शारदीय नवरात्र 2026: तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा, जानें मंत्र, भोग, पूजन विधि, मंगल दोष के उपाय और पौराणिक कथा

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शारदीय नवरात्र 2026: तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा, जानें पूजन विधि, मंत्र, भोग, उपाय और पौराणिक कथा

शारदीय नवरात्र का पर्व मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना के लिए विशेष महत्व रखता है। इन नौ दिनों में भक्त माता रानी की पूजा-अर्चना करते हैं, व्रत रखते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि, शांति तथा खुशहाली की कामना करते हैं। नवरात्र के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी का यह स्वरूप साहस, शक्ति, निर्भयता और सौम्यता का प्रतीक है।

साल 2026 में शारदीय नवरात्र की शुरुआत 11 अक्टूबर से हुई है। दिनवार नवरात्र कैलेंडर के अनुसार, 13 अक्टूबर को मां चंद्रघंटा की पूजा की जाएगी। मां के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित रहता है, इसी कारण उनका नाम चंद्रघंटा पड़ा। देवी के दस हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र दर्शाए गए हैं और उनका वाहन सिंह माना जाता है। उनका स्वरूप भक्तों को यह संदेश देता है कि जीवन में शांति और करुणा के साथ अन्याय तथा नकारात्मकता का सामना करने के लिए साहस भी आवश्यक है।

नवरात्र के तीसरे दिन भक्त मां चंद्रघंटा को लाल फूल, लाल चुनरी, चंदन और दूध से बनी मिठाइयां अर्पित करते हैं। पूजा के दौरान देवी के मंत्रों का जाप किया जाता है और परिवार की सुख-शांति की कामना की जाती है। ज्योतिषीय मान्यताओं में मां चंद्रघंटा की आराधना का संबंध मंगल ग्रह से भी बताया जाता है। इस दिन कुछ भक्त मंगल दोष से संबंधित पारंपरिक उपाय भी करते हैं।

आइए जानते हैं मां चंद्रघंटा का स्वरूप कैसा है, उनकी पूजा कैसे की जाती है, कौन-सा मंत्र जपना चाहिए, माता को क्या भोग लगाया जाता है और महिषासुर के संहार से जुड़ी पौराणिक कथा क्या कहती है।

नवरात्र के तीसरे दिन कब होगी मां चंद्रघंटा की पूजा?

शारदीय नवरात्र 2026 में मां चंद्रघंटा की पूजा मंगलवार, 13 अक्टूबर को की जाएगी। इस दिन आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दौरान देवी के तीसरे स्वरूप की आराधना की जाती है।

पूजा के लिए सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। भक्त अपनी पारिवारिक परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा का समय तय कर सकते हैं। तिथि और मुहूर्त की गणना स्थान के अनुसार कुछ अंतर के साथ हो सकती है, इसलिए सटीक समय के लिए अपने शहर के पंचांग को देखना उचित रहेगा।

नवरात्र के हर दिन मां दुर्गा के एक विशेष स्वरूप की पूजा का विधान है। पहले दिन मां शैलपुत्री, दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी और तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की आराधना की जाती है। तीसरे दिन की पूजा में साहस, आत्मविश्वास और भय से मुक्ति की कामना प्रमुख मानी जाती है।

धार्मिक मान्यता है कि मां चंद्रघंटा की आराधना से भक्तों को कठिन परिस्थितियों का सामना करने की प्रेरणा मिलती है। देवी का स्वरूप यह भी सिखाता है कि शक्ति का उपयोग धर्म की रक्षा और अन्याय का विरोध करने के लिए किया जाना चाहिए।

मां चंद्रघंटा का स्वरूप कैसा है?

मां चंद्रघंटा मां दुर्गा का तीसरा स्वरूप हैं। उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित रहता है। इसी विशेषता के कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। धार्मिक चित्रों में देवी को प्रायः दस भुजाओं वाली देवी के रूप में दिखाया जाता है। उनके हाथों में त्रिशूल, तलवार, गदा, धनुष-बाण, कमल और अन्य दिव्य अस्त्र-शस्त्र दर्शाए जाते हैं। उनका वाहन सिंह है।

देवी के इस स्वरूप में शक्ति और शांति का अनूठा संगम दिखाई देता है। उनका चेहरा भक्तों के लिए मातृत्व और करुणा का प्रतीक है, जबकि अस्त्र-शस्त्र अन्याय और बुरी शक्तियों का सामना करने की क्षमता को दर्शाते हैं। सिंह पर सवार मां चंद्रघंटा निर्भयता और आत्मविश्वास की प्रेरणा देती हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और उन्हें संकटों का सामना करने का साहस देती हैं। उनकी पूजा करते समय भक्त अपने मन से भय, नकारात्मक विचार और अस्थिरता दूर करने की प्रार्थना करते हैं।

मां चंद्रघंटा के स्वरूप का एक महत्वपूर्ण संदेश संतुलन भी है। जीवन में केवल शक्ति होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका उचित उपयोग करना भी आवश्यक है। देवी का स्वरूप बताता है कि व्यक्ति को अपने कर्तव्य के प्रति दृढ़ रहना चाहिए, लेकिन साथ ही करुणा, संयम और विवेक को भी बनाए रखना चाहिए।

मां चंद्रघंटा की पूजा का धार्मिक महत्व

नवरात्र के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है। धार्मिक मान्यताओं में उन्हें भय दूर करने वाली, साहस प्रदान करने वाली और भक्तों की रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। उनकी आराधना से मन में सकारात्मकता और आत्मविश्वास बढ़ाने की प्रेरणा मिलती है।

मां चंद्रघंटा का स्वरूप यह संदेश देता है कि कठिन परिस्थितियों में घबराने के बजाय धैर्य और विवेक से काम लेना चाहिए। उनके हाथों में मौजूद अस्त्र-शस्त्र शक्ति और सुरक्षा के प्रतीक हैं। वहीं, उनके चेहरे की शांति यह बताती है कि साहस के साथ संयम बनाए रखना भी जरूरी है।

नवरात्र के दौरान भक्त अपने घरों में देवी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करके पूजा करते हैं। कई लोग मंदिरों में जाकर दर्शन करते हैं, दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं या देवी के मंत्रों का जाप करते हैं। कुछ श्रद्धालु नौ दिनों तक उपवास रखते हैं, जबकि कुछ अपनी क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं।

मां चंद्रघंटा की पूजा का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं माना जाता। भक्त उनके स्वरूप से जीवन में निर्भयता, जिम्मेदारी और आत्मसंयम जैसे गुण अपनाने की प्रेरणा भी लेते हैं।

यह ध्यान रखना चाहिए कि पूजा और व्रत व्यक्तिगत आस्था तथा परंपरा का विषय हैं। अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में पूजा के तरीके भिन्न हो सकते हैं। अपनी परंपरा के अनुसार श्रद्धापूर्वक पूजा करना सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

मां चंद्रघंटा की पूजा विधि

नवरात्र के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा घर पर सरल तरीके से की जा सकती है। पूजा के लिए स्वच्छता, श्रद्धा और एकाग्रता को विशेष महत्व दिया जाता है।

1. सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें

पूजा की शुरुआत सुबह स्नान से करें। इसके बाद साफ-सुथरे कपड़े पहनें। कुछ परंपराओं में इस दिन लाल रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है। पूजा स्थल को साफ करके मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर के सामने बैठें।

2. पूजा का संकल्प लें

हाथ में जल लेकर मां चंद्रघंटा की आराधना का संकल्प करें। अपने परिवार की सुख-शांति, स्वास्थ्य, समृद्धि और जीवन में साहस की कामना करें। यदि आप व्रत रख रहे हैं, तो अपनी परंपरा के अनुसार व्रत का संकल्प भी ले सकते हैं।

3. दीपक और धूप जलाएं

मां के सामने दीपक जलाएं और धूप अर्पित करें। पूजा के दौरान वातावरण को शांत रखें और मन को एकाग्र करने का प्रयास करें। पूजा में दीपक जलाने का अर्थ अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने की भावना से भी जोड़ा जाता है।

4. देवी को फूल और चुनरी अर्पित करें

मां चंद्रघंटा को लाल फूल, लाल चुनरी और चंदन अर्पित करने की परंपरा है। आप अपनी श्रद्धा और उपलब्ध सामग्री के अनुसार देवी को फूल चढ़ा सकते हैं। पूजा में स्वच्छता और श्रद्धा को विशेष महत्व दिया जाता है।

5. रोली, अक्षत और अन्य पूजन सामग्री चढ़ाएं

मां को रोली, अक्षत और अन्य पारंपरिक पूजन सामग्री अर्पित करें। यदि आपके परिवार में किसी विशेष विधि से पूजा करने की परंपरा है, तो उसका पालन कर सकते हैं।

6. मां चंद्रघंटा के मंत्र का जाप करें

पूजा के दौरान मां चंद्रघंटा के मंत्र का जाप करें। आप अपनी सुविधा के अनुसार 11, 21 या 108 बार मंत्र का जाप कर सकते हैं। मंत्र जपते समय मन को शांत और एकाग्र रखने का प्रयास करें।

7. दूध या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं

मां चंद्रघंटा को दूध, खीर या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाने की परंपरा है। इसके अलावा कुछ परिवार हलवा और मेवे भी अर्पित करते हैं। भोग अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार तैयार किया जा सकता है।

8. देवी की आरती करें

मंत्र जाप और भोग लगाने के बाद मां चंद्रघंटा की आरती करें। परिवार के अन्य सदस्य भी पूजा में शामिल हो सकते हैं। आरती के बाद देवी से परिवार की खुशहाली और सभी के कल्याण की प्रार्थना करें।

9. प्रसाद बांटें

पूजा पूरी होने के बाद प्रसाद परिवार के सदस्यों और अन्य श्रद्धालुओं में बांटें। यदि आप व्रत रख रहे हैं, तो अपनी व्रत परंपरा के अनुसार फलाहार या भोजन ग्रहण करें।

पूजा विधि में अलग-अलग क्षेत्रों में अंतर हो सकता है। इसलिए किसी एक विधि को सभी के लिए अनिवार्य मानने के बजाय अपनी पारिवारिक परंपरा और श्रद्धा के अनुसार पूजा करना उचित है।

मां चंद्रघंटा का मंत्र

नवरात्र के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की आराधना के लिए इस मंत्र का जाप किया जाता है:

ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥

इस मंत्र का अर्थ मां चंद्रघंटा को नमन करना है। भक्त इसे श्रद्धा और एकाग्रता के साथ जपते हैं। आप अपनी सुविधा के अनुसार 11, 21 या 108 बार मंत्र का जाप कर सकते हैं।

मां चंद्रघंटा की स्तुति के लिए नवदुर्गा के ध्यान मंत्र का भी पाठ किया जाता है:

पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥

इस स्तुति में मां चंद्रघंटा के शक्तिशाली स्वरूप का वर्णन किया गया है और उनसे कृपा की प्रार्थना की गई है।

मंत्र का जाप करते समय किसी विशेष संख्या को लेकर अनावश्यक चिंता करने की जरूरत नहीं है। श्रद्धालु अपनी परंपरा और सुविधा के अनुसार जाप कर सकते हैं। पूजा का उद्देश्य मन को एकाग्र करना और देवी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना है।

मां चंद्रघंटा को क्या भोग लगाएं?

नवरात्र के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा को दूध और दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाने की परंपरा है। कई श्रद्धालु देवी को खीर, दूध से तैयार मिठाई, हलवा या मेवे अर्पित करते हैं।

दूध को शुद्धता और पोषण से जोड़ा जाता है। धार्मिक परंपराओं में देवी को दूध से बने प्रसाद का भोग लगाने को शुभ माना गया है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में भोग की सामग्री अलग हो सकती है।

आप घर में उपलब्ध सामग्री से भी भोग तैयार कर सकते हैं। जरूरी नहीं कि पूजा के लिए बहुत अधिक सामग्री या महंगे प्रसाद की व्यवस्था की जाए। श्रद्धा के साथ तैयार किया गया साधारण प्रसाद भी पूजा में अर्पित किया जा सकता है।

भोग तैयार करते समय स्वच्छता का ध्यान रखें। यदि प्रसाद में दूध या दूध से बनी सामग्री का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो उसे उचित तरीके से सुरक्षित रखें। पूजा के बाद प्रसाद परिवार और अन्य श्रद्धालुओं में बांटा जा सकता है।

कुछ परंपराओं में देवी को लाल फूलों के साथ लाल रंग की चुनरी अर्पित करने का भी विधान है। पूजा सामग्री का चयन अपनी आस्था, उपलब्धता और पारिवारिक रीति के अनुसार किया जा सकता है।

नवरात्र के तीसरे दिन लाल रंग का महत्व

नवरात्र के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा के साथ लाल रंग को भी विशेष महत्व दिया जाता है। कई नवरात्र परंपराओं में इस दिन लाल वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है। लाल रंग को ऊर्जा, साहस, शक्ति और उत्साह का प्रतीक माना जाता है।

मां चंद्रघंटा का स्वरूप भी शक्ति और निर्भयता से जुड़ा है। इसलिए लाल रंग को इस दिन की पूजा के साथ जोड़कर देखा जाता है। श्रद्धालु लाल कपड़े पहन सकते हैं, देवी को लाल फूल चढ़ा सकते हैं या पूजा स्थल को लाल रंग की सामग्री से सजा सकते हैं।

हालांकि, नवरात्र के रंगों की परंपरा क्षेत्र और कैलेंडर के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। कुछ जगहों पर दिन के रंग का निर्धारण सप्ताह के दिन के आधार पर किया जाता है। इसलिए लाल रंग को धार्मिक परंपरा में शुभ माना जाना और हर स्थान पर उसे अनिवार्य मानना अलग-अलग बातें हैं।

यदि आपके पास लाल वस्त्र नहीं हैं, तो केवल इस कारण पूजा को अधूरा मानने की जरूरत नहीं है। श्रद्धा, स्वच्छता और मन की एकाग्रता को पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

मंगल दोष के लिए मां चंद्रघंटा के उपाय

ज्योतिषीय मान्यताओं में मां चंद्रघंटा का संबंध मंगल ग्रह से बताया जाता है। इसी वजह से नवरात्र के तीसरे दिन कुछ श्रद्धालु मंगल ग्रह से जुड़े पारंपरिक उपाय करते हैं। इन उपायों का उल्लेख धार्मिक और ज्योतिषीय परंपराओं में मिलता है, लेकिन इनके परिणामों की वैज्ञानिक गारंटी नहीं है।

लाल फूल अर्पित करें: मां चंद्रघंटा को लाल फूल चढ़ाकर परिवार की सुख-शांति और साहस की कामना की जाती है।

तांबे की वस्तु अर्पित करें: कुछ ज्योतिषीय परंपराओं में देवी को तांबे का सिक्का या तांबे की वस्तु अर्पित करना शुभ माना जाता है। ऐसा करते समय अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य का ध्यान रखें।

मां के मंत्र का जाप करें: पूजा के दौरान ‘ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः’ मंत्र का जाप किया जा सकता है। इससे मन को एकाग्र करने और सकारात्मक भावना बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

मंगल मंत्र का जाप: ज्योतिषीय परंपरा में मंगल ग्रह के लिए ‘ॐ अं अंगारकाय नमः’ मंत्र का जाप भी किया जाता है। कुछ श्रद्धालु नवरात्र के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा के बाद इस मंत्र का जाप करते हैं।

दान और सेवा करें: जरूरतमंद लोगों की सहायता करना, भोजन दान करना और दूसरों के प्रति सहयोग की भावना रखना भी धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि मंगल दोष और ग्रहों के प्रभाव से जुड़ी बातें ज्योतिषीय मान्यताओं का हिस्सा हैं। किसी स्वास्थ्य, विवाह, आर्थिक या अन्य गंभीर समस्या का समाधान केवल धार्मिक उपायों पर निर्भर करके नहीं करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर संबंधित विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित है।

मां चंद्रघंटा की पौराणिक कथा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा का स्वरूप देवी दुर्गा की शक्ति और दुष्ट शक्तियों के विनाश से जुड़ा हुआ है। देवी पुराण से संबंधित प्रचलित कथाओं में महिषासुर के अत्याचार और देवताओं की सहायता के लिए देवी के प्रकट होने का वर्णन मिलता है।

कथा के अनुसार, एक समय महिषासुर नाम का शक्तिशाली असुर देवताओं के लिए संकट बन गया था। उसने अपनी शक्ति के बल पर स्वर्गलोक पर अधिकार करने की कोशिश की और देवताओं को पराजित कर दिया। कहा जाता है कि महिषासुर ने इंद्र का सिंहासन भी छीन लिया था। देवताओं के सामने अपनी सत्ता और व्यवस्था को बचाने का संकट खड़ा हो गया।

पराजित देवता सहायता के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुंचे। उन्होंने अपनी समस्या बताई और महिषासुर के अत्याचार से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। देवताओं की स्थिति देखकर त्रिदेवों से दिव्य ऊर्जा प्रकट हुई। इस ऊर्जा के एकत्र होने से एक शक्तिशाली देवी का स्वरूप सामने आया।

देवी को विभिन्न देवताओं ने अपने-अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। भगवान शिव ने त्रिशूल, भगवान विष्णु ने चक्र और अन्य देवताओं ने भी अपने अस्त्र प्रदान किए। इंद्र ने वज्र अर्पित किया। देवी के हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र थे और वह सिंह पर सवार थीं। उनका स्वरूप असाधारण शक्ति और तेज से परिपूर्ण बताया गया है।

देवताओं ने देवी से महिषासुर के अत्याचार का अंत करने की प्रार्थना की। इसके बाद देवी ने असुर और उसकी सेना का सामना किया। कथा के अनुसार, देवी ने युद्ध में महिषासुर को पराजित कर देवताओं को संकट से मुक्ति दिलाई।

मां चंद्रघंटा के स्वरूप को इसी व्यापक देवी शक्ति की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र होने के कारण उन्हें चंद्रघंटा नाम से जाना जाता है। उनका स्वरूप यह संदेश देता है कि जब अन्याय और अत्याचार बढ़ते हैं, तब धर्म की रक्षा के लिए शक्ति और साहस आवश्यक होते हैं।

यह कथा धार्मिक आस्था और पौराणिक परंपरा का हिस्सा है। भक्त इसे देवी की शक्ति, धर्म की रक्षा और बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में देखते हैं।

मां चंद्रघंटा की पूजा से क्या संदेश मिलता है?

मां चंद्रघंटा की पूजा का धार्मिक महत्व उनके स्वरूप से जुड़े गुणों में भी देखा जाता है। उनका सिंह पर सवार होना साहस और निर्भयता का प्रतीक माना जाता है। हाथों में अस्त्र-शस्त्र होना अन्याय के खिलाफ खड़े होने की शक्ति को दर्शाता है, जबकि उनके चेहरे की शांति संयम और करुणा का संदेश देती है।

जीवन में कई बार व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों, भय या अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है। मां चंद्रघंटा का स्वरूप ऐसे समय में धैर्य बनाए रखने और समझदारी से निर्णय लेने की प्रेरणा देता है। शक्ति का अर्थ केवल विरोध करना नहीं, बल्कि सही समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता भी है।

नवरात्र के तीसरे दिन पूजा करते समय भक्त अपने भीतर साहस, आत्मविश्वास और सकारात्मकता विकसित करने की कामना करते हैं। कई लोग इस अवसर पर अपने परिवार के साथ पूजा करते हैं, जरूरतमंदों की सहायता करते हैं और धार्मिक गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं।

इस तरह मां चंद्रघंटा की आराधना धार्मिक आस्था के साथ-साथ जीवन में संतुलन, संयम और जिम्मेदारी के महत्व को भी याद दिलाती है।

घर पर पूजा करते समय किन बातों का ध्यान रखें?

मां चंद्रघंटा की पूजा करते समय सबसे पहले पूजा स्थल की साफ-सफाई का ध्यान रखें। दीपक और धूप जलाते समय आग से संबंधित सावधानी बरतें। यदि घर में छोटे बच्चे या बुजुर्ग हैं, तो दीपक को सुरक्षित स्थान पर रखें।

पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री अपनी सुविधा के अनुसार चुनें। बहुत अधिक सामग्री जुटाने या महंगे प्रसाद की व्यवस्था करने की जरूरत नहीं है। श्रद्धा के साथ फूल, दीपक, जल और प्रसाद अर्पित करके भी पूजा की जा सकती है।

यदि आप नवरात्र का व्रत रख रहे हैं, तो अपनी सेहत और क्षमता को ध्यान में रखें। व्रत की परंपराएं परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं। स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर उपवास के बारे में डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर है।

पूजा के दौरान मंत्रों का जाप करते समय मन को शांत रखें। यदि आपको किसी मंत्र का उच्चारण ठीक से नहीं आता, तो उसे सीखकर जप सकते हैं या देवी के नाम का स्मरण कर सकते हैं। पूजा का उद्देश्य श्रद्धा और भक्ति के साथ देवी की आराधना करना है।

निष्कर्ष

शारदीय नवरात्र 2026 के तीसरे दिन, 13 अक्टूबर को मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा की जाएगी। उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है और उनका सिंह पर सवार स्वरूप शक्ति, साहस तथा निर्भयता का प्रतीक माना जाता है।

इस दिन भक्त सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं, देवी को लाल फूल और चुनरी अर्पित करते हैं, मंत्रों का जाप करते हैं और दूध या दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाते हैं। मां चंद्रघंटा का मंत्र ‘ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः’ श्रद्धा के साथ जपा जाता है।

ज्योतिषीय मान्यताओं में मां चंद्रघंटा की पूजा का संबंध मंगल ग्रह से भी जोड़ा जाता है। इसलिए कुछ श्रद्धालु इस दिन मंगल मंत्र का जाप और तांबे की वस्तु अर्पित करने जैसे पारंपरिक उपाय करते हैं। इन उपायों को धार्मिक आस्था के संदर्भ में समझना चाहिए।

महिषासुर के संहार से जुड़ी पौराणिक कथा मां की शक्ति और धर्म की रक्षा का संदेश देती है। मां चंद्रघंटा की पूजा भक्तों को यह प्रेरणा देती है कि जीवन में साहस के साथ संयम, करुणा और विवेक भी बनाए रखना चाहिए। नवरात्र के इस पावन अवसर पर श्रद्धालु माता रानी से परिवार की सुख-शांति, स्वास्थ्य और खुशहाली की कामना करते हैं।

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