कभी बाइकर, कभी लेखक, कभी नेता और एनकाउंटर स्पेशलिस्ट… एंटीलिया केस के आरोपी सचिन वाझे की पूरी कुंडली

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1990 में महाराष्ट्र पुलिस में शुरू किया सफर

सचिन वाझे ने साल 1990 में महाराष्ट्र पुलिस में सब-इंस्पेक्टर के तौर पर नौकरी शुरू की थी। उनकी शुरुआती तैनाती नक्सल प्रभावित गढ़चिरौली इलाके में हुई थी। इसके बाद 1992 में उनका तबादला ठाणे सिटी पुलिस में किया गया।

आगे चलकर वह ठाणे क्राइम ब्रांच की विशेष टीम से जुड़े। इसी दौरान उनका नाम उन पुलिस अधिकारियों में आने लगा जो अपराधियों के खिलाफ चलाए जाने वाले एनकाउंटर अभियानों के लिए जाने जाते थे।

वाझे का नाम प्रदीप शर्मा और दया नायक जैसे चर्चित पुलिस अधिकारियों के साथ भी लिया जाता रहा। मीडिया रिपोर्टों में उन्हें एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के रूप में पेश किया गया और वह मुंबई तथा ठाणे इलाके में सक्रिय विशेष टीम का हिस्सा रहे। इंडिया टुडे की एक प्रोफाइल के मुताबिक, वाझे के नाम को 63 कथित अपराधियों के एनकाउंटर से जोड़ा गया था।

हालांकि, एनकाउंटर से जुड़े मामलों में पुलिस की कार्रवाई, न्यायिक जांच और किसी व्यक्ति की कानूनी जिम्मेदारी अलग-अलग विषय होते हैं। इसलिए ऐसे आंकड़ों को उस समय की मीडिया और पुलिस रिकॉर्ड आधारित रिपोर्टिंग के संदर्भ में समझना जरूरी है।

ख्वाजा यूनुस केस ने बदल दिया करियर

सचिन वाझे के करियर में बड़ा मोड़ ख्वाजा यूनुस मामले के बाद आया।

ख्वाजा यूनुस 2002 के घाटकोपर बम धमाका मामले में संदिग्ध था। जनवरी 2003 में पुलिस का कहना था कि उसे जांच के लिए औरंगाबाद ले जाते समय वह पुलिस वाहन से कूदकर फरार हो गया। बाद में वह लापता रहा और उसका शव बरामद नहीं हुआ।

यूनुस के परिवार ने मामले को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया। इसके बाद जांच महाराष्ट्र CID को सौंपी गई। CID ने मामले को हिरासत में मौत से जोड़कर जांच की और वाझे समेत कुछ पुलिसकर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ।

2004 में वाझे को इस मामले में निलंबित कर दिया गया। यही मामला आगे उनके पुलिस करियर के लिए बड़ी परेशानी बना।

2007 में पुलिस से इस्तीफा

निलंबन और कानूनी विवाद के बीच वाझे ने 2007 में पुलिस सेवा से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने पुलिस की नौकरी छोड़कर दूसरी गतिविधियों की ओर रुख किया।

हालांकि, उनके इस्तीफे की स्वीकृति को लेकर भी कानूनी और प्रशासनिक स्थिति जटिल रही। बाद के वर्षों में इस मामले और उनकी सेवा बहाली को लेकर अलग-अलग प्रक्रियाएं चलीं।

वाझे ने पुलिस सेवा से बाहर रहने के दौरान राजनीति और तकनीक सहित कई क्षेत्रों में काम किया। 2008 में वह शिवसेना से जुड़े। इसी दौरान उनकी सार्वजनिक पहचान एक पूर्व पुलिस अधिकारी से आगे बढ़कर राजनीतिक और तकनीकी गतिविधियों से जुड़े व्यक्ति के रूप में भी बनी।

नेता ही नहीं, लेखक और टेक्नोलॉजी से भी जुड़ाव

सचिन वाझे की प्रोफाइल का एक अलग पहलू उनका लेखन और तकनीक में रुचि रखना था।

रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने अपराध और आतंकवाद से जुड़े विषयों पर किताबें लिखीं। इनमें शीना बोरा हत्याकांड और मुंबई में 26/11 आतंकी हमलों से जुड़े विषय शामिल थे। उन्होंने डेविड हेडली से संबंधित विषय पर भी लेखन किया।

इसके अलावा उन्होंने एक मराठी सोशल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म शुरू करने की कोशिश की थी। रिपोर्टों में यह भी बताया गया कि उन्होंने एक स्वदेशी मैसेजिंग एप्लिकेशन तैयार करने और तकनीकी क्षेत्र में काम करने की कोशिश की।

यानी पुलिस की वर्दी से बाहर निकलने के बाद भी वाझे का सार्वजनिक जीवन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था। वह राजनीति, तकनीक और लेखन जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय रहे।

2020 में फिर पुलिस में वापसी

सचिन वाझे की कहानी में सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब वर्षों बाद उनकी पुलिस सेवा में वापसी हुई।

2020 में महाराष्ट्र सरकार के एक आदेश के बाद उनका निलंबन खत्म किया गया और उन्हें दोबारा पुलिस सेवा में लिया गया। उस समय मुंबई पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह ने कोविड-19 महामारी के दौरान पुलिस बल पर बढ़े दबाव और कर्मचारियों की कमी को उनकी बहाली के कारणों में बताया था।

बहाली के कुछ ही समय बाद उन्हें मुंबई क्राइम ब्रांच की क्रिमिनल इंटेलिजेंस यूनिट यानी CIU में तैनात किया गया।

यह पोस्टिंग इसलिए भी चर्चा में रही क्योंकि उनका रैंक अपेक्षाकृत कम था, लेकिन उन्हें कई हाई-प्रोफाइल मामलों की जांच से जोड़ा गया।

TRP केस से लेकर कई चर्चित जांच

क्रिमिनल इंटेलिजेंस यूनिट में रहते हुए सचिन वाझे ने कई चर्चित मामलों की जांच की।

उनका नाम TRP घोटाले की जांच से भी जुड़ा। इस मामले में उन्होंने BARC के तत्कालीन पूर्व CEO पार्थ दासगुप्ता समेत कई लोगों से पूछताछ और गिरफ्तारी की कार्रवाई की थी।

इसके अलावा स्पोर्ट्स कार डिजाइनर दिलीप छाबड़िया से जुड़े कथित कार घोटाले की जांच में भी वाझे की भूमिका रही। उन्होंने दिसंबर 2020 में छाबड़िया को गिरफ्तार किया था।

इसी दौरान वह अन्वय नाइक आत्महत्या मामले की जांच से जुड़े घटनाक्रम में भी चर्चा में आए। रिपोर्टों के मुताबिक, अलीबाग पुलिस की टीम में रहते हुए वह पत्रकार अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी की कार्रवाई का हिस्सा थे।

इन मामलों ने उन्हें फिर से महाराष्ट्र की अपराध और पुलिस व्यवस्था में एक चर्चित नाम बना दिया।

फिर आया एंटीलिया केस

सचिन वाझे के करियर और सार्वजनिक जीवन में सबसे बड़ा मोड़ फरवरी 2021 में आया।

25 फरवरी 2021 को मुंबई में उद्योगपति मुकेश अंबानी के दक्षिण मुंबई स्थित आवास ‘एंटीलिया’ के पास एक SUV खड़ी मिली। वाहन में जिलेटिन की छड़ें और एक धमकी भरा नोट मिलने की जानकारी सामने आई।

जांच में पता चला कि यह वाहन कारोबारी मनसुख हिरेन से जुड़ा था। हिरेन ने पुलिस को बताया था कि वाहन चोरी हो गया था।

इसके कुछ दिन बाद 5 मार्च 2021 को मनसुख हिरेन का शव ठाणे की एक खाड़ी में मिला। इसके बाद मामला और गंभीर हो गया और एंटीलिया के बाहर विस्फोटक मिलने तथा हिरेन की मौत के बीच संभावित संबंध की जांच शुरू हुई।

जांच में वाझे की भूमिका पर उठे सवाल

एंटीलिया के बाहर विस्फोटक मिलने का मामला शुरुआत में मुंबई पुलिस के पास था और सचिन वाझे भी इसकी जांच से जुड़े थे।

बाद में मामला राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी NIA को सौंपा गया। जांच एजेंसी ने वाझे पर इस पूरे मामले में आपराधिक साजिश का हिस्सा होने और मनसुख हिरेन की हत्या से जुड़े होने के आरोप लगाए।

NIA के अनुसार, एंटीलिया के बाहर SUV खड़ी करने और हिरेन की हत्या से जुड़े घटनाक्रम में कई लोगों ने मिलकर साजिश रची थी। वाझे समेत कई पूर्व पुलिसकर्मियों और अन्य आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया।

हालांकि, आरोप और अदालत में दोष सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। मामले में आरोपी पक्ष ने आरोपों का विरोध किया है और अंतिम न्यायिक निष्कर्ष ट्रायल के बाद ही तय होगा।

मनसुख हिरेन की मौत ने बढ़ाया विवाद

मनसुख हिरेन की मौत इस पूरे मामले का दूसरा बड़ा हिस्सा बनी।

जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया कि हिरेन की हत्या इसलिए की गई क्योंकि वह एंटीलिया मामले की जांच में महत्वपूर्ण कड़ी बन सकता था। NIA की चार्जशीट और अदालत में रखी गई दलीलों में वाझे तथा अन्य आरोपियों की कथित भूमिका का विवरण दिया गया।

पूर्व पुलिस अधिकारी प्रदीप शर्मा का नाम भी मामले में सामने आया। NIA ने आरोप लगाया कि शर्मा ने कथित तौर पर हिरेन की हत्या में वाझे की मदद की। शर्मा ने इन आरोपों को चुनौती दी और उनका डिस्चार्ज आवेदन सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने मामले के ट्रायल को प्रभावित करने वाली टिप्पणी करने से बचते हुए डिस्चार्ज की मांग स्वीकार नहीं की।

NIA ने लगाया आतंक की साजिश का आरोप

एंटीलिया मामले में NIA ने वाझे और अन्य आरोपियों पर गंभीर आरोप लगाए। जांच एजेंसी का दावा रहा कि विस्फोटक से भरी SUV को एंटीलिया के पास खड़ा करने का उद्देश्य भय और आतंक पैदा करना था।

मामले में UAPA यानी गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम और Explosive Substances Act समेत कई कानूनों के तहत कार्रवाई हुई।

अगस्त 2026 में मुंबई की विशेष NIA अदालत ने एंटीलिया बम कांड और मनसुख हिरेन हत्या मामले में 10 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए। वाझे और प्रदीप शर्मा समेत आरोपियों ने आरोपों से इनकार किया और ट्रायल का सामना करने की स्थिति में हैं।

पांच साल से ज्यादा समय से जेल में

एंटीलिया केस में गिरफ्तारी के बाद सचिन वाझे लंबे समय से जेल में हैं। 2026 तक वह पांच साल से अधिक समय से ठाणे सेंट्रल जेल में बंद रहे।

सितंबर 2026 में विशेष NIA अदालत ने उन्हें एंटीलिया बम केस में जमानत दे दी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष UAPA के तहत आतंकवाद के आरोप को प्रथम दृष्टया स्थापित करने में सफल नहीं हुआ है। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि वाझे लंबे समय से हिरासत में हैं।

इस आदेश के बाद लगा कि वाझे जेल से बाहर आ सकते हैं, लेकिन कहानी अगले ही दिन बदल गई।

जमानत के 24 घंटे बाद हाई कोर्ट की रोक

29 सितंबर को विशेष NIA अदालत से जमानत मिलने के बाद NIA ने बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया।

30 सितंबर 2026 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने विशेष अदालत के जमानत आदेश के अमल पर अंतरिम रोक लगा दी। इसका मतलब यह हुआ कि जमानत मिलने के बावजूद वाझे फिलहाल जेल से बाहर नहीं आ सके।

न्यायमूर्ति जीएस कुलकर्णी और न्यायमूर्ति नीला गोखले की पीठ ने NIA की अपील पर सुनवाई करते हुए जमानत आदेश पर 7 अक्टूबर तक रोक लगाई है। NIA ने विशेष अदालत के आदेश को चुनौती दी है और कहा है कि अदालत ने UAPA की धारा 43D से जुड़े प्रावधानों को सही तरीके से नहीं देखा।

इसलिए फिलहाल वाझे की कानूनी स्थिति यह है कि उन्हें विशेष अदालत से जमानत मिली थी, लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट की अंतरिम रोक के कारण उनकी रिहाई रुक गई है। मामले पर अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को होनी है।

स्पेशल कोर्ट ने NIA की जांच पर भी उठाए सवाल

वाझे को जमानत देते समय विशेष NIA अदालत ने जांच एजेंसी की कार्रवाई और कुछ साक्ष्यों को लेकर सवाल उठाए।

अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर सवाल किया कि NIA ने अभी तक मुकेश अंबानी के परिवार के किसी सदस्य का बयान क्यों दर्ज नहीं किया है, जबकि अभियोजन का आरोप था कि एंटीलिया के बाहर विस्फोटक वाली SUV खड़ी करने की कार्रवाई का उद्देश्य परिवार को आतंकित करना था।

NIA ने हाई कोर्ट में इन टिप्पणियों का विरोध किया है और विशेष अदालत के आदेश को चुनौती दी है। एजेंसी का कहना है कि निचली अदालत का निष्कर्ष सही नहीं था।

यह विवाद अब बॉम्बे हाई कोर्ट के सामने है और 7 अक्टूबर की सुनवाई में आगे की तस्वीर स्पष्ट हो सकती है।

एक पुलिस अधिकारी से विवादित आरोपी तक का सफर

सचिन वाझे की कहानी कई अलग-अलग चरणों से होकर गुजरी है।

एक समय वह मुंबई पुलिस की चर्चित क्राइम ब्रांच टीम का हिस्सा थे और एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के रूप में उनकी पहचान बनी। फिर ख्वाजा यूनुस मामले में विवाद और निलंबन हुआ। 2007 में पुलिस सेवा छोड़ी, 2008 में राजनीति से जुड़े, तकनीक और लेखन में काम किया और वर्षों बाद 2020 में फिर पुलिस सेवा में लौटे।

वापसी के बाद उन्हें कई हाई-प्रोफाइल मामलों की जांच का हिस्सा बनाया गया। लेकिन 2021 में एंटीलिया के बाहर विस्फोटक वाली SUV और मनसुख हिरेन की मौत के मामलों ने उनकी पूरी सार्वजनिक छवि बदल दी।

आज वाझे का नाम इन्हीं मामलों में चल रहे मुकदमे, UAPA के आरोप और लंबे समय से चली आ रही न्यायिक हिरासत के संदर्भ में लिया जाता है।

आगे क्या होगा?

फिलहाल सचिन वाझे की कानूनी स्थिति पूरी तरह अदालतों में चल रही प्रक्रिया पर निर्भर है। विशेष NIA अदालत ने उन्हें जमानत दी थी, लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट ने उस आदेश पर 7 अक्टूबर तक रोक लगा दी है।

दूसरी ओर, एंटीलिया और मनसुख हिरेन मामलों में अगस्त 2026 में आरोप तय हो चुके हैं और ट्रायल की प्रक्रिया आगे बढ़नी है। इन आरोपों में हत्या, आपराधिक साजिश, सबूत नष्ट करने, जबरन वसूली और UAPA तथा विस्फोटक कानून की धाराएं शामिल हैं।

इस मामले में अंतिम दोष या निर्दोषता का निर्धारण अदालत में होने वाले ट्रायल और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर होगा। फिलहाल सचिन वाझे एक ऐसे पूर्व पुलिस अधिकारी हैं जिनका करियर एनकाउंटर टीम से शुरू होकर हाई-प्रोफाइल जांचों तक पहुंचा और बाद में एंटीलिया बम कांड तथा मनसुख हिरेन हत्या मामले में आरोपी बनने के बाद कानूनी विवादों के केंद्र में आ गया।

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