
दिल्ली में हाल के दिनों में इमारतों पर नगर निगम की कार्रवाई अचानक तेज हो गई है। खासकर 6 सितंबर 2026 को दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन में एक इमारत गिरने से सात लोगों की मौत के बाद दिल्ली नगर निगम यानी MCD ने राजधानी के अलग-अलग इलाकों में अवैध और खतरनाक इमारतों की जांच और तोड़फोड़ की कार्रवाई बढ़ा दी है। MCD ने दो दिनों में करीब 1100 PG का सर्वे किया और 24 संपत्तियों पर डिमोलिशन की कार्रवाई की, जबकि 27 संपत्तियों के लिए डिमोलिशन ऑर्डर जारी किए गए।
ऐसे में उन लोगों के मन में एक बड़ा सवाल उठ रहा है जिनकी बिल्डिंग या उसका कोई हिस्सा MCD की कार्रवाई में तोड़ा जा रहा है—क्या सरकार या नगर निगम उन्हें मुआवजा देगा?
इस सवाल का जवाब सीधा ‘हां’ या ‘नहीं’ नहीं है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि बिल्डिंग किस वजह से तोड़ी जा रही है, निर्माण वैध था या अनधिकृत, कार्रवाई किस कानूनी प्रावधान के तहत हो रही है और संपत्ति के मालिक के पास संबंधित मंजूरियां और दस्तावेज हैं या नहीं।
हर टूटी बिल्डिंग पर मुआवजा नहीं मिलता
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि MCD द्वारा किसी भवन को गिराया जाना और सरकार द्वारा किसी जमीन या संपत्ति का अधिग्रहण किया जाना एक ही बात नहीं है।
अगर किसी संपत्ति को सड़क, मेट्रो, सरकारी परियोजना या सार्वजनिक उद्देश्य के लिए वैध रूप से अधिग्रहित किया जाता है तो उस स्थिति में लागू भूमि अधिग्रहण कानूनों के तहत मुआवजे का सवाल उठ सकता है।
लेकिन अगर किसी इमारत को इसलिए हटाया जा रहा है क्योंकि उसमें अनधिकृत निर्माण, बिना मंजूरी का निर्माण या भवन नियमों का उल्लंघन पाया गया है, तो सामान्य तौर पर इसे सरकारी अधिग्रहण की तरह नहीं माना जाता। ऐसी स्थिति में मालिक को केवल इसलिए मुआवजा मिलने का अधिकार नहीं बन जाता कि उसकी बनाई हुई संरचना को MCD ने तोड़ दिया।
दिल्ली हाई कोर्ट के हालिया आदेश में DMC Act की धारा 343 का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि बिना स्वीकृति या स्वीकृति की शर्तों के विपरीत किए गए निर्माण के खिलाफ MCD demolition order जारी कर सकता है। कानून में ऐसे निर्माण को हटाने की प्रक्रिया निर्धारित है।
DMC Act की धारा 343 क्या कहती है?
दिल्ली नगर निगम अधिनियम यानी DMC Act में अनधिकृत निर्माण के खिलाफ कार्रवाई के लिए महत्वपूर्ण प्रावधान हैं।
धारा 343 के तहत यदि कोई भवन या निर्माण बिना आवश्यक मंजूरी के बनाया गया है, मंजूर नक्शे के विपरीत बनाया गया है या कानून अथवा उपनियमों का उल्लंघन करता है, तो निगम आयुक्त demolition order जारी कर सकते हैं।
हालांकि कानून में प्रक्रिया भी निर्धारित है। संबंधित व्यक्ति को सामान्य तौर पर यह अवसर दिया जाना चाहिए कि वह बताए कि demolition order क्यों जारी नहीं किया जाना चाहिए। हालिया दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश में धारा 343 के प्रावधान का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि demolition order से पहले उचित कारण बताने का अवसर दिया जाना चाहिए।
अर्थात MCD की कार्रवाई का आधार केवल यह नहीं हो सकता कि अधिकारी को कोई बिल्डिंग पसंद नहीं आई। कार्रवाई के पीछे कानूनी आधार और निर्धारित प्रक्रिया होनी चाहिए।
अगर निर्माण अवैध है तो मालिक को ही खर्च भी उठाना पड़ सकता है
यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि अनधिकृत निर्माण को हटाने का खर्च भी कुछ परिस्थितियों में संपत्ति के मालिक या संबंधित व्यक्ति से वसूला जा सकता है।
दिल्ली के एक मामले में अदालत के सामने MCD की ओर से जारी demolition order का विवरण आया, जिसमें कहा गया था कि यदि संबंधित व्यक्ति स्वयं अनधिकृत निर्माण नहीं हटाता तो MCD कार्रवाई कर सकती है और demolition पर आया खर्च उससे वसूला जा सकता है।
इसका अर्थ यह है कि अवैध निर्माण के मामले में स्थिति कई बार मुआवजा मिलने के बिल्कुल उलट हो सकती है। मालिक को मुआवजा मिलने के बजाय कार्रवाई का खर्च भी वहन करना पड़ सकता है।
MCD की आधिकारिक वेबसाइट पर भी demolition charges की recovery से संबंधित अलग आदेश और प्रक्रिया सूचीबद्ध है।
फिर किन मामलों में मुआवजे का सवाल उठ सकता है?
मुआवजा मुख्य रूप से इस बात से जुड़ा है कि संपत्ति को किस उद्देश्य से और किस कानूनी अधिकार के तहत हटाया जा रहा है।
अगर सरकार किसी वैध निजी संपत्ति को सार्वजनिक परियोजना के लिए अधिग्रहित करती है, तो मामला अलग होगा। ऐसे मामलों में लागू अधिग्रहण कानून और संबंधित अधिसूचना के आधार पर मुआवजे का निर्धारण हो सकता है।
लेकिन अगर MCD किसी अवैध मंजिल, अतिरिक्त निर्माण, बिना मंजूरी के बने हिस्से या खतरनाक संरचना को हटाती है, तो उसे भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई नहीं माना जा सकता।
इसलिए केवल यह तथ्य कि ‘मेरी बिल्डिंग टूट गई’ मुआवजे का अधिकार पैदा नहीं करता।
खतरनाक इमारत का मामला अलग हो सकता है
सत्य निकेतन हादसे के बाद MCD जिन इमारतों को खतरनाक मानकर कार्रवाई कर रही है, उनके मामले में भी परिस्थितियां अलग-अलग हो सकती हैं।
6 सितंबर को सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत गिरने के बाद उसके बगल की एक इमारत को भी MCD ने खतरनाक स्थिति में पाया और उसे हटाने की प्रक्रिया शुरू की। MCD का उद्देश्य ऐसी संरचना से आसपास के लोगों को संभावित खतरे से बचाना बताया गया है।
किसी भवन का पुराना होना अपने आप में उसे गिराने का पर्याप्त कारण नहीं है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार दिल्ली के नियमों में ऐसा कोई सामान्य प्रावधान नहीं है कि 50 साल पुरानी हर इमारत को अनिवार्य रूप से गिराना ही होगा। लेकिन अगर भवन संरचनात्मक रूप से असुरक्षित या खतरनाक पाया जाता है तो संबंधित प्राधिकरण कार्रवाई कर सकता है।
सिर्फ पुरानी होने से बिल्डिंग नहीं टूटती
सत्य निकेतन की घटना के बाद यह धारणा भी सामने आई कि बहुत पुरानी इमारतों को सीधे गिराया जा सकता है। लेकिन मामला इतना सरल नहीं है।
किसी भवन की उम्र और उसकी संरचनात्मक सुरक्षा अलग-अलग बातें हैं। 40 या 50 साल पुरानी इमारत जरूरी नहीं कि असुरक्षित हो और नई इमारत भी नियमों के उल्लंघन या खराब निर्माण के कारण जोखिम पैदा कर सकती है।
इसी वजह से दिल्ली सरकार ने PG हब जैसे क्षेत्रों में संरचनात्मक ऑडिट कराने और सार्वजनिक उपयोग वाली इमारतों के लिए नई सुरक्षा नीति पर विचार करने की दिशा में कदम उठाए हैं।
अगर बिल्डिंग वैध है तो क्या करें?
मान लीजिए किसी संपत्ति के मालिक के पास स्वीकृत बिल्डिंग प्लान है और MCD ने फिर भी demolition order जारी कर दिया। ऐसी स्थिति में मालिक को नोटिस को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
सबसे पहले यह देखना जरूरी है कि MCD ने किस प्रावधान के तहत कार्रवाई का आदेश दिया है। नोटिस में बताए गए कारण, संपत्ति का विवरण और कथित उल्लंघन को ध्यान से देखना चाहिए।
इसके बाद संबंधित व्यक्ति को उपलब्ध कानूनी remedy का इस्तेमाल करना चाहिए। DMC Act की धारा 343 में demolition order के खिलाफ appeal की व्यवस्था भी है। हालिया दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश में भी इस अपील व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।
ऐसे मामले में संपत्ति के दस्तावेज, स्वीकृत नक्शा, completion certificate, occupancy से जुड़े रिकॉर्ड और MCD के साथ हुई पत्राचार की प्रतियां सुरक्षित रखना महत्वपूर्ण हो सकता है।
बिना नोटिस के कार्रवाई हो तो?
कानून में demolition से पहले प्रक्रिया और संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर देने की व्यवस्था महत्वपूर्ण है। दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा उद्धृत DMC Act की धारा 343 में भी demolition order से पहले संबंधित व्यक्ति को कारण बताने का उचित अवसर देने का प्रावधान है।
हालांकि कुछ परिस्थितियों में तत्काल कार्रवाई के लिए अलग कानूनी प्रावधान लागू हो सकते हैं, खासकर जब किसी संरचना से तत्काल सार्वजनिक खतरा पैदा हो रहा हो। इसलिए हर मामले को एक ही नियम से नहीं देखा जा सकता।
अगर किसी मालिक को लगता है कि उसके खिलाफ प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, तो वह उचित कानूनी मंच पर आदेश को चुनौती दे सकता है।
सत्य निकेतन हादसे के बाद क्यों बढ़ी कार्रवाई?
सत्य निकेतन हादसे के बाद MCD ने दिल्ली के सभी 12 जोन में कार्रवाई तेज की है। MCD के अनुसार, दो दिनों में लगभग 1100 PG का सर्वे किया गया और बड़ी संख्या में संपत्तियों की जांच की गई।
इस अभियान का उद्देश्य सिर्फ पुरानी इमारतों को गिराना नहीं बताया गया है। MCD यह भी जांच रही है कि PG के रूप में इस्तेमाल की जा रही संपत्तियां भवन नियमों और सुरक्षा मानकों का पालन कर रही हैं या नहीं।
रिपोर्ट के अनुसार, 1 जून से 31 अगस्त 2026 के बीच MCD ने 959 संपत्तियों पर demolition action लिया था। 1 जून से 8 सितंबर के बीच 471 संपत्तियों को सील किया गया और 753 demolition orders जारी किए गए।
यानी मौजूदा अभियान एक बड़ी enforcement drive का हिस्सा है, जो सत्य निकेतन हादसे के बाद और तेज हो गई है।
अगर सिर्फ एक हिस्सा अवैध है तो पूरी बिल्डिंग टूटेगी?
जरूरी नहीं कि हर मामले में पूरी इमारत गिराई जाए। कार्रवाई इस बात पर निर्भर कर सकती है कि उल्लंघन किस हिस्से में है और उसे किस तरह हटाया जा सकता है।
उदाहरण के लिए अगर किसी इमारत में बिना मंजूरी के अतिरिक्त मंजिल बनाई गई है तो कार्रवाई उस अनधिकृत हिस्से पर केंद्रित हो सकती है। लेकिन अगर पूरी संरचना ही नियमों के गंभीर उल्लंघन में है या संरचनात्मक रूप से खतरनाक पाई जाती है, तो व्यापक demolition की जरूरत पड़ सकती है।
इसलिए मालिक को demolition notice में दर्ज वास्तविक कारण देखना चाहिए, न कि केवल मौके पर हो रही कार्रवाई के आधार पर निष्कर्ष निकालना चाहिए।
मुआवजा मांगने से पहले ये दस्तावेज रखें
अगर किसी मालिक को लगता है कि MCD की कार्रवाई गलत है और उसकी संपत्ति वैध थी, तो कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज बेहद उपयोगी हो सकते हैं:
- स्वीकृत बिल्डिंग प्लान
- निर्माण की अनुमति
- Completion/Occupancy Certificate, जहां लागू हो
- संपत्ति के स्वामित्व के दस्तावेज
- MCD से प्राप्त पुराने नोटिस और जवाब
- संपत्ति कर से जुड़े रिकॉर्ड
- बिजली-पानी कनेक्शन के दस्तावेज
- संरचनात्मक सुरक्षा से संबंधित रिपोर्ट
- demolition या sealing notice की प्रति
- कार्रवाई के फोटो और वीडियो
इन दस्तावेजों के आधार पर यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि कार्रवाई किस आधार पर हुई और क्या उसे कानूनी रूप से चुनौती देने का आधार बनता है।
सबसे जरूरी बात: मुआवजा अपने आप नहीं मिलता
दिल्ली में MCD द्वारा किसी बिल्डिंग को गिराए जाने की स्थिति में मुआवजा अपने आप मिलने का कोई सामान्य नियम नहीं है। यदि निर्माण अनधिकृत था और DMC Act के तहत वैध प्रक्रिया के बाद उसे गिराया जा रहा है, तो मालिक को सामान्य तौर पर मुआवजे की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। बल्कि कुछ मामलों में demolition का खर्च भी संबंधित व्यक्ति से वसूला जा सकता है।
दूसरी ओर, यदि मामला किसी वैध संपत्ति के सरकारी अधिग्रहण या किसी अलग कानूनी कार्रवाई से जुड़ा है, तो मुआवजे के नियम अलग हो सकते हैं।
इसी तरह यदि मालिक का दावा है कि MCD ने बिना उचित प्रक्रिया के या गलत तरीके से वैध संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है, तो वह उचित कानूनी मंच पर राहत या क्षतिपूर्ति की मांग कर सकता है। लेकिन ऐसी राहत मामले के तथ्यों और लागू कानून पर निर्भर करेगी।
दिल्ली में अभी क्या हो रहा है?
सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली में अवैध और असुरक्षित निर्माण के खिलाफ प्रशासन का रुख काफी सख्त हुआ है। MCD ने चार से अधिक मंजिल वाली अनधिकृत इमारतों की sealing को लेकर भी सख्त निर्देश जारी किए हैं।
साथ ही सरकार सार्वजनिक उपयोग वाली इमारतों, खासकर PG accommodation की सुरक्षा को लेकर नई नीति और structural audit पर काम कर रही है।
इसलिए आने वाले दिनों में दिल्ली में और भी इमारतों की जांच, sealing और demolition की कार्रवाई देखने को मिल सकती है।
निष्कर्ष
दिल्ली में MCD की ओर से किसी बिल्डिंग को तोड़े जाने का मतलब यह नहीं है कि उसके मालिक को उसकी कीमत का मुआवजा मिलेगा। अगर कार्रवाई अनधिकृत निर्माण, नियमों के उल्लंघन या खतरनाक संरचना के कारण हो रही है, तो सामान्य तौर पर मुआवजा नहीं मिलता और demolition का खर्च भी वसूला जा सकता है।
लेकिन अगर मामला वैध संपत्ति के सरकारी अधिग्रहण या किसी अलग कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा है, तो मुआवजे का सवाल अलग तरीके से तय होगा।
इसलिए जिस व्यक्ति की संपत्ति पर MCD ने नोटिस दिया है, उसे सबसे पहले नोटिस का कानूनी आधार समझना चाहिए। यदि निर्माण वैध होने के दस्तावेज मौजूद हैं या प्रक्रिया में कोई गंभीर कमी दिखाई देती है, तो निर्धारित समय के भीतर जवाब और उपलब्ध अपील या न्यायिक उपाय का इस्तेमाल करना महत्वपूर्ण है।
वर्तमान में दिल्ली में चल रही कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य अवैध और संभावित रूप से खतरनाक निर्माण को हटाकर सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है। सत्य निकेतन की त्रासदी के बाद प्रशासन का फोकस इसी दिशा में और तेज हुआ है।