
कानून का काम अपराधियों पर शिकंजा कसना होता है, लेकिन जब वही कानून किसी वांटेड अपराधी को सुरक्षा कवच दे दे, तो व्यवस्था पर भरोसा डगमगाने लगता है। कानपुर से सामने आया ताजा मामला इसी कड़वी सच्चाई को उजागर करता है। यहां एक वांछित अपराधी अकील अहमद को कानपुर पुलिस ने सरकारी गनर मुहैया करा रखा था, और वह उसी सुरक्षा के साथ सोशल मीडिया पर रील बनाकर अपना “भौकाल” दिखा रहा था। इस खुलासे ने पुलिस प्रशासन, राजनीतिक संरक्षण और सिस्टम की अंदरूनी कमजोरियों—तीनों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
अकील अहमद का नाम कोई नया नहीं है। उसके खिलाफ पहले से कई गंभीर आपराधिक मामले दर्ज बताए जा रहे हैं। इसके बावजूद उसे सरकारी सुरक्षा मिलना अपने आप में चौंकाने वाला तथ्य है। सवाल यह नहीं है कि उसे सुरक्षा क्यों मिली, बल्कि यह है कि किस आधार पर और किसके आदेश से एक वांछित अपराधी को सरकारी गनर दिया गया।
मामला तब सामने आया, जब सोशल मीडिया पर अकील अहमद की कुछ रील्स वायरल होने लगीं। इन वीडियो में वह खुलेआम हथियारबंद सरकारी गनर के साथ घूमता नजर आ रहा था, महंगी गाड़ियों में बैठकर रौब दिखा रहा था और खुद को ताकतवर साबित करने की कोशिश कर रहा था। इन वीडियो ने आम लोगों के मन में एक ही सवाल पैदा किया—अगर यह व्यक्ति वांटेड है, तो इसके साथ पुलिस की सुरक्षा क्यों है?
जैसे ही मामला मीडिया में उछला, कानपुर पुलिस प्रशासन हरकत में आया। शुरुआती जांच में यह सामने आया कि अकील अहमद को कथित तौर पर किसी खतरे की आशंका के चलते सुरक्षा दी गई थी। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि जिस व्यक्ति को खतरा बताया जा रहा था, वही व्यक्ति खुद कई मामलों में आरोपी था और पुलिस की वांछित सूची में शामिल बताया जा रहा था।
पुलिस सूत्रों के मुताबिक, सुरक्षा देने की प्रक्रिया में कई स्तरों पर गंभीर लापरवाही हुई। नियम के मुताबिक, किसी भी व्यक्ति को सरकारी गनर तभी दिया जाता है, जब उसकी जान को वास्तविक और प्रमाणित खतरा हो, और उसकी पृष्ठभूमि पूरी तरह साफ हो। लेकिन इस मामले में आपराधिक रिकॉर्ड होने के बावजूद सुरक्षा स्वीकृत कर दी गई।
इस खुलासे के बाद पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया। वरिष्ठ अधिकारियों ने तत्काल इस मामले की जांच के आदेश दिए और अकील अहमद से सुरक्षा वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की गई। साथ ही, यह भी तय किया गया कि जिन अधिकारियों ने यह सुरक्षा मंजूर की थी, उनकी भूमिका की जांच की जाएगी।
राजनीतिक गलियारों में भी यह मामला चर्चा का विषय बन गया। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि यह पूरा मामला राजनीतिक संरक्षण और सिफारिश का नतीजा है। उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश में कई बार प्रभावशाली लोगों के दबाव में अपराधियों को सुरक्षा मिल जाती है, जिससे वे कानून से ऊपर होने का अहसास करने लगते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अकील अहमद लंबे समय से इलाके में डर का माहौल बनाए हुए था। उसकी रील्स देखकर लोग हैरान थे कि एक वांछित अपराधी इतनी खुलेआम सरकारी सुरक्षा के साथ घूम रहा है। कई लोगों ने यह भी कहा कि इससे अपराधियों का मनोबल बढ़ता है और आम जनता का पुलिस पर से भरोसा उठता है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि यह मामला सिर्फ प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि संभावित आपराधिक लापरवाही का भी मामला बन सकता है। अगर कोई अधिकारी जानबूझकर किसी अपराधी को सुरक्षा देता है, तो यह सत्ता के दुरुपयोग की श्रेणी में आ सकता है।
यह पहली बार नहीं है, जब किसी संदिग्ध व्यक्ति को सरकारी सुरक्षा देने का मामला सामने आया हो। पहले भी देश के कई हिस्सों में ऐसे उदाहरण मिल चुके हैं, जहां बाद में पता चला कि सुरक्षा पाने वाला व्यक्ति अपराध की दुनिया से जुड़ा हुआ था। लेकिन हर बार सवाल यही उठता है कि जांच और सत्यापन की प्रक्रिया इतनी कमजोर क्यों होती है?
इस मामले ने सोशल मीडिया की भूमिका को भी उजागर किया है। अगर अकील अहमद खुद रील बनाकर अपनी सुरक्षा का प्रदर्शन न करता, तो शायद यह मामला सामने ही न आता। यानी सिस्टम की खामी को उजागर करने में डिजिटल प्लेटफॉर्म एक बार फिर निर्णायक साबित हुए।
पुलिस प्रशासन अब यह दावा कर रहा है कि पूरे सुरक्षा आवंटन सिस्टम की समीक्षा की जाएगी। जिन लोगों को सरकारी गनर दिया गया है, उनकी सूची दोबारा जांची जाएगी और जिन मामलों में नियमों का उल्लंघन हुआ है, वहां सुरक्षा हटाई जाएगी।
लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ सुरक्षा हटाना काफी होगा? या फिर उन अधिकारियों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई होगी, जिन्होंने एक वांछित अपराधी को यह विशेष सुविधा दिलाई?
समाजशास्त्रियों का कहना है कि जब अपराधी खुद को सिस्टम से सुरक्षित महसूस करने लगते हैं, तो अपराध पर लगाम लगाना बेहद मुश्किल हो जाता है। सरकारी गनर सिर्फ सुरक्षा नहीं, बल्कि ताकत और वैधता का प्रतीक बन जाता है, जिसका गलत इस्तेमाल बेहद खतरनाक हो सकता है।
इस पूरे प्रकरण ने यह भी दिखा दिया है कि कानून व्यवस्था सिर्फ थानों और अदालतों से नहीं चलती, बल्कि आंतरिक ईमानदारी से चलती है। अगर सुरक्षा जैसे संवेदनशील अधिकार का गलत इस्तेमाल होगा, तो अपराधियों और आम नागरिकों के बीच फर्क मिटने लगेगा।
कानपुर पुलिस के लिए यह मामला प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। एक तरफ उन्हें जनता का भरोसा बहाल करना है, तो दूसरी तरफ अपने ही तंत्र की खामियों को सुधारना है। अगर इस मामले में सिर्फ दिखावटी कार्रवाई हुई, तो आने वाले समय में ऐसे मामले दोहराए जाते रहेंगे।
कुल मिलाकर, वांटेड अपराधी अकील अहमद को सरकारी गनर मिलना सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह कहानी है उस सिस्टम की, जहां सिफारिश, लापरवाही और प्रभाव के चलते कानून का संतुलन बिगड़ सकता है। अब देखना यह है कि क्या इस मामले में सिर्फ शोर मचकर मामला ठंडा हो जाएगा, या फिर सच में ऐसी व्यवस्था बनाई जाएगी, जहां अपराधी को नहीं, बल्कि कानून को सबसे पहले सुरक्षा मिले।