‘बच्चों को रातोंरात स्कूलों से नहीं निकाल सकते’, बॉम्बे हाई कोर्ट से मलाड के 14 गैर-मान्यता प्राप्त स्कूलों को राहत

8

मुंबई के मलाड पश्चिम स्थित मालवणी इलाके में संचालित 14 कथित तौर पर गैर-मान्यता प्राप्त स्कूलों को बॉम्बे हाई कोर्ट से राहत मिली है। अदालत ने विद्यार्थियों के भविष्य और उनके जारी शैक्षणिक वर्ष को ध्यान में रखते हुए कहा कि बच्चों की पढ़ाई बीच सत्र में बाधित नहीं होनी चाहिए। अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि यदि स्कूलों को अचानक बंद कर दिया गया, तो वहां पढ़ रहे विद्यार्थियों को गंभीर और अपूरणीय नुकसान हो सकता है।

यह मामला उन 14 स्कूलों के खिलाफ मुंबई महानगरपालिका की ओर से की जा रही कार्रवाई से जुड़ा है, जिन्हें कथित तौर पर आवश्यक मान्यता के बिना संचालित किया जा रहा था। स्कूलों को बंद करने की कार्रवाई को चुनौती देते हुए नाजिर बशीर खान ने बॉम्बे हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। याचिका में सवाल उठाया गया कि विद्यार्थियों की पढ़ाई और उनके शैक्षणिक भविष्य की व्यवस्था किए बिना स्कूलों को तत्काल बंद करने की कार्रवाई कैसे की जा सकती है।

मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान विद्यार्थियों के हितों को महत्वपूर्ण माना। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से स्कूलों की मान्यता, विद्यार्थियों और शिक्षकों की संख्या, बोर्ड से संबद्धता, संचालन की अवधि तथा स्कूल प्रबंधन के खिलाफ की गई कार्रवाई की जानकारी मांगी है।

विद्यार्थियों का शैक्षणिक वर्ष बीच में बाधित न हो

अदालत ने कहा कि संबंधित स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों का वर्तमान शैक्षणिक वर्ष पहले से जारी है। ऐसे में अचानक स्कूल बंद होने से उनकी पढ़ाई प्रभावित हो सकती है। अदालत ने इस संभावना पर विचार करने की बात कही कि क्या विद्यार्थियों को मौजूदा शैक्षणिक वर्ष पूरा करने की अनुमति देने के लिए कोई अंतरिम राहत दी जा सकती है।

पीठ ने विद्यार्थियों की स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि उनका शैक्षणिक वर्ष बीच में बाधित या अस्थिर नहीं होना चाहिए। ऐसा होने से उन्हें गंभीर और अपूरणीय नुकसान हो सकता है। अदालत की चिंता का केंद्र यह था कि स्कूलों की मान्यता से जुड़े विवाद का असर उन बच्चों पर न पड़े, जो नियमित रूप से वहां पढ़ाई कर रहे हैं।

हालांकि, अदालत ने स्कूलों की कानूनी स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया। उसने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित संस्थानों के संचालन, मान्यता और अधिकारियों की भूमिका की जांच की जानी आवश्यक है। विद्यार्थियों के हितों की रक्षा और शिक्षा से जुड़े नियमों के पालन, दोनों पहलुओं पर विचार किया जाएगा।

14 स्कूलों की मान्यता और संचालन पर सवाल

यह जनहित याचिका मालवणी, मलाड पश्चिम में संचालित 14 स्कूलों को तत्काल बंद करने की कार्रवाई के खिलाफ दायर की गई थी। याचिका में मुंबई महानगरपालिका के शिक्षा विभाग की कार्रवाई को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि स्कूलों को बंद करने से पहले विद्यार्थियों की शिक्षा जारी रखने के लिए प्रभावी वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।

महानगरपालिका की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित स्कूलों को समय-समय पर नोटिस जारी किए गए थे। इन नोटिसों में स्कूलों को नए विद्यार्थियों के प्रवेश की प्रक्रिया शुरू नहीं करने के निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद, निगम के अनुसार, स्कूल नए विद्यार्थियों को प्रवेश दे रहे थे और वहां पढ़ाई भी जारी थी।

महानगरपालिका ने संबंधित स्कूलों को अनधिकृत और गैर-मान्यता प्राप्त बताया। अदालत ने इस दलील को सुनते हुए कहा कि स्कूलों की स्थिति और उनके संचालन से जुड़े तथ्य स्पष्ट होने चाहिए। पीठ ने यह भी कहा कि यदि स्कूलों को मान्यता प्राप्त नहीं थी, तो यह जांचना होगा कि संबंधित सक्षम अधिकारियों ने उन्हें इतने समय तक संचालित होने की अनुमति किन परिस्थितियों में दी।

अदालत ने अधिकारियों से मांगा विस्तृत हलफनामा

बॉम्बे हाई कोर्ट ने संबंधित सक्षम प्राधिकरण को विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसमें स्कूलों की वर्तमान स्थिति और उनके संचालन से जुड़ी कई जानकारियां शामिल करनी होंगी।

अदालत ने अधिकारियों से निम्नलिखित विवरण मांगे हैं:

  • क्या संबंधित स्कूलों के पास संचालन की वैध अनुमति या मान्यता है?
  • स्कूल अनुदानित हैं, गैर-अनुदानित हैं या किसी अन्य श्रेणी में आते हैं?
  • प्रत्येक स्कूल में कितने विद्यार्थी पढ़ रहे हैं?
  • स्कूलों में कितने शिक्षक कार्यरत हैं?
  • क्या स्कूल किसी मान्यता प्राप्त शिक्षा बोर्ड से संबद्ध हैं?
  • संबंधित स्कूल कब से विद्यार्थियों को शिक्षा दे रहे हैं?
  • स्कूलों या उनके प्रबंधन के खिलाफ अब तक क्या कार्रवाई की गई है?
  • स्कूलों को संचालित होने देने में संबंधित अधिकारियों की क्या भूमिका रही?

अदालत के अनुसार, इन विवरणों से मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने में मदद मिलेगी। इससे यह भी समझा जा सकेगा कि स्कूलों के संचालन में नियमों का पालन हुआ या नहीं और प्रशासन ने पहले क्या कदम उठाए थे।

स्कूलों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज

याचिका में शामिल 14 स्कूलों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने की जानकारी भी अदालत के सामने रखी गई। इस तथ्य के बाद मामला केवल स्कूल बंद करने की प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्कूलों और उनके प्रबंधन के खिलाफ की गई कानूनी कार्रवाई का पहलू भी सुनवाई का हिस्सा बन गया।

अदालत ने अधिकारियों से स्कूलों के खिलाफ की गई कार्रवाई का विवरण मांगा है। इसमें यह स्पष्ट करना होगा कि किन आधारों पर कार्रवाई की गई और संबंधित स्कूलों को किस तरह के नोटिस दिए गए थे। साथ ही यह भी बताया जाना है कि स्कूलों के प्रबंधन के खिलाफ कोई अन्य कार्रवाई हुई है या नहीं।

मामले में अदालत ने अभी स्कूलों की मान्यता या कार्रवाई की वैधता पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। फिलहाल उसका ध्यान आवश्यक तथ्यों को जुटाने और विद्यार्थियों के शैक्षणिक वर्ष को सुरक्षित रखने की संभावनाओं पर है।

याचिकाकर्ता ने स्कूल बंद करने की कार्रवाई को चुनौती दी

नाजिर बशीर खान की जनहित याचिका में मुंबई महानगरपालिका की ओर से 14 स्कूलों को बंद करने के लिए की जा रही कार्रवाई को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया कि स्कूलों को बंद करने से पहले विद्यार्थियों की शिक्षा जारी रखने के लिए प्रभावी वैकल्पिक व्यवस्था की जानी चाहिए।

याचिकाकर्ता ने शिक्षा के अधिकार और विद्यार्थियों के हितों का हवाला देते हुए अदालत से राहत की मांग की। उनका पक्ष था कि स्कूलों की मान्यता से जुड़े विवाद के कारण बच्चों की पढ़ाई अचानक समाप्त नहीं होनी चाहिए। याचिका में स्कूलों को जारी रखने की अनुमति देने और संबंधित कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाने जैसी राहतों की मांग भी की गई।

अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान विद्यार्थियों के भविष्य को लेकर चिंता जताई। उसने कहा कि स्कूलों के संचालन की वैधता की जांच जरूरी है, लेकिन साथ ही यह भी देखना होगा कि वहां पढ़ रहे बच्चों को अचानक पढ़ाई से वंचित न होना पड़े।

शिक्षा के अधिकार और नियमों के बीच संतुलन

यह मामला शिक्षा के अधिकार और स्कूलों के नियमन से जुड़े दो महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने लाता है। एक ओर शिक्षा संस्थानों के लिए निर्धारित मान्यता और नियमों का पालन जरूरी है। दूसरी ओर, स्कूलों में पढ़ रहे विद्यार्थियों की शिक्षा और उनके शैक्षणिक भविष्य की रक्षा भी महत्वपूर्ण है।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम स्कूलों के संचालन और मान्यता से संबंधित व्यवस्था तय करता है। इस कानून के तहत स्कूलों को आवश्यक मान्यता और निर्धारित मानकों का पालन करना होता है। गैर-मान्यता प्राप्त संस्थानों के संचालन पर कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन जब किसी स्कूल में बड़ी संख्या में विद्यार्थी पढ़ रहे हों, तो कार्रवाई के दौरान उनकी शिक्षा की निरंतरता का सवाल भी उठता है।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने इसी संतुलन पर विचार करने की बात कही है। अदालत ने स्कूलों की स्थिति स्पष्ट करने के लिए अधिकारियों से जानकारी मांगी है और साथ ही यह भी कहा है कि वर्तमान शैक्षणिक वर्ष को बीच में बाधित करने से विद्यार्थियों को नुकसान हो सकता है।

अचानक स्कूल बंद होने से विद्यार्थियों पर असर

यदि किसी स्कूल को शैक्षणिक सत्र के बीच में बंद किया जाता है, तो विद्यार्थियों को नए स्कूल में प्रवेश लेने, पाठ्यक्रम के साथ तालमेल बैठाने और परीक्षा की तैयारी में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। खासकर प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों के लिए स्कूल बदलना एक बड़ा बदलाव हो सकता है।

ऐसी स्थिति में विद्यार्थियों की पढ़ाई, उपस्थिति, पाठ्यक्रम और परीक्षा से जुड़ी व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका रहती है। अदालत ने इसी तरह की संभावित परेशानियों को ध्यान में रखते हुए मौजूदा शैक्षणिक वर्ष पूरा करने के लिए राहत दिए जाने की संभावना पर विचार करने की बात कही।

हालांकि, राहत का स्वरूप और उसकी शर्तें अदालत के आगे के आदेशों पर निर्भर करेंगी। स्कूलों को स्थायी रूप से संचालन की अनुमति मिल गई है, ऐसा अभी नहीं कहा जा सकता। अदालत ने फिलहाल विद्यार्थियों के हितों को ध्यान में रखते हुए मामले के तथ्यों की जांच और आगे की सुनवाई का रास्ता अपनाया है।

प्रशासन की जवाबदेही भी जांच के दायरे में

अदालत ने केवल स्कूलों की मान्यता की स्थिति पर ही सवाल नहीं उठाया, बल्कि यह भी जानना चाहा कि संबंधित अधिकारियों ने इन संस्थानों को किस परिस्थिति में संचालित होने दिया। यदि स्कूल लंबे समय से चल रहे थे, तो उनके संचालन की निगरानी और मान्यता संबंधी प्रक्रिया पर भी सवाल उठ सकते हैं।

इसलिए अधिकारियों को यह बताना होगा कि स्कूल कब से संचालित हो रहे थे, उनके खिलाफ पहले क्या कदम उठाए गए और क्या कार्रवाई की गई। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि स्कूलों को मान्यता प्राप्त बोर्ड से संबद्धता मिली थी या नहीं।

इस जानकारी से यह समझने में मदद मिलेगी कि विवाद केवल स्कूलों के प्रबंधन तक सीमित है या इसमें प्रशासनिक निगरानी से जुड़े सवाल भी शामिल हैं। अदालत ने इन तथ्यों को सामने लाने के लिए हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।

आगे की सुनवाई पर टिकी नजर

बॉम्बे हाई कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद अदालत स्कूलों की स्थिति, महानगरपालिका की कार्रवाई और विद्यार्थियों के शैक्षणिक हितों से जुड़े पहलुओं पर आगे विचार करेगी।

मामले में अदालत का रुख फिलहाल यह है कि स्कूलों की मान्यता से संबंधित नियमों की जांच होनी चाहिए, लेकिन विद्यार्थियों की पढ़ाई को बीच सत्र में अचानक बाधित नहीं किया जाना चाहिए। इसी आधार पर अदालत यह देखेगी कि मौजूदा शैक्षणिक वर्ष पूरा करने के लिए कोई अंतरिम राहत दी जा सकती है या नहीं।

इस मामले का अंतिम फैसला स्कूलों के संचालन और विद्यार्थियों की शिक्षा, दोनों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। फिलहाल 14 स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों और उनके अभिभावकों की नजर अदालत की अगली सुनवाई और प्रशासन की ओर से दाखिल किए जाने वाले हलफनामे पर है।

बॉम्बे हाई कोर्ट की टिप्पणी ने स्पष्ट किया है कि स्कूलों की मान्यता का प्रश्न महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई में विद्यार्थियों के भविष्य और शिक्षा की निरंतरता को भी ध्यान में रखना होगा। अदालत ने इसी मानवीय और कानूनी पहलू को साथ लेकर आगे बढ़ने का संकेत दिया है।

Share it :

End