
कोलकाता टेस्ट में टीम इंडिया की करारी हार ने भारतीय क्रिकेट के ढांचे, टीम चयन, बल्लेबाजों की तकनीक और कोचिंग में चल रही तैयारी पर कई गंभीर बहसों को जन्म दे दिया है। पिछले कुछ समय से यह सवाल उठ रहा है कि आखिर नई भारतीय टीम स्पिन गेंदबाज़ी का सामना करने में इतनी कमजोर क्यों दिखाई दे रही है। पहले घरेलू सीरीज में न्यूजीलैंड के स्पिनरों के सामने टीम इंडिया का शीर्ष क्रम ढह गया और अब दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ भी वही कहानी दोहराई गई।
गंभीर की कोचिंग के बाद उम्मीद थी कि भारतीय टीम नई ऊर्जा और नई योजनाओं के साथ मैदान पर उतरेगी, लेकिन लगातार कमजोर प्रदर्शन ने हर किसी को चौंका दिया है। खासकर यह देखना चौंकाने वाला है कि वह टीम, जिसे स्पिन खेलने में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ माना जाता था, आज अपने ही घरेलू मैदानों पर स्पिन के सामने संघर्ष करती दिखाई दे रही है।
स्पिन के खिलाफ संघर्ष—तकनीक में कहाँ हुई गलती?
भारतीय क्रिकेट की खासियत हमेशा से रही है कि उसके बल्लेबाज दुनिया भर में घूमते हुए स्पिन गेंदबाज़ी को आत्मविश्वास के साथ खेलते रहे हैं। चाहे बात सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर या राहुल द्रविड़ की हो—भारतीय बल्लेबाजों पर स्पिन का कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता था।
लेकिन मौजूदा टीम में स्थिति उलटती दिख रही है। खिलाड़ी स्पिन गेंद को पढ़ने में गलती कर रहे हैं, फुटवर्क बेहद कमजोर नजर आ रहा है और गेंदबाज़ की बदलाव वाली गेंदों पर विकेट सस्ते में गिर रहे हैं।
कोलकाता टेस्ट में तो ऐसा लगा कि भारतीय बल्लेबाज विकेट गंवाने की जल्दी में थे। कई खिलाड़ी सामने आती गेंद पर पिच का गलत अनुमान लगाते हुए फंस गए। टर्न होती गेंदों पर फ्रंट फुट शॉट्स का अत्यधिक प्रयोग और बैकफुट शॉट्स की कमी साफ दिखी।
विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक क्रिकेट में T20 के दौर ने खिलाड़ियों की तकनीक पर सबसे अधिक असर डाला है। खिलाड़ी लाइन के बाहर जाकर बड़े शॉट खेलने के आदी हो गए हैं, जिससे टेस्ट क्रिकेट की धैर्यपूर्ण, तकनीक आधारित बल्लेबाजी कमज़ोर हुई है।
न्यूजीलैंड के सामने ढह गई थी बल्लेबाजी
न्यूजीलैंड जैसी टीम, जिसे परंपरागत रूप से तेज गेंदबाजी का देश माना जाता है, उसने भी अपने स्पिनरों की मदद से भारतीय बल्लेबाजों को जकड़कर रखा। घरेलू पिच पर न्यूजीलैंड के गेंदबाज भारतीय बल्लेबाजों को लगातार परेशान करते रहे।
उस सीरीज में भी वही समस्या देखने को मिली थी—
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खराब फुटवर्क
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घूमती गेंद पर गलत शॉट सिलेक्शन
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धैर्य की कमी
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पार्टनरशिप का न बन पाना
इसके बावजूद माना जा रहा था कि अफ्रीका के खिलाफ भारत स्थिति संभाल लेगा, लेकिन कोलकाता टेस्ट ने उल्टा संकेत दिया।
अफ्रीका ने भारतीय कमजोरी को भांप लिया
दक्षिण अफ्रीका की टीम ने यह समझ लिया कि भारतीय बल्लेबाज स्पिन के सामने अब उतने सहज नहीं हैं। इसलिए उन्होंने अपनी प्लानिंग उसी हिसाब से तैयार की।
उनके स्पिनरों ने टर्न, उछाल और रफ्तार—तीनों का मिश्रण किया और भारतीय बल्लेबाजों की तकनीकी कमियों को उभारकर रखा। यह हार केवल एक मैच की धोखे वाली हार नहीं थी, बल्कि यह भारतीय बल्लेबाजी की गहरी कमजोरी को उजागर करने वाली हार थी।
गंभीर की कोचिंग पर उठे सवाल
गौरतलब है कि गौतम गंभीर को भारतीय टीम का कोच बनाए जाने के बाद उनसे बड़ी उम्मीदें थीं। गंभीर का क्रिकेटिंग माइंड तेज माना जाता है और वह अपने दृढ़ फैसलों के लिए जाने जाते हैं।
लेकिन लगातार दो बड़ी टेस्ट हार ने आलोचकों को खुलकर बोलने का मौका दे दिया है। सोशल मीडिया से लेकर क्रिकेट विश्लेषकों तक—हर जगह गंभीर की रणनीति, टीम चयन और बल्लेबाजों की तैयारी पर सवाल उठ रहे हैं।
कुछ आलोचक मानते हैं कि गंभीर ने टीम में जल्दबाजी में बदलाव किए, जबकि कुछ का कहना है कि उन्होंने युवा खिलाड़ियों को पर्याप्त मार्गदर्शन नहीं दिया। वहीं, कई विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि सिर्फ कोच को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं, क्योंकि खिलाड़ी तकनीक और फुटवर्क पर खुद भी मेहनत करने से बच रहे हैं।
युवा खिलाड़ियों की तकनीक में कमी
क्रिकेट विशेषज्ञों के मुताबिक मौजूदा भारतीय युवा खिलाड़ियों में पारंपरिक टेस्ट तकनीक की कमी साफ दिखाई देती है।
विशेषकर तीन कमियां सबसे अधिक उभरकर सामने आईं—
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स्पिन को पढ़ने की क्षमता में कमी
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फुटवर्क का धीमा होना
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रक्षा की जगह आक्रामक शॉट्स का अधिक उपयोग
भारतीय पिचें हमेशा से स्पिन गेंदबाजों के लिए फायदेमंद रही हैं, लेकिन अगर बल्लेबाज तकनीक खो दें, तो घरेलू मैदान भी दुश्मन साबित हो जाता है।
वरिष्ठ खिलाड़ियों का खराब फॉर्म
संयोग से वरिष्ठ खिलाड़ियों ने भी पिछले कुछ मैचों में निराश किया है। टीम को संभालने वाली अनुभवी रीढ़ ढह जाए तो युवा खिलाड़ियों पर दबाव बढ़ जाता है।
वरिष्ठ बल्लेबाजों का लगातार फ्लॉप होना भारतीय टीम के लिए बड़ी चिंता का विषय बन गया है। खासकर यह तब और चौंकाता है जब टीम घरेलू मैदान पर खेल रही हो।
स्पिनरों की रणनीति बनाम भारतीय कमजोरी
प्रत्येक विपक्षी टीम अब यह समझ चुकी है कि भारतीय बल्लेबाज चौथी-पांचवीं स्टंप लाइन पर घूमती गेंदों के खिलाफ संघर्ष करते हैं। इसलिए वे—
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कम उड़ान वाली फ्लैट गेंदें डालते हैं
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ऑफ-स्टंप के बाहर धीमी टर्न से फंसाते हैं
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बीच-बीच में तेज गेंद डालकर चौंकाते हैं
भारतीय बल्लेबाजों की कमजोरी का फायदा उठाते हुए दक्षिण अफ्रीका ने कोलकाता टेस्ट को अपने पक्ष में मोड़ लिया।
आगे क्या करना होगा टीम इंडिया को?
अगर भारत को आगामी टेस्ट मुकाबलों में वापसी करनी है, तो कई स्तर पर बदलाव अनिवार्य होंगे—
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स्पिन के खिलाफ विशेष प्रशिक्षण
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फुटवर्क सुधारने पर जोर
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रक्षा तकनीक को मजबूत करना
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वरिष्ठ खिलाड़ियों की भूमिका स्पष्ट करना
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युवा खिलाड़ियों को लंबा अवसर देना
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पिच रीडिंग पर विशेष प्रशिक्षण देना
गंभीर को यह समझना होगा कि टीम को केवल आक्रामक मानसिकता नहीं, बल्कि टेस्ट क्रिकेट की बुनियादी तकनीक भी सिखानी होगी।
निष्कर्ष
नई टीम इंडिया की समस्या सिर्फ एक हार या दो हार नहीं है—समस्या तकनीकी स्तर की है। स्पिन गेंदबाज़ी के सामने बल्लेबाजों का ढहना चिंता का विषय है। अब समय आ गया है कि भारतीय टीम टेस्ट क्रिकेट की जड़ों की ओर लौटे और अपनी खोई हुई तकनीक पर फिर से काम करे।
गंभीर की कोचिंग को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब भारतीय टीम तभी दे पाएगी, जब वह मैदान पर परिणामों से खुद को साबित करे।