जग्गा-कालिया को अलग करने वाले प्रसिद्ध न्यूरोसर्जन डॉ. अशोक कुमार महापात्र का निधन, AIIMS भोपाल के अध्यक्ष थे

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देश के प्रसिद्ध न्यूरोसर्जन और पद्मश्री से सम्मानित प्रोफेसर डॉ. अशोक कुमार महापात्र के निधन से चिकित्सा जगत में शोक की लहर है। जटिल मस्तिष्क सर्जरी के लिए पहचाने जाने वाले डॉ. महापात्र ने अपने लंबे करियर में चिकित्सा विज्ञान, न्यूरोसर्जरी, मेडिकल शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थानों के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया। उन्हें खास तौर पर साल 2017 में ओडिशा के सिर से जुड़े जुड़वां बच्चों जग्गा और कालिया को अलग करने वाली ऐतिहासिक सर्जरी का नेतृत्व करने के लिए याद किया जाता है।

डॉ. महापात्र का सोमवार शाम दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी AIIMS में इलाज के दौरान निधन हो गया। वह 74 वर्ष के थे। उनके निधन की खबर सामने आने के बाद ओडिशा सहित देशभर के चिकित्सा विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और राजनीतिक नेताओं ने दुख व्यक्त किया। उन्हें एक कुशल सर्जन, शोधकर्ता, शिक्षक और संस्थान निर्माता के रूप में याद किया जा रहा है।

जग्गा-कालिया की सर्जरी से मिली देश-दुनिया में पहचान

डॉ. अशोक कुमार महापात्र के करियर की सबसे चर्चित उपलब्धियों में साल 2017 में जग्गा और कालिया को अलग करने वाली जटिल सर्जरी शामिल रही। ओडिशा के कंधमाल जिले से ताल्लुक रखने वाले ये दोनों बच्चे सिर से जुड़े हुए पैदा हुए थे। चिकित्सा विज्ञान में इस स्थिति को क्रेनियोपैगस कहा जाता है। ऐसे मामलों में बच्चों के सिर की हड्डियों, रक्त वाहिकाओं और मस्तिष्क के आसपास की संरचनाओं के बीच जटिल जुड़ाव हो सकता है। इस कारण उन्हें अलग करना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है।

दिल्ली AIIMS में विशेषज्ञों की बहु-विषयक टीम ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया था। डॉ. महापात्र ने इस टीम का नेतृत्व किया। सर्जरी कई चरणों में की गई और इसमें न्यूरोसर्जरी के साथ-साथ अन्य चिकित्सा विशेषज्ञों की भूमिका भी अहम रही। ऑपरेशन के बाद दोनों बच्चों के जीवित रहने को चिकित्सा क्षेत्र की बड़ी उपलब्धि माना गया। इस घटना ने भारत में जटिल न्यूरोसर्जरी की क्षमता को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया।

जग्गा और कालिया की कहानी केवल एक सफल ऑपरेशन तक सीमित नहीं थी। यह लंबे समय तक चली चिकित्सकीय निगरानी, पुनर्वास और विशेषज्ञ देखभाल की भी कहानी थी। ऐसे मामलों में सर्जरी के बाद बच्चों की स्थिति पर लगातार नजर रखना जरूरी होता है। डॉ. महापात्र और उनकी टीम की कोशिश ने यह दिखाया कि अत्यंत जटिल परिस्थितियों में भी समन्वित चिकित्सा प्रयास मरीजों के लिए नई संभावनाएं पैदा कर सकते हैं।

इस उपलब्धि के कारण डॉ. महापात्र को देश के अग्रणी न्यूरोसर्जनों में गिना जाने लगा। उनके काम ने कई युवा डॉक्टरों और मेडिकल विद्यार्थियों को न्यूरोसर्जरी के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

ओडिशा के पुरी में हुआ था जन्म

डॉ. अशोक कुमार महापात्र का जन्म 29 दिसंबर 1952 को ओडिशा के पुरी में हुआ था। उनका शुरुआती जीवन और शिक्षा ओडिशा में ही हुई। उन्होंने MKCG मेडिकल कॉलेज और अस्पताल, बेरहामपुर से MBBS की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद वह उच्च चिकित्सा शिक्षा और विशेषज्ञ प्रशिक्षण के लिए दिल्ली स्थित AIIMS पहुंचे।

AIIMS दिल्ली से उन्होंने सर्जरी में MS और न्यूरोसर्जरी में MCh की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने इसी संस्थान में चिकित्सा सेवा, अध्यापन और शोध के क्षेत्र में लंबा समय बिताया। उनके करियर का बड़ा हिस्सा AIIMS दिल्ली में बीता, जहां उन्होंने न्यूरोसर्जरी विभाग और न्यूरोसाइंसेज सेंटर से जुड़े महत्वपूर्ण पदों पर काम किया।

करीब चार दशक से अधिक के पेशेवर जीवन में उन्होंने मरीजों के इलाज के साथ-साथ मेडिकल शिक्षा और शोध को भी प्राथमिकता दी। उनके काम का दायरा केवल ऑपरेशन थिएटर तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने चिकित्सा संस्थानों के विकास, नई सुविधाओं की शुरुआत, शोध गतिविधियों और युवा डॉक्टरों के प्रशिक्षण में भी योगदान दिया।

AIIMS दिल्ली में करीब 42 साल की सेवा

डॉ. महापात्र ने AIIMS दिल्ली में लगभग 42 साल तक विभिन्न जिम्मेदारियां निभाईं। वह न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रमुख रहे और न्यूरोसाइंसेज सेंटर के नेतृत्व से भी जुड़े रहे। उन्होंने डीन रिसर्च सहित कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक और अकादमिक भूमिकाएं संभालीं।

AIIMS दिल्ली देश के प्रमुख चिकित्सा संस्थानों में गिना जाता है। यहां लंबे समय तक सेवा देने के दौरान डॉ. महापात्र ने जटिल न्यूरोलॉजिकल और न्यूरोसर्जिकल मामलों के इलाज में अनुभव हासिल किया। उन्होंने मरीजों की देखभाल, चिकित्सा प्रशिक्षण और शोध के बीच बेहतर तालमेल बनाने पर जोर दिया।

उनकी अकादमिक उपलब्धियां भी उल्लेखनीय रहीं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उन्होंने लगभग 870 शोध पत्र प्रकाशित किए, 16 किताबें लिखीं और 140 से अधिक पुस्तक अध्यायों में योगदान दिया। उनके शोध को हजारों बार उद्धृत किया गया। यह उपलब्धियां बताती हैं कि उनका प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं था, बल्कि वैश्विक चिकित्सा शोध समुदाय में भी उनके काम को महत्व मिला।

SGPGIMS लखनऊ के निदेशक के रूप में काम

AIIMS दिल्ली में लंबे समय तक काम करने के बाद डॉ. महापात्र को उत्तर प्रदेश के संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज यानी SGPGIMS, लखनऊ का निदेशक नियुक्त किया गया। उन्होंने 2006 से 2009 तक इस पद पर काम किया।

उनके कार्यकाल में संस्थान में कई चिकित्सा सुविधाओं और विभागों के विकास पर ध्यान दिया गया। उच्च स्तरीय चिकित्सा संस्थानों में केवल विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि मरीजों के लिए आधुनिक उपकरण, प्रशिक्षित कर्मचारी, शोध सुविधाएं और व्यवस्थित प्रशासन भी जरूरी होता है। डॉ. महापात्र ने इन क्षेत्रों में सुधार और विस्तार की दिशा में काम किया।

SGPGIMS में उनके नेतृत्व को संस्थान के विकास और नई सुविधाओं की शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है। उनके प्रशासनिक अनुभव ने आगे AIIMS भुवनेश्वर जैसे नए संस्थान के निर्माण और संचालन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

AIIMS भुवनेश्वर के संस्थापक निदेशक बने

डॉ. अशोक कुमार महापात्र के करियर की एक और बड़ी उपलब्धि AIIMS भुवनेश्वर के संस्थापक निदेशक के रूप में उनकी भूमिका रही। साल 2012 में उन्हें इस संस्थान की जिम्मेदारी सौंपी गई। उस समय संस्थान को विकसित करना, चिकित्सा शिक्षा शुरू करना और मरीजों के लिए आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था करना बड़ी चुनौती थी।

उन्होंने संस्थान के शुरुआती ढांचे को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व में MBBS, नर्सिंग, स्नातकोत्तर और सुपर स्पेशियलिटी पाठ्यक्रमों की शुरुआत की गई। मेडिकल शिक्षा के साथ-साथ अस्पताल सेवाओं और शोध गतिविधियों को भी आगे बढ़ाया गया।

AIIMS भुवनेश्वर के विकास को ओडिशा में उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जाता है। इस संस्थान के माध्यम से राज्य और आसपास के क्षेत्रों के मरीजों को उन्नत चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में काम हुआ।

डॉ. महापात्र 2012 से 2016 तक AIIMS भुवनेश्वर के निदेशक रहे। संस्थान की स्थापना और शुरुआती विकास में उनके योगदान के कारण उन्हें इसके संस्थापक निदेशक के रूप में याद किया जाता है।

SOA यूनिवर्सिटी में कुलपति की जिम्मेदारी

AIIMS भुवनेश्वर में अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के बाद डॉ. महापात्र ने चिकित्सा शिक्षा और अकादमिक नेतृत्व के क्षेत्र में काम जारी रखा। वह भुवनेश्वर स्थित सिकsha ‘O’ Anusandhan यानी SOA यूनिवर्सिटी के कुलपति बने। उन्होंने 2020 से 2022 तक इस पद पर काम किया।

कोविड-19 महामारी के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं और चिकित्सा शिक्षा के सामने अभूतपूर्व चुनौतियां थीं। इस दौर में चिकित्सा संस्थानों को मरीजों के लिए बेड, जांच सुविधाएं, स्वास्थ्यकर्मियों की व्यवस्था और शोध गतिविधियों को मजबूत करना पड़ा। डॉ. महापात्र की भूमिका इस अवधि में संस्थागत नेतृत्व और स्वास्थ्य सेवा के समन्वय से जुड़ी रही।

कुलपति पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वह SOA से जुड़े चिकित्सा संस्थान में सलाहकार के रूप में भी काम करते रहे। उनके अनुभव का इस्तेमाल चिकित्सा शिक्षा, अस्पताल प्रशासन और शोध के क्षेत्र में किया जाता रहा।

पद्मश्री से किया गया सम्मानित

चिकित्सा विज्ञान और न्यूरोसर्जरी के क्षेत्र में उनके योगदान को भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया। यह देश के प्रमुख नागरिक सम्मानों में से एक है। डॉ. महापात्र को यह सम्मान चिकित्सा सेवा, शोध और संस्थान निर्माण में उनके योगदान के लिए प्रदान किया गया।

उनकी उपलब्धियों में जटिल न्यूरोसर्जरी, मेडिकल शिक्षा का विस्तार, नए चिकित्सा संस्थानों का विकास और शोध कार्य शामिल रहे। पद्मश्री सम्मान ने उनके लंबे पेशेवर जीवन और चिकित्सा क्षेत्र में योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दी।

उनका करियर इस बात का उदाहरण माना जाता है कि चिकित्सा क्षेत्र में उत्कृष्टता केवल मरीजों के इलाज तक सीमित नहीं होती। शोध, शिक्षा, संस्थान निर्माण और अगली पीढ़ी के डॉक्टरों को प्रशिक्षित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

चिकित्सा जगत और राजनीतिक नेताओं ने जताया शोक

डॉ. महापात्र के निधन पर ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने दुख व्यक्त किया। उन्होंने उन्हें देश के प्रतिष्ठित न्यूरोसर्जनों और चिकित्सा विज्ञान की अग्रणी हस्तियों में से एक बताया। मुख्यमंत्री ने कहा कि डॉ. महापात्र ने स्वास्थ्य सेवा और शोध के क्षेत्र को समृद्ध किया तथा ओडिशा और देश का गौरव बढ़ाया।

ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता नवीन पटनायक ने भी उनके निधन पर शोक जताया। उन्होंने कहा कि डॉ. महापात्र ने चिकित्सा विज्ञान में अमिट छाप छोड़ी। AIIMS भुवनेश्वर की स्थापना और लोगों को उन्नत स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।

AIIMS भुवनेश्वर ने भी अपने संस्थापक निदेशक के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। संस्थान के डॉक्टरों, शिक्षकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों ने उन्हें एक दूरदर्शी संस्थान निर्माता, उत्कृष्ट न्यूरोसर्जन और प्रेरणादायक शिक्षक के रूप में याद किया।

एक डॉक्टर, शोधकर्ता और संस्थान निर्माता की विरासत

डॉ. अशोक कुमार महापात्र का निधन भारतीय चिकित्सा जगत के लिए बड़ी क्षति है। उनका जीवन चिकित्सा सेवा, कठिन परिस्थितियों में मरीजों के इलाज, शोध और संस्थान निर्माण के प्रति समर्पण का उदाहरण रहा। जग्गा और कालिया की सर्जरी ने उन्हें आम लोगों के बीच विशेष पहचान दिलाई, लेकिन उनका योगदान इससे कहीं व्यापक था।

AIIMS दिल्ली में दशकों की सेवा, SGPGIMS लखनऊ का नेतृत्व, AIIMS भुवनेश्वर की स्थापना और SOA यूनिवर्सिटी में अकादमिक जिम्मेदारी ने उनके करियर को कई आयाम दिए। उनके शोध और पुस्तकों ने चिकित्सा ज्ञान को आगे बढ़ाने में योगदान किया, जबकि उनके मार्गदर्शन में प्रशिक्षित डॉक्टर आगे स्वास्थ्य सेवाओं में अपनी भूमिका निभाते रहे।

उनकी उपलब्धियां आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेंगी। चिकित्सा जगत उन्हें एक ऐसे विशेषज्ञ के रूप में याद करेगा, जिन्होंने जटिल न्यूरोसर्जरी में अपनी दक्षता के साथ-साथ चिकित्सा शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों को मजबूत करने के लिए भी काम किया।

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