
उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव भले अभी कुछ समय दूर हों, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। सत्तारूढ़ भाजपा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य लेकर मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए संगठन को मजबूत करने में जुटी है, जबकि उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) राज्य के क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर अपनी राजनीतिक जमीन वापस हासिल करने की कोशिश कर रहा है।
भाजपा ने साफ संकेत दिए हैं कि 2027 का चुनाव मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। पार्टी नेतृत्व सार्वजनिक रूप से धामी सरकार के विकास कार्यों, समान नागरिक संहिता (UCC), नकल विरोधी कानून, आधारभूत ढांचे के विस्तार और निवेश परियोजनाओं को अपनी प्रमुख उपलब्धियों के रूप में पेश कर रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा की रणनीति विकास, राष्ट्रवाद और स्थिर नेतृत्व के मुद्दों पर आधारित होगी। इसी दिशा में चुनाव से पहले धामी मंत्रिमंडल का विस्तार भी किया गया, जिसे क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश माना जा रहा है। हरिद्वार, कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों में संगठनात्मक मजबूती बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
हालांकि भाजपा के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। बेरोजगारी, पलायन, पर्वतीय क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी, आपदा प्रबंधन और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे विपक्ष लगातार उठाता रहा है। हाल के महीनों में पार्टी के भीतर असंतुष्ट नेताओं को साधने की कोशिशें भी देखने को मिली हैं, जिसे चुनावी तैयारी का हिस्सा माना जा रहा है।
कांग्रेस की बात करें तो पार्टी संगठनात्मक पुनर्गठन के जरिए खुद को मजबूत करने में लगी है। प्रदेश नेतृत्व का मानना है कि भाजपा विरोधी मतों को एकजुट कर वह मुकाबले को रोचक बना सकती है। कांग्रेस बेरोजगारी, महंगाई, भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवादों और स्थानीय आर्थिक मुद्दों को प्रमुख चुनावी हथियार बनाने की तैयारी कर रही है।
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत अब भी कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते हैं, जबकि प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती आंतरिक एकजुटता और मजबूत नेतृत्व प्रस्तुत करना होगी।
उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) भी इस चुनाव में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की तैयारी कर रहा है। राज्य गठन आंदोलन से निकली यह पार्टी लंबे समय से हाशिए पर रही है, लेकिन स्थानीय पहचान, मूल निवास, भू-कानून और पलायन जैसे मुद्दों पर उसकी पकड़ अब भी बनी हुई है। यदि UKD कुछ क्षेत्रों में प्रभावी प्रदर्शन करती है, तो वह भाजपा और कांग्रेस दोनों के समीकरण प्रभावित कर सकती है।
राज्य की राजनीति में एक दिलचस्प पहलू चुनाव की संभावित टाइमिंग भी है। हरिद्वार में 2027 के कुंभ आयोजन और चुनावी कार्यक्रम के संभावित टकराव को देखते हुए राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि विधानसभा चुनाव निर्धारित समय से पहले भी कराए जा सकते हैं। हालांकि इस पर अभी कोई आधिकारिक निर्णय नहीं हुआ है।
70 सदस्यीय उत्तराखंड विधानसभा में बहुमत के लिए 36 सीटों की आवश्यकता होती है। 2022 के चुनाव में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया था, लेकिन 2027 में मुकाबला पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है क्योंकि विपक्ष अब तैयारी के लिए अधिक समय और संगठित रणनीति के साथ मैदान में उतर रहा है।
फिलहाल तस्वीर यह संकेत देती है कि भाजपा मुख्यमंत्री धामी के चेहरे और विकास एजेंडे के सहारे ‘मिशन रिपीट’ पर काम कर रही है, जबकि कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल बनाने की कोशिश में है। वहीं UKD क्षेत्रीय अस्मिता और स्थानीय मुद्दों के सहारे अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बढ़ाने का प्रयास कर रही है। अगले कुछ महीनों में होने वाली राजनीतिक गतिविधियां, संगठनात्मक बदलाव और जनसंपर्क अभियान ही तय करेंगे कि देवभूमि की चुनावी बिसात पर बढ़त किसे मिलती है।