नेशनल कॉन्फ्रेंस में नहीं थम रही नाराजगी, 10 विधायकों की बंद कमरे में तीसरी बैठक से बढ़ी सियासी हलचल

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नेशनल कॉन्फ्रेंस में नहीं थम रही नाराजगी, 10 विधायकों की बंद कमरे में तीसरी बैठक से बढ़ी सियासी हलचल

जम्मू-कश्मीर की सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) में मंत्रिमंडल विस्तार के बाद शुरू हुई नाराजगी थमने का नाम नहीं ले रही है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के हालिया कैबिनेट फेरबदल से असंतुष्ट विधायकों ने बुधवार को श्रीनगर में बंद कमरे में तीसरी बैठक की। बैठक में करीब 10 से 15 विधायकों के शामिल होने की खबर है। इन नेताओं ने पार्टी नेतृत्व के सामने रखी गई मांगों पर चर्चा की और आगे की रणनीति पर विचार किया।

पार्टी के भीतर बढ़ती खींचतान ऐसे समय सामने आई है, जब वरिष्ठ नेता और विधायक मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने से नाराज हैं। दूसरी ओर, श्रीनगर के सांसद सैयद आगा रुहुल्लाह मेहदी ने पार्टी से अलग होने का ऐलान कर दिया है। इस घटनाक्रम ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के सामने राजनीतिक और संगठनात्मक चुनौती बढ़ा दी है।

बुधवार की बैठक उस समय भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जब वरिष्ठ नेता मुबारक गुल की ओर से पार्टी नेतृत्व को अपनी मांगों पर विचार करने के लिए दी गई समयसीमा समाप्त हो गई। गुल ने मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने सहित अपनी मांगों पर फैसला करने के लिए 4 नवंबर तक का समय दिया था। हालांकि, बैठक के बाद उन्होंने तत्काल कोई बड़ा ऐलान नहीं किया और कहा कि वह उचित समय पर अपनी बात रखेंगे।

कैबिनेट फेरबदल के बाद बढ़ी नाराजगी

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने 27 अक्टूबर को अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल और विस्तार किया था। सरकार के गठन के लगभग दो साल बाद हुए इस बदलाव से उम्मीद थी कि खाली पद भरे जाएंगे और प्रशासनिक कामकाज को मजबूती मिलेगी। लेकिन मंत्रिमंडल में जगह नहीं पाने वाले कई वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी खुलकर सामने आ गई।

इस फेरबदल में अली मोहम्मद सागर, मीर सैफुल्लाह, शमीमा फिरदौस और अल्ताफ अहमद वानी को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। वहीं, जम्मू क्षेत्र से निर्दलीय विधायक सतीश शर्मा को मंत्रिमंडल से हटाया गया। नए मंत्रियों के शामिल होने के बाद पार्टी के कुछ वरिष्ठ विधायक खुद को उपेक्षित महसूस करने लगे।

नाराज नेताओं का कहना है कि मंत्रिमंडल गठन में वरिष्ठता, राजनीतिक अनुभव और पार्टी के प्रति योगदान को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। कुछ विधायकों ने यह भी सवाल उठाया कि जिन नेताओं ने लंबे समय तक पार्टी के लिए काम किया, उन्हें मंत्रिमंडल में जगह क्यों नहीं मिली।

इस असंतोष के चलते विधायकों ने अलग-अलग बैठकों के बजाय सामूहिक रूप से अपनी मांगें रखने का रास्ता अपनाया। लगातार हो रही बंद कमरे की बैठकों को पार्टी नेतृत्व पर दबाव बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

तीसरी बैठक में आगे की रणनीति पर चर्चा

बुधवार को हुई बैठक में विधायकों ने अपनी मांगों और पार्टी नेतृत्व से अपेक्षित कार्रवाई पर चर्चा की। रिपोर्टों के अनुसार, यह बैठक श्रीनगर में विधायक नजीर अहमद गुरेजी के आवास पर हुई। इससे पहले भी नाराज विधायक अलग-अलग स्थानों पर बैठक कर चुके हैं।

बैठक में शामिल नेताओं ने अपनी मांगों को दोहराया और नेतृत्व से ठोस कदम उठाने की अपेक्षा जताई। कुछ विधायकों का कहना है कि उनकी शिकायतें पहले ही पार्टी अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला तक पहुंचाई जा चुकी हैं। अब वे चाहते हैं कि नेतृत्व इन मुद्दों पर स्पष्ट जवाब दे।

विधायकों के बीच चर्चा का मुख्य विषय मंत्रिमंडल में बदलाव, वरिष्ठ नेताओं को उचित प्रतिनिधित्व, मुख्यमंत्री के सलाहकारों की भूमिका और पार्टी के चुनावी वादों को पूरा करना रहा। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने और अनुच्छेद 370 से जुड़े मुद्दों पर पार्टी के रुख को लेकर भी असंतोष जताया गया है।

हालांकि, अब तक ऐसी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है कि नाराज विधायक पार्टी छोड़ने जा रहे हैं या सरकार के खिलाफ कोई निर्णायक कदम उठाने वाले हैं। उनकी बैठकों को फिलहाल पार्टी के भीतर सुधार और नेतृत्व पर दबाव बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

18 से 20 विधायकों की मांगों का चार्टर

पार्टी के भीतर नाराजगी केवल कुछ विधायकों तक सीमित नहीं बताई जा रही। पिछले दिनों करीब 18 से 20 विधायकों ने बैठक कर अपनी शिकायतों और मांगों का एक चार्टर तैयार किया था। कुछ रिपोर्टों में इस समूह में सरकार को समर्थन देने वाले निर्दलीय विधायकों के शामिल होने की भी बात कही गई।

विधायकों की मांगों में मंत्रिमंडल के मौजूदा सदस्यों के प्रदर्शन की समीक्षा और कुछ मंत्रियों को बदलने की मांग प्रमुख रही है। उनका कहना है कि सरकार के गठन के बाद से जिन मंत्रियों को जिम्मेदारी दी गई थी, उनके कामकाज का मूल्यांकन होना चाहिए और जरूरत के अनुसार नए नेताओं को अवसर दिया जाना चाहिए।

कुछ विधायकों ने मुख्यमंत्री के सलाहकारों की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि सलाहकारों का प्रभाव पार्टी और प्रशासनिक निर्णयों में बढ़ गया है, जबकि निर्वाचित विधायकों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा। इन आरोपों को पार्टी नेतृत्व की ओर से औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया है।

विधायकों की मांगों में क्षेत्रीय संतुलन का मुद्दा भी शामिल है। उनका कहना है कि मंत्रिमंडल में जम्मू, कश्मीर और विभिन्न जिलों को उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। पार्टी के भीतर यह भावना भी सामने आई है कि कुछ क्षेत्रों के नेताओं को अधिक महत्व मिला, जबकि अन्य क्षेत्रों के प्रतिनिधियों को अपेक्षित जगह नहीं मिली।

चार मंत्रियों को बदलने की मांग

नाराज विधायकों के एक समूह ने मुख्यमंत्री से मंत्रिमंडल में व्यापक बदलाव की मांग की है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, वे उन चार मंत्रियों को बदलने की मांग कर रहे हैं जो अक्टूबर 2024 में सरकार बनने के समय से मंत्रिमंडल में शामिल रहे हैं। उनका तर्क है कि इससे वरिष्ठ और हालिया फेरबदल में उपेक्षित नेताओं को मौका मिल सकता है।

इस मांग का अर्थ यह नहीं है कि सभी विधायकों की राय या अंतिम रणनीति एक जैसी है। अलग-अलग नेताओं ने अपनी नाराजगी के अलग कारण बताए हैं। कुछ का जोर वरिष्ठता और राजनीतिक अनुभव पर है, जबकि कुछ ने मंत्रियों के कामकाज और विभागों के प्रदर्शन को मुद्दा बनाया है।

उपमुख्यमंत्री सुरिंदर सिंह चौधरी के विभागों को लेकर भी कुछ विधायकों ने पहले शिकायतें की थीं। रिपोर्टों में कहा गया है कि कुछ नेताओं ने लोक निर्माण विभाग (PWD) के कामकाज और विधायकों के साथ व्यवहार को लेकर असंतोष जताया था। इन शिकायतों पर मुख्यमंत्री की ओर से पहले विचार किए जाने की बात भी कही गई थी।

नाराज विधायकों का आरोप है कि पहले दिए गए आश्वासनों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। उनके मुताबिक, कैबिनेट फेरबदल ने पहले से मौजूद असंतोष को और बढ़ा दिया।

मुख्यमंत्री के सलाहकारों को हटाने की मांग

नाराज विधायकों की मांगों में मुख्यमंत्री के सलाहकार नासिर असलम वानी और शम्मी ओबेरॉय की भूमिका भी शामिल है। कुछ विधायकों ने आरोप लगाया है कि सलाहकारों का प्रभाव पार्टी के आंतरिक मामलों और प्रशासनिक फैसलों में बढ़ गया है।

विशेष रूप से नासिर असलम वानी को लेकर कई विधायकों ने अपनी नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की राय को महत्व दिया जाना चाहिए और पार्टी के निर्णयों में विधायकों की भागीदारी बढ़नी चाहिए।

इन आरोपों के बीच पार्टी नेतृत्व की ओर से मतभेदों को आंतरिक मामला बताया गया है। पार्टी के कुछ नेताओं ने उम्मीद जताई है कि बातचीत के जरिए विवाद सुलझाया जा सकता है। लेकिन लगातार बैठकों और सार्वजनिक बयानबाजी से स्पष्ट है कि असंतोष अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

मुबारक गुल की समयसीमा समाप्त

वरिष्ठ नेता मुबारक गुल की नाराजगी ने भी पार्टी के भीतर तनाव बढ़ाया है। गुल कई बार विधायक रह चुके हैं और जम्मू-कश्मीर विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष भी हैं। उन्हें हालिया कैबिनेट विस्तार में शामिल नहीं किया गया, जिससे उनके समर्थकों में नाराजगी देखी गई।

गुल ने 27 अक्टूबर को पार्टी नेतृत्व से अपनी मांगों पर विचार करने के लिए 4 नवंबर तक का समय दिया था। उनकी मांगों में मंत्रिमंडल में जगह देने का मुद्दा प्रमुख था। समयसीमा समाप्त होने के दिन उन्होंने अपने समर्थकों से मुलाकात की और आगे की रणनीति पर चर्चा की।

हालांकि, बैठक के बाद गुल ने तत्काल कोई बड़ा ऐलान करने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि वह अपने साथियों की भावनाओं और विचारों का सम्मान करते हैं और उचित समय पर अपनी बात रखेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि वह संघर्ष जारी रखेंगे।

गुल के बयान से यह संकेत मिला कि वह अपनी नाराजगी वापस लेने के लिए तैयार नहीं हैं, लेकिन फिलहाल उन्होंने पार्टी छोड़ने या कोई अंतिम राजनीतिक कदम उठाने की घोषणा नहीं की है।

आगा रुहुल्लाह के पार्टी छोड़ने से बढ़ी मुश्किल

नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए एक और बड़ा झटका श्रीनगर के सांसद सैयद आगा रुहुल्लाह मेहदी का पार्टी छोड़ने का ऐलान रहा। रुहुल्लाह ने 3 नवंबर को अपने पिता आगा सैयद मेहदी की 26वीं पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम में पार्टी नेतृत्व की आलोचना की और अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर संकेत दिए।

रुहुल्लाह ने आरोप लगाया कि पार्टी नेतृत्व ने जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक अधिकारों और अनुच्छेद 370 की बहाली के मुद्दे पर अपने चुनावी वादों से दूरी बना ली है। उन्होंने फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला पर भी निशाना साधा।

रुहुल्लाह ने 2024 में नेशनल कॉन्फ्रेंस के टिकट पर श्रीनगर लोकसभा सीट जीती थी। उनके पार्टी से अलग होने के फैसले ने संगठन के भीतर पहले से मौजूद असंतोष को और गंभीर बना दिया है।

रिपोर्टों के अनुसार, रुहुल्लाह ने नए राजनीतिक संगठन की संभावना का भी संकेत दिया। हालांकि, उनके आगे के राजनीतिक कदम और संगठन की रूपरेखा को लेकर अंतिम स्थिति स्पष्ट नहीं है।

चुनावी वादों और अनुच्छेद 370 पर भी मतभेद

नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर असंतोष का एक प्रमुख पहलू पार्टी के चुनावी वादों से जुड़ा है। 2024 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने और अनुच्छेद 370 से जुड़े मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट किया था।

कुछ नाराज विधायक चाहते हैं कि सरकार और पार्टी नेतृत्व इन मुद्दों पर अधिक सक्रिय और स्पष्ट भूमिका निभाएं। उनका कहना है कि जनता ने जिन वादों के आधार पर पार्टी को समर्थन दिया, उन्हें पूरा करने के लिए ठोस प्रयास किए जाने चाहिए।

आगा रुहुल्लाह ने भी पार्टी छोड़ने के अपने फैसले के दौरान इसी मुद्दे को प्रमुखता दी। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी नेतृत्व ने संवैधानिक अधिकारों की बहाली के संघर्ष को कमजोर किया है।

हालांकि, पार्टी नेतृत्व की ओर से इन आरोपों पर अलग-अलग समय पर जवाब दिए गए हैं। इस मुद्दे पर मतभेद केवल मंत्रिमंडल में जगह मिलने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पार्टी की राजनीतिक दिशा और चुनावी प्रतिबद्धताओं से भी जुड़े हैं।

नेतृत्व के सामने चुनौती: असंतोष को बातचीत से सुलझाना

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पार्टी अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती नाराज विधायकों को एकजुट रखना है। मंत्रिमंडल में सीमित पदों के कारण सभी वरिष्ठ नेताओं को जगह देना संभव नहीं था, लेकिन फेरबदल के बाद जिस तरह असंतोष सामने आया है, उससे नेतृत्व पर बातचीत और समन्वय का दबाव बढ़ गया है।

पार्टी के कुछ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि मतभेद परिवार के भीतर की तरह हैं और उन्हें जल्द सुलझा लिया जाएगा। वहीं, नाराज विधायकों का कहना है कि केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं हैं और उनकी मांगों पर ठोस कार्रवाई होनी चाहिए।

कुछ वरिष्ठ नेता दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं। उनका उद्देश्य नाराज विधायकों और पार्टी नेतृत्व के बीच सीधी बातचीत का रास्ता तैयार करना है। लेकिन अभी तक किसी व्यापक समझौते की औपचारिक घोषणा नहीं हुई है।

क्या सरकार की स्थिरता पर असर पड़ेगा?

लगातार हो रही बैठकों और वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी ने उमर अब्दुल्ला सरकार की राजनीतिक स्थिरता को लेकर सवाल उठाए हैं। हालांकि, अब तक नाराज विधायकों ने सरकार से समर्थन वापस लेने या विधानसभा में सरकार के खिलाफ मतदान करने की कोई औपचारिक घोषणा नहीं की है।

इसलिए पार्टी के भीतर असंतोष को सीधे सरकार गिरने के संकट के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। फिलहाल यह विवाद मंत्रिमंडल के गठन, संगठनात्मक निर्णयों और पार्टी की राजनीतिक दिशा को लेकर है।

फिर भी, यदि नाराजगी लंबे समय तक बनी रहती है और नेतृत्व के साथ बातचीत सफल नहीं होती, तो इसका असर सरकार के कामकाज और पार्टी की एकजुटता पर पड़ सकता है। विपक्ष भी इन मतभेदों को राजनीतिक मुद्दा बना सकता है।

आगे क्या होगा?

बुधवार की तीसरी बंद कमरे की बैठक के बाद अब सबकी नजर पार्टी नेतृत्व की प्रतिक्रिया पर है। मुबारक गुल की समयसीमा समाप्त हो चुकी है, आगा रुहुल्लाह पार्टी छोड़ने का ऐलान कर चुके हैं और नाराज विधायक अपनी मांगों पर कायम हैं।

आने वाले दिनों में यह स्पष्ट हो सकता है कि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला असंतुष्ट नेताओं के साथ औपचारिक बातचीत करते हैं या मंत्रिमंडल में आगे कोई बदलाव किया जाता है। साथ ही यह भी देखना होगा कि पार्टी अपने चुनावी वादों और संगठनात्मक शिकायतों पर क्या रुख अपनाती है।

फिलहाल नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर जारी मतभेदों ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। लगातार बैठकों से यह संकेत मिलता है कि नाराज विधायक अपनी मांगों को सामूहिक रूप से आगे बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन पार्टी में किसी टूट या सरकार के खिलाफ निर्णायक कदम की पुष्टि अभी नहीं हुई है।

आने वाले दिनों में नेतृत्व की बातचीत, नाराज विधायकों की अगली रणनीति और पार्टी के आधिकारिक फैसले इस राजनीतिक संकट की दिशा तय करेंगे।

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