ऑपरेशन शेरुवाली में लश्कर कमांडर मूसा ढेर, 2022 से घाटी में सक्रिय चार आतंकियों का सफाया

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बडगाम में देर रात हुई मुठभेड़

जम्मू-कश्मीर के बडगाम जिले में मंगलवार देर रात सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच मुठभेड़ हुई। यह कार्रवाई मध्य कश्मीर के यूसमर्ग के पास कोराग और आसपास के जंगल क्षेत्र में की गई। सुरक्षाबलों को इलाके में आतंकियों की मौजूदगी से संबंधित विशेष खुफिया जानकारी मिली थी। इसके बाद भारतीय सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी CRPF ने संयुक्त तलाशी अभियान शुरू किया।

सुरक्षाबलों के अनुसार, तलाशी के दौरान जवानों को संदिग्ध गतिविधियां दिखाई दीं। जब संदिग्धों को चुनौती दी गई तो आतंकियों ने गोलीबारी शुरू कर दी। इसके बाद मुठभेड़ शुरू हो गई। कार्रवाई के दौरान एक आतंकी मारा गया। बाद में अधिकारियों ने उसकी पहचान लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर मूसा के रूप में की।

सेना की चिनार कोर ने शुरुआती जानकारी में मारे गए आतंकी का नाम आधिकारिक रूप से जारी नहीं किया था। हालांकि, सुरक्षा अधिकारियों ने बाद में उसकी पहचान सुलेमान शाह उर्फ मूसा, मोहम्मद आसिफ उर्फ हाशिम मूसा या फौजी मूसा के रूप में बताई। अलग-अलग रिपोर्टों में उसके नाम के अलग-अलग उपनाम सामने आए हैं।

कौन था लश्कर कमांडर मूसा?

मूसा को सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से हाई-वैल्यू और मोस्ट-वांटेड आतंकियों में गिनती थीं। अधिकारियों के अनुसार, वह पाकिस्तान से जुड़ा लश्कर-ए-तैयबा का आतंकी था और जम्मू-कश्मीर में कई हमलों में उसकी कथित भूमिका की जांच की गई थी।

सुरक्षा अधिकारियों के मुताबिक, मूसा ने जम्मू-कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों में सुरक्षा बलों को निशाना बनाने वाले कई हमलों में भूमिका निभाई थी। उपलब्ध खुफिया जानकारी के अनुसार, उसका नाम हालन, कुलगाम में अगस्त 2023 के हमले, दिसंबर 2023 के डेरा की गली हमले और 2024 में पुंछ तथा गुलमर्ग क्षेत्र में हुए हमलों से जोड़ा गया है। इन घटनाओं में सुरक्षा बलों और अन्य लोगों की मौत हुई थी।

हालांकि, किसी आतंकी की किसी विशेष हमले में भूमिका को लेकर सुरक्षा एजेंसियों के दावे और अदालत में स्थापित तथ्य अलग-अलग कानूनी स्तर रखते हैं। इसलिए इन घटनाओं में उसकी कथित भूमिका को सुरक्षा एजेंसियों के आकलन के रूप में देखा जाना चाहिए।

पहले भी सुरक्षाबलों के हाथ से बच निकला था

मूसा इससे पहले सितंबर 2026 की शुरुआत में यूसमर्ग की पहाड़ियों में हुई मुठभेड़ के दौरान सुरक्षाबलों की घेराबंदी से निकल गया था। उसी अभियान में उसका करीबी सहयोगी यासिर मारा गया था।

यासिर को सुरक्षा एजेंसियां एक महत्वपूर्ण लश्कर कमांडर मानती थीं। सितंबर की उस कार्रवाई के बाद सुरक्षाबलों ने पीर पंजाल के जंगलों और ऊंचाई वाले इलाकों में तलाशी अभियान जारी रखा था, क्योंकि आशंका थी कि मूसा और उसके अन्य सहयोगी आसपास के जंगलों में छिपे हो सकते हैं।

इसके बाद सुरक्षा एजेंसियों ने मूसा की गतिविधियों पर नजर बनाए रखी। 29 सितंबर को मिले नए खुफिया इनपुट के आधार पर सुरक्षाबलों ने दोबारा अभियान शुरू किया और इस बार मूसा को घेर लिया गया।

ऑपरेशन के दौरान क्या हुआ?

सेना के अनुसार, ऑपरेशन के दौरान जवानों ने संदिग्ध गतिविधि देखी। सुरक्षा बलों ने आतंकियों को चुनौती दी, जिसके बाद दूसरी ओर से गोलीबारी की गई। जवाबी कार्रवाई में एक आतंकी को मार गिराया गया।

तलाशी के बाद मौके से हथियार और अन्य सामान बरामद होने की जानकारी सामने आई है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, सुरक्षा बलों ने मौके से AK-47 राइफल, दो मैगजीन और संचार उपकरण बरामद किए।

मुठभेड़ के बाद इलाके में तलाशी अभियान जारी रखा गया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि आसपास कोई अन्य आतंकी छिपा हुआ न हो। पहाड़ी और घने जंगल वाले इलाके की वजह से सुरक्षा बलों को अभियान के दौरान अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ी।

2022 से सक्रिय चार आतंकियों का समूह

मूसा के मारे जाने के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने लश्कर के उस चार सदस्यीय समूह को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है, जो 2022 से जम्मू-कश्मीर में सक्रिय बताया गया था।

गृह मंत्रालय से जुड़े बयान के अनुसार, इस समूह के चार वरिष्ठ लश्कर कमांडरों को अलग-अलग अभियानों में मार गिराया गया है। इनमें मूसा के अलावा जुनैद भट, सुलेमान शाह और यासिर के नाम सामने आए हैं।

हालांकि, अलग-अलग रिपोर्टों में इस समूह के सदस्यों की पहचान और उपनामों को लेकर कुछ अंतर दिखाई देता है। इसलिए आधिकारिक सुरक्षा एजेंसियों द्वारा जारी नामों और पहचान को ही प्राथमिक आधार माना जाना चाहिए।

जुनैद भट कब मारा गया?

इस समूह के स्थानीय कमांडर जुनैद भट को 3 दिसंबर 2024 को श्रीनगर के दाचीगाम इलाके में हुई मुठभेड़ में मारा गया था। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, वह कश्मीर में लश्कर के एक महत्वपूर्ण स्थानीय कमांडर के रूप में सक्रिय था।

जुनैद का नाम गांदरबल जिले के गगनगीर क्षेत्र में अक्टूबर 2024 में हुए आतंकी हमले की जांच में भी सामने आया था। उस हमले में एक डॉक्टर और निर्माण कार्य से जुड़े छह मजदूरों समेत सात लोगों की मौत हुई थी।

दाचीगाम अभियान के बाद भी लश्कर से जुड़े अन्य आतंकी नेटवर्क की गतिविधियां जारी रहीं। सुरक्षा एजेंसियों ने इसके बाद भी घाटी के अलग-अलग इलाकों में आतंकवाद विरोधी अभियान जारी रखा।

सुलेमान शाह और ऑपरेशन महादेव

इस समूह के एक अन्य सदस्य सुलेमान शाह का नाम 2025 के पहलगाम आतंकी हमले की जांच में सामने आया था। सुरक्षा एजेंसियों ने बाद में उसे हमले से जुड़े आतंकियों में शामिल बताया।

जुलाई 2025 में श्रीनगर के दाचीगाम इलाके में चलाए गए ऑपरेशन महादेव के दौरान सुलेमान शाह को मारे जाने की जानकारी सामने आई थी। इस कार्रवाई के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने पहलगाम हमले से जुड़े आतंकी नेटवर्क के खिलाफ अपनी जांच और अभियान को आगे बढ़ाया।

सुलेमान शाह के खिलाफ सुरक्षा एजेंसियों की जांच में सामने आई जानकारी और उस पर लगाए गए आरोपों को सुरक्षा एजेंसियों के आधिकारिक आकलन के रूप में देखा जाता है।

सितंबर में यासिर भी मारा गया था

चार सदस्यीय समूह में शामिल बताए गए यासिर को सितंबर 2026 की शुरुआत में यूसमर्ग के पास हुई लंबी मुठभेड़ में मार गिराया गया था। इस अभियान के दौरान सुरक्षाबलों ने कई दिनों तक पहाड़ी क्षेत्र में तलाशी अभियान चलाया।

Aaj Tak की पहले की रिपोर्ट के मुताबिक, यासिर पहले मूसा के समूह का हिस्सा था, लेकिन लगभग एक साल पहले वह इस समूह से अलग हो गया था और अलग तरीके से सक्रिय था। सुरक्षा एजेंसियां उसके नेटवर्क और अन्य आतंकियों से संपर्क की भी जांच कर रही थीं।

यासिर के मारे जाने के बाद मूसा सुरक्षा बलों के लिए प्रमुख लक्ष्य बना रहा। अब उसकी मौत के साथ उस समूह के अंतिम प्रमुख सदस्य के भी मारे जाने की जानकारी सामने आई है।

मूसा पर कई हमलों में शामिल होने का आरोप

सुरक्षा अधिकारियों के मुताबिक, मूसा का नाम जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ वर्षों के कई आतंकी हमलों से जुड़ा रहा था। रिपोर्टों में हालन, डेरा की गली, पुंछ के शास्तर और गुलमर्ग के बोटापथरी क्षेत्र में हुए हमलों का उल्लेख किया गया है।

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, खुफिया एजेंसियों ने मूसा को अगस्त 2023 में हालन, कुलगाम में हुए हमले, दिसंबर 2023 के DKG हमले, मई 2024 में पुंछ के शास्तर क्षेत्र में भारतीय वायुसेना के काफिले पर हुए हमले और अक्टूबर 2024 के बोटापथरी हमले से जोड़ा था।

इनमें से प्रत्येक मामले की अपनी जांच और कानूनी प्रक्रिया रही है। मूसा की मौत के बाद सुरक्षा एजेंसियां उसके नेटवर्क, संपर्कों और उससे जुड़े अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच कर सकती हैं।

सेना और पुलिस का संयुक्त अभियान

इस कार्रवाई की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह रही कि इसमें कई सुरक्षा एजेंसियां शामिल थीं। भारतीय सेना की चिनार कोर, जम्मू-कश्मीर पुलिस और CRPF ने संयुक्त रूप से अभियान चलाया।

ऐसे अभियानों में स्थानीय पुलिस से मिलने वाली खुफिया जानकारी, सेना की निगरानी क्षमता और केंद्रीय बलों की जमीनी तैनाती को एक साथ इस्तेमाल किया जाता है। यूसमर्ग और बडगाम के पहाड़ी जंगलों में अभियान चलाना भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण माना जाता है।

सेना ने बताया कि ऑपरेशन विशेष खुफिया इनपुट के आधार पर शुरू किया गया था। इस तरह की कार्रवाई में किसी संदिग्ध गतिविधि की पुष्टि होने के बाद इलाके की घेराबंदी की जाती है और संभावित भागने के रास्तों पर निगरानी रखी जाती है।

आगे भी जारी रहेगी तलाशी

मूसा के मारे जाने के बाद भी सुरक्षाबलों ने क्षेत्र में तलाशी अभियान जारी रखा। इसका उद्देश्य आसपास छिपे किसी अन्य आतंकी या सहयोगी की मौजूदगी की जांच करना था।

सुरक्षा एजेंसियां अब बरामद हथियारों, संचार उपकरणों और अन्य सामग्री की फॉरेंसिक जांच कर सकती हैं। इनसे मूसा के संपर्कों और संभावित नेटवर्क के बारे में जानकारी जुटाने में मदद मिल सकती है।

इसके अलावा सुरक्षा एजेंसियां यह भी जांच कर सकती हैं कि मूसा को स्थानीय स्तर पर किस तरह की सहायता मिल रही थी और उसके लिए रहने, हथियार पहुंचाने या संदेश पहुंचाने का नेटवर्क कौन चला रहा था।

लश्कर के नेटवर्क के लिए बड़ा झटका

मूसा की मौत के बाद सुरक्षा एजेंसियों का ध्यान अब उस नेटवर्क के बचे हुए हिस्सों पर हो सकता है, जिससे वह जुड़ा हुआ था। गृह मंत्रालय ने उसके मारे जाने को जम्मू-कश्मीर में लश्कर के ऑपरेशनल नेटवर्क के लिए गंभीर झटका बताया है।

हालांकि, किसी एक कमांडर के मारे जाने से किसी आतंकी संगठन का पूरा नेटवर्क समाप्त हो जाना जरूरी नहीं है। ऐसे संगठनों में स्थानीय सहयोगियों, नए सदस्यों और सीमा पार से मिलने वाले निर्देशों के जरिए नेटवर्क को दोबारा सक्रिय करने की कोशिश की जा सकती है।

इसी कारण मूसा के मारे जाने के बाद सुरक्षा एजेंसियों की अगली चुनौती उसके संपर्कों और सहयोगियों की पहचान करना होगी।

2022 से चली आ रही कार्रवाई का एक और चरण

सुरक्षा एजेंसियों द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, 2022 से घाटी में सक्रिय बताए जा रहे चार प्रमुख लश्कर आतंकियों के खिलाफ अलग-अलग वर्षों में कार्रवाई हुई। जुनैद भट 2024 में, सुलेमान शाह 2025 में, यासिर सितंबर 2026 में और अब मूसा सितंबर 2026 में मारा गया।

इस तरह अलग-अलग अभियानों में इस समूह के सभी चार सदस्यों के मारे जाने की जानकारी सामने आई है।

मूसा की मौत के बाद भी जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियान जारी रहने की संभावना है। सुरक्षा एजेंसियों के लिए अब चुनौती केवल सक्रिय आतंकियों का पता लगाना नहीं, बल्कि उनके स्थानीय नेटवर्क, वित्तीय मदद, संचार तंत्र और संभावित सहयोगियों की पहचान करना भी होगी।

बडगाम की ताजा मुठभेड़ ने एक बार फिर यह दिखाया है कि पहाड़ी और जंगल वाले इलाकों में आतंकियों की तलाश के लिए लंबे समय तक चलने वाले संयुक्त अभियान कितने महत्वपूर्ण हैं। फिलहाल सुरक्षाबलों की ओर से इलाके में तलाशी जारी है और आगे की जांच से मूसा के नेटवर्क तथा उसके संपर्कों से जुड़ी और जानकारी सामने आने की उम्मीद है।

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