
मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिला अस्पताल से सामने आया एक बेहद गंभीर मामला कई सवाल खड़े कर रहा है। अस्पताल की स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट यानी SNCU में महज एक दिन की नवजात बच्ची मृत पाई गई। शुरुआत में इसे सामान्य मौत माना जा रहा था, लेकिन बच्ची के शरीर पर मिले निशानों और बाद में सामने आई पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पूरे मामले को संदिग्ध बना दिया। जांच में बच्ची की मौत गला दबाने से होने की बात सामने आई है।
अब पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि अस्पताल की निगरानी में रखी गई इतनी छोटी बच्ची की जान आखिर किसने ली और क्यों। सबसे बड़ा सवाल इसलिए खड़ा हुआ है क्योंकि घटना के समय बच्ची तक पहुंच रखने वाले लोगों में उसकी मां और दादी भी शामिल थीं। पुलिस दोनों से पूछताछ कर रही है। हालांकि, अभी तक मां या दादी के खिलाफ हत्या का कोई अंतिम आरोप साबित नहीं हुआ है और जांच जारी है।
घटना ने इसलिए भी गंभीर रूप ले लिया है क्योंकि जिस SNCU में बच्ची भर्ती थी, वहां CCTV कैमरे नहीं लगे होने की जानकारी सामने आई है। इसका मतलब है कि घटना के निर्णायक समय का सीधा वीडियो फुटेज पुलिस के पास उपलब्ध नहीं है। अब जांचकर्ताओं को अस्पताल के आसपास लगे दूसरे कैमरों, मेडिकल रिकॉर्ड, कर्मचारियों के बयान और परिवार के सदस्यों से पूछताछ के जरिए पूरी कड़ी जोड़नी होगी।
बच्ची के जन्म के कुछ ही घंटे बाद बदल गई कहानी
मामला अशोकनगर जिले के चंदेरी क्षेत्र से जुड़े एक परिवार का है। सकरा गांव की रहने वाली भावना ने अस्पताल में एक बच्ची को जन्म दिया था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार बच्ची का जन्म शुक्रवार और शनिवार की दरमियानी रात हुआ था। जन्म के बाद उसे चिकित्सकीय निगरानी के लिए जिला अस्पताल की SNCU में रखा गया।
परिवार के लिए यह बच्ची बेहद छोटी उम्र में ही अस्पताल की विशेष निगरानी में पहुंच गई थी। SNCU में ऐसे नवजात बच्चों को रखा जाता है जिन्हें जन्म के बाद विशेष चिकित्सकीय निगरानी या उपचार की जरूरत होती है।
शुरुआत में परिवार को उम्मीद थी कि डॉक्टरों की निगरानी में बच्ची सुरक्षित रहेगी। लेकिन शनिवार दोपहर के आसपास अचानक उसकी हालत को लेकर गंभीर स्थिति सामने आई। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक बच्ची को दूध पिलाने के बाद मां ने उसे अचेत अवस्था में पाया। दूसरी जानकारी के अनुसार मां बच्ची को अपने पास सुलाकर कुछ देर के लिए सो गई थी और जागने पर बच्ची को कोई हरकत करते नहीं देखा।
इसके बाद परिजनों ने स्वास्थ्यकर्मियों को सूचना दी। डॉक्टरों ने बच्ची की जांच की, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका।
यहीं से मामला सामान्य नवजात मृत्यु से बदलकर संदिग्ध मौत की जांच में पहुंच गया।
गले पर दिखे गहरे निशान
डॉक्टरों ने बच्ची की हालत देखने के बाद उसके शरीर पर ऐसे निशान देखे जिनसे मौत की परिस्थितियों पर सवाल उठने लगे। बच्ची के गले के आसपास दबाव के निशान बताए गए हैं। उसके मुंह से खून निकलने की जानकारी भी सामने आई।
इतनी छोटी बच्ची के शरीर पर इस तरह के निशान मिलने के बाद डॉक्टरों ने पुलिस को सूचना दी। इसके बाद शव का पोस्टमार्टम कराया गया।
पोस्टमार्टम से सामने आए निष्कर्षों ने मामले को और गंभीर बना दिया। रिपोर्ट के आधार पर बच्ची की मौत गला दबाने के कारण होने की बात सामने आई। यानी मामला किसी सामान्य बीमारी, जन्म के बाद होने वाली चिकित्सकीय जटिलता या अचानक तबीयत बिगड़ने से हुई मौत तक सीमित नहीं रहा।
अब पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि बच्ची के गले पर दबाव किसने डाला और घटना किस समय हुई।
बच्ची के पास कौन-कौन पहुंचा?
जांच में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि बच्ची तक घटना के समय किसकी पहुंच थी।
अस्पताल प्रशासन और पुलिस से जुड़ी जानकारी के मुताबिक, बच्ची की मां और दादी उसके पास जाती थीं। दादी बच्ची को दूध पिलाने के लिए उसके साथ जाती थीं। इस वजह से पुलिस दोनों से विस्तार से पूछताछ कर रही है।
कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि बच्ची के पास मां और दादी के अलावा किसी अन्य परिजन के जाने की जानकारी सामने नहीं आई। हालांकि, यह जांच का विषय है कि अस्पताल के कर्मचारियों या अन्य व्यक्तियों की पहुंच किस हद तक थी।
पुलिस का काम इस समय किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि यह पता लगाना है कि घटना वास्तव में कैसे हुई।
इसीलिए मां और दादी से पूछताछ को जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। दोनों ने घटना के बारे में जानकारी होने से इनकार किया है।
क्या मां या दादी ने बच्ची को मारा?
यही वह सवाल है जिसने पूरे मामले को सबसे ज्यादा रहस्यमय बना दिया है। पुलिस की जांच में परिवार के सदस्यों पर संदेह की बात सामने आई है, लेकिन अभी यह साबित नहीं हुआ है कि मां या दादी ने ही बच्ची की हत्या की।
कुछ पुलिस अधिकारियों ने संदेह जताया है कि घटना में परिवार के किसी सदस्य की भूमिका हो सकती है। एक रिपोर्ट के अनुसार जांचकर्ताओं का संदेह मां की ओर अधिक बताया गया है। हालांकि यह पुलिस की जांच के दौरान व्यक्त किया गया संदेह है, इसे अदालत में सिद्ध तथ्य या अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
जांच पूरी होने तक कई संभावनाएं खुली हुई हैं।
यह भी संभव है कि पुलिस को आगे की जांच में कोई दूसरा व्यक्ति या कोई अन्य परिस्थितिजन्य तथ्य मिले। इसलिए केवल इस आधार पर कि मां और दादी बच्ची के पास मौजूद थीं, यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि उनमें से किसी ने ही हत्या की।
तीसरी बेटी होने का पहलू भी जांच में
इस मामले में एक और संवेदनशील पहलू सामने आया है। उपलब्ध पुलिस जानकारी के अनुसार नवजात बच्ची परिवार की तीसरी बेटी थी।
इसी वजह से जांचकर्ता इस पहलू को भी देख रहे हैं कि कहीं बच्ची के लड़की होने की वजह से उसके साथ कोई अपराध तो नहीं किया गया।
कुछ रिपोर्टों में पुलिस अधिकारियों के हवाले से यह संभावना जताई गई है कि परिवार में तीसरी बेटी के जन्म को लेकर किसी तरह की नकारात्मक मानसिकता या दबाव की भूमिका हो सकती है। लेकिन यह फिलहाल जांच का एक एंगल है, स्थापित तथ्य नहीं।
लड़की के जन्म को लेकर भेदभाव और कन्या भ्रूण हत्या जैसे सामाजिक मुद्दों पर देश में लंबे समय से चिंता व्यक्त की जाती रही है। लेकिन इस मामले में किसी भी मकसद को तब तक निश्चित नहीं माना जा सकता जब तक पुलिस के पास पर्याप्त सबूत न हों।
अस्पताल के SNCU में CCTV नहीं
जांच की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि जिस SNCU में बच्ची भर्ती थी, वहां CCTV कैमरे नहीं लगे होने की जानकारी सामने आई है।
यदि वार्ड के भीतर CCTV मौजूद होता, तो पुलिस के लिए यह पता लगाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता था कि बच्ची के पास कौन गया, किस समय गया और घटना के समय वहां क्या हुआ।
अब पुलिस को दूसरे स्रोतों पर निर्भर रहना होगा।
अस्पताल के गलियारों, प्रवेश और निकास मार्गों तथा आसपास के हिस्सों में लगे CCTV कैमरों की फुटेज खंगाली जा रही है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर सकती है कि बच्ची के भर्ती होने के बाद कौन-कौन लोग उस इलाके में आए और कौन बाहर गया।
लेकिन यदि घटना SNCU के भीतर हुई और वहां कोई कैमरा नहीं था, तो केवल बाहरी फुटेज से पूरी घटना का सीधा प्रमाण मिलना मुश्किल हो सकता है।
अस्पताल के कर्मचारियों से भी पूछताछ
जांच केवल परिवार तक सीमित नहीं है। अस्पताल में उस समय ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और अन्य कर्मचारियों से भी जानकारी ली जा सकती है।
पुलिस यह समझना चाहेगी कि बच्ची की हालत में बदलाव पहली बार कब देखा गया था। उसे आखिरी बार स्वस्थ अवस्था में किसने देखा था। बच्ची को दूध कब पिलाया गया था। डॉक्टरों को कब सूचना दी गई और बच्ची को मृत कब घोषित किया गया।
इन घटनाओं की टाइमलाइन तैयार करना मामले में बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।
अगर बच्ची को किसी विशेष समय पर जीवित देखा गया था और थोड़े समय बाद उसकी मौत हो गई, तो उस अंतराल में बच्ची के आसपास मौजूद लोगों की पहचान जांच को आगे बढ़ाने में मदद कर सकती है।
मां का बयान भी महत्वपूर्ण
मां भावना ने घटना को लेकर बताया है कि उसने बच्ची को दूध पिलाया था। इसके बाद बच्ची अचेत अवस्था में मिली।
एक अन्य रिपोर्ट में उनके हवाले से बताया गया कि वह बच्ची को अपने पास सुलाकर खुद सो गई थीं और कुछ देर बाद जागने पर बच्ची के मुंह से खून निकलता देखा।
इन बयानों की जांच पुलिस अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के साथ करेगी।
पुलिस यह भी देख सकती है कि मां ने बच्ची को आखिरी बार कब देखा था, उस समय बच्ची की हालत कैसी थी और उसके बाद किस व्यक्ति की बच्ची तक पहुंच हुई।
मां का बयान जांच का केवल एक हिस्सा है। इसे मेडिकल रिकॉर्ड, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और दूसरे गवाहों के बयानों के साथ मिलाकर देखा जाना जरूरी है।
दादी की भूमिका को लेकर भी सवाल
बच्ची की दादी राजनबाई भी घटना के समय अस्पताल में मौजूद थीं। जानकारी के अनुसार वह बच्ची को दूध पिलाने के लिए उसके साथ जाती थीं।
यही कारण है कि पुलिस उनसे भी पूछताछ कर रही है।
दादी ने घटना में किसी भूमिका से इनकार किया है। अब पुलिस यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि उन्होंने बच्ची को आखिरी बार कब देखा, वह कितनी देर उसके साथ थीं और उस समय बच्ची की हालत कैसी थी।
यदि उनके बयान और अन्य गवाहों के बयान में अंतर मिलता है तो पुलिस उस अंतर की भी जांच कर सकती है।
लेकिन केवल पूछताछ किए जाने का मतलब यह नहीं है कि पुलिस ने उन्हें दोषी मान लिया है। किसी भी जांच में घटना के समय मौजूद सभी संभावित लोगों से पूछताछ करना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होता है।
पिता उस समय कहां थे?
घटना की टाइमलाइन में बच्ची के पिता की मौजूदगी भी जांच का विषय है।
कुछ रिपोर्टों के अनुसार बच्ची के पिता केदार सुबह अपनी चाची को लेकर गांव चले गए थे। पुलिस अब यह पता लगा रही है कि उस दौरान अस्पताल में कौन-कौन लोग मौजूद थे और बच्ची तक उनकी पहुंच कितनी थी।
यदि पिता घटना के समय अस्पताल में मौजूद नहीं थे, तो पुलिस उनकी गतिविधियों और समय संबंधी जानकारी भी दर्ज कर सकती है।
इससे घटना की पूरी टाइमलाइन तैयार करने में मदद मिलेगी।
परिवार में पहले से बेटियां थीं
जांच के दौरान परिवार की पारिवारिक स्थिति भी सामने आई है। रिपोर्टों के अनुसार नवजात बच्ची अपने माता-पिता की दूसरी बेटी थी, जबकि संयुक्त परिवार में उसे तीसरी बेटी के रूप में देखा जा रहा था।
परिवार में बेटियों की संख्या को लेकर सामने आई जानकारी के कारण पुलिस यह भी जांच कर रही है कि क्या बच्ची के जन्म को लेकर किसी तरह का पारिवारिक दबाव या विवाद था।
हालांकि, यहां अलग-अलग रिपोर्टों में परिवार की बेटियों की संख्या और पारिवारिक संरचना को लेकर विवरण में अंतर दिखाई देता है। इसलिए इस पहलू पर अंतिम निष्कर्ष पुलिस की आधिकारिक जांच के बाद ही निकाला जाना चाहिए।
क्या अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है?
घटना ने केवल परिवार और हत्या की जांच से जुड़े सवाल नहीं उठाए हैं। इसने अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।
एक नवजात बच्ची को ऐसी यूनिट में रखा जाता है जहां उसे चिकित्सकीय निगरानी की आवश्यकता होती है। ऐसे वार्ड में प्रवेश और निकास को नियंत्रित रखना महत्वपूर्ण होता है।
यदि कोई अनधिकृत व्यक्ति नवजात तक पहुंच सकता है, तो अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
दूसरी ओर, यदि केवल अधिकृत परिवार के सदस्यों और स्वास्थ्यकर्मियों को ही बच्ची तक पहुंच थी, तो जांच का दायरा और सीमित हो जाता है।
CCTV का अभाव इस जांच को और कठिन बना रहा है।
पुलिस के सामने कई सवाल
जांचकर्ताओं के सामने इस समय कई सवाल हैं।
बच्ची की मौत किस समय हुई?
उस समय बच्ची के पास कौन था?
बच्ची को आखिरी बार किसने जीवित देखा?
क्या उसकी मौत से पहले कोई असामान्य गतिविधि देखी गई थी?
गले पर दबाव किस तरह डाला गया?
क्या घटना के दौरान किसी तरह की आवाज या हलचल हुई?
क्या SNCU के कर्मचारियों ने कुछ असामान्य देखा?
बच्ची के शरीर पर गले के अलावा कोई और चोट थी या नहीं?
अस्पताल के आसपास लगे CCTV में कोई संदिग्ध व्यक्ति दिखाई देता है या नहीं?
और सबसे महत्वपूर्ण, क्या इस घटना के पीछे परिवार से जुड़ा कोई कारण था या किसी बाहरी व्यक्ति की भूमिका?
इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही मामला स्पष्ट हो पाएगा।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने बदला पूरा मामला
इस घटना में पोस्टमार्टम रिपोर्ट सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्यों में से एक है। शुरुआत में बच्ची की मौत को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं थी। लेकिन पोस्टमार्टम में गला दबाने के संकेत मिलने के बाद पुलिस ने इसे संभावित हत्या के रूप में जांचना शुरू किया।
गले पर दबाव के निशान और मुंह से खून निकलने की जानकारी ने डॉक्टरों को भी चौंकाया था।
इससे पहले परिवार को यह लग सकता था कि बच्ची की तबीयत अचानक खराब हुई है। लेकिन मेडिकल जांच के बाद मौत के कारण को लेकर तस्वीर बदल गई।
अब पुलिस को पोस्टमार्टम के निष्कर्षों को घटना की टाइमलाइन और परिवार के बयानों के साथ जोड़ना होगा।
मां और दादी से पूछताछ क्यों जरूरी है?
घटना के समय बच्ची के पास मां और दादी की मौजूदगी की जानकारी सामने आई है। इसलिए पुलिस का उनसे पूछताछ करना जांच का स्वाभाविक हिस्सा है।
किसी भी संदिग्ध मौत में पुलिस उन लोगों से पूछताछ करती है जो पीड़ित के सबसे करीब थे या जिन्हें घटना के समय उस व्यक्ति तक पहुंच थी।
लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि पूछताछ और दोष सिद्ध होने में अंतर समझा जाए।
मां या दादी से पूछताछ होने का अर्थ यह नहीं कि पुलिस ने हत्या का दोष तय कर दिया है। दोष तभी तय होगा जब पर्याप्त सबूत सामने आएं और कानूनी प्रक्रिया के तहत आरोप साबित हों।
क्या बच्ची की हत्या का मकसद सामने आया?
फिलहाल हत्या का निश्चित मकसद सामने नहीं आया है।
तीसरी बेटी होने की बात जांच का एक संभावित पहलू है, लेकिन इसे अंतिम कारण के रूप में नहीं माना जा सकता।
पुलिस यह भी जांच सकती है कि बच्ची के जन्म के बाद परिवार में किसी तरह का विवाद हुआ था या नहीं। क्या किसी व्यक्ति ने बेटी के जन्म पर आपत्ति जताई थी? क्या परिवार पर आर्थिक या सामाजिक दबाव था? क्या बच्ची की सेहत को लेकर कोई चिंता थी? या फिर कोई दूसरा व्यक्तिगत कारण था?
इन सभी संभावनाओं की जांच साक्ष्यों के आधार पर की जानी होगी।
अस्पताल में ऐसी घटना ने बढ़ाई चिंता
यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि घटना किसी सुनसान स्थान पर नहीं बल्कि जिला अस्पताल के भीतर हुई।
SNCU जैसे विशेष वार्ड में भर्ती बच्चे बेहद संवेदनशील स्थिति में होते हैं। उन्हें लगातार चिकित्सकीय निगरानी की आवश्यकता होती है और उनके आसपास की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण होती है।
यदि जांच में यह साबित होता है कि कोई बाहरी व्यक्ति बिना अनुमति वार्ड तक पहुंचा, तो अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठेंगे।
अगर इसके उलट घटना में परिवार के किसी सदस्य की भूमिका सामने आती है, तो अस्पताल में परिवार के सदस्यों की निगरानी और प्रवेश व्यवस्था पर भी सवाल उठ सकते हैं।
CCTV की कमी से क्या नुकसान हुआ?
अस्पताल के SNCU में CCTV न होना जांच के लिए बड़ी समस्या बन गया है।
आज के समय में अस्पतालों के संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी व्यवस्था अपराध की रोकथाम के साथ-साथ किसी घटना की जांच में भी मदद करती है।
CCTV होने से पुलिस यह देख सकती थी कि किस समय कौन व्यक्ति वार्ड में गया और कितनी देर वहां रहा।
लेकिन यहां ऐसी सीधी रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं है। इसलिए पुलिस को परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर ज्यादा निर्भर रहना होगा।
आसपास के कैमरों की फुटेज, प्रवेश रजिस्टर, अस्पताल स्टाफ की ड्यूटी सूची और परिवार के सदस्यों के मोबाइल या अन्य उपलब्ध रिकॉर्ड जांच का हिस्सा बन सकते हैं, यदि जांच अधिकारी उन्हें प्रासंगिक समझें।
परिवार के लिए बेहद दर्दनाक घटना
एक परिवार के लिए बच्चे का जन्म आम तौर पर खुशी का अवसर होता है। लेकिन इस मामले में जन्म के कुछ ही घंटों बाद बच्ची की मौत हो गई।
मौत की परिस्थितियां संदिग्ध होने और पोस्टमार्टम में गला दबाने की बात सामने आने से परिवार के भीतर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
यदि जांच में परिवार के किसी सदस्य की भूमिका सामने आती है, तो यह घटना और भी गंभीर रूप लेगी। वहीं अगर किसी बाहरी व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अलग सवाल उठेंगे।
फिलहाल दोनों संभावनाएं जांच के दायरे में हैं।
जांच का अगला चरण
पुलिस अब कई स्तरों पर जांच आगे बढ़ा सकती है। सबसे पहले परिवार के सभी सदस्यों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं। इसके साथ ही अस्पताल के डॉक्टरों और कर्मचारियों से जानकारी ली जा रही है।
अस्पताल परिसर और आसपास लगे CCTV कैमरों की फुटेज की जांच भी महत्वपूर्ण होगी।
इसके अलावा बच्ची के मेडिकल रिकॉर्ड की जांच की जा सकती है ताकि यह पता चल सके कि जन्म के समय उसकी स्थिति कैसी थी और अस्पताल में भर्ती होने के बाद उसकी मेडिकल स्थिति में क्या बदलाव आया।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट के निष्कर्षों को भी जांच की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यदि पुलिस को पर्याप्त परिस्थितिजन्य या प्रत्यक्ष साक्ष्य मिलते हैं, तो उसी आधार पर आगे कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी
इस मामले में सबसे जरूरी बात यह है कि अभी जांच पूरी नहीं हुई है। मां और दादी पर संदेह जरूर जताया जा रहा है, लेकिन दोनों में से किसी को भी अभी दोषी घोषित नहीं किया जा सकता।
पुलिस के सामने कई सवाल हैं और उनके जवाब जांच के दौरान सामने आएंगे।
यह भी संभव है कि जांच में ऐसा कोई तथ्य सामने आए जो शुरुआती संदेह को बदल दे।
इसलिए बच्ची की मौत को लेकर किसी व्यक्ति पर आरोप लगाने से पहले पुलिस जांच और कानूनी प्रक्रिया का इंतजार करना जरूरी है।
अस्पताल प्रशासन की जिम्मेदारी पर भी सवाल
घटना के बाद अस्पताल प्रशासन के सामने भी कई सवाल खड़े हुए हैं। यदि किसी नवजात की मौत अस्पताल के सुरक्षित वार्ड में होती है और वहां CCTV उपलब्ध नहीं है, तो अस्पताल को अपनी सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करनी पड़ सकती है।
SNCU जैसे संवेदनशील स्थानों में कौन प्रवेश कर सकता है, परिजनों को कितनी देर रहने की अनुमति है, नवजात के साथ किस व्यक्ति को जाने दिया जाता है और ड्यूटी पर मौजूद कर्मचारी कितनी नियमितता से निगरानी करते हैं, ये सभी बातें महत्वपूर्ण हैं।
अगर जांच में सुरक्षा व्यवस्था की कोई कमी सामने आती है तो प्रशासन को उस पर भी कार्रवाई करनी पड़ सकती है।
बच्ची की मौत ने कई सवाल छोड़ दिए
अशोकनगर जिला अस्पताल की यह घटना कई स्तरों पर चिंता पैदा करती है। एक दिन की नवजात बच्ची, अस्पताल की विशेष निगरानी वाली यूनिट, गले पर दबाव के निशान, पोस्टमार्टम में गला दबाने की पुष्टि और घटना के समय CCTV का अभाव, इन सभी परिस्थितियों ने मामले को बेहद गंभीर बना दिया है।
पुलिस का संदेह परिवार की ओर भी है क्योंकि मां और दादी बच्ची के पास मौजूद थीं। लेकिन केवल मौजूदगी के आधार पर हत्या का आरोप तय नहीं किया जा सकता।
तीसरी बेटी होने का पहलू भी जांच में शामिल है, लेकिन यह अभी केवल एक संभावित जांच दिशा है। यह तभी स्पष्ट होगा जब पुलिस को इसके समर्थन में ठोस साक्ष्य मिलें।
फिलहाल जांच का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि एक दिन की बच्ची की गर्दन पर दबाव किसने डाला और अस्पताल की निगरानी के बीच यह घटना कैसे हुई?
इस सवाल का जवाब पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मेडिकल रिकॉर्ड, परिवार के बयान, अस्पताल कर्मचारियों की जानकारी और आसपास के CCTV फुटेज को जोड़कर तलाशा जा रहा है।
मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि इसमें एक ऐसी बच्ची की जान गई है जो अपने जीवन की शुरुआत ही कर रही थी। उसकी मौत सामान्य बीमारी से हुई या किसी ने जानबूझकर उसकी जान ली, यह अंतर जांच के निष्कर्ष से स्पष्ट होगा।
फिलहाल पुलिस मां और दादी समेत संबंधित लोगों से पूछताछ कर रही है और सबूत जुटा रही है। जब तक जांच पूरी नहीं होती, तब तक किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
इतना जरूर स्पष्ट है कि पोस्टमार्टम में गला दबाने के संकेत मिलने के बाद यह मामला साधारण नवजात मृत्यु से आगे बढ़कर संभावित हत्या की जांच में बदल चुका है। अब पुलिस और प्रशासन के सामने न सिर्फ हत्यारे तक पहुंचने की चुनौती है, बल्कि यह पता लगाने की भी जिम्मेदारी है कि अस्पताल के उस संवेदनशील वार्ड में आखिर ऐसी घटना को होने से कैसे नहीं रोका जा सका।