
असम की नगांव लोकसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव अब राजनीतिक रूप से काफी रोचक हो गया है। कांग्रेस ने आखिरकार अपने उम्मीदवार के नाम का ऐलान कर दिया है। पार्टी ने पूर्व बाटद्रवा विधायक शिवामोनी बोरा को मैदान में उतारा है। उनका मुकाबला भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार देबाशीष शर्मा से होगा, जो हाल ही में प्रशासनिक सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर बीजेपी में शामिल हुए हैं और कुछ ही दिनों के भीतर पार्टी का टिकट हासिल कर चुके हैं।
नगांव उपचुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सीट लंबे समय से कांग्रेस के प्रभाव वाले क्षेत्रों में गिनी जाती रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रद्युत बोरदोलोई ने यहां से जीत हासिल की थी। लेकिन बाद में उन्होंने कांग्रेस और लोकसभा की सदस्यता छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया और 2026 के विधानसभा चुनाव में दिसपुर सीट से जीत दर्ज की। इसी वजह से नगांव लोकसभा सीट खाली हुई और अब यहां उपचुनाव कराया जा रहा है।
अब कांग्रेस ने शिवामोनी बोरा पर भरोसा जताया है। बोरा पहले विधायक रह चुकी हैं और उनके पास जमीनी राजनीति का अनुभव है। दूसरी ओर बीजेपी ने जिस देबाशीष शर्मा को मैदान में उतारा है, वे लंबे समय तक प्रशासनिक सेवा में रहे हैं और नगांव के जिला आयुक्त के रूप में भी काम कर चुके हैं। ऐसे में दोनों उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि अलग-अलग है—एक तरफ सक्रिय राजनीति और संगठन का अनुभव है तो दूसरी तरफ प्रशासनिक सेवा और स्थानीय स्तर पर काम करने की पहचान।
कांग्रेस ने किसे बनाया उम्मीदवार?
कांग्रेस ने शिवामोनी बोरा को नगांव लोकसभा उपचुनाव के लिए अपना उम्मीदवार घोषित किया है। बोरा असम की राजनीति में नया नाम नहीं हैं। वह बाटद्रवा विधानसभा सीट से विधायक रह चुकी हैं और कांग्रेस संगठन में भी सक्रिय रही हैं।
पार्टी के भीतर टिकट को लेकर कई नामों पर चर्चा चल रही थी। पूर्व विधायक दुलार्भ चामुआ के अलावा इमदाद हुसैन, मोहिदुल इस्लाम, रंजीत बरमन और कांग्रेस प्रवक्ता मोहसिन खान जैसे नाम भी दावेदारों में बताए जा रहे थे। आखिरकार पार्टी ने शिवामोनी बोरा के नाम पर मुहर लगाई।
कांग्रेस के सामने उम्मीदवार चुनने की चुनौती इसलिए भी बड़ी थी क्योंकि नगांव को पार्टी अपने पुराने राजनीतिक आधार के तौर पर देखती है। ऐसे में उसे ऐसा चेहरा चाहिए था जो संगठन के साथ-साथ स्थानीय मतदाताओं के बीच भी प्रभाव रखता हो।
शिवामोनी बोरा का पिछला राजनीतिक अनुभव कांग्रेस के लिए इसी वजह से महत्वपूर्ण हो सकता है। वह विधानसभा चुनाव लड़ चुकी हैं और क्षेत्र की राजनीति से परिचित हैं।
शिवामोनी बोरा की राजनीतिक पृष्ठभूमि
शिवामोनी बोरा ने असम की सक्रिय राजनीति में काम किया है और बाटद्रवा विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व भी किया है। उनका राजनीतिक आधार मुख्य रूप से स्थानीय संगठन और क्षेत्रीय संपर्क से जुड़ा हुआ है।
हालिया विधानसभा चुनाव के परिसीमन के बाद उनकी पुरानी विधानसभा सीट के समीकरणों में बदलाव आया था। उनके पूर्व निर्वाचन क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा, जिसमें मुस्लिम बहुल इलाके भी शामिल थे, धिंग विधानसभा क्षेत्र में चला गया। इसके बाद कांग्रेस और अखिल गोगोई की रायजोर दल के बीच सीट बंटवारे के समझौते में धिंग सीट रायजोर दल के हिस्से में चली गई।
इस घटनाक्रम के बाद अब बोरा को नगांव लोकसभा उपचुनाव में उतारना कांग्रेस की एक बड़ी राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
पार्टी को उम्मीद होगी कि विधानसभा स्तर पर उनका अनुभव और स्थानीय संपर्क लोकसभा उपचुनाव में काम आएगा। हालांकि लोकसभा सीट का क्षेत्र काफी बड़ा होता है और इसमें अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक समूहों के बीच संतुलन बनाना किसी भी उम्मीदवार के लिए बड़ी चुनौती होती है।
दूसरी तरफ हैं पूर्व IAS अधिकारी देबाशीष शर्मा
बीजेपी ने नगांव सीट पर जिस उम्मीदवार को उतारा है, उनकी पृष्ठभूमि कांग्रेस उम्मीदवार से बिल्कुल अलग है। देबाशीष शर्मा लंबे समय तक प्रशासनिक सेवा में रहे हैं और नगांव के जिला आयुक्त के रूप में उनकी पहचान बनी।
शर्मा ने 3 सितंबर 2026 को सरकारी सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी। उस समय वह नगांव के जिला आयुक्त के पद पर तैनात थे। इसके कुछ ही दिन बाद, 8 सितंबर को वह बीजेपी में शामिल हुए और 11 सितंबर को पार्टी ने उन्हें नगांव लोकसभा उपचुनाव के लिए उम्मीदवार घोषित कर दिया।
यानी सरकारी सेवा छोड़ने और चुनावी राजनीति में प्रवेश करने के बीच उनके पास बहुत कम समय रहा। यही वजह है कि उनकी उम्मीदवारी असम की राजनीति में काफी चर्चा का विषय बनी हुई है।
देबाशीष शर्मा के पास लगभग तीन दशक का प्रशासनिक अनुभव है। उन्होंने 1992 में असम सिविल सर्विस ज्वाइन की थी। उनकी पहली पोस्टिंग बरपेटा में हुई थी। अपने लंबे करियर में उन्होंने कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालीं।
नगांव के जिला आयुक्त भी रह चुके हैं शर्मा
देबाशीष शर्मा की उम्मीदवारी का सबसे बड़ा राजनीतिक पहलू यह है कि वह हाल तक नगांव के जिला आयुक्त थे। इससे उन्हें क्षेत्र और प्रशासनिक व्यवस्था की गहरी जानकारी होने का दावा किया जा सकता है।
नगांव के अलावा वह मोरीगांव के जिला आयुक्त भी रह चुके हैं। इसके साथ ही उन्होंने गुवाहाटी नगर निगम के कमिश्नर के रूप में भी काम किया।
वह असम के तत्कालीन राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा के विशेष अधिकारी के तौर पर भी कार्य कर चुके हैं। इसके अलावा मुंबई स्थित असम भवन में डिप्टी रेजिडेंट कमिश्नर की जिम्मेदारी संभालते हुए महाराष्ट्र में असम सरकार का प्रतिनिधित्व किया।
इस प्रशासनिक अनुभव को बीजेपी अब राजनीतिक मैदान में उनकी सबसे बड़ी ताकत के तौर पर पेश कर सकती है।
देबाशीष शर्मा की सामाजिक क्षेत्र में भी पहचान
प्रशासनिक सेवा के अलावा देबाशीष शर्मा सामाजिक क्षेत्र से भी जुड़े रहे हैं। वह कैंसर देखभाल के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था ‘दीपशिखा’ के संस्थापक अध्यक्ष और ट्रस्टी बताए जाते हैं।
उनकी सामाजिक गतिविधियों और प्रशासनिक कार्यकाल को देखते हुए बीजेपी को उम्मीद हो सकती है कि उन्हें केवल पार्टी कार्यकर्ता के रूप में नहीं बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर भी देखा जाएगा जिसने लंबे समय तक सार्वजनिक प्रशासन में काम किया है।
हालांकि चुनावी राजनीति में प्रशासनिक अनुभव अपने आप में जीत की गारंटी नहीं देता। यहां उम्मीदवार को पार्टी संगठन, कार्यकर्ताओं, स्थानीय समीकरणों और मतदाताओं के साथ राजनीतिक स्तर पर भी मजबूत तालमेल बनाना होगा।
यही कारण है कि कांग्रेस की ओर से शिवामोनी बोरा को मैदान में उतारे जाने के बाद मुकाबला और दिलचस्प हो गया है।
नगांव सीट पर क्यों हो रहा है उपचुनाव?
नगांव लोकसभा सीट 2024 में कांग्रेस के प्रद्युत बोरदोलोई ने जीती थी। लेकिन 2026 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया और असम विधानसभा चुनाव में दिसपुर सीट से चुनाव लड़ा। वह वहां से जीतने में सफल रहे।
इसके बाद नगांव लोकसभा सीट खाली हो गई और उपचुनाव कराने की स्थिति बनी।
इसका मतलब यह है कि नगांव का यह चुनाव केवल दो उम्मीदवारों के बीच मुकाबला नहीं है, बल्कि पिछले कुछ महीनों में असम की राजनीति में हुए बड़े राजनीतिक बदलावों की परीक्षा भी है।
कांग्रेस के लिए यह सीट अपनी पुरानी पकड़ को बनाए रखने की चुनौती है। वहीं बीजेपी के लिए यह कांग्रेस के पारंपरिक गढ़ में अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका है।
कांग्रेस के सामने पुरानी सीट बचाने की चुनौती
नगांव को लंबे समय से कांग्रेस के प्रभाव वाले लोकसभा क्षेत्रों में माना जाता रहा है। 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने यहां से जीत दर्ज की थी। लेकिन अब राजनीतिक समीकरण बदल चुके हैं।
प्रद्युत बोरदोलोई के बीजेपी में जाने से कांग्रेस को नुकसान हुआ है। दूसरी ओर बीजेपी ने पूर्व जिला आयुक्त देबाशीष शर्मा को टिकट देकर एक ऐसा चेहरा उतारा है जिसकी क्षेत्र में प्रशासनिक पहचान पहले से मौजूद है।
कांग्रेस के लिए इसलिए शिवामोनी बोरा का चयन काफी महत्वपूर्ण है। पार्टी को अब यह साबित करना होगा कि उसका पारंपरिक संगठन और स्थानीय नेटवर्क अभी भी चुनावी मुकाबले में प्रभावी है।
बीजेपी के लिए भी आसान नहीं है मुकाबला
हालांकि बीजेपी के पास देबाशीष शर्मा के रूप में एक मजबूत उम्मीदवार है, लेकिन नगांव में चुनाव उसके लिए भी आसान नहीं माना जा सकता।
यह क्षेत्र लंबे समय से कांग्रेस की राजनीति से जुड़ा रहा है। ऐसे में बीजेपी को सिर्फ उम्मीदवार की व्यक्तिगत पहचान पर निर्भर रहने के बजाय संगठन और बूथ स्तर पर मजबूत चुनावी अभियान चलाना होगा।
इसके अलावा नगांव का सामाजिक और राजनीतिक समीकरण काफी विविध है। अलग-अलग समुदायों और इलाकों की राजनीतिक प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं।
बीजेपी के लिए चुनौती यह होगी कि शर्मा की प्रशासनिक छवि को चुनावी समर्थन में कैसे बदला जाए।
शर्मा को लेकर कांग्रेस ने उठाए सवाल
देबाशीष शर्मा के बीजेपी में शामिल होने और उम्मीदवार बनने के बाद कांग्रेस ने उनके प्रशासनिक कार्यकाल को लेकर सवाल उठाए हैं।
कांग्रेस सांसद रकीबुल हुसैन ने असम के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को शिकायत देकर नगांव के जिला आयुक्त और जिला निर्वाचन अधिकारी के रूप में शर्मा के कार्यकाल के दौरान लिए गए विभिन्न चुनावी फैसलों की समीक्षा की मांग की थी। शिकायत को आगे आवश्यक कार्रवाई और निर्देश के लिए चुनाव आयोग को भेजा गया।
कांग्रेस का तर्क है कि शर्मा हाल तक उस जिले की प्रशासनिक और चुनावी व्यवस्था का हिस्सा थे और अब उसी सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। इसलिए उनके कार्यकाल से जुड़े चुनावी फैसलों की निष्पक्षता और समीक्षा को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
हालांकि इन आरोपों को अभी राजनीतिक शिकायत और मांग के रूप में ही देखा जाना चाहिए। इससे यह साबित नहीं होता कि शर्मा के कार्यकाल में कोई चुनावी अनियमितता हुई थी। किसी भी आरोप की पुष्टि संबंधित जांच या निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया के बाद ही हो सकती है।
चुनावी मुकाबला बन सकता है बहुकोणीय
कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधी टक्कर के अलावा नगांव में अन्य दल भी चुनावी मैदान में उतर सकते हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार AIUDF की ओर से भी उम्मीदवार उतारे जाने की संभावना है, जबकि अखिल गोगोई की रायजोर दल भी मुकाबले में उतर सकता है।
अगर कई उम्मीदवार मैदान में आते हैं तो चुनाव का समीकरण और जटिल हो सकता है।
विशेष रूप से ऐसे क्षेत्र में जहां अलग-अलग समुदायों के मतदाताओं की राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग हैं, बहुकोणीय मुकाबला किसी भी प्रमुख पार्टी के वोट शेयर को प्रभावित कर सकता है।
कांग्रेस के लिए चिंता यह हो सकती है कि अगर उसका पारंपरिक समर्थन अलग-अलग दलों में बंटता है तो बीजेपी को फायदा मिल सकता है। वहीं बीजेपी को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके समर्थक वोट एकजुट रहें।
कांग्रेस के अंदर भी था टिकट को लेकर खींचतान
शिवामोनी बोरा के नाम के ऐलान से पहले कांग्रेस के भीतर उम्मीदवार को लेकर मतभेद की खबरें सामने आई थीं।
पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष गौरव गोगोई के खेमे की ओर से शिवामोनी बोरा का समर्थन किए जाने की बात सामने आई थी, जबकि वरिष्ठ सांसद रकीबुल हुसैन कथित तौर पर दुलार्भ चामुआ के पक्ष में थे। कांग्रेस के असम प्रभारी और पूर्व छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी प्रदेश नेताओं और विधायकों के साथ बैठकें की थीं।
इससे साफ है कि उम्मीदवार का चयन कांग्रेस के लिए आसान नहीं था।
अब बोरा का नाम घोषित होने के बाद पार्टी के सामने अगली चुनौती यही होगी कि सभी गुटों को एकजुट करके चुनावी अभियान में उतारा जाए।
अगर कांग्रेस आंतरिक मतभेदों को पीछे छोड़कर एकजुट अभियान चलाती है, तो उसका पारंपरिक संगठन और बोरा का स्थानीय अनुभव उसके लिए उपयोगी साबित हो सकता है।
6 अक्टूबर को मतदान, 9 अक्टूबर को नतीजे
नगांव लोकसभा उपचुनाव के लिए मतदान 6 अक्टूबर 2026 को होगा। मतगणना 9 अक्टूबर को की जाएगी। उम्मीदवारों के लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 16 सितंबर है और नाम वापस लेने की अंतिम तारीख 19 सितंबर तय की गई है।
इसका मतलब है कि राजनीतिक दलों के पास उम्मीदवारों के ऐलान के बाद चुनावी अभियान को तेज करने के लिए बहुत कम समय है।
कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार अब घोषित कर दिया है, जबकि बीजेपी पहले ही देबाशीष शर्मा के नाम का ऐलान कर चुकी है। ऐसे में दोनों प्रमुख दल अब संगठनात्मक स्तर पर तेजी से तैयारी करेंगे।
एक तरफ राजनीतिक अनुभव, दूसरी तरफ प्रशासनिक अनुभव
नगांव का मुकाबला इसलिए खास है क्योंकि दोनों प्रमुख उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि अलग-अलग है।
शिवामोनी बोरा के पास सक्रिय राजनीति और विधानसभा का अनुभव है। वह कांग्रेस संगठन से जुड़ी रही हैं और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को समझती हैं।
देबाशीष शर्मा के पास प्रशासनिक सेवा का लंबा अनुभव है। उन्होंने करीब तीन दशक तक सरकारी व्यवस्था में काम किया और नगांव के जिला आयुक्त के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई।
चुनाव में अब यह देखना होगा कि मतदाता किस तरह के अनुभव को ज्यादा महत्व देते हैं।
क्या वे स्थानीय राजनीति में सक्रिय रहे नेता को प्राथमिकता देंगे या प्रशासनिक अनुभव और सार्वजनिक सेवा की छवि वाले नए राजनीतिक चेहरे को?
प्रद्युत बोरदोलोई का बीजेपी में जाना भी अहम
नगांव उपचुनाव को समझने के लिए प्रद्युत बोरदोलोई के राजनीतिक बदलाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
2024 में कांग्रेस के टिकट पर नगांव से लोकसभा चुनाव जीतने वाले बोरदोलोई ने बाद में कांग्रेस छोड़ दी और बीजेपी में शामिल हो गए। 2026 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने दिसपुर से बीजेपी उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल की। उनके लोकसभा से हटने के बाद नगांव सीट खाली हुई।
इसलिए अब होने वाला उपचुनाव यह भी बताएगा कि बोरदोलोई के कांग्रेस छोड़ने का नगांव में पार्टी के जनाधार पर कितना असर पड़ा है।
अगर कांग्रेस यह सीट फिर जीतती है तो पार्टी इसे अपने पारंपरिक समर्थन के कायम रहने के संकेत के तौर पर पेश कर सकती है। वहीं अगर बीजेपी जीतती है तो यह कांग्रेस के पुराने गढ़ में उसकी बड़ी राजनीतिक सेंध मानी जाएगी।
देबाशीष शर्मा के लिए पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा
देबाशीष शर्मा के लिए यह चुनाव उनके सक्रिय राजनीतिक करियर की पहली बड़ी परीक्षा है।
उन्होंने सरकारी सेवा में लंबा समय बिताया है, लेकिन चुनाव लड़ना प्रशासनिक जिम्मेदारी निभाने से बिल्कुल अलग है। चुनाव में मतदाताओं के साथ लगातार संपर्क, पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ तालमेल, राजनीतिक संदेश और विपक्ष के हमलों का जवाब देना—ये सभी उनकी नई भूमिका का हिस्सा होंगे।
बीजेपी ने उन्हें टिकट देकर उनके प्रशासनिक अनुभव और स्थानीय पहचान पर भरोसा जताया है।
अब उन्हें यह साबित करना होगा कि वह प्रशासनिक अधिकारी की छवि से आगे बढ़कर एक प्रभावी राजनीतिक उम्मीदवार भी बन सकते हैं।
शिवामोनी बोरा के लिए भी बड़ी चुनौती
कांग्रेस उम्मीदवार शिवामोनी बोरा के लिए यह चुनाव भी आसान नहीं है।
उन्हें ऐसे उम्मीदवार के सामने उतारा गया है जो हाल तक नगांव के प्रशासनिक ढांचे के शीर्ष पदों में से एक पर था और इलाके में उसकी पहचान है।
बोरा के सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस के पुराने वोट आधार को एकजुट रखना होगी। इसके अलावा उन्हें यह भी साबित करना होगा कि पार्टी का स्थानीय संगठन अभी भी मजबूत है और वह बीजेपी की चुनौती का सामना कर सकता है।
अगर मुकाबला बहुकोणीय होता है तो वोटों का बंटवारा भी अहम भूमिका निभाएगा।
नगांव का चुनाव असम की राजनीति के लिए क्यों अहम?
नगांव लोकसभा उपचुनाव का परिणाम भले ही केवल एक लोकसभा सीट तय करेगा, लेकिन इसका राजनीतिक संदेश बड़ा हो सकता है।
असम की राजनीति में बीजेपी पिछले कुछ वर्षों में मजबूत हुई है। वहीं कांग्रेस अपने पारंपरिक क्षेत्रों में संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
नगांव कांग्रेस के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उसका पुराना आधार रहा है। बीजेपी के लिए यह सीट इसलिए अहम है क्योंकि यहां जीत उसे कांग्रेस के पुराने गढ़ में अपनी पकड़ मजबूत करने का मौका देगी।
इस चुनाव में उम्मीदवारों की व्यक्तिगत छवि के साथ-साथ पार्टी संगठन, स्थानीय मुद्दे, सामाजिक समीकरण और हालिया राजनीतिक बदलाव सभी महत्वपूर्ण होंगे।
फिलहाल तस्वीर साफ है। बीजेपी ने पूर्व जिला आयुक्त और पूर्व IAS अधिकारी देबाशीष शर्मा को मैदान में उतारा है, जबकि कांग्रेस ने पूर्व विधायक शिवामोनी बोरा पर भरोसा जताया है। एक तरफ लगभग तीन दशक का प्रशासनिक अनुभव है तो दूसरी तरफ सक्रिय राजनीति और जमीनी संगठन का अनुभव।
6 अक्टूबर को नगांव की जनता किसे अपना प्रतिनिधि चुनती है, इसका जवाब 9 अक्टूबर को मतगणना के बाद मिलेगा। लेकिन उससे पहले ही यह उपचुनाव असम की राजनीति में एक दिलचस्प मुकाबले के रूप में सामने आ चुका है।
सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या कांग्रेस अपने पुराने गढ़ को बचा पाएगी या बीजेपी अपने नए चेहरे और पूर्व प्रशासनिक अधिकारी की छवि के सहारे नगांव में नया राजनीतिक अध्याय लिखेगी।