की स्मृति को सम्मान देने जैसा होगा। यह तर्क भावनात्मक जरूर है, लेकिन इसके पीछे एक गहरी राजनीतिक रणनीति भी छिपी हुई है।

दरअसल, उद्धव ठाकरे से अलग होने के बाद शिंदे गुट लगातार यह साबित करने की कोशिश में है कि असली शिवसेना वही हैं। बीएमसी का नियंत्रण इस लड़ाई में निर्णायक हथियार बन सकता है। अगर मेयर पद शिंदे गुट को मिलता है, तो यह संगठनात्मक और प्रतीकात्मक—दोनों स्तरों पर उनकी स्थिति को मजबूत करेगा।

दूसरी ओर, बीजेपी के लिए यह फैसला आसान नहीं है। बीएमसी में बीजेपी खुद भी बड़ी ताकत बनकर उभरी है और वह मेयर पद पर अपनी दावेदारी छोड़ना नहीं चाहती। पार्टी के भीतर यह राय भी है कि नगर निगम जैसे बड़े संस्थान में नेतृत्व का अधिकार उसी दल को मिलना चाहिए, जिसके पास अधिक संख्या बल और बेहतर संगठनात्मक स्थिति हो।

बीजेपी के रणनीतिकार यह भी जानते हैं कि अगर उन्होंने शिंदे गुट की मांग मान ली, तो पार्टी के कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा हो सकता है। वहीं, अगर उन्होंने शिंदे गुट की मांग खारिज की, तो महायुति के भीतर तनाव बढ़ने का खतरा है। ऐसे में बीजेपी के सामने संतुलन साधने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिंदे गुट की यह मांग सिर्फ मेयर पद तक सीमित नहीं है। यह आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों से पहले अपनी ताकत दिखाने की कोशिश भी है। बीएमसी जैसे मंच से सत्ता मिलना शिंदे गुट को महाराष्ट्र की राजनीति में और मजबूत दावेदार के रूप में पेश कर सकता है।

विपक्षी दलों की नजर भी इस पूरे घटनाक्रम पर टिकी हुई है। उद्धव ठाकरे गुट के लिए यह मौका है यह दिखाने का कि बालासाहेब की असली विरासत पर उनका ही अधिकार है। अगर शिंदे गुट को मेयर पद मिलता है, तो उद्धव गुट इसे अपनी वैचारिक हार के रूप में देख सकता है।

कांग्रेस और अन्य दल इस पूरे संघर्ष को महायुति की अंदरूनी कलह के तौर पर पेश कर रहे हैं। उनका कहना है कि सत्ता की लालसा में सहयोगी दल एक-दूसरे से ही टकरा रहे हैं, और इसका असर प्रशासनिक स्थिरता पर भी पड़ सकता है।

मेयर पद का महत्व सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है। बीएमसी का बजट कई राज्यों के बजट से भी बड़ा होता है। यहां से मिलने वाला प्रशासनिक नियंत्रण, ठेके, परियोजनाएं और राजनीतिक प्रभाव किसी भी दल के लिए बेहद कीमती होता है। यही वजह है कि इस पद के लिए रस्साकशी इतनी तेज हो गई है।

शिंदे गुट के समर्थकों का कहना है कि उन्होंने राज्य की सत्ता में बड़ी भूमिका निभाई है, इसलिए नगर निगम में भी उन्हें सम्मानजनक हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। उनका तर्क है कि महायुति अगर एकजुट रहना चाहती है, तो बड़े फैसलों में सहयोगियों की भावनाओं का सम्मान करना जरूरी है।

वहीं बीजेपी के कुछ नेताओं का मानना है कि पार्टी को अपनी दीर्घकालिक रणनीति को देखते हुए फैसला करना चाहिए। वे यह भी देख रहे हैं कि बीएमसी का नेतृत्व किसके हाथ में जाने से भविष्य के चुनावों में पार्टी को ज्यादा फायदा होगा।

बालासाहेब ठाकरे का नाम इस पूरी बहस को और संवेदनशील बना देता है। महाराष्ट्र की राजनीति में उनका प्रभाव आज भी गहरा है। हर गुट उनकी विरासत का दावा करना चाहता है। शिंदे गुट ने इसी भावनात्मक मुद्दे को अपनी मांग का केंद्र बनाया है, ताकि नैतिक दबाव बनाया जा सके।

आने वाले दिनों में महायुति के भीतर कई दौर की बातचीत होने की संभावना है। सूत्रों का कहना है कि सत्ता के अन्य पदों—स्थायी समिति अध्यक्ष, प्रमुख समितियों के चेयरमैन—जैसे पदों के बंटवारे के जरिए संतुलन बनाने की कोशिश की जा सकती है। यानी संभव है कि मेयर पद के बदले किसी और बड़े पद पर समझौता हो जाए।

लेकिन फिलहाल तस्वीर साफ नहीं है। क्या बीजेपी शिंदे गुट की मांग मान लेगी? क्या किसी बीच के रास्ते पर सहमति बनेगी? या फिर यह विवाद महायुति के भीतर नई दरार पैदा करेगा—इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं।

कुल मिलाकर, “बालासाहेब को ट्रिब्यूट” के नाम पर उठी यह मांग सिर्फ भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि एक गहरी राजनीतिक चाल है। बीएमसी का मेयर पद अब सिर्फ नगर निगम का प्रमुख नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति में शक्ति संतुलन का प्रतीक बन चुका है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि यह सत्ता की चाबी किसके हाथ में जाती है और क्या महायुति इस परीक्षा में एकजुट रह पाती है या नहीं।

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