
राजस्थान के धौलपुर जिले में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने ग्रामीण इलाकों की बुनियादी सुविधाओं की जमीनी हकीकत को बेनकाब कर दिया है। निधेरा कलां ग्राम पंचायत के बच्चों को हर रोज़ अपनी जान जोखिम में डालकर स्कूल जाना पड़ता है, क्योंकि पार्वती नदी पर न तो पुल है और न ही सुरक्षित रास्ता। हालात इतने बदतर हैं कि कुछ महीने पहले चार छात्राओं की डूबकर मौत हो चुकी है, लेकिन फिर भी प्रशासन और सरकार अब तक मौन है। इस क्षेत्र के लोगों का कहना है कि उन्होंने कई बार पुलिया निर्माण की मांग उठाई, लेकिन इसके बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
✔️ नदी पार करना बच्चों के लिए दैनिक संघर्ष
निधेरा कलां समेत आसपास के गांवों के बच्चों को स्कूल जाने के लिए पार्वती नदी पार करनी पड़ती है। बरसात हो, ठंड हो या तेज़ गर्मी—किसी भी मौसम में यह नदी उनके रास्ते का सबसे बड़ा खतरा बन जाती है। कई जगह पानी घुटनों तक, कमर तक या उससे भी ज्यादा रहता है, जिससे छोटे बच्चों को पार करना बेहद मुश्किल हो जाता है। लड़कियों और छोटे बच्चों को कई बार किश्ती या ट्रैक्टर-ट्रॉली का सहारा लेना पड़ता है, लेकिन हर बार यह विकल्प उपलब्ध नहीं होता।
ग्रामीण बताते हैं कि यह नदी पार करना सिर्फ जोखिम नहीं, बल्कि एक भयावह अनुभव होता है। तेज धार और फिसलन भरी मिट्टी बच्चों के पैरों को बार-बार खींचती है। कुछ बच्चों को तो अपने बैग सिर पर रखकर नदी को पार करना पड़ता है, ताकि उनकी किताबें भीग न जाएं। पैर फिसलने, पानी में बह जाने या गहरे गड्ढों में फंसने की संभावना हर कदम के साथ रहती है।
✔️ चार छात्राओं की मौत ने हिला दिया था गांव
गांववालों ने बताया कि कुछ समय पहले, नदी को पार करते समय एक बड़ी दुर्घटना हुई थी जिसमें चार छात्राओं की मौत हो गई थी। यह घटना न सिर्फ उनके परिवारों, बल्कि पूरे इलाके के बच्चों को सदमे में डाल गई। स्थानीय लोगों ने कहा कि यदि तब भी प्रशासन ने सबक लेकर पुल का निर्माण शुरू कर दिया होता, तो आज हालात कुछ और होते।
लेकिन दुखद बात यह है कि चार मासूमों की मौत के बावजूद स्थानीय प्रशासन ने अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया। परिजनों ने बताया कि उस हादसे के बाद कई नेताओं और अधिकारियों ने क्षेत्र का दौरा किया था, आश्वासन दिए गए थे कि जल्द ही पुलिया बनाई जाएगी, लेकिन समय बीतता गया और समस्या जस की तस बनी हुई है।
✔️ अनिकट बना है मौत का जाल
पार्वती नदी पर एक अनिकट (छोटी बाँध जैसी संरचना) बना हुआ है, जिस पर लोग पैदल गुजरते हैं। बारिश के मौसम में यह अनिकट पूरी तरह पानी में डूब जाता है, जिससे उस पर से गुजरना और भी खतरनाक हो जाता है। तेज बहाव के कारण कई बार अनिकट टूटने की स्थिति भी बन जाती है। ग्रामीणों ने बताया कि यह अनिकट कभी भी स्थायी समाधान नहीं रहा, बल्कि यह मौत को दावत देने वाली जगह बन चुका है।
स्कूल जाने वाले बच्चों के साथ-साथ खेतों में काम करने वाले किसान, महिलाओं और बुजुर्गों को भी इसी अनिकट पर निर्भर रहना पड़ता है। कई बार बच्चों को बड़ों को पकड़कर पार कराना पड़ता है, लेकिन तेज़ बहाव के दौरान यह भी कारगर नहीं होता।
✔️ सरकारी योजनाएं सिर्फ कागजों में?
ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों से चल रही पुल निर्माण की मांग को अब तक गंभीरता से नहीं लिया गया है। पंचायत स्तर से लेकर जिला स्तर तक कई बार ज्ञापन दिए गए, नारे लगाए गए, धरने हुए, लेकिन हर बार अधिकारियों ने जांच और सर्वे की बात कह कर मामला टाल दिया।
राजस्थान में ग्रामीण सड़क और पुल निर्माण की कई योजनाएं चल रही हैं, लेकिन इस क्षेत्र को प्राथमिकता सूची में आज तक जगह नहीं मिली। ग्रामीण कहते हैं कि चुनाव से पहले नेता आते हैं, वादे करते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही समस्याओं पर पर्दा डाल दिया जाता है।
✔️ बच्चों की पढ़ाई पर गहरा असर
बच्चों की शिक्षा इस परिस्थिति से बुरी तरह प्रभावित हो रही है। कई बच्चे डर की वजह से स्कूल जाना बंद कर चुके हैं, खासकर लड़कियां। बरसात के मौसम में तो लगभग पूरा विद्यालय खाली हो जाता है, क्योंकि नदी में पानी बढ़ने से जाना असंभव हो जाता है।
कई अभिभावकों ने बताया कि वे अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं, लेकिन उन्हें रोज़ जोखिम में डालना उनके लिए बहुत कठिन फैसला होता है। कई परिवारों ने स्कूल बदलवाने या दूसरी जगह शिफ्ट होने की भी सोच रखी है, लेकिन आर्थिक स्थिति इसकी इजाज़त नहीं देती।
✔️ ग्रामीणों का गुस्सा और बेबसी
गांव के लोगों का कहना है कि वे सरकार की अनदेखी से बेहद नाराज़ हैं। उन्हें लगता है कि ग्रामीणों की समस्याओं को लेकर प्रशासन में संवेदनशीलता की कमी है। लोगों का कहना है कि जब तक कोई बड़ा नुकसान नहीं होता, तब तक अधिकारी सक्रिय नहीं होते। चार बच्चियों की जान जाना किसी भी प्रशासन के लिए चेतावनी होनी चाहिए थी, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ।
ग्रामीणों ने कहा कि यदि जल्द ही पुल का निर्माण नहीं शुरू किया गया, तो वे बड़े पैमाने पर आंदोलन करेंगे। यह उनकी मजबूरी है, क्योंकि सिर्फ उनकी आवाज़ से प्रशासन नहीं जागता।
✔️ राजनीतिक बयानबाज़ी और असली कार्रवाई का अभाव
स्थानीय नेताओं ने घटना के बाद कई बयान दिए—किसी ने इसे प्रशासन की विफलता कहा, किसी ने सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाया, जबकि कुछ ने विपक्ष पर राजनीति करने का आरोप लगाया। लेकिन इन राजनीतिक खींचतान के बीच सबसे ज्यादा नुकसान किसका हो रहा है?—बच्चों का।
लोगों का कहना है कि नेताओं के दौरे और कैमरों के सामने बयान देने से समस्या का समाधान नहीं होने वाला। उन्हें सिर्फ तस्वीरें खिंचवाने नहीं, बल्कि जमीन पर काम करने की ज़रूरत है।
✔️ क्या अब होगा पुल का निर्माण?
इस सवाल का जवाब अस्पष्ट है। प्रशासन का कहना है कि पुल निर्माण प्रस्ताव भेजा गया है और प्रक्रिया में है, लेकिन ग्रामीण इसे मात्र एक और बहाना मानते हैं। उनका कहना है कि प्रस्ताव तो वर्षों से भेजा जा रहा है, लेकिन मंजूरी कोई नहीं देता।
ग्रामीणों की अपेक्षा है कि सरकार बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए इस निर्माण को तुरंत प्राथमिकता सूची में डाले। यह सिर्फ एक पुलिया नहीं है, बल्कि पूरे इलाके की शिक्षा, सुरक्षा और विकास का रास्ता है।