‘न आदिवासी हटेंगे, न जंगल घटेगा’, ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर LG डीके जोशी का जवाब, बोले- देश की रणनीतिक जरूरत है यह परियोजना

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ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना को लेकर चल रही बहस के बीच अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के उपराज्यपाल एडमिरल (सेवानिवृत्त) डी.के. जोशी ने परियोजना का जोरदार बचाव किया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस परियोजना के कारण न तो किसी आदिवासी समुदाय को विस्थापित किया जाएगा और न ही पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की अनुमति दी जाएगी। उनके अनुसार ग्रेट निकोबार परियोजना केवल एक विकास योजना नहीं बल्कि भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक, आर्थिक और समुद्री सुरक्षा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण पहल है।

हाल के दिनों में इस परियोजना को लेकर राजनीतिक और पर्यावरणीय बहस तेज हुई है। कई पर्यावरणविदों, सामाजिक संगठनों और विपक्षी नेताओं ने परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों तथा आदिवासी समुदायों पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता व्यक्त की है। कुछ आलोचकों का दावा है कि परियोजना के कारण बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई हो सकती है और द्वीप की पारिस्थितिकी प्रभावित हो सकती है।

इन आलोचनाओं का जवाब देते हुए डीके जोशी ने कहा कि परियोजना की योजना तैयार करते समय आदिवासी समुदायों के अधिकारों और पर्यावरणीय संतुलन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। उन्होंने कहा कि सरकार की नीति पूरी तरह स्पष्ट है कि किसी भी जनजातीय समुदाय का जबरन विस्थापन नहीं होगा और परियोजना का क्रियान्वयन निर्धारित सुरक्षा और संरक्षण मानकों के अनुरूप किया जाएगा।

ग्रेट निकोबार परियोजना को भारत की सबसे महत्वाकांक्षी द्वीप विकास योजनाओं में से एक माना जाता है। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एक ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, ऊर्जा अवसंरचना और आधुनिक शहरी सुविधाओं का विकास प्रस्तावित है। परियोजना का उद्देश्य भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में अधिक मजबूत रणनीतिक उपस्थिति प्रदान करना और वैश्विक समुद्री व्यापार मार्गों से बेहतर तरीके से जोड़ना है।

विशेषज्ञों के अनुसार ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति इसे अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है। यह द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है। भारत लंबे समय से इस क्षेत्र में अपनी सामरिक क्षमता और समुद्री अवसंरचना को मजबूत करने की दिशा में प्रयास कर रहा है। इसी संदर्भ में इस परियोजना को राष्ट्रीय महत्व का माना जा रहा है।

उपराज्यपाल ने यह भी कहा कि परियोजना को केवल आर्थिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार यह भारत की समुद्री सुरक्षा, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और पूर्वी एशिया के साथ संपर्क को मजबूत करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। उनका मानना है कि भविष्य में यह परियोजना देश की लॉजिस्टिक्स क्षमता और क्षेत्रीय प्रभाव को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

हालांकि परियोजना को लेकर चिंताएं भी बनी हुई हैं। कई पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रेट निकोबार जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। यहां दुर्लभ वनस्पतियां, समुद्री जीव, प्रवाल भित्तियां और विशेष जनजातीय समुदाय निवास करते हैं। आलोचकों का तर्क है कि बड़े पैमाने पर अवसंरचना निर्माण से इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव पड़ सकता है।

इसके जवाब में परियोजना समर्थकों का कहना है कि पर्यावरणीय मंजूरियां विस्तृत अध्ययन और मूल्यांकन के बाद दी गई हैं तथा विभिन्न संरक्षण उपायों को परियोजना का हिस्सा बनाया गया है। सरकारी पक्ष का दावा है कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाते हुए परियोजना को आगे बढ़ाया जाएगा।

ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर देश में दो अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं। एक पक्ष इसे भारत के भविष्य के लिए रणनीतिक रूप से अनिवार्य मानता है, जबकि दूसरा पक्ष पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों को लेकर सतर्कता बरतने की मांग कर रहा है। इसी बहस के बीच डीके जोशी ने स्पष्ट संदेश दिया है कि सरकार विकास और संरक्षण दोनों लक्ष्यों को साथ लेकर चलना चाहती है।

फिलहाल यह परियोजना राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी हुई है। आने वाले वर्षों में इसका क्रियान्वयन किस प्रकार आगे बढ़ता है और पर्यावरणीय तथा सामाजिक चिंताओं को किस हद तक संबोधित किया जाता है, इस पर देश और दुनिया की नजर बनी रहेगी।

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