रायबरेली में चोरी कबूल कराने के लिए युवक को थर्ड डिग्री देने का आरोप, बोला ‘हाथ-पांव काम नहीं कर रहे’, पुलिस ने शुरू की जांच

7

रायबरेली में मंदिर चोरी के मामले में युवक को थर्ड डिग्री देने का आरोप, बोला ‘हाथ-पांव काम नहीं कर रहे’

उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में पुलिस पर एक युवक के साथ कथित मारपीट और थर्ड डिग्री टॉर्चर करने के गंभीर आरोप लगे हैं। डीह थाना क्षेत्र के टेकारी दांदू गांव के रहने वाले रवि उर्फ कबीर अपने परिवार के साथ पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचे और पुलिसकर्मियों के खिलाफ शिकायत की। उनका आरोप है कि मंदिर में हुई चोरी को कबूल कराने के लिए उन्हें थाने में प्रताड़ित किया गया। युवक का दावा है कि जब उन्होंने चोरी करने से इनकार किया, तो पुलिसकर्मियों ने उनके साथ मारपीट की और जबरन जुर्म स्वीकार कराने की कोशिश की।

रवि के मुताबिक, उन्हें पट्टे और लाठी से पीटा गया। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों ने रस्सी से बांधकर उन्हें ऊपर लटकाया और गाली-गलौज भी की। युवक का कहना है कि कथित पिटाई के बाद उनके हाथ-पांव ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। उनकी हालत को लेकर परिवार भी चिंतित है। रवि ने बताया कि वह आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं और इलाज तथा दवाइयों का खर्च उठाने में परेशानी हो रही है।

दूसरी ओर, पुलिस का कहना है कि रवि को मंदिर में हुई चोरी के मामले में संदेह के आधार पर पूछताछ के लिए बुलाया गया था। क्षेत्राधिकारी के मुताबिक, उन्हें अलग-अलग तारीखों पर पूछताछ के लिए बुलाया गया और फिर छोड़ दिया गया। पुलिस ने युवक की ओर से लगाए गए आरोपों की जांच कराने की बात कही है। फिलहाल, मामले में दोनों पक्षों के बयान सामने आए हैं और कथित पुलिस प्रताड़ना की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।

क्या है पूरा मामला?

मामला रायबरेली के डीह थाना क्षेत्र के टेकारी दांदू गांव से जुड़ा है। यहां स्थित टेकारी महल परिसर के मंदिर में अक्टूबर की शुरुआत में चोरी की घटना सामने आई थी। मंदिर से मूर्तियां, आभूषण और अन्य कीमती सामान चोरी होने की शिकायत दर्ज कराई गई थी। घटना के बाद पुलिस ने जांच शुरू की और संदिग्धों से पूछताछ की।

इसी चोरी के मामले में रवि उर्फ कबीर का नाम सामने आया। युवक का कहना है कि पुलिस उन्हें पकड़कर थाने ले गई और चोरी कबूल करने के लिए दबाव बनाया। उनके मुताबिक, उन्होंने चोरी करने से इनकार किया, लेकिन इसके बावजूद पुलिसकर्मियों ने उनके साथ मारपीट की।

रवि ने पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचकर अपनी शिकायत रखी। उन्होंने आरोप लगाया कि थाने में उनके साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया, उससे उनकी शारीरिक स्थिति बिगड़ गई। उन्होंने कहा कि अब उनके हाथ-पांव पहले की तरह काम नहीं कर रहे हैं और उन्हें इलाज की जरूरत है।

इस मामले में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि मंदिर चोरी की जांच और पुलिस प्रताड़ना के आरोप दो अलग-अलग विषय हैं। पुलिस को चोरी की जांच करने और संदिग्धों से कानून के अनुसार पूछताछ करने का अधिकार है, लेकिन किसी व्यक्ति को अपराध कबूल कराने के लिए कथित रूप से पीटना या प्रताड़ित करना गंभीर आरोप है। यदि ऐसा हुआ है, तो इसकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच जरूरी होगी।

फिलहाल, रवि ने पुलिसकर्मियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं, जबकि पुलिस ने कहा है कि उन्हें केवल पूछताछ के लिए बुलाया गया था। जांच में यह स्पष्ट करना होगा कि युवक को किन परिस्थितियों में थाने लाया गया, कितने समय तक रखा गया और उनके साथ किसी तरह की मारपीट हुई या नहीं।

रवि उर्फ कबीर ने क्या आरोप लगाए?

रवि के अनुसार, टेकारी महल परिसर के मंदिर में चोरी के मामले में पुलिस उन्हें पूछताछ के लिए थाने ले गई थी। उनका आरोप है कि वहां पुलिसकर्मियों ने उनसे बार-बार चोरी स्वीकार करने को कहा। उन्होंने चोरी में शामिल होने से इनकार किया, लेकिन कथित तौर पर पुलिसकर्मियों ने उन पर दबाव बनाना जारी रखा।

युवक का दावा है कि जब उन्होंने अपराध कबूल नहीं किया, तो उनके साथ मारपीट की गई। उन्होंने डीह थाने में तैनात सुभाष यादव नाम के पुलिसकर्मी और दो अन्य पुलिसकर्मियों पर पिटाई करने का आरोप लगाया है। रवि का कहना है कि उन्हें अन्य दोनों पुलिसकर्मियों के नाम नहीं मालूम हैं।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों ने उनके साथ गाली-गलौज की और उन्हें शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया। रवि के मुताबिक, कथित मारपीट के दौरान उन्हें पट्टे और लाठी से पीटा गया। उन्होंने रस्सी से बांधकर ऊपर लटकाए जाने का आरोप भी लगाया है।

इन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए मामले में संबंधित पुलिसकर्मियों के बयान, थाने के रिकॉर्ड और युवक की चिकित्सकीय जांच महत्वपूर्ण हो सकते हैं। फिलहाल आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है। इसलिए यह जरूरी है कि शिकायत की जांच बिना किसी पूर्व निष्कर्ष के की जाए।

यदि जांच में हिरासत के दौरान मारपीट या गैरकानूनी प्रताड़ना के साक्ष्य मिलते हैं, तो संबंधित कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जा सकती है। वहीं, यदि आरोपों से संबंधित कोई तथ्य सामने नहीं आता, तो जांच में उसके कारण और परिस्थितियां भी स्पष्ट होनी चाहिए।

‘हमारा हाथ-पांव काम नहीं कर रहा’

रवि ने अपनी शिकायत में कहा कि कथित मारपीट के बाद उनकी शारीरिक स्थिति खराब हो गई। उन्होंने बताया कि उनके हाथ-पांव ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। इसी परेशानी के चलते उन्हें इलाज कराना पड़ा और उनकी स्थिति को लेकर परिवार चिंतित है।

रवि के अनुसार, उनका पहले जिला अस्पताल में इलाज चल रहा था। बाद में उन्हें एम्स के लिए रेफर किया गया। हालांकि, उनकी मौजूदा चिकित्सकीय स्थिति और इलाज से जुड़े सभी विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं होती है।

युवक ने अपनी आर्थिक परेशानी का जिक्र करते हुए कहा कि उनके पास इलाज और दवाइयों के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं। उनके मुताबिक, परिवार की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर है। ऐसे में शारीरिक रूप से काम करने में परेशानी होने से उनके सामने रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने की चुनौती खड़ी हो गई है।

रवि ने बताया कि उनके चार बच्चे हैं। उन्होंने परिवार के भविष्य को लेकर चिंता जताई और कहा कि अगर वह काम नहीं कर पाए, तो परिवार का खर्च कैसे चलेगा। उनके बयान से यह स्पष्ट होता है कि वह कथित मारपीट के आरोपों के साथ-साथ इलाज और आर्थिक मदद की समस्या भी अधिकारियों के सामने रखना चाहते हैं।

किसी व्यक्ति को गंभीर चोट लगने या हाथ-पांव में कमजोरी महसूस होने की स्थिति में चिकित्सकीय जांच जरूरी होती है। ऐसे मामलों में डॉक्टरों की रिपोर्ट से चोटों की प्रकृति और उपचार की जरूरत के बारे में जानकारी मिल सकती है। यदि हिरासत में प्रताड़ना का आरोप लगाया गया है, तो चिकित्सकीय दस्तावेज जांच के महत्वपूर्ण हिस्सों में शामिल हो सकते हैं।

पांच दिन तक थाने में रखने का दावा

रवि ने दावा किया कि उन्हें लगभग पांच दिन तक थाने में रखा गया और छठे दिन छोड़ा गया। उनका कहना है कि इस अवधि में उनके साथ कथित तौर पर मारपीट की गई। हालांकि, पुलिस की ओर से इस अवधि और हिरासत में प्रताड़ना के आरोपों की पुष्टि नहीं की गई है।

पुलिस के मुताबिक, रवि को चोरी के मामले में पूछताछ के लिए अलग-अलग तारीखों पर बुलाया गया था। क्षेत्राधिकारी ने बताया कि उन्हें 3, 5 और 6 तारीख को पूछताछ के लिए बुलाया गया और फिर छोड़ दिया गया। पुलिस के इस बयान और युवक के दावे में अंतर है।

यही अंतर इस मामले की जांच को महत्वपूर्ण बनाता है। जांच में यह स्पष्ट करना होगा कि रवि को किन तारीखों पर थाने लाया गया, क्या उन्हें लगातार हिरासत में रखा गया या अलग-अलग दिनों में पूछताछ की गई और प्रत्येक बार उन्हें कब छोड़ा गया।

इसके लिए थाने की जनरल डायरी, उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज, संबंधित अधिकारियों की ड्यूटी से जुड़े रिकॉर्ड और पूछताछ से संबंधित दस्तावेजों की जांच की जा सकती है। यदि युवक को किसी औपचारिक हिरासत में रखा गया था, तो उससे जुड़े कानूनी रिकॉर्ड भी महत्वपूर्ण होंगे।

किसी व्यक्ति को पूछताछ के लिए बुलाना और उसे कई दिनों तक हिरासत में रखना एक जैसी परिस्थितियां नहीं हैं। इसलिए जांच में केवल मौखिक बयानों पर निर्भर रहने के बजाय उपलब्ध दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों को भी देखा जाना चाहिए।

भाजपा नेता के पहुंचने के बाद छोड़े जाने का दावा

रवि ने अपनी शिकायत में यह भी दावा किया कि रमेश सिंह नाम के एक भाजपा नेता पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचे थे। उनके मुताबिक, नेता के पहुंचने के बाद ही उन्हें छोड़ा गया।

यह दावा भी फिलहाल युवक के बयान पर आधारित है। इस घटनाक्रम की स्वतंत्र पुष्टि के लिए संबंधित व्यक्ति का बयान और थाने के रिकॉर्ड देखना जरूरी होगा। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि रवि को छोड़ने का निर्णय किस अधिकारी ने लिया और उस समय क्या परिस्थितियां थीं।

रवि ने पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचकर अपने साथ हुई कथित घटना की शिकायत की। उनके साथ परिवार के सदस्य भी मौजूद थे। उन्होंने पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करने और अपनी परेशानी का समाधान करने की मांग की।

ऐसे मामलों में शिकायतकर्ता की बात सुनने के साथ-साथ संबंधित पुलिसकर्मियों का पक्ष लेना भी जरूरी है। निष्पक्ष जांच का उद्देश्य किसी एक पक्ष की बात को तुरंत सही या गलत घोषित करना नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर घटनाक्रम की वास्तविक स्थिति सामने लाना होता है।

यदि किसी राजनीतिक या अन्य सार्वजनिक व्यक्ति की मौजूदगी से युवक को छोड़े जाने के दावे की पुष्टि होती है, तो यह भी जांच का हिस्सा हो सकता है। फिलहाल इस दावे को आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

पुलिस का क्या कहना है?

रवि के आरोपों पर क्षेत्राधिकारी सलोन ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मामला उनकी जानकारी में है। उनके मुताबिक, युवक को मंदिर चोरी के मामले में संदेह के आधार पर पूछताछ के लिए बुलाया गया था।

क्षेत्राधिकारी के अनुसार, रवि को 3, 5 और 6 तारीख को पूछताछ के लिए बुलाया गया था और उसके बाद छोड़ दिया गया। पुलिस अधिकारी ने यह भी कहा कि अब युवक थाने की पुलिस पर मारपीट और प्रताड़ना के आरोप लगा रहे हैं।

पुलिस ने मामले की जांच क्षेत्राधिकारी को सौंपने की बात कही है। वहीं, मंदिर चोरी की जांच अभी जारी बताई गई है। उपलब्ध जानकारी में पुलिस की ओर से कथित मारपीट के आरोपों की पुष्टि नहीं की गई है।

पुलिस का पक्ष इस मामले में महत्वपूर्ण है, क्योंकि चोरी की जांच के तहत पूछताछ की परिस्थितियों को स्पष्ट करना जरूरी है। लेकिन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि युवक को पूछताछ के लिए बुलाया गया था। जांच में यह भी देखा जाना चाहिए कि पूछताछ के दौरान कानून और निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन हुआ या नहीं।

यदि युवक को चोटें आई हैं, तो चिकित्सकीय रिपोर्ट और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों की जांच जरूरी होगी। इसी तरह, पुलिसकर्मियों के बयान और थाने के रिकॉर्ड से यह पता लगाया जा सकता है कि रवि कब आए, कितनी देर रहे और उन्हें किस परिस्थिति में छोड़ा गया।

फिलहाल पुलिस ने जांच का भरोसा दिया है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि युवक के आरोपों में कितनी सच्चाई है और क्या किसी कर्मचारी की भूमिका की जांच के आधार पर आगे कार्रवाई की जरूरत है।

किस मंदिर में हुई थी चोरी?

यह मामला रायबरेली के डीह थाना क्षेत्र के टेकारी दांदू गांव स्थित टेकारी महल परिसर में बने मंदिर से जुड़ा है। अक्टूबर की शुरुआत में यहां चोरी की घटना सामने आई थी। मंदिर से शिव-पार्वती की अष्टधातु की बताई गई मूर्तियां, सोने-चांदी के आभूषण और अन्य कीमती सामान चोरी होने की सूचना मिली थी।

चोरी की शिकायत के बाद पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया और जांच के लिए कई टीमें लगाई गईं। पुलिस ने घटनास्थल से साक्ष्य जुटाने के साथ संदिग्धों से पूछताछ भी की। इस मामले में एसओजी, सर्विलांस टीम और डॉग स्क्वायड की मदद लिए जाने की जानकारी सामने आई थी।

मीडिया रिपोर्टों में चोरी गए सामान में चांदी के बर्तन, नकदी, आभूषण और मूर्तियों का उल्लेख किया गया है। शुरुआती रिपोर्टों में चोरी की कीमत लगभग 80 लाख रुपये बताई गई थी। हालांकि, चोरी गए सामान की अंतिम सूची और वास्तविक कीमत का निर्धारण जांच तथा उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर किया जाना जरूरी है।

मंदिर में चोरी की घटना के बाद पुलिस पर जल्द खुलासा करने का दबाव रहा होगा, लेकिन किसी मामले को सुलझाने के लिए संदिग्धों से पूछताछ कानून के दायरे में रहकर ही की जानी चाहिए। किसी व्यक्ति पर संदेह होना अपने आप में उसे दोषी साबित नहीं करता।

रवि उर्फ कबीर का नाम इसी जांच के दौरान सामने आया। अब उनके द्वारा पुलिस पर लगाए गए आरोपों की जांच और मंदिर चोरी की जांच दोनों महत्वपूर्ण हैं। एक मामले में चोरी के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करनी है, जबकि दूसरे में यह देखना है कि पूछताछ के दौरान युवक के साथ कोई गैरकानूनी व्यवहार हुआ या नहीं।

पुलिस पूछताछ और थर्ड डिग्री के आरोप क्यों गंभीर हैं?

पुलिस का काम अपराध की जांच करना, साक्ष्य जुटाना और संदिग्धों से पूछताछ करना है। लेकिन पूछताछ के दौरान किसी व्यक्ति को मारना, धमकाना या जबरन अपराध कबूल कराने के लिए प्रताड़ित करना कानून के शासन और मानवाधिकारों से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।

किसी व्यक्ति का अपराध स्वीकार करना ही किसी मामले का एकमात्र आधार नहीं होना चाहिए। जांच में स्वतंत्र साक्ष्य, घटनास्थल से मिले सबूत, गवाहों के बयान और अन्य प्रासंगिक जानकारी महत्वपूर्ण होती है। किसी भी आरोप की जांच निष्पक्ष तरीके से की जानी चाहिए।

हिरासत में मारपीट के आरोप सामने आने पर शिकायतकर्ता की चिकित्सकीय जांच, थाने के रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और संबंधित पुलिसकर्मियों के बयान जैसे साक्ष्य महत्वपूर्ण हो सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति की शारीरिक स्थिति बिगड़ने का दावा है, तो डॉक्टरों की रिपोर्ट से यह समझने में मदद मिल सकती है कि उसे किस प्रकार की चोट या समस्या हुई।

इस मामले में रवि का कहना है कि उनके हाथ-पांव काम नहीं कर रहे हैं। यह एक गंभीर दावा है, जिसकी पुष्टि चिकित्सकीय जांच और संबंधित दस्तावेजों से की जानी चाहिए। उपलब्ध जानकारी से उनकी पूरी चिकित्सकीय स्थिति का स्वतंत्र निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

इसी तरह, पुलिसकर्मियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को भी जांच से पहले अंतिम रूप से साबित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। निष्पक्ष प्रक्रिया में शिकायतकर्ता और आरोपित कर्मचारियों, दोनों का पक्ष सुना जाना चाहिए।

जांच में किन बातों पर ध्यान देना जरूरी है?

इस मामले में जांच के दौरान कई सवालों के जवाब मिलना महत्वपूर्ण होगा।

पहला सवाल यह है कि रवि को पूछताछ के लिए किस आधार पर बुलाया गया था और उनसे संबंधित चोरी के मामले में पुलिस के पास क्या जानकारी थी। दूसरा, उन्हें थाने में किन तारीखों पर बुलाया गया और हर बार कितनी देर तक पूछताछ हुई। तीसरा, क्या उन्हें लगातार पांच दिन तक थाने में रखा गया, जैसा कि युवक का दावा है, या अलग-अलग तारीखों पर पूछताछ की गई, जैसा कि पुलिस अधिकारी ने बताया।

चौथा सवाल यह है कि क्या रवि के शरीर पर चोटों के निशान हैं और उनकी चिकित्सकीय रिपोर्ट क्या कहती है। पांचवां, क्या थाने में उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज या अन्य रिकॉर्ड से घटना की परिस्थितियों का पता लगाया जा सकता है। छठा, क्या किसी पुलिसकर्मी ने युवक के साथ मारपीट या अनुचित व्यवहार किया।

इन सवालों के जवाब मिलने से आरोपों की निष्पक्ष जांच में मदद मिल सकती है। यदि कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है या उसमें विसंगतियां हैं, तो जांच अधिकारी को उन परिस्थितियों को भी स्पष्ट करना चाहिए।

इसके अलावा, यह देखना जरूरी होगा कि युवक की शिकायत पर क्या औपचारिक कार्रवाई की गई है और जांच की प्रगति क्या है। शिकायतकर्ता और उसके परिवार को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि मामले की जांच किस स्तर पर है और उनकी शिकायत पर क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

परिवार पर क्या असर पड़ा?

रवि ने अपने बयान में परिवार की आर्थिक स्थिति को लेकर चिंता जताई। उन्होंने बताया कि उनके चार बच्चे हैं और परिवार की जिम्मेदारियां उनके ऊपर हैं। उनका दावा है कि कथित मारपीट के बाद उनकी शारीरिक स्थिति बिगड़ने से काम करना मुश्किल हो गया है।

यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक काम नहीं कर पाता, तो इसका असर उसके परिवार की आय, इलाज के खर्च और रोजमर्रा की जरूरतों पर पड़ सकता है। रवि ने इसी परेशानी का जिक्र करते हुए कहा कि उनके पास दवाइयों और उपचार के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं।

उन्होंने जिला अस्पताल में इलाज कराने और एम्स के लिए रेफर किए जाने की बात कही। इस संबंध में उनकी चिकित्सकीय स्थिति और उपचार के विवरण की पुष्टि संबंधित मेडिकल रिकॉर्ड से की जा सकती है।

फिलहाल, युवक की आर्थिक परेशानी और परिवार की चिंता उनके बयान का हिस्सा है। उनकी वास्तविक स्थिति का पूरा आकलन करने के लिए परिवार की परिस्थितियों और इलाज से संबंधित जानकारी की पुष्टि जरूरी होगी।

आगे क्या होगा?

रायबरेली पुलिस ने कहा है कि मामले की जांच कराई जा रही है। जांच में युवक की शिकायत, पुलिसकर्मियों के बयान और उपलब्ध दस्तावेजों को देखा जाना चाहिए। यदि चिकित्सकीय रिपोर्ट उपलब्ध है, तो उसे भी जांच में शामिल करना महत्वपूर्ण होगा।

मंदिर चोरी के मामले की जांच अलग से जारी है। पुलिस को चोरी के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करने और साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई करने की जरूरत है। साथ ही, रवि के आरोपों की निष्पक्ष जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि पूछताछ के दौरान कोई नियम उल्लंघन हुआ था या नहीं।

यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई का सवाल उठेगा। यदि आरोपों की पुष्टि नहीं होती, तो जांच में सामने आए तथ्यों और निष्कर्षों को स्पष्ट करना भी जरूरी होगा।

निष्कर्ष

रायबरेली के डीह थाना क्षेत्र में मंदिर चोरी के मामले ने अब पुलिस पूछताछ के दौरान कथित प्रताड़ना को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रवि उर्फ कबीर का आरोप है कि चोरी कबूल कराने के लिए उन्हें पट्टे और लाठी से पीटा गया, रस्सी से बांधकर लटकाया गया और गाली-गलौज की गई। उनका कहना है कि अब उनके हाथ-पांव ठीक से काम नहीं कर रहे और इलाज के लिए पैसे जुटाना मुश्किल हो रहा है।

दूसरी ओर, पुलिस का कहना है कि रवि को चोरी के संदेह में अलग-अलग तारीखों पर पूछताछ के लिए बुलाया गया था। क्षेत्राधिकारी के मुताबिक, उन्हें 3, 5 और 6 तारीख को बुलाया गया और बाद में छोड़ दिया गया। पुलिस ने मामले की जांच कराने की बात कही है।

अब सबसे जरूरी है कि युवक की शिकायत की निष्पक्ष जांच हो, चिकित्सकीय तथ्यों और थाने के रिकॉर्ड की समीक्षा की जाए तथा दोनों पक्षों के बयानों का सत्यापन किया जाए। मंदिर चोरी के मामले में दोषियों की पहचान करना जरूरी है, लेकिन किसी संदिग्ध के साथ गैरकानूनी व्यवहार की शिकायत को भी गंभीरता से लेना चाहिए।

जांच के निष्कर्ष ही यह स्पष्ट करेंगे कि रवि के आरोपों में कितनी सच्चाई है और क्या किसी पुलिसकर्मी के खिलाफ कार्रवाई की आवश्यकता है।

Share it :

End