दिल्ली के सत्य निकेतन में 40-50 साल पुरानी PG इमारत ढही, बेसमेंट में चल रही थी मरम्मत, तीन लोगों की मौत

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दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में रविवार, 6 सितंबर 2026 को एक दर्दनाक हादसे ने राजधानी में इमारतों की सुरक्षा और छात्रों के लिए चल रहे निजी PG की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के नजदीक एक पांच मंजिला इमारत अचानक भरभराकर गिर गई। इस इमारत का इस्तेमाल छात्रों के लिए पेइंग गेस्ट यानी PG के तौर पर किया जा रहा था।

हादसे में अब तक तीन लोगों की मौत हो चुकी है और नौ लोगों को मलबे से बाहर निकाला जा चुका है। कई लोगों के घायल होने की जानकारी है, जबकि हादसे के शुरुआती घंटों में बड़ी संख्या में लोगों के मलबे में फंसे होने की आशंका जताई गई थी। राहत और बचाव दल लगातार मलबे की जांच कर रहे हैं।

दिल्ली पुलिस के मुताबिक जिस इमारत में PG चल रहा था, वह करीब 40 से 50 साल पुरानी थी। हादसे के वक्त उसके बेसमेंट में मरम्मत का काम चल रहा था। हालांकि इमारत गिरने की वास्तविक वजह क्या थी, यह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। बेसमेंट में चल रहा काम और भवन की उम्र फिलहाल जांच के महत्वपूर्ण बिंदु हैं।

घटना के बाद दिल्ली पुलिस, दिल्ली फायर सर्विस, राष्ट्रीय आपदा मोचन बल यानी NDRF, दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, नगर निगम, CATS और सिविल डिफेंस की टीमें मौके पर पहुंचीं। संकरी गलियों के कारण बचाव अभियान में चुनौतियां भी सामने आईं। कई दमकल गाड़ियों और राहत वाहनों को घटनास्थल तक पहुंचाने में स्थानीय परिस्थितियों के कारण अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ी।

दोपहर में अचानक भरभराकर गिरी इमारत

घटना रविवार दोपहर करीब 1:30 बजे की बताई जा रही है। दिल्ली फायर सर्विस को दोपहर 1 बजकर 33 मिनट पर इमारत गिरने की सूचना मिली। इसके बाद दमकल की गाड़ियां घटनास्थल के लिए रवाना हुईं। पुलिस को भी लगभग इसी समय जानकारी मिली और राहत-बचाव का काम शुरू किया गया।

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक इमारत अचानक गिरी और देखते ही देखते पूरा ढांचा मलबे में बदल गया। आसपास के लोगों को कुछ समझने का मौका तक नहीं मिला। घटना के बाद इलाके में अफरा-तफरी मच गई और स्थानीय लोग भी तुरंत बचाव के लिए आगे आए।

कई स्थानीय लोगों ने अपने स्तर पर मलबा हटाने की कोशिश की। इसके बाद पुलिस और दमकलकर्मियों ने पूरे इलाके को सुरक्षित करते हुए व्यवस्थित तरीके से बचाव अभियान शुरू किया।

शुरुआत में स्थानीय लोगों ने बड़ी संख्या में छात्रों के मलबे में फंसे होने की आशंका जताई। कुछ प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार 20 से 30 या उससे अधिक लोग अंदर हो सकते थे, जबकि कुछ स्थानीय लोगों ने इससे भी ज्यादा संख्या का अनुमान लगाया। हालांकि अधिकारियों ने शुरुआत में स्पष्ट किया था कि मलबे में फंसे लोगों की वास्तविक संख्या तत्काल निर्धारित नहीं हो सकी थी।

मलबे के अंदर से आ रही थीं फोन कॉल

हादसे के बाद बचाव अभियान का सबसे भावुक और चिंताजनक हिस्सा यह रहा कि मलबे के अंदर फंसे कुछ लोगों से फोन पर संपर्क होने की बात सामने आई।

स्थानीय जनप्रतिनिधियों और पुलिस अधिकारियों ने बताया कि कुछ लोग मलबे के नीचे से फोन कर रहे थे। इससे बचाव दलों को उम्मीद मिली कि मलबे के अंदर कुछ लोग जीवित हो सकते हैं।

ऐसी परिस्थितियों में हर मिनट महत्वपूर्ण होता है। बचाव दलों को मलबा हटाते समय बेहद सावधानी बरतनी पड़ती है, क्योंकि भारी कंक्रीट स्लैब या लोहे के ढांचे को हटाने में थोड़ी सी लापरवाही अंदर फंसे लोगों के लिए जोखिम बढ़ा सकती है।

इसी वजह से राहतकर्मी मशीनों के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर हाथों से भी मलबा हटाते रहे। ऑक्सीजन सिलेंडर भी घटनास्थल पर लाए गए, ताकि यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक मलबे में फंसा हो तो उसे तत्काल ऑक्सीजन उपलब्ध कराई जा सके।

नौ लोगों को निकाला गया, तीन की मौत

बचाव अभियान आगे बढ़ने के साथ मलबे से लोगों को निकालने का सिलसिला शुरू हुआ। उपलब्ध जानकारी के अनुसार नौ लोगों को मलबे से निकालकर अस्पताल पहुंचाया गया।

बाद में मृतकों की संख्या तीन तक पहुंच गई। कुछ घायलों की हालत गंभीर बताई गई है और उन्हें अस्पतालों में उपचार के लिए भर्ती कराया गया।

हादसे के शुरुआती घंटों में अलग-अलग स्रोतों से मृतकों और घायलों के आंकड़े सामने आते रहे। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि बड़े भवन हादसे में बचाव अभियान के दौरान आंकड़े लगातार बदल सकते हैं। अंतिम स्थिति का आकलन मलबा पूरी तरह हटने और अस्पतालों से जानकारी मिलने के बाद ही संभव होता है।

40-50 साल पुरानी थी इमारत

इस हादसे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इमारत की उम्र है। पुलिस के अनुसार ढही हुई इमारत करीब 40 से 50 साल पुरानी थी।

इमारत में बेसमेंट के अलावा पांच ऊपरी मंजिलें थीं। इसका इस्तेमाल छात्रों के लिए PG के तौर पर किया जा रहा था। स्थानीय स्तर पर इसे ‘Hostel Daze’ के नाम से भी जाना जाता था।

पुरानी इमारत अपने आप में असुरक्षित हो, यह जरूरी नहीं है। लेकिन किसी पुराने भवन की सुरक्षा उसकी संरचना, रखरखाव, समय-समय पर किए गए बदलाव और वर्तमान उपयोग पर निर्भर करती है।

यदि किसी पुराने मकान को छात्रावास या PG में बदल दिया जाता है और उसमें बड़ी संख्या में लोग रहने लगते हैं, तो भवन की सुरक्षा की नियमित जांच और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

बेसमेंट में चल रहा था मरम्मत का काम

पुलिस के अनुसार हादसे के समय इमारत के बेसमेंट में मरम्मत का काम चल रहा था। यही पहलू अब जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यह पता लगाया जाएगा कि बेसमेंट में किस प्रकार की मरम्मत की जा रही थी, काम के लिए आवश्यक अनुमति ली गई थी या नहीं और क्या उस दौरान इमारत के किसी महत्वपूर्ण संरचनात्मक हिस्से में बदलाव किया गया था।

बेसमेंट में काम के दौरान नींव या सहायक ढांचे से किसी तरह की छेड़छाड़ हुई या नहीं, यह भी जांच का विषय हो सकता है।

स्थानीय लोगों ने पानी जमा होने और इमारत की नींव कमजोर होने जैसी बातें भी कही हैं। हालांकि ये स्थानीय दावे हैं और इन्हें हादसे की आधिकारिक वजह नहीं माना जा सकता। घटना की वास्तविक तकनीकी वजह विशेषज्ञ जांच के बाद ही सामने आएगी।

दिल्ली में लगातार बारिश भी एक पहलू

दिल्ली में पिछले कुछ दिनों से बारिश का दौर भी जारी था। बारिश के कारण पुराने भवनों में नमी, जलभराव और निर्माण संबंधी कमजोरियां सामने आ सकती हैं।

हालांकि किसी इमारत के गिरने के लिए सिर्फ बारिश को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। इस मामले में भी बारिश और भवन की संरचनात्मक स्थिति के बीच संबंध की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक बेसमेंट में पानी जमा हो रहा था। यदि यह तथ्य जांच में भी सामने आता है तो यह पता लगाना जरूरी होगा कि पानी जमा होने से भवन की संरचना पर कितना प्रभाव पड़ा था।

लेकिन फिलहाल इसे हादसे का अंतिम कारण कहना जल्दबाजी होगी।

सत्य निकेतन में बड़ी संख्या में छात्र रहते हैं

सत्य निकेतन दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के आसपास का प्रमुख छात्र क्षेत्र है। यहां अलग-अलग कॉलेजों में पढ़ने वाले विद्यार्थी बड़ी संख्या में PG और हॉस्टलों में रहते हैं।

इलाके में कई मकानों का इस्तेमाल छात्रों को किराये पर कमरे देने के लिए किया जाता है। इस वजह से यहां की इमारतों की सुरक्षा सीधे हजारों छात्रों की जिंदगी से जुड़ा विषय है।

हादसे के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या छात्र क्षेत्रों में चल रहे सभी PG की संरचनात्मक सुरक्षा और फायर सेफ्टी की नियमित जांच होती है।

कई छात्र जब किसी PG में कमरा लेते हैं तो वे किराया, कॉलेज से दूरी, भोजन, इंटरनेट और अन्य सुविधाओं को देखते हैं। भवन की संरचनात्मक सुरक्षा की जानकारी उनके लिए आसानी से उपलब्ध नहीं होती।

ऐसे में प्रशासन के लिए यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि छात्र आवास के रूप में इस्तेमाल होने वाली इमारतें न्यूनतम सुरक्षा मानकों का पालन करें।

संकरी गलियों ने बढ़ाई रेस्क्यू की चुनौती

सत्य निकेतन का इलाका घनी आबादी और संकरी गलियों वाला है। घटनास्थल के आसपास कई PG, दुकानें और खाने-पीने के प्रतिष्ठान हैं।

हादसे के बाद बड़ी संख्या में स्थानीय लोग मौके पर जमा हो गए। इससे राहत और बचाव वाहनों की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका भी सामने आई।

पुलिस और सुरक्षा बलों ने लोगों से घटनास्थल से दूर रहने की अपील की, ताकि एंबुलेंस, दमकल वाहन और बचाव दलों को आने-जाने में परेशानी न हो।

बड़े भवन हादसे में रास्ता खुला रखना बेहद महत्वपूर्ण होता है। एक तरफ जहां स्थानीय लोग अपने स्तर पर मदद करना चाहते हैं, वहीं भीड़ बढ़ने से बचाव अभियान प्रभावित हो सकता है।

इसीलिए पुलिस ने घटनास्थल के आसपास सुरक्षा व्यवस्था भी बढ़ाई।

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता मौके पर पहुंचीं

हादसे की जानकारी मिलने के बाद दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता भी घटनास्थल पर पहुंचीं और राहत-बचाव अभियान का जायजा लिया।

मुख्यमंत्री ने संबंधित एजेंसियों के अधिकारियों से स्थिति की जानकारी ली। दिल्ली सरकार की ओर से बताया गया कि DDMA, NDRF, दिल्ली फायर सर्विस, दिल्ली पुलिस, MCD, CATS और सिविल डिफेंस की टीमें संयुक्त रूप से अभियान चला रही हैं।

एहतियात के तौर पर हादसे से सटी एक इमारत को खाली कराने की जानकारी भी सामने आई है।

सरकार ने प्रभावित लोगों को तत्काल सहायता उपलब्ध कराने और मलबे में फंसे लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने की बात कही है।

पुलिस ने दर्ज की FIR

घटना के बाद दिल्ली पुलिस ने मामले में FIR दर्ज की है। पुलिस के अनुसार भवन के मालिक के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है और हादसे से जुड़े सभी पहलुओं की जांच की जा रही है।

जांच में यह देखा जाएगा कि इमारत की स्थिति क्या थी, उसमें PG संचालन के लिए आवश्यक नियमों का पालन किया गया था या नहीं और बेसमेंट में चल रहा मरम्मत का काम किस तरह किया जा रहा था।

यदि जांच में किसी तरह की लापरवाही, नियमों का उल्लंघन या बिना अनुमति निर्माण गतिविधि सामने आती है तो संबंधित लोगों की जिम्मेदारी तय की जा सकती है।

हालांकि FIR में नाम होना या पुलिस जांच का हिस्सा बनना अपने आप में दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है। अंतिम जिम्मेदारी न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर तय होगी।

PG संस्कृति पर फिर उठे सवाल

सत्य निकेतन हादसे ने दिल्ली में बढ़ती PG संस्कृति पर एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है।

दिल्ली विश्वविद्यालय और अन्य बड़े शिक्षण संस्थानों के आसपास छात्रों के लिए आवास की भारी मांग है। इस मांग के कारण पुराने मकानों को PG में बदलने का चलन बढ़ा है।

कई जगह एक ही भवन में बड़ी संख्या में छात्रों को कमरे या बेड उपलब्ध कराए जाते हैं। इससे भवन का इस्तेमाल उसके मूल आवासीय उपयोग से काफी अलग हो सकता है।

ऐसी स्थिति में भवन की संरचनात्मक क्षमता, बिजली व्यवस्था, आग से सुरक्षा, आपातकालीन निकास और अन्य मानकों की जांच जरूरी है।

यदि कोई मकान वर्षों पुराना है और उसमें कई स्तरों पर बदलाव किए गए हैं, तो उसकी इंजीनियरिंग जांच और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

अब आसपास की इमारतों की जांच की मांग

हादसे के बाद स्थानीय लोगों ने इलाके की दूसरी पुरानी इमारतों की स्थिति को लेकर भी चिंता जताई है।

यह चिंता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सत्य निकेतन और आसपास के इलाकों में बड़ी संख्या में पुराने मकान हैं, जिनमें से कई का इस्तेमाल PG, हॉस्टल, दुकान या अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जाता है।

यदि एक पुरानी इमारत में संरचनात्मक समस्या सामने आती है तो आसपास की समान उम्र और समान उपयोग वाली इमारतों की भी जांच करना प्रशासन के लिए उपयोगी हो सकता है।

ऐसी जांच का उद्देश्य किसी को परेशान करना नहीं बल्कि संभावित खतरे की पहचान पहले करना होना चाहिए।

अगर किसी भवन को खतरनाक पाया जाता है तो वहां रहने वाले लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना हादसे के बाद राहत पहुंचाने से कहीं बेहतर कदम होगा।

मृतकों और घायलों के परिवारों के सामने बड़ा संकट

किसी भी भवन हादसे का सबसे बड़ा असर उन परिवारों पर पड़ता है जिनके सदस्य इसमें फंस जाते हैं।

सत्य निकेतन में रहने वाले कई छात्र दूसरे राज्यों से आकर दिल्ली में पढ़ाई कर रहे थे। उनके परिवारों के लिए अचानक आई इस खबर ने चिंता और भय की स्थिति पैदा कर दी।

कई परिवार अपने बच्चों से संपर्क करने की कोशिश करते रहे। मलबे के अंदर से फोन आने की खबर ने उम्मीद और डर दोनों को बढ़ाया।

जो लोग अस्पताल पहुंचाए गए हैं, उनके इलाज और परिवारों को सहायता उपलब्ध कराना भी प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

मृतकों की पहचान और उनके परिवारों को सूचना देना भी राहत अभियान का अहम हिस्सा होता है।

सवाल सिर्फ एक इमारत का नहीं

सत्य निकेतन हादसे की जांच के साथ एक व्यापक सवाल भी सामने आया है—क्या दिल्ली में पुरानी इमारतों की नियमित संरचनात्मक जांच के लिए मौजूदा व्यवस्था पर्याप्त है?

दिल्ली में बड़ी संख्या में पुराने मकान हैं। कुछ ऐतिहासिक इलाकों में हैं, कुछ घनी आबादी वाले क्षेत्रों में और कुछ ऐसे स्थानों पर जहां छात्रों और कामकाजी युवाओं के लिए PG के रूप में उनका इस्तेमाल होता है।

इन इमारतों की सुरक्षा केवल उनकी उम्र से तय नहीं की जा सकती। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ नियमित निरीक्षण और रखरखाव की जरूरत जरूर बढ़ जाती है।

बेसमेंट में बदलाव, अतिरिक्त निर्माण, पानी का रिसाव, भारी सामान, कमजोर नींव और लगातार होने वाला निर्माण कार्य जैसे कारक भवन की सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए हादसे के बाद सिर्फ मलबा हटाना पर्याप्त नहीं है। उस कारण तक पहुंचना जरूरी है जिसने इमारत को गिरने की स्थिति में पहुंचाया।

अब जांच से मिलेंगे कई सवालों के जवाब

सत्य निकेतन हादसे की तकनीकी जांच में कई सवालों के जवाब तलाशे जाएंगे।

क्या इमारत की उम्र और संरचनात्मक स्थिति की पहले कभी जांच हुई थी? बेसमेंट में किस प्रकार का मरम्मत कार्य चल रहा था? क्या इसके लिए अनुमति थी? क्या भवन का इस्तेमाल PG के रूप में करने के लिए सभी आवश्यक नियमों का पालन किया गया था? क्या इमारत में रहने वाले लोगों की संख्या उसकी क्षमता के अनुरूप थी? क्या किसी तरह की पूर्व चेतावनी या शिकायत प्रशासन तक पहुंची थी?

इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही हादसे की पूरी तस्वीर स्पष्ट होगी।

फिलहाल प्राथमिकता मलबे में फंसे लोगों की तलाश और घायलों के इलाज की है। इसके बाद जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

एक और दर्दनाक चेतावनी

सत्य निकेतन की घटना दिल्ली के लिए सिर्फ एक स्थानीय हादसा नहीं है। यह राजधानी में भवन सुरक्षा को लेकर लगातार सामने आ रही चिंताओं की एक और गंभीर कड़ी है।

सबसे दुखद पहलू यह है कि जिस इमारत में छात्र अपने भविष्य के सपने लेकर रह रहे थे, वही इमारत अचानक मलबे में बदल गई।

40 से 50 साल पुरानी इमारत, बेसमेंट में चल रही मरम्मत, PG में रह रहे छात्र और संकरी गलियों में बचाव अभियान—इन सभी पहलुओं ने घटना को और गंभीर बना दिया है।

अब जरूरी है कि जांच केवल हादसे की वजह तक सीमित न रहे। यदि किसी नियम का उल्लंघन सामने आता है तो जिम्मेदारी तय हो, लेकिन साथ ही आसपास और दिल्ली के अन्य छात्र इलाकों में मौजूद जोखिम वाली इमारतों की पहचान भी की जाए।

क्योंकि किसी हादसे के बाद मलबे से लोगों को निकालना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि अगली इमारत गिरने से पहले खतरे को पहचान लिया जाए।

सत्य निकेतन में तीन लोगों की मौत ने कई परिवारों को गहरा सदमा दिया है। नौ लोगों को बचाया जा चुका है और राहत-बचाव अभियान के दौरान एजेंसियां लगातार काम कर रही हैं। इस घटना की पूरी सच्चाई जांच के बाद सामने आएगी, लेकिन फिलहाल यह हादसा दिल्ली के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है—पुरानी और कमजोर इमारतों की सुरक्षा की अनदेखी की कीमत बेहद भारी हो सकती है।

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