
बेंगलुरु को लंबे समय से भारत के सबसे बड़े आईटी और टेक्नोलॉजी हब में गिना जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों से हजारों युवा बेहतर नौकरी, करियर और भविष्य की उम्मीद में इस शहर का रुख करते हैं। लेकिन जैसे-जैसे शहर में नौकरियों और कंपनियों की संख्या बढ़ी है, वैसे-वैसे यहां रहने की लागत भी कई लोगों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। खासकर मकान का किराया और सिक्योरिटी डिपॉजिट नौकरीपेशा लोगों के मासिक बजट पर लगातार दबाव डाल रहे हैं।
इसी मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट ने नई बहस छेड़ दी है। एक बेंगलुरु निवासी ने अपनी पोस्ट के जरिए शहर में सैलरी और मकान के किराये के बीच बढ़ते अंतर को लेकर सवाल उठाया। पोस्ट का शीर्षक ही काफी कुछ कहता है, जिसमें दावा किया गया कि सैलरी जैसे 2006 में अटकी हुई है, जबकि बेंगलुरु का किराया 2046 में पहुंच चुका है। इस तुलना के जरिए यूजर ने यह बताने की कोशिश की कि निजी क्षेत्र में वेतन बढ़ने की रफ्तार और शहर में आवास की लागत के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है।
इस पोस्ट में न्यू थिप्पासंद्रा और इंदिरानगर जैसे इलाकों का उदाहरण दिया गया। यूजर के मुताबिक, इन क्षेत्रों में सामान्य या पुराने 1BHK मकानों के लिए भी हजारों रुपये का मासिक किराया मांगा जा रहा है। एक उदाहरण में 1BHK के लिए ₹22,000 से ₹24,000 तक का किराया और करीब ₹1.5 लाख का सिक्योरिटी डिपॉजिट बताया गया। खास बात यह थी कि जिस मकान का उदाहरण दिया गया, वह 15 साल से अधिक पुरानी इमारत में दूसरी मंजिल पर स्थित बताया गया था और वहां लिफ्ट की सुविधा भी नहीं थी।
यही नहीं, पोस्ट में पानी की सप्लाई को लेकर भी शिकायत की गई। यूजर ने बताया कि नगर निगम की पानी की उपलब्धता सीमित समय के लिए होने की समस्या भी सामने आती है। यानी किराया और डिपॉजिट काफी अधिक होने के बावजूद मकान से जुड़ी हर सुविधा उसी अनुपात में उपलब्ध हो, ऐसा जरूरी नहीं है।
सोशल मीडिया पर इस पोस्ट के बाद बेंगलुरु में किराये, सैलरी, मकान की सुविधाओं और जीवन-यापन की लागत को लेकर बड़ी चर्चा शुरू हो गई। कई लोगों ने अपने अनुभव साझा किए, जबकि कुछ ने किराये की बढ़ती कीमतों पर निगरानी या नियंत्रण की जरूरत की बात कही।
‘सैलरी 2006 की, किराया 2046 का’ क्यों कहा गया?
सोशल मीडिया पोस्ट में बेंगलुरु के नौकरीपेशा लोगों की आर्थिक स्थिति को एक मजेदार लेकिन गंभीर तुलना के जरिए समझाने की कोशिश की गई। पोस्ट करने वाले व्यक्ति के मुताबिक, निजी क्षेत्र में मिलने वाली सैलरी उन्हें करीब दो दशक पुराने दौर की याद दिलाती है, जबकि मकान मालिकों की ओर से मांगा जाने वाला किराया भविष्य की कीमतों जैसा लगता है।
यूजर ने अपनी मासिक आय और खर्चों का हिसाब लगाने के बाद यह सवाल उठाया कि आखिर नौकरीपेशा व्यक्ति बढ़ते किराये के साथ अपनी बचत और बाकी जरूरतों को कैसे संतुलित करे।
पोस्ट में यह भी कहा गया कि बेंगलुरु के शुरुआती आईटी हब वाले दौर की तुलना में आज शहर में किराये का बाजार काफी बदल चुका है। टेक कंपनियों, स्टार्टअप्स और कॉरपोरेट ऑफिसों के कारण कुछ इलाकों में आवास की मांग लगातार बनी हुई है। ऐसे में किराये की कीमतें भी कई जगहों पर तेजी से बढ़ी हैं।
यूजर ने इस स्थिति को एक तरह की ‘इकोनॉमिक टाइम मशीन’ बताया। उनके अनुसार, कंपनी कर्मचारी को पुराने दौर के हिसाब से भुगतान करती है, मकान मालिक भविष्य के हिसाब से किराया मांगता है और शहर का बुनियादी ढांचा अभी भी कई मामलों में पुरानी व्यवस्था पर चलता हुआ नजर आता है।
यह टिप्पणी भले ही सोशल मीडिया की भाषा में कही गई हो, लेकिन इसके पीछे बेंगलुरु में रहने वाले लोगों की एक वास्तविक चिंता दिखाई देती है: आय बढ़ने की गति और जीवन-यापन की लागत में संतुलन।
1BHK का ₹22 हजार से ₹24 हजार किराया
पोस्ट में जिस उदाहरण का जिक्र किया गया, उसमें 1BHK मकान के लिए ₹22,000 से ₹24,000 तक मासिक किराया बताया गया। इसके अलावा करीब ₹1.5 लाख की सिक्योरिटी डिपॉजिट भी मांगी जाने की बात कही गई।
किसी व्यक्ति के लिए सिर्फ किराये की रकम ही पूरा खर्च नहीं होती। इसके ऊपर बिजली, पानी, मेंटेनेंस, इंटरनेट, खाना, यात्रा और दूसरी रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च जुड़ जाता है। अगर नौकरीपेशा व्यक्ति अकेला रहता है और पूरी जिम्मेदारी खुद संभालता है, तो आवास पर खर्च होने वाली बड़ी रकम उसके मासिक बजट को काफी प्रभावित कर सकती है।
यहां समस्या सिर्फ किराये की रकम तक सीमित नहीं है। सिक्योरिटी डिपॉजिट भी कई लोगों के लिए बड़ी शुरुआती आर्थिक बाधा बन सकता है। ₹1.5 लाख जैसी राशि एक साथ जमा करना हर कर्मचारी के लिए आसान नहीं होता, खासकर तब जब वह नया नौकरीपेशा व्यक्ति हो और उसकी बचत अभी ज्यादा न बनी हो।
यही वजह है कि सोशल मीडिया पर बेंगलुरु के किराये की चर्चा केवल ‘मकान महंगा है’ तक सीमित नहीं रहती। इसमें यह सवाल भी शामिल हो जाता है कि शहर में नौकरी करने वाले व्यक्ति को घर लेने के लिए शुरुआत में कितनी रकम जुटानी पड़ती है और उसके बाद हर महीने कितना खर्च करना पड़ता है।
पुराने मकान के लिए भी महंगा किराया?
सोशल मीडिया पोस्ट में जिस मकान का उदाहरण दिया गया, उसे 15 साल से ज्यादा पुरानी इमारत में स्थित बताया गया। यह दूसरी मंजिल पर था और इसमें लिफ्ट की सुविधा नहीं होने की बात कही गई।
यही बिंदु पोस्ट करने वाले व्यक्ति की नाराजगी का बड़ा कारण था। उनका तर्क था कि अगर मकान पुराना है, सुविधाएं सीमित हैं और पानी जैसी बुनियादी जरूरतों को लेकर भी दिक्कत है, तो किराये की रकम पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
हालांकि, किराये की कीमत केवल मकान की उम्र या सुविधाओं से तय नहीं होती। किसी इलाके की लोकेशन, ऑफिस और मेट्रो से दूरी, आसपास की सुविधाएं, बाजार, स्कूल, अस्पताल, सार्वजनिक परिवहन और उस इलाके में मकानों की मांग भी किराये को प्रभावित करती है।
बेंगलुरु के अलग-अलग हिस्सों में किराये की कीमतों में काफी अंतर हो सकता है। इसलिए किसी एक मकान की कीमत को पूरे शहर के किराये का प्रतिनिधि आंकड़ा नहीं माना जा सकता। फिर भी ऐसे उदाहरण यह दिखाते हैं कि कुछ लोकप्रिय इलाकों में रहने की लागत को लेकर लोगों की चिंता बढ़ रही है।
1BHK और 1RK की परिभाषा पर भी सवाल
सोशल मीडिया पर चर्चा सिर्फ किराये की रकम तक सीमित नहीं रही। कुछ यूजर्स ने बेंगलुरु में 1BHK और 1RK मकानों की परिभाषा को लेकर भी शिकायत की।
एक यूजर ने दावा किया कि कुछ मकान मालिक और ब्रोकर बहुत छोटे हिस्से को भी किचन के रूप में पेश करते हैं। उदाहरण के तौर पर एक छोटे ग्रेनाइट स्लैब या सीमित जगह को किचन बताकर पूरे मकान को 1BHK के रूप में प्रस्तुत किए जाने की शिकायत की गई।
एक अन्य शिकायत पेंटिंग के नाम पर अतिरिक्त पैसे लेने को लेकर थी। सोशल मीडिया यूजर ने कहा कि किराये पर मकान लेते समय पेंटिंग आदि के नाम पर एक महीने का किराया लिया जाता है, लेकिन उन्हें वास्तव में नया पेंट किया हुआ मकान मिलने का अनुभव नहीं हुआ।
ये व्यक्तिगत अनुभव हैं और हर मकान मालिक या ब्रोकर पर लागू नहीं किए जा सकते। लेकिन ऐसी टिप्पणियां यह जरूर दिखाती हैं कि किराये पर मकान खोजने वाले लोगों और प्रॉपर्टी मालिकों के बीच अपेक्षाओं को लेकर कई बार अंतर पैदा होता है।
क्या बेंगलुरु में किराये पर नियंत्रण की जरूरत है?
पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कुछ यूजर्स ने शहर में किराये पर किसी तरह की निगरानी या नियंत्रण की जरूरत की बात कही। उनका कहना था कि अगर किराये लगातार बढ़ते रहे और सैलरी उसी गति से नहीं बढ़ी, तो लंबे समय में शहर में काम करना कई लोगों के लिए मुश्किल हो सकता है।
एक यूजर ने टिप्पणी की कि स्थिति तब और स्पष्ट होगी जब लोग और कंपनियां बेंगलुरु से दूसरे शहरों की ओर जाना शुरू करेंगी। उनका संकेत यह था कि अगर रहने की लागत बहुत अधिक हो जाती है, तो कंपनियां और कर्मचारी वैकल्पिक शहरों पर विचार कर सकते हैं।
हालांकि, किराये पर नियंत्रण का मुद्दा जटिल है। मकान की कीमत, जमीन का मूल्य, इलाके की मांग, निर्माण लागत, सार्वजनिक परिवहन और रोजगार के केंद्र जैसे कई कारक किराये को प्रभावित करते हैं। इसलिए केवल किराये की रकम देखकर पूरे बाजार के लिए कोई निष्कर्ष निकालना आसान नहीं है।
फिर भी लगातार बढ़ती आवास लागत पर चर्चा होना इस बात का संकेत है कि किराये का मुद्दा नौकरीपेशा लोगों के घरेलू बजट में महत्वपूर्ण स्थान ले चुका है।
क्या बेंगलुरु की नौकरी के लिए ज्यादा सैलरी मांगनी चाहिए?
सोशल मीडिया चर्चा में एक और सुझाव सामने आया। एक यूजर ने कहा कि बेंगलुरु में नौकरी के लिए सैलरी पर बातचीत करते समय शहर की ऊंची जीवन-यापन लागत को ध्यान में रखना चाहिए।
उस यूजर ने सुझाव दिया कि बेंगलुरु में काम करने वाले कर्मचारियों को दूसरे शहरों की तुलना में अतिरिक्त वेतन की मांग पर विचार करना चाहिए। चर्चा में करीब 20 प्रतिशत अतिरिक्त वेतन की मांग का सुझाव भी दिया गया।
इसका आधार यह था कि अगर किसी कर्मचारी को किसी दूसरे शहर की तुलना में बेंगलुरु में किराये और यात्रा पर ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है, तो केवल नौकरी का बेस सैलरी पैकेज देखकर फैसला करना पर्याप्त नहीं हो सकता।
हालांकि, 20 प्रतिशत का आंकड़ा सोशल मीडिया पर दिए गए एक व्यक्ति के सुझाव के रूप में सामने आया है। इसे किसी आधिकारिक वेतन मानक या सार्वभौमिक नियम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वास्तविक जरूरत व्यक्ति की नौकरी, स्थान, कंपनी, जीवनशैली और आवास व्यवस्था पर निर्भर करेगी।
टियर-2 शहरों का विकल्प भी चर्चा में
बेंगलुरु की बढ़ती लागत के बीच टियर-2 शहरों का विकल्प भी चर्चा का हिस्सा बना। सोशल मीडिया यूजर्स ने सुझाव दिया कि अगर कंपनियां कर्मचारियों को दूर से काम करने या छोटे शहरों से काम करने की सुविधा दें, तो आवास पर होने वाला खर्च कम हो सकता है।
कुछ यूजर्स ने नागपुर, भुवनेश्वर और कोयंबटूर जैसे शहरों का उदाहरण देते हुए दावा किया कि कुछ बड़ी कंपनियों ने वहां भी ऑफिस शुरू किए हैं। हालांकि, किसी कंपनी के शहर चुनने के पीछे केवल आवास लागत ही कारण हो, ऐसा मानना उचित नहीं होगा। टैलेंट की उपलब्धता, इंफ्रास्ट्रक्चर, ग्राहक, ऑपरेशनल लागत और कंपनी की रणनीति जैसे कई दूसरे कारण भी भूमिका निभा सकते हैं।
फिर भी रिमोट और हाइब्रिड वर्किंग ने नौकरीपेशा लोगों के सामने एक नया विकल्प जरूर रखा है। अगर नौकरी की प्रकृति इसकी अनुमति देती है, तो कुछ कर्मचारी बड़े शहरों की बजाय अपेक्षाकृत कम खर्च वाले शहरों को चुन सकते हैं।
किराया बनाम होम लोन की EMI
सोशल मीडिया चर्चा में एक और महत्वपूर्ण चिंता सामने आई। एक यूजर ने कर्मचारियों को बहुत ज्यादा किराये या होम लोन की EMI के बोझ से सावधान रहने की सलाह दी।
उनका तर्क था कि नौकरी की आय को हमेशा स्थायी मानकर बड़े वित्तीय फैसले नहीं लेने चाहिए। अगर किसी कर्मचारी की नौकरी चली जाती है और उसके ऊपर बहुत ज्यादा किराया या EMI का बोझ है, तो आर्थिक दबाव अचानक बढ़ सकता है।
यह बात व्यक्तिगत वित्त के स्तर पर भी महत्वपूर्ण है। घर का खर्च आमतौर पर हर महीने की सबसे बड़ी निश्चित लागतों में से एक होता है। अगर किसी व्यक्ति की आय का बहुत बड़ा हिस्सा केवल आवास पर खर्च हो जाए, तो बचत, निवेश और आपातकालीन फंड के लिए कम पैसा बच सकता है।
इसीलिए किराये का मकान चुनते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि घर कितना अच्छा है। यह भी देखना जरूरी है कि किराया, डिपॉजिट, मेंटेनेंस और यात्रा सहित कुल मासिक खर्च आय के मुकाबले कितना है।
बेंगलुरु में सिर्फ किराया ही समस्या नहीं
शहर में रहने की लागत पर चर्चा करने वाले लोगों के मुताबिक, समस्या केवल मकान के किराये तक सीमित नहीं है। किराये के अलावा यात्रा, खाना, बिजली, इंटरनेट, मेंटेनेंस और दूसरी सेवाओं की लागत भी कुल खर्च बढ़ाती है।
बेंगलुरु में ऑफिस और घर के बीच दूरी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अगर कर्मचारी कम किराये वाले इलाके में रहता है लेकिन रोज ऑफिस आने-जाने में लंबा समय और ज्यादा पैसा खर्च करता है, तो कम किराये का फायदा काफी हद तक कम हो सकता है।
इसके विपरीत, ऑफिस के पास रहने पर किराया अधिक हो सकता है, लेकिन यात्रा का समय और खर्च घट सकता है। इसलिए घर चुनने का फैसला कई अलग-अलग खर्चों को जोड़कर करना पड़ता है।
शहर की जीवनशैली भी खर्च को प्रभावित करती है। बाहर खाना, कैफे, मनोरंजन और सामाजिक गतिविधियों पर खर्च करने वाले लोगों का बजट अलग हो सकता है, जबकि कोई व्यक्ति सीमित खर्च के साथ रहने पर काफी कम बजट में भी शहर में जीवन चला सकता है।
क्या हर व्यक्ति के लिए बेंगलुरु महंगा है?
सोशल मीडिया पर बढ़ती बहस के बावजूद यह कहना सही नहीं होगा कि बेंगलुरु में हर व्यक्ति के लिए रहने का खर्च एक जैसा है। किसी व्यक्ति का खर्च उसके वेतन, परिवार की स्थिति, ऑफिस की लोकेशन, रहने की जगह, रूममेट्स और जीवनशैली पर निर्भर करता है।
जो कर्मचारी दोस्तों या सहकर्मियों के साथ घर साझा करता है, उसका व्यक्तिगत किराया कम हो सकता है। दूसरी ओर, जो व्यक्ति अकेले 1BHK में रहना चाहता है, उसे अधिक खर्च करना पड़ सकता है।
इसी तरह शहर के प्रमुख कॉरपोरेट और टेक क्षेत्रों के आसपास किराये अधिक हो सकते हैं, जबकि कुछ दूर के इलाकों में अपेक्षाकृत कम विकल्प मिल सकते हैं। लेकिन वहां से ऑफिस तक आने-जाने में समय और परिवहन लागत बढ़ सकती है।
इसलिए बेंगलुरु के किराये की चर्चा को एक ही आंकड़े से समझना मुश्किल है।
रियल एस्टेट बाजार और नौकरी का रिश्ता
बेंगलुरु की अर्थव्यवस्था में आईटी और टेक्नोलॉजी सेक्टर की बड़ी भूमिका है। बड़ी संख्या में कंपनियों और कर्मचारियों की मौजूदगी ने कई इलाकों में आवास की मांग को मजबूत किया है।
जब किसी इलाके में रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, तो वहां रहने की मांग भी बढ़ सकती है। अगर आवास की उपलब्धता मांग की तुलना में कम हो, तो किराये पर दबाव आ सकता है।
यही कारण है कि बेंगलुरु के कुछ टेक कॉरिडोर और लोकप्रिय ऑफिस क्षेत्रों के आसपास किराये की चर्चा अक्सर होती रहती है।
लेकिन इस बाजार में समय के साथ बदलाव भी आता रहता है। नई आवासीय परियोजनाएं, बेहतर परिवहन व्यवस्था, मेट्रो विस्तार, नए ऑफिस हब और शहर के बाहरी हिस्सों में विकास लोगों को अलग-अलग क्षेत्रों में रहने के विकल्प दे सकते हैं।
क्या यह सिर्फ सोशल मीडिया की शिकायत है?
इस पूरी बहस की शुरुआत एक सोशल मीडिया पोस्ट से हुई है। इसलिए पोस्ट में दिए गए व्यक्तिगत अनुभवों को पूरे बेंगलुरु के आधिकारिक आंकड़ों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
एक व्यक्ति को ₹24,000 का किराया बहुत ज्यादा लग सकता है, जबकि किसी दूसरे व्यक्ति के लिए वही रकम ऑफिस के पास अच्छी लोकेशन के कारण स्वीकार्य हो सकती है। इसी तरह ₹1.5 लाख का डिपॉजिट किसी कर्मचारी के लिए बहुत बड़ा हो सकता है, जबकि अधिक आय वाले व्यक्ति के लिए स्थिति अलग हो सकती है।
फिर भी सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट महत्वपूर्ण इसलिए होते हैं क्योंकि वे लोगों के रोजमर्रा के अनुभवों को सामने लाते हैं। जब कई लोग समान समस्या की बात करते हैं, तो उससे किसी शहर की जीवन-यापन लागत को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो सकती है।
बेंगलुरु में किराये को लेकर पहले भी ऐसी चर्चाएं होती रही हैं। मौजूदा बहस में भी लोगों ने अपने-अपने अनुभव साझा किए और इस बात पर चर्चा की कि शहर में सैलरी बढ़ने और आवास लागत बढ़ने की गति के बीच कितना अंतर है।
नौकरीपेशा लोगों के लिए बढ़ती चुनौती
बेंगलुरु में नौकरी करने वाले किसी व्यक्ति के लिए असली सवाल केवल यह नहीं है कि उसे कितनी सैलरी मिलती है। महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि उस सैलरी में से हर महीने कितनी रकम घर के किराये और उससे जुड़े खर्चों में चली जाती है।
अगर किसी व्यक्ति की आय का बड़ा हिस्सा किराये में चला जाए, तो उसके पास बचत और दूसरी जरूरतों के लिए कम रकम रह सकती है। अगर वह यात्रा पर भी ज्यादा खर्च करता है, तो कुल लागत और बढ़ जाती है।
यही कारण है कि बेंगलुरु में नौकरी स्वीकार करने से पहले कई कर्मचारी अब केवल CTC नहीं देखते। वे यह भी देखते हैं कि ऑफिस कहां है, वहां रहने के लिए कितना किराया देना होगा, घर से ऑफिस की दूरी कितनी है और रोजाना आने-जाने में कितना समय लगेगा।
‘सैलरी 2006 की और किराया 2046 का’ सिर्फ एक लाइन नहीं
सोशल मीडिया पोस्ट में इस्तेमाल की गई ‘सैलरी 2006 की और किराया 2046 का’ वाली लाइन भले ही व्यंग्यात्मक अंदाज में लिखी गई हो, लेकिन इसके पीछे शहर की जीवन-यापन लागत को लेकर एक गंभीर सवाल छिपा है।
क्या कर्मचारियों की आय उसी गति से बढ़ रही है जिस गति से उनके रहने और रोजमर्रा के खर्च बढ़ रहे हैं? क्या शहर में नौकरी करने वाले युवाओं के लिए घर किराये पर लेना आर्थिक रूप से टिकाऊ है? क्या कंपनियों को कर्मचारियों के वेतन में शहर की लागत को अधिक महत्व देना चाहिए? और क्या शहरों में आवास की उपलब्धता रोजगार की मांग के साथ पर्याप्त गति से बढ़ रही है?
इन सवालों का कोई एक आसान जवाब नहीं है। लेकिन बेंगलुरु की मौजूदा किराया बहस ने इन मुद्दों को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
फिलहाल एक सोशल मीडिया पोस्ट से शुरू हुई यह चर्चा बेंगलुरु में रहने वाले नौकरीपेशा लोगों की उन परेशानियों को सामने ला रही है, जिनमें बढ़ता किराया, भारी सिक्योरिटी डिपॉजिट, सीमित सुविधाओं वाले मकानों के लिए ऊंची कीमत और वेतन के मुकाबले बढ़ती जीवन-यापन लागत शामिल हैं।
बेंगलुरु जैसे बड़े टेक शहर के लिए आने वाले समय में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो सकता है कि शहर में रोजगार के अवसरों के साथ-साथ क्या लोगों के लिए रहने की व्यवस्था भी किफायती रह पाती है। अगर किराये और आय के बीच अंतर लगातार बढ़ता है, तो कर्मचारियों को घर और ऑफिस के बीच दूरी, रूममेट्स, रिमोट वर्क, वैकल्पिक शहरों और वेतन पर बातचीत जैसे विकल्पों पर अधिक ध्यान देना पड़ सकता है।
फिलहाल सोशल मीडिया पर चल रही यह बहस किसी आधिकारिक किराया नीति या पूरे शहर के लिए लागू निष्कर्ष का प्रतिनिधित्व नहीं करती। लेकिन यह जरूर दिखाती है कि बेंगलुरु में मकान का किराया अब सिर्फ महीने के बजट का एक हिस्सा नहीं रह गया है। बहुत से नौकरीपेशा लोगों के लिए यह नौकरी चुनने, इलाके का चुनाव करने, बचत करने और शहर में लंबे समय तक रहने के फैसले से जुड़ा महत्वपूर्ण आर्थिक सवाल बन चुका है।
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