Alzheimer’s Disease Alert: अल्जाइमर सिर्फ भूलने की बीमारी नहीं है। यह धीरे-धीरे इंसान की याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता, निर्णय लेने की शक्ति, भाषा, व्यवहार और यहां तक कि अपने करीबी लोगों को पहचानने की क्षमता तक को प्रभावित कर सकती है। इसके बढ़ते मामलों को लेकर दो चौंकाने वाली बाते सामने आई हैं, जिसे आपके लिए भी जानना जरूरी है।

अल्जाइमर का नाम सुनते ही आपके मन में पहला ख्याल क्या आता है? भूलने या फिर ऐसी बीमारी जिसमें अक्सर भ्रम बना रहता है और व्यक्ति का व्यवहार काफी बदल जाता है।
अल्जाइमर ऐसी समस्या है जिसमें व्यक्ति अपने ही परिवार के लोगों को सही से नहीं पहचान पाता, यादें धुंधली पड़ जाती हैं और रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातें भी याद नहीं रहतीं। शोध बताते हैं कि यह बीमारी हमारी सोच से कहीं ज्यादा जटिल है और इसके पीछे कई ऐसे कारण हो सकते हैं जिन पर पहले कम ध्यान दिया गया।
हाल ही में सामने आए अध्ययनों में अल्जाइमर को लेकर दो बड़े खुलासे हुए हैं। इसमें ब्लड प्रेशर और लिवर का अल्जाइमर से ऐसा कनेक्शन सामने आया है जिसने नई बहस छेड़ दी है। नए शोध उम्मीद भी जगा रहे हैं और चेतावनी भी दे रहे हैं कि दिमाग की सेहत सिर्फ उम्र पर निर्भर नहीं करती, बल्कि शरीर के कई दूसरे अंग और आदतें भी इसमें अहम भूमिका निभाती हैं।

अल्जाइमर रोग को लेकर बड़े खुलासे
अल्जाइमर को लेकर दो बड़े खुलासे इन दिनों काफी चर्चा में हैं।
- अध्ययन से संकेत मिलता है कि लंबे समय तक लो ब्लड प्रेशर रहने से दिमाग को पर्याप्त रक्त, ऑक्सीजन और पोषण नहीं मिल पाता, जिससे भविष्य में अल्जाइमर का खतरा बढ़ सकता है। यानी सिर्फ हाई ब्लड प्रेशर ही नहीं, बल्कि लगातार लो बीपी भी दिमाग के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
- दूसरा खुलासा इससे भी ज्यादा हैरान करने वाला है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अल्जाइमर से लड़ाई सिर्फ दिमाग में नहीं, बल्कि लिवर के जरिए भी लड़ी जा सकती है। शोध में पाया गया कि लिवर खून से एक हानिकारक चिपचिपे प्रोटीन को साफ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही प्रोटीन अगर शरीर में जमा होने लगे तो धीरे-धीरे दिमाग की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है और याददाश्त कमजोर होने लगती है। भविष्य में ऐसी थेरेपी विकसित होने की उम्मीद है जो लिवर की इस क्षमता को बढ़ाकर दिमाग की इस बीमारी के खतरे को कम कर सके।

लो ब्लड प्रेशर की स्थिति बढ़ा देती है खतरा
हाई ब्लड प्रेशर को ब्रेन हेल्थ के लिए काफी खतरनाक माना जाता रहा है। हालांकि अब अध्ययन में पाया गया है कि जिन लोगों का ब्लड प्रेशर लंबे समय तक सामान्य से काफी कम रहता है, उनमें अल्जाइमर होने की आशंका दूसरों की तुलना में कई गुना अधिक हो सकती है।
लो ब्लड प्रेशर का मतलब है कि शरीर में खून का दबाव इतना कम हो जाए कि अंगों तक पर्याप्त मात्रा में रक्त न पहुंच पाए। सामान्य तौर पर 90/60 mmHg से कम रीडिंग को लो बीपी माना जाता है।
अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के ‘ब्रेन हेल्थ अक्रॉस द लाइफस्पैन’ पर 2026 विषय के शोधकर्ता एलिजाबेथ मार्श कहते हैं, हमें लंबे समय से पता है कि हाई ब्लड प्रेशर का दिमाग पर लंबे समय तक बुरा असर पड़ सकता है। हालांकि यह स्टडी दिखाती है कि ब्लड प्रेशर तब भी समस्या बन सकता है जब यह लंबे समय तक बहुत कम रहता है।
अध्ययन में क्या पता चला?
जर्नल ऑफ अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन’ में प्रकाशित इस अध्ययन में विशेषज्ञों का मानना है कि मस्तिष्क में रक्त का प्रवाह बाधित होना इस का कारण हो सकता है। चूंकि रक्त का संचार कम होने से मस्तिष्क के ऊतकों तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व कम पहुंचते हैं।
- इससे ऐसी स्थितियां बन सकती हैं जो अमाइलॉइड बीटा और टाऊ प्रोटीन के जमाव को बढ़ावा देती हैं। ये प्रोटीन अल्जाइमर रोग को बढ़ावा देने वाले माने जाते हैं।
- अध्ययन की मुख्य लेखिका ऐली टॉयली कहती हैं, ये नतीजे ‘अल्जाइमर की बीमारी को रोकने के लिए बेहतर कार्डियोवैस्कुलर हेल्थ (दिल और रक्त वाहिकाओं की सेहत) के महत्व’ को उजागर करते हैं।
- हाई ब्लड प्रेशर की तुलना में लो ब्लड प्रेशर पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है, जिसके कारण शायद इस पर कम डेटा उपलब्ध है और कम रिसर्च हो रही है।

अल्जाइमर से बचाने में लिवर की बड़ी भूमिका
एक दूसरे अध्ययन में अल्जाइमर को लेकर और भी चौंकाने वाली बात सामने आई है।
अब तक माना जाता था कि अल्जाइमर की बीमारी सिर्फ दिमाग से संबंधित है, लेकिन अब वैज्ञानिकों ने बताया कि इस बीमारी का इलाज लिवर के जरिए भी किया जा सकता है।
जर्नल न्यूरॉन में प्रकाशित रिपोर्ट में सामने आया है कि अल्जाइमर में दिमाग के अंदर एमिलॉयड नाम का एक चिपचिपा प्रोटीन जमा होने लगता है। इसे ऐसे समझिए जैसे किसी पाइप में धीरे-धीरे गंदगी जमती जाए और उसका रास्ता बंद होने लगे। इसी तरह यह प्रोटीन दिमाग की कोशिकाओं के बीच जमा होकर उनके आपसी संदेशों को बाधित करता है और याददाश्त व सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित होने लगती है।
शोध में पाया गया कि दिमाग में बनने वाले इस हानिकारक प्रोटीन का बड़ा हिस्सा खून के जरिए शरीर में पहुंचता है, जहां लिवर उसे साफ करने का काम करता है। अगर लिवर इस सफाई का काम बेहतर तरीके से करे, तो दिमाग में इसकी मात्रा भी कम हो सकती है।
शोध में क्या पता चला?
वैज्ञानिकों ने चूहों पर किए गए प्रयोगों में देखा कि लिवर की इस क्षमता को बढ़ाने से दिमाग में हानिकारक प्रोटीन कम जमा हुआ और उनकी याददाश्त में भी सुधार देखने को मिला।
- शोध में APOE4 नाम के एक जीन का भी जिक्र है। आसान भाषा में कहें तो यह एक ऐसा आनुवंशिक बदलाव है जो कुछ लोगों में शरीर की सफाई प्रणाली को सही से नहीं होने देता। ऐसे लोगों में एमिलॉयड ठीक से साफ नहीं हो पाता और अल्जाइमर का खतरा बढ़ जाता है।
- अब वैज्ञानिक ऐसी जीन थेरेपी विकसित करने पर काम कर रहे हैं जो लिवर को और बेहतर तरीके से इस हानिकारक प्रोटीन साफ करने में मदद करे।
- अगर भविष्य में यह तकनीक सफल होती है, तो अल्जाइमर की रोकथाम और इलाज का तरीका पूरी तरह बदल सकता है।
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