विजय माल्या की राह में बने रोड़ा, 40 करोड़ रुपये खर्च कर डैनी डेन्जोंगपा ने बचाया अपना कारोबारी साम्राज्य

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विजय माल्या की राह में बने रोड़ा, 40 करोड़ रुपये खर्च कर डैनी डेन्जोंगपा ने बचाया अपना कारोबारी साम्राज्य

बॉलीवुड में जब भी खतरनाक और दमदार खलनायकों की चर्चा होती है, तो डैनी डेन्जोंगपा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। अपनी गहरी आवाज, प्रभावशाली व्यक्तित्व और यादगार अभिनय से उन्होंने हिंदी सिनेमा में अलग पहचान बनाई। लेकिन पर्दे पर खलनायक के रूप में मशहूर डैनी की असल जिंदगी की कहानी भी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। फिल्मों में नाम और शोहरत हासिल करने के साथ-साथ उन्होंने शराब बनाने के कारोबार में भी बड़ा मुकाम बनाया।

डैनी डेन्जोंगपा का कारोबारी सफर सिक्किम से शुरू हुआ। उन्होंने अपने गांव युक्सोम के नाम पर युक्सम ब्रुअरीज की स्थापना की और धीरे-धीरे इसे एक मजबूत कंपनी के रूप में विकसित किया। बाद में उन्होंने ओडिशा और असम में भी कारोबार का विस्तार किया। इसी विस्तार के दौरान एक ऐसा कदम सामने आया, जिसने उन्हें देश के बड़े शराब कारोबारी विजय माल्या की कंपनी यूनाइटेड ब्रुअरीज के सामने खड़ा कर दिया।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, साल 2009 में डैनी की कंपनी ने असम की राइनो एजेंसीज लिमिटेड का अधिग्रहण करीब 40 करोड़ रुपये में किया था। उस समय यूनाइटेड ब्रुअरीज भी पूर्वोत्तर भारत के बाजार में अपनी मौजूदगी मजबूत करने की तैयारी कर रही थी। डैनी के इस अधिग्रहण को अपने कारोबार और क्षेत्रीय बाजार में पकड़ बनाए रखने की रणनीति के तौर पर देखा गया।

सेना में जाना चाहते थे डैनी, मां की सलाह पर बदला फैसला

डैनी डेन्जोंगपा का जन्म सिक्किम में हुआ था। बचपन से ही उनके मन में भारतीय सेना में अधिकारी बनने और देश की सेवा करने का सपना था। लेकिन 1960 के दशक में चीन के साथ तनाव और युद्ध जैसी परिस्थितियों के दौरान उन्होंने हिंसा और तबाही का भयावह दृश्य देखा। इस अनुभव ने उनकी मां को चिंतित कर दिया।

उनकी मां नहीं चाहती थीं कि बेटा सेना में जाकर ऐसी परिस्थितियों का सामना करे। उन्होंने डैनी से सेना में न जाने की गुजारिश की। डैनी ने मां की बात मानते हुए अपना फैसला बदल दिया और संगीत तथा अभिनय की ओर रुख किया।

इसके बाद उन्होंने पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया यानी FTII में अभिनय का प्रशिक्षण लिया। यहां से उनके फिल्मी सफर की शुरुआत हुई। 1970 के दशक में उन्होंने फिल्मों में छोटे और सहायक किरदार निभाए। धीरे-धीरे उनकी आवाज, स्क्रीन पर मौजूदगी और अभिनय की विशिष्ट शैली ने उन्हें बॉलीवुड के सबसे यादगार खलनायकों में शामिल कर दिया।

फिल्मों के साथ सिक्किम से जुड़ाव बनाए रखा

फिल्मों में सफलता मिलने के बाद डैनी डेन्जोंगपा मुंबई में रहने लगे, लेकिन सिक्किम से उनका लगाव हमेशा बना रहा। वह अपने गृह राज्य और परिवार के साथ अधिक समय बिताना चाहते थे। इसी कारण उन्होंने तय किया कि वह साल का कम से कम आधा समय सिक्किम में बिताएंगे।

सिक्किम में समय बिताने के दौरान उनके मन में स्थानीय स्तर पर कारोबार शुरू करने का विचार आया। वह ऐसा व्यवसाय खड़ा करना चाहते थे, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिले और राज्य की अर्थव्यवस्था को भी लाभ पहुंचे।

इसी सोच के साथ उन्होंने अपने गांव युक्सोम के नाम पर युक्सम ब्रुअरीज की शुरुआत की। कंपनी की स्थापना 1980 के दशक में हुई और 1987 में इसका उत्पादन शुरू हुआ। शुरुआती दौर में यह एक स्थानीय कारोबार था, लेकिन समय के साथ कंपनी ने अपनी उत्पादन क्षमता और बाजार का विस्तार किया।

डैनी का यह फैसला उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। फिल्मों से मिलने वाली कमाई और लोकप्रियता के साथ-साथ उनका कारोबारी साम्राज्य भी आकार लेने लगा।

युक्सम ब्रुअरीज कैसे बनी बड़ी कंपनी

युक्सम ब्रुअरीज ने सिक्किम में अपना कारोबार शुरू किया और धीरे-धीरे पूर्वोत्तर भारत के बाजार में अपनी पहचान बनाई। कंपनी के उत्पादों में Dansberg, Hit और He-Man जैसे ब्रांड शामिल रहे। स्थानीय बाजार में कंपनी की पकड़ मजबूत होने लगी और कारोबार ने राज्य की सीमाओं से बाहर विस्तार करना शुरू किया।

युक्सम ब्रुअरीज की सफलता का एक अहम कारण क्षेत्रीय बाजार की समझ थी। पूर्वोत्तर भारत में स्थानीय उत्पादन, वितरण व्यवस्था और बाजार तक पहुंच किसी भी शराब कंपनी के लिए महत्वपूर्ण कारक थे। डैनी की कंपनी ने इस क्षेत्र में अपना नेटवर्क विकसित किया और स्थानीय स्तर पर अपनी उपस्थिति मजबूत की।

समय के साथ कंपनी को देश की प्रमुख स्वतंत्र ब्रुअरी कंपनियों में गिना जाने लगा। कुछ रिपोर्टों में इसे भारत की तीसरी सबसे बड़ी ब्रुअरी और पूर्वोत्तर क्षेत्र की सबसे बड़ी ब्रुअरी बताया गया है। हालांकि, ऐसे उद्योग-आधारित दावों का आकलन अलग-अलग मानकों, जैसे उत्पादन, बिक्री या बाजार हिस्सेदारी, के आधार पर किया जा सकता है।

डैनी के लिए यह कारोबार केवल आर्थिक सफलता का साधन नहीं था। उन्होंने इसे अपने गृह राज्य से जुड़े रहने और स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान देने के तरीके के रूप में भी देखा।

2005 से शुरू हुआ कारोबार का विस्तार

युक्सम ब्रुअरीज ने 2005 के आसपास अपने कारोबार का विस्तार तेज किया। इसी दौर में डैनी ने ओडिशा में डेंजोंग ब्रुअरीज की स्थापना की। इससे कंपनी की उत्पादन और वितरण क्षमता बढ़ाने की दिशा में कदम उठाया गया।

इसके बाद कंपनी ने पूर्वोत्तर भारत के अन्य बाजारों में भी अपनी स्थिति मजबूत करने की योजना बनाई। असम इस रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण राज्य था, क्योंकि वहां उत्पादन सुविधा होने से क्षेत्रीय बाजार तक पहुंच बेहतर हो सकती थी।

साल 2009 में डैनी की कंपनी ने असम की राइनो एजेंसीज लिमिटेड का अधिग्रहण किया। यह कंपनी गुवाहाटी से जुड़ी थी और शराब उत्पादन तथा बाजार विस्तार के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही थी।

इस अधिग्रहण ने डैनी के कारोबारी नेटवर्क को सिक्किम से आगे बढ़ाकर असम तक पहुंचाया। इसके साथ ही कंपनी को पूर्वोत्तर भारत के बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर मिला।

विजय माल्या की यूनाइटेड ब्रुअरीज भी बना रही थी रणनीति

उस समय विजय माल्या की कंपनी यूनाइटेड ब्रुअरीज भारतीय बीयर उद्योग की बड़ी कंपनियों में शामिल थी। कंपनी का प्रमुख ब्रांड किंगफिशर देशभर में लोकप्रिय था। यूनाइटेड ब्रुअरीज पूर्वोत्तर भारत में अपनी उत्पादन और वितरण व्यवस्था मजबूत करना चाहती थी।

रिपोर्टों के अनुसार, यूनाइटेड ब्रुअरीज ने 2007 में गुवाहाटी स्थित राइनो एजेंसीज के साथ तकनीकी सलाह और लाइसेंस से जुड़ा समझौता किया था। इस व्यवस्था के जरिए कंपनी पूर्वोत्तर बाजार में अपनी उत्पादन मौजूदगी बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रही थी।

ऐसे में राइनो एजेंसीज का अधिग्रहण डैनी की कंपनी के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बन गया। यदि यह कंपनी यूनाइटेड ब्रुअरीज के नेटवर्क में शामिल हो जाती, तो क्षेत्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा का समीकरण बदल सकता था।

डैनी की कंपनी पहले से ही पूर्वोत्तर क्षेत्र में अपनी पकड़ बनाए हुए थी। एक बड़ी राष्ट्रीय कंपनी के विस्तार से स्थानीय कारोबार पर दबाव बढ़ने की आशंका थी। इसलिए राइनो एजेंसीज का अधिग्रहण अपने बाजार और कारोबारी हितों की रक्षा करने का कदम माना गया।

40 करोड़ रुपये में हुआ राइनो एजेंसीज का अधिग्रहण

साल 2009 में डैनी की कंपनी ने राइनो एजेंसीज लिमिटेड का अधिग्रहण किया। उस समय इस सौदे की कीमत करीब 40 करोड़ रुपये बताई गई थी। यह रकम एक क्षेत्रीय ब्रुअरी कंपनी के लिए बड़ा निवेश थी।

अधिग्रहण के जरिए डैनी की कंपनी ने असम में अपनी उत्पादन क्षमता और बाजार तक पहुंच को मजबूत किया। इससे कंपनी को पूर्वोत्तर भारत में अपने कारोबार का विस्तार करने में मदद मिली।

इस सौदे को कारोबारी रणनीति के लिहाज से एक महत्वपूर्ण कदम माना गया। एक तरफ यूनाइटेड ब्रुअरीज जैसी बड़ी कंपनी क्षेत्रीय बाजार में विस्तार कर रही थी, वहीं दूसरी तरफ डैनी की कंपनी अपने स्थानीय अनुभव और पहले से मौजूद नेटवर्क के आधार पर प्रतिस्पर्धा कर रही थी।

इस घटना को अक्सर बड़े कारोबारी समूह और क्षेत्रीय कंपनी के बीच मुकाबले के उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है। हालांकि, इसे केवल व्यक्तिगत दुश्मनी के रूप में देखना सही नहीं होगा। उपलब्ध कारोबारी रिपोर्टों में यह मामला मुख्य रूप से बाजार विस्तार, अधिग्रहण और प्रतिस्पर्धा से जुड़ा हुआ बताया गया है।

डैनी ने खुद बताया था कि ब्रुअरीज उनकी असली कमाई का जरिया हैं

डैनी डेन्जोंगपा ने अपने कारोबार की सफलता के बारे में एक पुराने इंटरव्यू में खुलकर बात की थी। साल 2009 में द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत के दौरान उनसे पूछा गया कि उनका ब्रुअरी कारोबार कैसा चल रहा है।

उन्होंने जवाब दिया था कि कारोबार बहुत अच्छा चल रहा है और सिक्किम में उनकी तीन ब्रुअरीज हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि ब्रुअरीज उनकी असली आजीविका का साधन हैं, जबकि अभिनय उनके जीवन में साथ-साथ चलता रहा।

उनके इस बयान से स्पष्ट होता है कि फिल्मों में लोकप्रियता हासिल करने के बावजूद कारोबारी गतिविधियां उनके जीवन का बड़ा हिस्सा बन चुकी थीं। अभिनय ने उन्हें पहचान और शोहरत दी, जबकि ब्रुअरी कारोबार ने उन्हें आर्थिक स्थिरता और अपने फैसले खुद लेने की स्वतंत्रता दी।

डैनी ने अपने कारोबारी जीवन को सार्वजनिक रूप से बहुत ज्यादा प्रचारित नहीं किया। वह फिल्मों की तरह अपने व्यवसाय को भी शांत तरीके से आगे बढ़ाते रहे। इसी कारण कई लोगों को लंबे समय तक यह जानकारी नहीं थी कि वह शराब उद्योग में भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।

कारोबार ने फिल्मों के चुनाव में दी आजादी

डैनी डेन्जोंगपा ने अपने करियर के बाद के वर्षों में फिल्मों को लेकर काफी चयनात्मक रवैया अपनाया। वह हर फिल्म या हर भूमिका स्वीकार करने के बजाय अपनी पसंद और सुविधा के अनुसार काम करना चाहते थे।

साल 2018 में Scroll के साथ बातचीत में उन्होंने बताया था कि उन्हें मुंबई की गर्मी पसंद नहीं है। वह आमतौर पर नवंबर से जनवरी के बीच मुंबई में शूटिंग करना पसंद करते हैं। उन्होंने कहा था कि गर्मियों में उमस और पसीने के कारण शूटिंग करना असहज हो जाता है।

डैनी ने यह भी बताया था कि वह रविवार को काम नहीं करते और कई बार उनका काम करने का मन नहीं होता। वह अपने काम की गति को लेकर सहज थे और अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीना चाहते थे।

उनके कारोबारी संसाधनों ने उन्हें यह स्वतंत्रता दी कि वह फिल्मों में काम करने के लिए आर्थिक दबाव महसूस न करें। वह भूमिकाएं चुन सकते थे, लंबे अंतराल ले सकते थे और अपने निजी जीवन को प्राथमिकता दे सकते थे।

बॉलीवुड में यादगार रहा डैनी का सफर

डैनी डेन्जोंगपा ने अपने लंबे फिल्मी करियर में कई यादगार किरदार निभाए। ‘धुंध’, ‘द बर्निंग ट्रेन’, ‘अग्निपथ’, ‘हम’, ‘क्रांतिवीर’ और ‘घातक’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को दर्शकों ने खूब पसंद किया।

साल 2010 में रजनीकांत की फिल्म ‘एंथिरन’ में उन्होंने मुख्य खलनायक की भूमिका निभाई। इसके अलावा ‘बेबी’ और ‘नाम शबाना’ जैसी फिल्मों में भी उनके किरदारों ने दर्शकों का ध्यान खींचा।

साल 2022 में सूरज बड़जात्या की फिल्म ‘ऊंचाई’ में वह बड़े पर्दे पर नजर आए। डैनी को साल 2003 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। यह सम्मान उनके कला और सिनेमा के क्षेत्र में योगदान की राष्ट्रीय मान्यता था।

पर्दे के खलनायक की असल जिंदगी में कारोबारी पहचान

डैनी डेन्जोंगपा की कहानी इस बात का उदाहरण है कि किसी कलाकार की पहचान केवल उसके फिल्मी किरदारों तक सीमित नहीं होती। उन्होंने अभिनय के साथ-साथ एक ऐसा कारोबार भी विकसित किया, जिसने उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाया और अपने गृह राज्य से जुड़े रहने का अवसर दिया।

युक्सम ब्रुअरीज की स्थापना, ओडिशा में विस्तार और असम की राइनो एजेंसीज का अधिग्रहण उनके कारोबारी सफर के महत्वपूर्ण पड़ाव रहे। 40 करोड़ रुपये का अधिग्रहण उस समय एक बड़ा निवेश था, जिसने पूर्वोत्तर भारत के बाजार में उनकी कंपनी की स्थिति मजबूत करने में मदद की।

विजय माल्या की यूनाइटेड ब्रुअरीज के साथ यह प्रतिस्पर्धा कारोबारी रणनीति और बाजार में अपनी जगह बनाए रखने की कहानी थी। डैनी ने अपने स्थानीय नेटवर्क, अनुभव और निवेश के जरिए एक बड़ी कंपनी के विस्तार के सामने अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की।

आज डैनी डेन्जोंगपा को बॉलीवुड के यादगार खलनायकों के साथ-साथ एक सफल कारोबारी के रूप में भी याद किया जाता है। उनकी कहानी बताती है कि पर्दे पर खतरनाक दिखने वाला अभिनेता वास्तविक जीवन में धैर्य, रणनीति और उद्यमशीलता के जरिए अपना अलग साम्राज्य खड़ा कर सकता है।

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