देवरिया में 48 घंटे के भीतर एक परिवार पर टूटा कहर, पहले सैनिक की मौत फिर हादसे में बेटे और भाई ने गंवाई जान, एक साथ उठीं तीन अर्थियां

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उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में एक परिवार के साथ ऐसा हादसा हुआ, जिसने पूरे गांव को गहरे सदमे में डाल दिया। महज 48 घंटे के भीतर एक ही परिवार के तीन सदस्यों की मौत हो गई और एक साथ तीन अर्थियां उठीं। जिस परिवार में एक सदस्य की मौत के बाद अंतिम विदाई की तैयारी हो रही थी, वहां अचानक दो और अपनों के शव पहुंच गए। देखते ही देखते एक घर का दुख तीन गुना हो गया और पूरा गांव शोक में डूब गया।

यह दर्दनाक घटनाक्रम देवरिया के रुद्रपुर क्षेत्र के गहिला-दुधैला गांव से जुड़ा है। परिवार के करीब 50 वर्षीय सत्यवान सिंह भारतीय थल सेना में सूबेदार मेजर के पद पर तैनात थे। वह लंबे समय से किडनी संबंधी बीमारी से परेशान थे और चंडीगढ़ के पंचकूला में उनका इलाज चल रहा था। परिवार को उम्मीद थी कि इलाज के बाद उनकी हालत सुधरेगी और वह स्वस्थ होकर घर लौटेंगे। लेकिन शनिवार को परिवार की यह उम्मीद अचानक टूट गई। सत्यवान सिंह का निधन हो गया।

सत्यवान के निधन के बाद परिवार के सामने सबसे बड़ा काम उनके पार्थिव शरीर को चंडीगढ़ से देवरिया स्थित पैतृक गांव तक लाने का था। उनके बड़े भाई रामसमुझ सिंह अपने छोटे भाई को अंतिम बार घर पहुंचाने के लिए चंडीगढ़ पहुंचे। परिवार का 18 वर्षीय बेटा गौरव सिंह भी इस अंतिम यात्रा में शामिल हुआ। एंबुलेंस में सत्यवान सिंह का पार्थिव शरीर रखा गया और उनके बड़े भाई रामसमुझ तथा बेटा गौरव भी साथ चल पड़े।

किसी ने कल्पना तक नहीं की थी कि यह यात्रा इतनी भयावह त्रासदी में बदल जाएगी।

भाई को आखिरी सफर में अकेला नहीं छोड़ना चाहते थे रामसमुझ

रामसमुझ सिंह और सत्यवान सिंह स्वर्गीय जयसिंह के दो बेटे थे। दोनों भाइयों के बीच बेहद करीबी संबंध होने की बात परिवार से जुड़े लोगों ने बताई। रामसमुझ सिंह डाक विभाग में पोस्टमास्टर रह चुके थे, जबकि उनके छोटे भाई सत्यवान सिंह भारतीय सेना में सूबेदार मेजर थे।

दोनों भाइयों ने अपने-अपने क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई थी। लेकिन पेशेवर जिंदगी से अलग उनके बीच पारिवारिक जुड़ाव भी मजबूत था। जब सत्यवान सिंह का निधन हुआ तो बड़े भाई रामसमुझ चंडीगढ़ पहुंचे। छोटे भाई का शव घर लाने की जिम्मेदारी को उन्होंने सिर्फ एक औपचारिकता की तरह नहीं लिया। वह खुद एंबुलेंस में बैठकर अपने भाई के पार्थिव शरीर के साथ देवरिया के लिए रवाना हुए।

परिवार के लिए यह एक भावुक यात्रा थी। एक भाई अपने उस भाई को अंतिम बार घर लेकर लौट रहा था जिसके साथ उसने जीवन का लंबा हिस्सा बिताया था। साथ में सत्यवान का 18 वर्षीय बेटा गौरव भी था। उसके लिए यह अपने पिता को आखिरी बार घर पहुंचाने का सफर था।

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

एंबुलेंस में था पिता का शव, साथ बैठा था 18 साल का बेटा

एंबुलेंस में सत्यवान सिंह का पार्थिव शरीर था। उनके बड़े भाई रामसमुझ सिंह और 18 वर्षीय बेटे गौरव सिंह भी उसी वाहन में सवार थे। परिवार के दूसरे लोग फोन के जरिए एंबुलेंस की लोकेशन जान रहे थे और घर पर उनके पहुंचने का इंतजार कर रहे थे।

गांव में लोग जानते थे कि सत्यवान सिंह का पार्थिव शरीर आने वाला है। अंतिम दर्शन के बाद सैनिक को सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी जानी थी। परिवार और ग्रामीणों के लिए यह बेहद भावुक लेकिन सामान्य अंतिम संस्कार की तैयारी थी।

लेकिन रास्ते में अचानक सब कुछ बदल गया।

पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर सुल्तानपुर जिले के क्षेत्र में एंबुलेंस एक भीषण सड़क हादसे का शिकार हो गई। हादसा इतना गंभीर था कि उसमें सवार लोगों को बचाया नहीं जा सका। सत्यवान सिंह का शव लेकर चल रहे उनके बड़े भाई रामसमुझ सिंह और 18 वर्षीय बेटे गौरव सिंह की भी मौत हो गई।

एंबुलेंस में मौजूद राजन चौधरी और चालक जसपाल की भी इस दुर्घटना में जान चली गई। इस तरह हादसे में चार लोगों की मौत हुई, जबकि जिस व्यक्ति के पार्थिव शरीर को घर ले जाया जा रहा था, उसकी मृत्यु पहले ही हो चुकी थी।

एक ही सफर में परिवार के दो और सदस्य हमेशा के लिए बिछड़ गए।

जिस फोन का इंतजार था, उसी से आई मौत की खबर

गहिला-दुधैला गांव में लोग एंबुलेंस के पहुंचने का इंतजार कर रहे थे। परिवार के लोग फोन पर उसकी लोकेशन पूछ रहे थे। हर किसी की निगाह इस बात पर थी कि एंबुलेंस कितनी दूर पहुंची है और गांव तक आने में कितना समय लगेगा।

लेकिन अचानक खबर आई कि एंबुलेंस का एक्सीडेंट हो गया है।

पहले लोगों को शायद हादसे की गंभीरता का अंदाजा नहीं था। लेकिन जैसे-जैसे जानकारी सामने आई, परिवार और गांव में चीख-पुकार मच गई। 18 वर्षीय गौरव की मौत की खबर आई। इसके बाद पता चला कि रामसमुझ सिंह भी इस हादसे में नहीं बच सके।

फिर एंबुलेंस चालक जसपाल और साथ चल रहे राजन चौधरी की मौत की जानकारी सामने आई।

जिस घर में कुछ समय पहले तक एक व्यक्ति के निधन का दुख था, वहां अब दो और अपनों की मौत की खबर पहुंच चुकी थी।

परिवार को यह समझने में भी समय लग रहा था कि कुछ ही घंटों के अंतराल में उसके साथ इतना बड़ा हादसा कैसे हो गया।

एक पिता का अंतिम सफर बेटे की भी अंतिम यात्रा बन गया

गौरव सिंह महज 18 वर्ष के थे। वह अपने पिता को आखिरी बार घर लाने के लिए एंबुलेंस में उनके साथ चल रहे थे। किसी बेटे के लिए इससे ज्यादा भावुक परिस्थिति शायद ही कोई हो सकती है कि वह अपने पिता के पार्थिव शरीर के साथ अंतिम यात्रा पर निकले।

लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि यह यात्रा गौरव की जिंदगी की भी आखिरी यात्रा बन जाएगी।

वह अपने पिता को घर लाने निकला था, लेकिन हादसे के बाद उसका शव भी उसी गांव पहुंचा। एक पिता, जिसकी मौत बीमारी के कारण हुई थी, उसके अंतिम संस्कार की तैयारी के साथ अब बेटे की अंतिम विदाई की तैयारी भी करनी पड़ी।

परिवार के लिए यह सदमा इसलिए भी असहनीय था क्योंकि गौरव अभी जीवन की शुरुआत में था। 18 वर्ष की उम्र में उसके सामने पढ़ाई, करियर और भविष्य के अनेक रास्ते थे। लेकिन एक सड़क हादसे ने अचानक सब कुछ खत्म कर दिया।

रामसमुझ के परिवार पर भी टूटा दुखों का पहाड़

रामसमुझ सिंह की मौत ने उनके परिवार को भी पूरी तरह तोड़ दिया। उनकी पत्नी शीला देवी को जब पति की मौत की खबर मिली तो वह बेसुध हो गईं। उनके तीन बेटे विवेक, विकास और विनीत के सामने अचानक पिता का साया उठ गया।

रामसमुझ अपने छोटे भाई सत्यवान के पार्थिव शरीर को लेकर घर लौट रहे थे। उन्हें उम्मीद थी कि वह अपने भाई की अंतिम यात्रा पूरी कराएंगे और परिवार के साथ अंतिम संस्कार में शामिल होंगे।

लेकिन वह खुद घर वापस नहीं लौट सके।

जिस व्यक्ति ने छोटे भाई को आखिरी सफर में अकेला नहीं छोड़ा, वही बड़ा भाई इस सफर में खुद दुनिया छोड़ गया।

यह घटना परिवार के रिश्तों की गहराई और उस यात्रा की भयावहता को और भी मार्मिक बना देती है। एक भाई ने अपने छोटे भाई के साथ आखिरी सफर करने का फैसला किया था, लेकिन रास्ते में दोनों भाइयों के परिवारों पर एक साथ ऐसा दुख टूट पड़ा जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।

48 घंटे में तीन मौतों से गांव में पसरा मातम

सत्यवान सिंह की मौत शनिवार को हुई। इसके बाद एंबुलेंस हादसे में उनके बड़े भाई रामसमुझ सिंह और बेटे गौरव सिंह की मौत हो गई। यानी लगभग 48 घंटे के भीतर एक ही परिवार के तीन सदस्यों की जिंदगी खत्म हो गई।

गांव में यह खबर फैलते ही मातम छा गया।

ग्रामीणों के लिए यह घटना केवल सड़क हादसा नहीं थी। यह एक पूरे परिवार के अचानक उजड़ जाने की कहानी थी। जिस परिवार के तीन सदस्य अलग-अलग भूमिकाओं में समाज और देश से जुड़े हुए थे, उनके शव एक साथ गांव पहुंचे।

एक तरफ सेना में सेवा देने वाले सत्यवान सिंह का पार्थिव शरीर था। दूसरी तरफ उनका 18 वर्षीय बेटा गौरव था। तीसरी ओर उनके बड़े भाई रामसमुझ सिंह का शव था।

तीनों को एक साथ अंतिम विदाई देने की स्थिति ने ग्रामीणों को भी भावुक कर दिया।

गांव में जब पहुंचे तीनों शव

सोमवार सुबह शव गांव पहुंचे तो गहिला-दुधैला में बड़ी संख्या में लोग जमा हो गए। परिवार के लोगों का रो-रोकर बुरा हाल था। महिलाओं के विलाप और परिजनों की चीख-पुकार से माहौल बेहद गमगीन हो गया।

लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस परिवार में एक व्यक्ति की अंतिम यात्रा के लिए लोग जमा होने वाले थे, उसी परिवार के तीन सदस्यों की अर्थियां एक साथ उठेंगी।

सत्यवान सिंह के पार्थिव शरीर को सेना के अधिकारियों की मौजूदगी में गांव लाया गया। उनके अंतिम संस्कार में सैन्य सम्मान भी दिया गया। सेना के अधिकारियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी और सलामी दी।

एनसीसी कैडेट्स भी अंतिम विदाई में पहुंचे। बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी।

सत्यवान सिंह की अंतिम यात्रा के दौरान देशभक्ति के नारे भी लगाए गए। लेकिन उस माहौल में मौजूद तीन शवों का दृश्य हर किसी को भीतर तक झकझोर रहा था।

एक अर्थी पर तिरंगा, दूसरी पर बेटा, तीसरी पर भाई

इस घटना की सबसे मार्मिक तस्वीर यही थी कि एक ही परिवार से तीन अर्थियां उठीं।

एक अर्थी उस सैनिक की थी जिसने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा देश की सेवा में लगाया। उस पर तिरंगा था और उन्हें सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई।

दूसरी अर्थी उनके 18 वर्षीय बेटे गौरव की थी, जिसने अपने पिता को आखिरी बार घर पहुंचाने के लिए उनके साथ सफर किया था।

तीसरी अर्थी बड़े भाई रामसमुझ सिंह की थी, जो अपने छोटे भाई को अकेले अंतिम सफर पर भेजना नहीं चाहते थे।

एक परिवार के तीन अलग-अलग रिश्ते कुछ ही समय में मौत के सामने खत्म हो गए।

यह दृश्य गांव में मौजूद लोगों के लिए लंबे समय तक भूल पाना आसान नहीं होगा।

सैनिक के परिवार पर दोहरी नहीं, तिहरी मार

सत्यवान सिंह की मौत पहले ही परिवार के लिए बड़ा आघात थी। बीमारी के कारण लंबे समय से उनका इलाज चल रहा था। परिवार को उम्मीद थी कि इलाज के बाद वह वापस घर आएंगे। लेकिन उनके पार्थिव शरीर के लौटने की खबर ने घर को पहले ही दुख में डुबो दिया था।

इसके बाद सड़क हादसे ने परिवार को दूसरा बड़ा झटका दिया।

गौरव की मौत ने पिता के दुख को और गहरा कर दिया। इसके साथ ही रामसमुझ सिंह की मौत ने परिवार के एक और मजबूत सदस्य को छीन लिया।

इस तरह एक परिवार को कुछ ही समय में तीन अपनों को खोना पड़ा।

ऐसे समय में किसी भी परिवार के लिए स्थिति को संभालना बेहद मुश्किल होता है। एक ओर अंतिम संस्कार की जिम्मेदारियां होती हैं, तो दूसरी ओर अचानक टूटे परिवार को संभालने की चुनौती सामने होती है।

हादसे में चार लोगों की मौत

पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर हुए इस हादसे में कुल चार लोगों की मौत की जानकारी सामने आई है। इनमें सत्यवान सिंह के बड़े भाई रामसमुझ सिंह, उनके बेटे गौरव सिंह, एंबुलेंस चालक जसपाल और साथ चल रहे राजन चौधरी शामिल थे।

सत्यवान सिंह की मौत इससे पहले बीमारी के कारण हो चुकी थी।

इस तरह पूरे घटनाक्रम में एक परिवार के तीन लोगों की मौत हुई, जबकि एंबुलेंस में मौजूद दो अन्य लोगों ने भी जान गंवाई। यह हादसा केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे जुड़े अन्य परिवारों को भी गहरा नुकसान हुआ।

अंतिम विदाई में उमड़ी भीड़

सत्यवान सिंह की अंतिम विदाई में बड़ी संख्या में ग्रामीण पहुंचे। सेना के अधिकारियों और एनसीसी कैडेट्स ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी। उत्तर प्रदेश सरकार में कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने भी मृतकों के अंतिम दर्शन कर श्रद्धांजलि अर्पित की।

अंतिम विदाई के दौरान माहौल बेहद भावुक था। एक ओर सैनिक के सम्मान में नारे लगाए जा रहे थे, वहीं दूसरी ओर परिवार के सदस्य अपने तीन अपनों को खोने के दर्द में डूबे थे।

गांव के लोगों के लिए यह केवल किसी परिवार की निजी त्रासदी नहीं थी। पूरा गांव इस दुख में परिवार के साथ खड़ा दिखाई दिया।

हादसे ने कई सवाल भी छोड़ दिए

यह घटना एक बार फिर लंबी दूरी की सड़क यात्राओं और एंबुलेंस सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े करती है। हालांकि हादसे के कारणों को लेकर जांच और आधिकारिक जानकारी महत्वपूर्ण होगी, लेकिन इतनी बड़ी दुर्घटना में एक साथ कई लोगों की जान जाना बेहद गंभीर घटना है।

जब किसी मरीज या मृतक के पार्थिव शरीर को लंबी दूरी तक सड़क मार्ग से ले जाया जाता है, तब चालक और वाहन की सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण होती है। इस घटना के बाद भी यही सवाल सामने आता है कि यात्रा किस परिस्थिति में हुई और दुर्घटना किस वजह से हुई।

हालांकि, किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले जांच से सामने आने वाली आधिकारिक जानकारी का इंतजार करना जरूरी है।

परिवार के लिए बदल गया पूरा जीवन

कुछ ही दिनों पहले तक इस परिवार में अलग-अलग जिम्मेदारियों और भविष्य की योजनाओं को लेकर सामान्य जीवन चल रहा था। सत्यवान सिंह सेना में सेवा दे रहे थे। उनके बड़े भाई रामसमुझ अपने जीवन और परिवार में व्यस्त थे। गौरव की उम्र अभी महज 18 वर्ष थी और उसके सामने पूरा भविष्य था।

लेकिन एक बीमारी और उसके बाद एक सड़क हादसे ने परिवार की तस्वीर बदल दी।

सत्यवान सिंह की बीमारी से हुई मौत अपने आप में बड़ा दुख थी। लेकिन उनके पार्थिव शरीर को घर लाते समय हुए हादसे में बेटे और भाई की मौत ने उस दुख को असहनीय बना दिया।

एक परिवार के लिए 48 घंटे का समय जिंदगी और मौत के बीच की ऐसी कहानी बन गया, जिसे वह शायद पूरी जिंदगी नहीं भूल पाएगा।

तीन अर्थियां, एक परिवार और अनगिनत सवाल

गहिला-दुधैला गांव में जब तीन अर्थियां उठीं तो लोगों के सामने केवल तीन शव नहीं थे, बल्कि तीन अलग-अलग रिश्तों की अंतिम विदाई थी।

एक पिता, एक बेटा और एक भाई।

सत्यवान सिंह अपने परिवार को छोड़कर चले गए। उनके बेटे गौरव ने पिता को आखिरी बार घर पहुंचाने की कोशिश में अपनी जान गंवा दी। रामसमुझ अपने छोटे भाई के अंतिम सफर में साथ रहे और उसी सफर में उनकी भी मौत हो गई।

इस पूरी घटना ने एक ही परिवार को ऐसा घाव दिया है, जिसे भरने में शायद बहुत लंबा समय लगेगा।

सबसे दुखद बात यह रही कि परिवार जिस एंबुलेंस के घर पहुंचने का इंतजार कर रहा था, उसी एंबुलेंस से एक के बाद एक मौत की खबर आई। घरवालों को उम्मीद थी कि कुछ देर बाद वे सत्यवान के अंतिम दर्शन करेंगे। उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि उनके साथ दो और अपनों के शव भी पहुंचेंगे।

देवरिया की यह घटना इस बात की याद दिलाती है कि जिंदगी कितनी अनिश्चित हो सकती है। कभी-कभी कुछ ही घंटों में परिस्थितियां इतनी बदल जाती हैं कि पूरा परिवार अपनी पुरानी जिंदगी में वापस नहीं लौट पाता।

सत्यवान सिंह को सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई मिली। उनके बेटे गौरव और बड़े भाई रामसमुझ को भी अंतिम विदाई दी गई। गांव के लोगों ने परिवार के साथ खड़े होकर इस कठिन समय में अपनी संवेदना व्यक्त की।

लेकिन इस परिवार के लिए यह सिर्फ एक अंतिम संस्कार नहीं था। यह एक साथ तीन रिश्तों को खोने का दर्द था।

जिस गांव में लोग एक सैनिक की अंतिम विदाई के लिए जमा हुए थे, वहां तीन अर्थियां उठीं। और शायद इसी वजह से वहां मौजूद हर व्यक्ति की जुबान पर यही बात थी कि आखिर इतनी बड़ी त्रासदी एक ही परिवार के हिस्से में इतनी जल्दी कैसे आ गई।

48 घंटे के भीतर तीन मौतों की यह घटना देवरिया के गहिला-दुधैला गांव में लंबे समय तक याद की जाएगी। एक सैनिक की बीमारी से हुई मौत, उसे घर लाने निकले बेटे और भाई की सड़क हादसे में मौत और फिर एक साथ उठी तीन अर्थियां, इस पूरे घटनाक्रम ने एक परिवार को ऐसा दुख दिया है जिसकी भरपाई संभव नहीं है।

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